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22 सितंबर 2012

दुर्गा पूजा की परंपरा


अपने देश में दुर्गा पूजा का इतिहास काफी पुराना है। इसके प्रमाण 12वीं सदी से ही मिलते हैं। आज यह एक सामुदायिक उत्सव बन चुका है। सच्चाई यह है कि समय के साथ इसमें बदलाव भी होते रहे हैं। पहले जहां राजा या अमीर ही यह पूजा करवाते थे, वहीं आज यह क्लबों, संगठनों और सोसाइटीज भी कराने लगी हैं। प्रारंभ में जहां मां दुर्गा की पूजा अकेले की जाती थी, वहीं आज शक्ति स्वरूपा को उनके पूरे परिवार के साथ पूजा जाता है। 

आजकल दुर्गा का सबसे मान्य रूप आठ हाथों वाली मां दुर्गा की मूर्ति है, जो शेर पर सवार हैं। उनके दो हाथों को छोड़कर हर हाथ में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र हैं। शेष दोनों हाथों से वह भाला पकड़े हुए हैं, जो महिषासुर की छाती में घुसा हुआ है। दुर्गा पूजा के लिए तैयार की जाने वाली ज्यादातर मूर्तियों में देवी के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक को भी दर्शाया जाता है। इनमें से लक्ष्मी धन की देवी हैं। सरस्वती ज्ञान और बुद्घि की भगवती हैं। कार्तिक रूप के देवता हैं और गणेश के बिना किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं हो सकती। 

ड्रम बजाना दुर्गा पूजा का अहम अंग माना जाता है। ड्रम के कई प्रकार हैं, जिन्हें काफी पसंद किया जाता है। 'ढाक' ऐसा ही ड्रम है, जिसे कोलकाता के लोग खूब पसंद करते हैं। इसे षष्ठी के दिन से ही बजाया जाता है। इसे एक तरफ मोटी और दूसरी तरफ पतली छड़ी से थाप दी जाती है। यूं तो दुर्गा पूजा का आयोजन दस दिनों तक किया जाता है, लेकिन कोलकाता में मुख्य पूजा का आरंभ भी षष्ठी की शाम से ही माना जाता है। इसके कुछ घंटों के बाद ही सप्तमी आरंभ हो जाती है।

इस दिन मां देवी में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। परंपरा है कि देवी के प्राण नजदीकी नदी से लाकर देवी की मूर्ति में प्रतिष्ठापित किए जाते हैं। इसके बाद मुख्य पूजा की शुरुआत होती है। इसके लिए सबसे मुख्य समय अष्टमी और नवमी के मिलन का होता है, जिसे संदिक्षण काल कहते हैं। इसके बाद नवमी और फिर दशमी को मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता है। 
पूजा की रस्म 

आश्विन के पहले चांद के साथ ही मां की पूजा शुरू हो जाती है, जबकि मां की मूर्ति की पूजा महाअष्टमी से प्रारंभ होती है यानी तीन दिनों की ही मुख्य पूजा होती है, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी। विभिन्न विधि-विधानों, मंत्र और श्लोकों से स्तुति के साथ ही पूजा आरंभ होती है। फिर आरती के साथ ही समापन भी हो जाता है। 

महाषष्ठी : इस दिन मां के चेहरे से पर्दे को हटाया जाता है। इस प्रक्रिया में भी विधि पर काफी ध्यान दिया जाता है। 

महासप्तमी : इस दिन नौ तरह के पेड़ों की पूजा मां दुर्गा का प्रतीक समझकर की जाती है। 

महाअष्टमी : अष्टमी के दिन पंडालों में मां के दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। घरों में होने वाली पूजा में कुंआरी पूजा का खास महत्व है। इसी दिन संधि पूजा भी कराई जाती है, जो अष्टमी और नवमी को जोड़ने के लिए होती है। 

महानवमी : संधि पूजा के समापन के साथ ही महानवमी आरंभ हो जाती है। इसी दिन देवी को भोग भी लगाया जाता है। 

दशमी : मां को अश्रुपूर्ण विदाई इसी दिन की जाती है। मां की मूर्ति को तालाब या नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। इसी दिन विजयादशमी का पर्व पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है। 

21 सितंबर 2012

भगवती दुर्गा की आराधना क्यों और कैसे


भगवती दुर्गा की आराधना का सर्वोत्तम अवसर नवरात्र हैं जिसके हर दिन भगवती के नवीन स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है और जप-पाठ आदि के धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। श्रद्धालु भक्त भगवती के नव स्वरूपों की पूजा कर कृतार्थ होते हैं और देवी की अनुकपा से उनके सभी मनोरथ पूरे होते हैं। चाहे कोई भी संकट हों, विघ्न-बाधाओं के बादल प्रलय ढाने को तैयार हों, ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव हों – हर प्रकार की कठिनाइयां भगवती दुर्गा के आशीर्वाद से दूर हो जाती हैं। यही वजह है कि सनातन काल से लोग भगवती की नवरात्रों में विशेष पूजा किया करते हैं। नवरात्र के अवसर पर प्रस्तुत हैं माकण्डेय पुराण से संकलित देवी माहात्म्य को रेखांकित करने वाली प्रथम चरित्र-कथा जिसमें भगवती ने मधु कैटभ दैत्य का संहार किया था। कौष्टुकि मुनि के पूछने पर महर्षि मार्कण्डेय जी ने उन्हें श्री शनिदेव के भ्राता सावर्णि मनु की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाने के बाद उनके मन्वंतर के स्वामी बनने का आख्यान सुनाने के क्रम में भगवती के प्रथम चरित्र का भी गान किया।
मार्कण्डेय जी बोले – सूर्य के पुत्र साविर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो। सूर्य कुमार महाभाग सवर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल की बात है,स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था । वे प्रजा का अपने और पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे। फिर भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये। राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्ध भूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।
राजा का बल क्षीण हो चला था, इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये। वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिसंक जीव (अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर) परम शान्त भाव से रहते थे। मुनि के बहुत से शिष्य उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वहां जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनि श्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे। फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे – पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वहीं नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं को अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना भी खाली हो जायेगा। ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरंतर सोचते रहते थे।
एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा – भाई, तुम कौन हो? यहां तुम्हारे आने का क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखायी देते हो? राजा सुरथ का यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा – राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दुखी होकर मैं वन में चला आया हँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों का कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं, अथवा उन्हें कोई कष्ट है? वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं?
राजा ने पूछा – जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?
वैश्य बाला – आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं, वह सब ठीक है। किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलाञ्जलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते, गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है – इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हँ और मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है, तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करुँ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं – तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरंभ किया।
राजा ने कहा – भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। मुनिश्रेष्ठ जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता हो रही है। यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है, यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसको छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदय में उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग हम दोनों समझदार है,तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेकशून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है।
ऋषि बोले – महाभाग, विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं, किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है तथा जैसी मनुष्यों की होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनों में समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, यह स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं। नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवाती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही पराविद्या, संसार-बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी तथा संपूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।
राजा ने पूछा – भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे, उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।
ऋषि बोले – राजन्! वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकटय अनेक प्रकार से होता है। वह मुझ से सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं को कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अन्त में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग् हो रहा था और सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों की मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये।
भगवान विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा जी ने कहा – देवि तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तम्ही वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुम से ही इस जगत की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्ही कल्प के अंत में सबको अपना ग्रास बना लेती हो।
जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्रीं और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लाज्जा , पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ – ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो – इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्याधिक सुन्दरी हो। पर और अपर – सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो।
सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हींहो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार णकरते हैं, उन भगवान को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान शंकर को तथा भगवान विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है। अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्घर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।
ऋषि कहते हैं – राजन्! जब ब्रह्मा जी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान विष्णु को जगाने के लिए तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी।
योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत के स्वामी भगवान जनार्दन उस एकावर्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे और क्रोध से ऑंखें लाल किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान श्री हरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहु युद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था, इसलिये वे भगवान विष्णु से कहने लगे – हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।
श्री भगवान् बोले – यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।
ऋषि कहते हैं – इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत में जल ही जल देखा तब कमलनयन भगवान से कहा – जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो।
ऋषि कहते हैं- तब तथास्तु कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं।

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दुर्गा सप्तशती में भगवती दुर्गा के सुन्दर इतिहास के साथ-साथ गूढ़ रहस्यों का भी वर्णन किया गया है। राजा सुरथ ने भी दुर्गा आराधना से ही अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया था। न जाने कितने की आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा मंत्र साधक माँ दुर्गा के सिद्ध मंत्र की साधना कर अपने मनोरथों को पूरा करने में सफलता प्राप्त कर चुके हैं। नवरात्रों अथवा ग्रहण काल में दुर्गा मंत्र की साधना कर आप भी अपने मनोरथ पूर्ण कर सकते हैं। यह मंत्र साधना सभी प्रकार के फल प्रदान करती है। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नम: – यह आठ अक्षरों का भगवती दुर्गा का सिद्धि मंत्र है जिसका पाठ रक्तचन्दन की 108 दाने की माला से प्रतिदिन शुद्ध अवस्था में साधक को करना चाहिये।

साधना विधि – नवरात्र, सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय अथवा किसी भी शुभ मुहूर्त में इस साधना को करें। नवरात्र में पूरे 9 दिनों तक नियम के साथ दैनिक पूजन और मंत्र जप करें। ग्रहण काल में जितना समय ग्रहणकाल रहता है उतने ही समय तक मंत्र जाप साधना करनी चाहिये। नवरात्र के 9 दिनों की साधना में प्रतिदिन 27 माला जपने का विधान है। 9 दिनों में 24000 मंत्र जप के बाद 9वें दिन इसी मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार आहुति देकर हवन करना चाहिये। इस प्रकार यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस दुर्गा मंत्र का प्रभाव अचूक है।
यदि साधक ने 9 दिनों तक नियमित मंत्र जप और हवन की क्रिया पूरी कर ली तो वह कभी भी इस मंत्र को पढ़कर, दूब से जल छिड़कते हुये किसी की आपदाओं या बाधाओं का निवारण कर सकता है – चाहे कोई भी आर्थिक संकट हो, भूतादि ग्रहों की पीड़ा हो, प्रेत-पिशाच बाधा हो, दुर्भाग्य हो, नवग्रह पीड़ा हो, रोग अथवा बीमारी हो, शत्रु षडयंत्र की पीडा हो।
दुर्गाजी की प्रतिमा चित्र तथा श्री सिद्ध दुर्गा यंत्र जिसे नवार्ण मंत्र से प्रतिष्ठित किया गया हो। उसे लाल रंग के शुद्ध रेशमी कपड़े पर आसीन करके स्नान करायें। लाल चंदन, पुष्प, दीप व नैवेद्य अर्पित करें, फिर दुर्गाजी की स्तुति और ध्यान करें -

अध्यारूढ़ां मृगेन्द्रं सजल जलधर श्यामलां हस्त पद्मां।
शूलं वाणं कृपाणं त्वसि जलज गदा चाप पाशान् वहन्ती।
चंद्रोतंशां त्रिनेत्रां चितसृणिरसिमाखेटं विभ्रतीभि:।
कन्याभि: सेव्यमाना प्रतिभट भयदां शूलिनीं भावयाम:॥


ध्यान स्तुति के बाद परम तन्मय भाव से उपर्युक्त सिद्ध दुर्गा मंत्र का जाप करे। सिद्ध दुर्गा साधना के लिये सर्वप्रथम शुद्ध स्थान पर आसन बिछाकर, पूजा की सारी सामग्री पहले से वहां रख लें। ताम्र पत्र अथवा भोजपत्र पर रचित श्री सिद्ध दुर्गा यंत्र काठ के पीढ़े पर एक कपड़ा बिछाकर उस पर स्थापित करें। यंत्र तथा मूर्ति अथवा चित्र जो भी हो उसकी रक्त चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप-दीपादि से पूजा करके रक्त चंदन की 108 दाने की माला से दुर्गा अष्टाक्षर मंत्र का 27 माला जप करें। जप के समय घी का दीपक दुर्गाजी के सम्मुख जलाये। विकल्प के रूप में मीठे तेल के दीपक से भी काम चलाया जा सकता है। इस उपासना के लिये ऊनी आसन का ही प्रयोज्य होता है। माला लाल चंदन की, कुशाग्रंथि की अथवा रुद्राक्ष की भी ले सकते हैं। रक्त चंदन की माला सर्वश्रेष्ठ होती है। जप के लिये अर्द्धरात्रि का समय उत्तम होता है।
मंत्र जप समाप्त होने पर पूजा से उठने के पूर्व क्षमा याचना करते हुये दुर्गा जीे की स्तुति पढ़नी चाहिये। स्तुति पढ़ने या याद करने में असुविधा हो तो के वल श्री दुर्गायै नम: का सात बार जप करके देवी की प्रतिमा को क्षमा याचना हेतु प्रणाम करना चाहिये। मंत्र जप हो जाने पर कभी भी, किसी भी प्रकार प्रतिकूलता के शमन की आवश्यकता पडने पर इसे पढ़ते हुए उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

14 सितंबर 2012

DIL ka RAJ: Hindi positions and plight

Bhagwan Vishwakarma


देवताओं के वास्तुशिल्पी: विश्वकर्मा


 

देवताओं के इंजिनियर,
 बाबा विश्वकर्मा ने भूलोक में आकर राजमहलों से लेकर आम घरो का अभिकल्पन /डिजाइन तैयार  किया है । ब्रह्माजी के प्रपौत्र वास्तुकार विश्वकर्मा को ही  सर्वप्रथम सृष्ठि निर्माण में वास्तुकर्म करने वाला कहा जाता है । इन्द्रलोक /स्वर्गलोक सहित भूलोक और पाताललोक के राजमहलों से लेकर प्राचीनतम  मन्दिर देवालय नगर तथा ग्रामीण आवासो. का  निर्माता विश्वकर्मा को ही कहा जाता है । देवता, दानव और मनुष्य  आदि को छत प्रदान करने वाले शिल्पी और वास्तुकार विश्वकर्मा ही माने जाते है । प्राचीन आर्याव्रत यानि भारत को विश्वकर्मा की  ही यह वास्तुकला धीरे-धीरे सारे संसार में  फैली है और आज भी हमारा वास्तुविज्ञान किसी भी निर्माणाधीन संरचना के लिए खंगाला जाता है।

प्राचीनकाल में वैदिक युग से त्रेतायुग और द्वापर युग तक राजाओं की  जितनी राजधानियां, मन्दिर  देवालय और प्रमुख नगर थे, प्रायः सभी  देवताओं के वास्तुविशेषज्ञ विश्वकर्मा की ही बनाई कही जाती हैं। यहां तक कि सतयुग का स्वर्गलोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलयुग का हस्तिनापुर आदि विश्वकर्मा द्वारा  ही रचित और निर्मित हैं। सुदामापुरी की तत्क्षण रचना के बारे में भी यह कहा जाता है कि उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। इससे यह आश्य लगाया जाता है कि धन-धान्य और सुख-समृद्धि की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों को बाबा विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है। विश्वकर्मा अपने तत्काल  और रातोरात ही  राजमहलों की संरचना और भू,खण्ड पर इमारत  खडा करने में सिद्धहस्त थे। देवतागण-यक्षगण  मनुष्य और राक्षण सभी उनकी सेवायें और आशीर्वाद लेकर आजके वास्तुविज्ञान तक पहुंचे है। यही कारण है कि  आज प्रत्येक शिल्पी, मिस़्त्री  राज, बढई , कारीगर तथा अभियंता, तकनीकी  विषेषज्ञ साल मे एक बार अवश्य बाबा विश्वकर्मा की पूजा करते है।

एक कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम नारायण अर्थात साक्षात विष्णु भगवान जलार्णव (क्षीर सागर) में शेषशय्या पर आविर्भूत हुए। उनके नाभि-कमल से चर्तुमुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे। ब्रह्मा के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव हुए। कहा जाता है कि धर्म की वस्तु नामक स्त्री (जो दक्ष की कन्याओं में एक थी) से उत्पन्न वास्तु सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए। पिता की भांति विश्वकर्मा भी वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने।

भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं- दो बाहु, कहीं चार बाहु एवं  कहीं कही पर दश बाहु तथा एक मुख,  कहीं चार मुख एवं कहीं पर पंचमुख। उनके मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ नामक पांच पुत्र हैं। यह भी मान्यता है कि ये पांचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार भी वैदिककाल में किया। इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ सोने-चांदी से जोड़ा जाता है। भगवान विश्वकर्मा की महत्ता स्थापित करने वाली एक कथा भी है। इसके अनुसार वाराणसी में धार्मिक व्यवहार से चलने वाला एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। अपने कार्य में निपुण था, परंतु स्थान-स्थान पर घूम कर प्रयत्न करने पर भी भोजन से अधिक धन नहीं प्राप्त कर पाता था। पति की तरह पत्नी भी पुत्र न होने के कारण चिंतित रहती थी। पुत्र प्राप्ति के लिए वे साधु-संतों के यहां जाते थे, लेकिन यह इच्छा उसकी पूरी न हो सकी। तब एक पड़ोसी ब्राह्माण ने रथकार की पत्नी से कहा कि तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी और अमावस्या तिथि को व्रत कर भगवान विश्वकर्मा माहात्म्य को सुनो। इसके बाद रथकार एवं उसकी पत्नी ने अमावस्या को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की, जिससे उसे धन-धान्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और वे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। उत्तर भारत में इस पूजा का काफी महत्व है। और आज भी भाद्रपद और कार्तिक में विश्वकर्मा की पूजा बहुत ही श्रद्धापूर्वक की जाती है !

वैसे तो दिवाली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन विश्वकर्मा पूजा  पूरे धूमधाम से सारे देष में मनाई जाती है। इस दिन पूरे भारत के विभिन्न राज्यों में, खासकर औद्योगिक क्षेत्रों, फैक्ट्रियों, लोहे की दुकान, वाहन शोरूम, सर्विस सेंटर आदि में विश्वकर्मा पूजा होती है। इस मौके पर मशीनों, औजारों की सफाई एवं रंगरोगन किया जाता है। इस दिन ज्यादातर कल-कारखाने बंद रहते हैं और लोग हर्षोल्लास के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, दिल्ली आदि राज्यों में भगवान विश्वकर्मा की भव्य मूर्ति स्थापित की जाती है और उनकी आराधना की जाती है, लेकिन चंडीगढ़ और पंजाब में दीपावली के दूसरे दिन यह पर्व मनाया जाता है। प्रतिवर्ष उत्तर भारत के कई राज्यो में17 सितंबर को श्रमदिवस के रूप में जाना जाता है। इस दिन भी विश्वकर्मा समाज के लोग बाबा विश्वकर्मा पूजा अवश्य करते हैं।

 भगवान विश्वकर्मा की पूजा और यज्ञ विशेष विधि-विधान से होता है। इसकी विधि यह है कि यज्ञकर्ता स्नानादि-नित्यक्रिया से निवृत्त होकर पत्नी सहित पूजास्थान में बैठे। इसके बाद विष्णु भगवान का ध्यान करे। तत्पश्चात् हाथ में पुष्प, अक्षत लेकर- ओम आधार शक्तपे नमरू और ओम् कूमयि नमरूय ओम् अनन्तम नमरू, पृथिव्यै नमरू ऐसा कहकर चारों ओर अक्षत छिड़के और पीली सरसों लेकर दिग्बंधन करे। अपने रक्षासूत्र बांधे एवं पत्नी को भी बांधे। पुष्प जलपात्र में छोड़े। इसके बाद हृदय में भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करे। रक्षादीप जलाये, जलद्रव्य के साथ पुष्प एवं सुपारी लेकर संकल्प करे। शुद्ध भूमि पर अष्टदल कमल बनाए। उस स्थान पर सप्त धान्य रखे। उस पर मिट्टी और तांबे का जल डाले। इसके बाद पंचपल्लव, सप्त मृन्तिका, सुपारी, दक्षिणा कलश में डालकर कपड़े से कलश का आच्छादन करे। चावल से भरा पात्र समर्पित कर ऊपर विश्वकर्मा बाबा की मूर्ति स्थापित करे और वरुण देव का आह्वान करे। पुष्प चढ़ाकर कहना चाहिए- हे विश्वकर्मा जी, इस मूर्ति में विराजिए और मेरी पूजा स्वीकार कीजिए। इस प्रकार पूजन के बाद विविध प्रकार के औजारों और यंत्रों आदि की पूजा कर हवन यज्ञ करे। अन्त में किसी एक या एक से अधिक कुशल कारीगरो को विशेष सम्मान देकर विश्वकर्मा पूजा सम्पन्न होती है । ऐसा कहते हैं कि निर्माण और उत्पादन कार्य से जुडे कुशल मिस्त्री/कारीगर की आत्मा में ही चिश्वकर्मा विराजमान है ।

विश्वकर्मा और रावण की लंका ...

त्रेतायुग में  जब रावण ने सीताजी का हरण किया तो उनको  मुक्त कराने के लिए हनुमानजी लंका में सीतामाता का पता लगाने गये । इसी दौरान रावण के सैनिको ने हनुमानजी को पकड कर रावण के दरबार में पेष कर दिया! वहां पर हनुमानजी को डराया गया और प्रताडना के वास्ते सर्वसम्मति से राय बनी की हनुमानजी की इस गुस्ताखी के लिए उनकी पूंछ में तेल लगा करके आ���� लगा दी जाए। फिर रावण के भरे दरबार में ऐसा ही हुआ । हनुमानजी तब अपनी मूल पूंछ को छुपाकर नकली  पूंछ को लम्बा करते गये और रावण सेना ने उस पर तेलमिश्रित कपडा लपेट कर आग लगा दी । हनुमानजी वायुपु़त्र तो थे ही,  उनके बाहर निकले ही 49 किस्म की हवायें तीव्र वेग से चलने लगी और वे हवा में उड्रते हुए रावण के आलीशान का महलों का दाहन करते रहे ! इस लंकादहन में सारी लंका खाक होगई परन्तु विभीषण की कुटिया बची रही क्यों उसने कुटिया के बाहर ..जय श्रीराम  लिखा हुआ था ।

हनुमानजी  के इस कृत्य से तिलमिलाये हुए रावण ने तत्काल ही देवराज इन्द्र को तलब किया और आदेश दिया कि अभी फौरन विश्वकर्मा जी को भेजा जाये ताकि रातोंरात  फिर वैसी ही सोने की महलों से सज्जित लंका नगरी बन सके ।

डर और दबाब में तनावग्रस्त विश्वकर्माजी आये और उन्होने परिस्थितियो का जायजा लिया और सीताजी के हरण पर खिन्न हुए ! दुर्दान्त रावण के आगे उस समय देवता भी विवष हो जाते थे। रावण कुबेर तक  को भयभीत करके देवताओं का सारा स्वर्णभण्डार लंका में खपा रखा था ! तब विश्वकर्मा ने विवश होकर रातोंरात वहीं स्वर्णनगरी लंका का निर्माण कर दिया !

लेकिन इस बार विश्वकर्माजी ने रावण तथा अन्य परिजनों के महल बनाते समय कुछ ऐसे वास्तुदोष प्रत्येक निर्माण में छोड दिये कि रावण का परिवार और राक्षस सेना एक एक कर विनाश की ओर बढ्रती गई और जबर्दस्ती दबाब में बनाये गये वास्तुदोष युक्त महल बाद में रावण के विनाष का कारण बन गये ! इस तरह कहा जाये तो विश्वकर्मा ने भी रावण के अन्त करने में अपना तकनीकी योगदान दिया ।

विश्वकर्मा के वास्तुशिल्प  से  ही वास्तुविज्ञान का जन्म हुआ जिसका वैदिक युग में  कडाई ये पालन किया जाता था ! हर निर्माण के दौरान विश्वकर्मा के साथ साथ वास्तुदेव की भी पूजा और स्थापना की जाती है । यह प्रक्रिया भूमिपूजन के दौरान अपनाई जाती है ! वस्तुत विश्वकर्मा और वास्तुदेव आज भी चारो दिशाओं और दस द्वार और अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता है और बिना उनके आशीर्वाद के कोई भी घर और महल / विल्डिंग आदि इन्सान को फलती नहीं है। 

विश्वकर्मा के अनुचर सिद्धपुरुष महर्षि जमदग्नि कहते है कि अपने तपकालीन सिद्धियों में महर्षि जमदग्नि को देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा से अनेक वरदान मिले थे जिससे वे सिद्धपुरुष और अवतारी कहलाये।

ब्रहमतेजस जिनका जागा हुआ है ऐसे महामानव अपनी सिद्धि, सामथ्र्य सम्पदा को समय आने पर प्रयुक्त करते और वह भी जनमानस को आत्मबल की सामथ्र्य व महत्ता समझाने के लिए न कि अहंकार  के प्रदर्शन हेतु ।

हैहयवंशी सम्राट कीर्तवीर्य विंध्य प्रदेश को जीतकर, मित्र राजाओं और विजयी सेना सहित स्वदेश लौट रहे थे । प्रथम विराम उन्होंने नर्मदा पर महर्षि जमदग्नि के आश्रम में किया । विजय के अहंकार में डूबे राजा कीर्तवीर्य उस समय राजसी वैभव से पूर्णतः अलंकृत थे । उनकी हजारो सैनिक और योद्धा  अपने हाथी घोड्रों पद लदे  हुए  चल रहे थे । महर्षि के दर्शन के बाद सम्राट कीर्तवीर्य सारे  लश्कर सहित अपरान्ह मे वे आगे चलने को समुद्यत तो महर्षि ने शिष्टाचारवश स्वयं उपस्थित होकर कहा -- राजन् आप लोग थके हैं आज रात यहीं विश्राम कर लेते हो अच्छा रहता।

सम्राट हंस पडे, बोले-तपोनिधि आपका आग्रह तो ठीक है, पर हमारे साथ इतनी विशाल सेना और आपकी छोटी सी कुटिया में विपन्न स्थिति, दोनों में सामंजस्य कैसा ? कैसे खिलायेगे इस विशाल फौज को ?

महर्षि उनके अहंकार को ताड़ गये उन्होंने कहा-- राजन ..आप उसकी चिन्ता न करें, तपस्वी का धन तो  भगवान है, भगवान तो सार संसार को खिलाता है आपकी सेना है ही कितनी ?

कीर्तवीर्य  महर्षि के आग्रह को टाल नहीं पाये  और रात वहीं बिताने के इरादे से ठहर गये । अब वहां का दृश्य बदला । दूसरे ही क्षण आश्रम ने अपना रूप बदला ।चारो ओर विशाल महल खडे हो गये । गुलाब, मंदार, करवीर, यूथिका, लौंध्र, कृन्द, चंपक, आदि नाना प्रकार के सु्रगन्धित फूलों से सुसज्जित हो गया आश्रम । छप्पन प्रकार के  भोज्य भक्ष्य पकवान्न तथा मधुर पेय लेहय तथा चोष्य सभी प्रकार के सुस्वाद युक्त व्यंजन हर अतिथि के लिये राजमहलों को भी कान्तिहत करने वाले सुन्दर भवन और राजसी वेष धारण किये परिचारक/सेवादार । यह सब देखकर सम्राट कीर्तवीर्य स्तब्ध रह गये । उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ कि यह सब कोई सम्मोहन है अथवा स्वप्न या सचमुच ही महर्षि की योग सिद्धि। इतने ठाटबाट तो उनके महलो में भी उपलब्ध नहीं हैं !
राजा की विशाल सेना भी महर्षि का आतिथ्य पाकर कृतकृत्य हुई। कल तक चारों तरफ राजा कीर्तवीर्य की प्रशंसा के स्वर गूंज रहे थे पर आज हर व्यक्ति के मुख में एक चमत्कारी गुणानुवाद था, महर्षि की ब्राहमी शक्ति का। स्वयं महाराज कह रहे थे--भगवन ! आज हमारा राजसी और क्षत्रियबल आपके अलौकिक ब्रह्मबल  और आपकी सिद्धि के सम्मुख हार मानता है और श्रद्धावान होकर शीश झुकाता है। मेरी सारी सेना और महायोद्धा आपके आगे नतमस्तक है। यह महर्षि जमदग्नि भगवान परशुपं. राम के पिता थे । आगे चलकर परशुराम ने हेहयवंशीय राजाओ से वर्चस्व की लड़ाई लडी और विजयी रहे।

12 सितंबर 2012

FURSAT KE PAL: राष्ट्रीय महिला आयोग और इनके कार्य

FURSAT KE PAL: राष्ट्रीय महिला आयोग और इनके कार्य: राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन राष्ट्रीय आयोग के तहत जनवरी 1992 में, एक संवैधानिक निकाय के रूप में किया गया था। यह अधिनियम संख्या 20 क...

11 सितंबर 2012

Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi in 2012, 2013




Answer: The date of Ganesh Chaturthi falls on the fourth day after the new moon in the Hindu month of Bhadrapada. This is August or September each year. It's commonly celebrated for the following 11 days, with the biggest spectacle taking place on the last day called Ananta Chaturdasi.

• In 2012, Ganesh Chaturthi is on September 19 (Ananta Chaturdasi on September 30).
• In 2013, Ganesh Chaturthi is on September 9 (Ananta Chaturdasi on September 20).



Birthday of Lord Ganesha and known as the day most sacred to Lord Ganesha...
Ganesh Chaturthi [Birthday Of Lord Ganesh] is one of the most popular of Hindu festivals. This is the birthday of Lord Ganesha and is known as the day most sacred to Lord Ganesha. It falls on the 4th day of the bright fortnight of Bhadrapada (August - September). It is observed throughout India, as well as by devoted Hindus in all parts of the world.

Lord Ganesha is the elephant-headed God. He is worshiped first in any prayers. His Names are repeated first before any auspicious work is begun, before any kind of worship is begun. He is the Lord of power and wisdom. He is the eldest son of Lord Shiva and the elder brother of Skanda or Kartikeya. By worshipping Lord Ganesha mothers hope to earn for their sons the sterling virtues of Ganesha.

The Elephant Headed God
Once upon a time, the Goddess Gauri (consort of Lord Shiva), while bathing, created Ganesha as a pure white being out of the mud of Her Body and placed Him at the entrance of the house. She told Him not to allow anyone to enter while she went inside for a bath. Lord Shiva Himself was returning home quite thirsty and was stopped by Ganesha at the gate. Shiva became angry and cut off Ganesha's head as He thought Ganesha was an outsider. 

When Gauri came to know of this she was sorely grieved. To console her grief Shiva ordered His servants to cut off and bring to Him the head of any creature that might be sleeping with its head facing north. The servants went on their mission and found only an elephant in that position. The sacrifice was thus made and the elephant's head was brought before Shiva. The Lord then joined the elephant's head onto the body of Ganesha. 

Lord Shiva made His son worthy of worship at the beginning of all undertakings, marriages, expeditions, studies, etc. He ordained that the annual worship of Ganesha should take place on the 4th day of the bright half of Bhadnpada. 

Without the Grace of Sri Ganesha and His help nothing whatsoever can be achieved. No action can be undertaken without His support, Grace or blessing. 

The following are some of the common Names of Lord Ganesha: "Dhoomraketu", "Sumukha", "Ekadantha", "Gajakarnaka", "Lambodara", "Vignaraja", "Ganadhyaksha", "Phalachandra", "Gajanana", "Vinayaka", "Vakratunda", "Siddhivinayaka", "Surpakarna", "Heramba", "Skandapurvaja", "Kapila" and "Vignesh Wara". Many devotees also address him as "Maha-Ganapathi". 

His Mantra is "Om Gung Ganapathaye Namah". Spiritual aspirants who worship Ganesha as their tutelary deity repeat this Mantra or Om Sri Ganeshaya Namah. 

In his first lesson in the alphabet a Maharashtrian child is initiated into the Mantra of Lord Ganesha, Om Sri Ganeshaya Namah. Only then is the alphabet taught.

The Puja
Ganesh Chaturthi is the most important of all Maharashtrian festivals, and is celebrated with great aplomb amongst Marathi communities worldwide. On the occasion of the Ganapati festival a large number of images are made of all possible sizes, and people buy them to keep in their houses as a divine guest for one and a half, five, seven, or ten days, after which the image is taken out ceremoniously and thrown into the river, sea or well for immersion or "Visarjan". The idol should not be kept after this day, as it is considered inauspicious. 

The Puja can be a simple one performed with family members within the household and to the accompaniment of a cassette of Shri Ganesh mantras, or an elaborate one, involving a priest who would come home and perform the puja. 'Modak' is the most famous and most typical food preparation of Ganesh Chaturthi celebrations. 

As long as the Ganesh idol is at home, Aarti is performed morning and evening (dusk, or at the hour when artificial lamps are lighted in the house). At the same time, all the members present throw Kumkum on the idol. 

After the Aarti, flowers, Haldi and Kumkum are offered to the women, and Prasad (made of dried desiccated coconut mixed with castor sugar) is distributed to all those present. During Ganesh Chaturthi, Aarti is performed five times: to the Ganesh idol, followed by Vitthal, Shankar (Shiva), Devi (Parvati) and Dattatreya (Kartikeya). The Aarti ends with a "Mantra Pushpanjali".

The Celebrations
During the festivals day's beautifully sculpted Ganesh idols are installed in the Mandaps (large tents) that are colourfully decorated, depicting religious themes or current events. There are huge public displays of Ganesh idols with Aarti (song of devotion to God) and loud music and dancing by the devotees. 

This activity is most popular in Bombay and Pune, with "Shrimant Dagadu Shet Halwai Ganapati" in Pune being the main attraction of the Utsaav. Many cultural events are organised and people participate in them with keen interest. On the tenth day, huge processions carry images of the God to be disposed off into the water, hoping for them to return early next year. When the idols are immersed in the water, people sing, "GANPATI BAPPA MORYA, AGLE BARAS TO JALDI AA," ("Father Ganpati, Next Year Come Again.").
 



07 सितंबर 2012

FURSAT KE PAL: The Pride of Bihar Dr. Bidhanchandra Roy

FURSAT KE PAL: The Pride of Bihar Dr. Bidhanchandra Roy: बिहार के गौरव डॉ. बिधानचंद्र राय Bidhan Chandra Roy डॉ. बिधान चंद्र राय (जुलाई 1, 1988 - जुलाई 1, 1962) चिकित्सक, स्वतंत्रता स...

03 सितंबर 2012

सिकन्दर शाह ने मन्दिर तोड़कर बनवाई

हजरत पंडुआ की अदीना मस्जिद



Adina Masjid, built in 1369 by Sultan Sikander Shah. One of the largest mosques in India, it also typifies the most developed mosque architecture of the period, the orthodox design being based on the great 8th century mosque of Damascus. Carved basalt masonry from earlier Hindu temples is used to support the 88 brick arches and 378 identical small domes.

अदीना अर्थात् जुम्मे की मस्जिद पश्चिम बंगाल के पश्चिमी दिनाजपुर जिले के रायगंज और मालदा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग -34 पर स्थित है। पहली नजर में ही इस इमारत का दोरंगा स्वरूप दिखाई देता है। जमीन से 10 फुट ऊपर तक इसका रंग भूरा है जो वस्तुत: पत्थर की ईंटों का रंग है। उससे 12 फुट ऊपर तक का भाग लाल ईंटों का बना है। स्पष्ट है कि वर्तमान मस्जिद का निर्माण पहले बनी किसी इमारत के ऊपर किया गया था।

मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद कुछ कदम चलते ही बाहरी दीवारों पर हिन्दू देवताओं की प्रतिमाओं के चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं। इनको ठोस पत्थर पर उकेरा गया है, जो बाहर की तरफ लगी उन लाल पत्थर की ईंटों से मिलता-जुलता है। एक पत्थर पर गणेश और उनकी अर्धांगिनी उकेरे दिखाई देते हैं। ऐसे ही उत्कीर्ण किए अनेक चित्र हैं। इनमें प्रवेश द्वार तथा उत्तरी और पूर्वी पार्श्व द्वारों के शीर्ष भी शामिल हैं। मस्जिद के भीतर किए गए पत्थर के काम से भी यही विश्वास होता है कि यह इमारत मूलत: एक मन्दिर की थी।

उत्तरी दीवार में पत्थर को काटकर बनाए गए लगभग 20 आले हैं। ये सभी मन्दिर में की जाने वाली पत्थर की कटाई के प्रमाण हैं। यदि इस विषय में कोई शंका हो भी तो उसका निराकरण इमाम के प्रयोग के लिए बनाए गए चबूतरे को देखकर हो जाता है। उसकी अंतिम सीढ़ी के पत्थर पर दो स्त्रियों की आकृतियां पत्थर को काटकर बनाई गई हैं। यद्यपि उनका चेहरा खण्डित कर दिया गया है, फिर भी वे स्पष्टत: मानव प्रतिमाएं हैं।

स्थानीय दंत कथा के अनुसार अदीना मस्जिद का निर्माण सुल्तान जलालुद्दीन मोहम्मद शाह द्वारा करवाया गया था। उसका पूर्व नाम जादू था और उसके पिता राजा गणेश ने 12 वर्ष की आयु में उसका मतान्तरण कराकर उसे मुसलमान बनवा दिया था। बाद में राजा को अपने कृत्य पर पाश्चाताप हुआ और उसने स्वर्णधेनु यज्ञ करवाया, लेकिन जादू अर्थात् जलालुद्दीन मोहम्मद शाह ने इस्लाम मत छोड़ने से इनकार कर दिया। इस पर हिन्दू दरबारियों ने जादू के भाई महेन्द्र देव को राजगद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। इससे जलालुद्दीन इतना नाराज हुआ कि वह मूर्तिभंजक बन गया। उसने मन्दिरों और मूर्तियों का विध्वंस करने के अतिरिक्त अनेक हिन्दुओं को जबरन इस्लाम मत स्वीकार करने को मजबूर किया।

लेकिन इस कथा से यह बात स्पष्ट नहीं होती कि मस्जिद का निर्माण कराते समय कोई मुसलमान उसमें हिन्दू देवताओं की आकृतियों से सज्जित पत्थरों का प्रयोग करने में गर्व क्यों करेगा। यह बात समझ में नहीं आती कि कोई मुसलमान अपने मत के विरुद्ध जाकर मस्जिद के बाहर की ओर, द्वारों के शीर्ष पर, दीवारों पर या चबूतरे के नीचे हिन्दू देवताओं की आकृतियों का उत्कीर्णन कैसे करवा सकता है? इन सबसे यही सिद्ध होता है कि अदीना मस्जिद भ्रष्ट किए गए मन्दिर के ऊपर बनाई गई है।

दिल्ली लौटकर मैंने अदीना मस्जिद से संबंधित साहित्य की खोजबीन की। स्पष्टत: इसके बारे में काफी शोध किया गया है। गौर व पंडुआ के संस्मरण मोहम्मद आबिद अली खां द्वारा लिखे गए और बाद में उनकी एच.ई. स्ट्रेपल्स, आई.ई.एस. द्वारा पुनरीक्षा की गई। उन्हें 1979 में एशियन पब्लिकेशन सर्विसेज, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया। मूलत: यह पुस्तक 1924 में मालदा में प्रकाशित हुई थी। इसमें मूल शोध कार्य और साथ ही पूर्व अध्ययनों का भी उल्लेख है। संदर्भ ग्रंथों की सूची में 32 विभिन्न ग्रंथों के नाम दिए गए हैं।

एक अपेक्षाकृत आधुनिक रचना डा. सैयद महमूदुल हसन द्वारा लिखित "मोस्क आर्कीटेक्चर आफ प्रीमुगल बंगाल' है। यह रचना मूलत: लंदन वि·श्वविद्यालय के लिए 1965 में तैयार किया गया शोध प्रबंध था। डा. हसन ढाका के वि·श्वविद्यालय कालेज में स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष थे। उन्होंने अनेक ब्रिटिश विद्वानों के उद्दरण दिए हैं, जिनमें भारतीय पुरातत्व विभाग के विख्यात निदेशक सर एलेक्जेंडर कनिंघम के उद्धरण भी शामिल हैं।

अदीना मस्जिद का निर्माण किसने और क्यों करवाया-इस विषय से संबंधित स्थानीय दंतकथा प्रकटत: असत्य प्रतीत होती है। विद्वानों का मत है कि इसकी स्थापना सुल्तान सिकंदर शाह ने 1364-1374 ई. के बीच करवाई थी। इस विषय में विशेषकर जे एच. रेवनशा और अन्य विद्वानों के बीच मतभेद है कि मध्यकालीन बंगाल की राजधानी अधिक प्राचीन है या हजरत पंडुआ, जहां अदीना स्थित है, अधिक प्राचीन है।

इस विवाद का यही महत्त्व है कि इस मस्जिद के निर्माण में इस्लामी काल से पूर्व के भवनों का कितना मलबा प्रयोग में लाया जा सका होगा। डा. हसन ने इतनी निष्पक्षता अवश्य दिखाई है कि उन्होंने अनेक विद्वानों के मत का विस्तार से उल्लेख किया है। लेकिन उन्होंने इस आरोप के संबंध में अपनी अप्रसन्नता भी प्रकट की है कि उसके निर्माण में हिन्दू इमारतों की सामग्री का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ, उनका कहना है, "इलाहीबख्श, क्रीटन, रेवेनशा, बुकानान, हेमिल्टन, वेस्टमेकाट, बेगलर, कनिंघम, किंग सहित अनेक इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने गैर इस्लामी सामग्री का प्रयोग किए जाने के प्रमाणों का बखान किया है। लेकिन उनमें से किसी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि गौर और हजरत पंडुआ के भव्य स्मारकों के निर्माण के लिए उस समय मंदिरों को तोड़कर सामग्री प्राप्त की गई थी।' उन्होंने ई.जी. हेवेल पर यह आरोप लगाया है कि हेवेल इतने असहिष्णु थे कि उन्होंने मुस्लिम निर्माताओं को विशाल महराबों, गुम्बदों, मीनारों और महीन नक्काशी के कार्य का श्रेय भी नहीं दिया है। उनका मत है कि हजरत पंडुआ की अदीना मस्जिद की केन्द्रीय महराब का वास्तुशिल्प हिन्दू वास्तुशिल्प होना इतना स्पष्ट है कि उस पर किसी प्रकार की कोई टिप्पणी अनावश्यक है।








बंगाल से संबंधित 1888 की पुरातत्व सर्वेक्षण रपट में जे.डी. बेगलर ने यह मत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है कि अदीना मस्जिद पहले एक मन्दिर था। उनके शब्दों में-"मुसलमान उस स्थान पर अपने पंथ की इबादतगाह (अर्थात् नमाज अदा करने का स्थान) बनाकर खुश हुए, जहां घृणित काफिरों का पूजा स्थल था।' खुर्शीदे जहांनुमा, जिसका अनुवाद एच.बीवरेज ने किया और जो "जनरल आफ एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल', खंड 44, भाग 1, 1895 में हुआ था, में बीवेरज ने लिखा है- "अदीना मस्जिद उस स्थान पर खड़ी है जहां मुस्लिमकाल से पूर्व किसी समय एक विख्यात व महत्त्वपूर्ण मन्दिर था।'

"जनरल आफ एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल', खंड 28, भाग 1,1932 में एस.के. सरस्वती ने भी यह बात जोर देकर कही है कि यह मस्जिद मूलत: हिन्दू इमारत थी। मैं यहां उनका उद्धरण नहीं देना चाहता, क्योंकि वह हिन्दू थे और उनका विचार पक्षपातपूर्ण हो सकता था। मेरी दृष्टि में इस विवादपूर्ण विषय में मुसलमान, ईसाई और ब्रिटिश विद्वानों का मत अधिक वि·श्वसनीय है।

एक वस्तुनिष्ठ प्रेक्षक के रूप में सर एलेकजेंडर कनिंघम पर बहुत लोगों ने भरोसा किया है। उनके मतानुसार, अदीना मस्जिद का चबूतरा स्पष्टत: हिन्दू स्थापत्य का नमूना है। हिन्दू स्थापत्य शैली के चौखटों, स्तम्भों, स्तम्भ शीर्षों, स्तम्भों के गोलाकार शिल्प, पत्थर पर की गई नक्काशियों, दीवारों के अधोभागों आदि का इस प्रकार कामचलाऊ प्रयोग किया गया है कि उनका तात्कालिक उपयोग लगभग असंभव हो गया है। लेकिन इस विवाद को शुरु करने का श्रेय मालदा के मुंशी इलाहीबख्श को दिया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा है- "अदीना मस्जिद की चौखट के सामने एक टूटी और चमकाई हुई मूर्ति थी, और इधर-उधर अन्य मूर्तियां पड़ी थीं। अत: ऐसा प्रतीत होता है कि यह मस्जिद मूलत: एक मुर्तियुक्त मन्दिर था।'

 
मलेशिया की सरकार ने संगणक व अंत:क्षेत्र पर अनैतिक कब्जा करने वालों को सबक सिखाने के लिए कठोर नियम बनाए हैं। इन नियमों के अनुसार अब इन "साइबर अपराधियों' को चार वर्ष की जेल तथा 65,000 अमरीकी डालर का जुर्माना देना पड़ सकता है।

- प्रफुल्ल गोरडिया
साभार : पांचजन्य 

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