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22 सितंबर 2012

दुर्गा पूजा की परंपरा


अपने देश में दुर्गा पूजा का इतिहास काफी पुराना है। इसके प्रमाण 12वीं सदी से ही मिलते हैं। आज यह एक सामुदायिक उत्सव बन चुका है। सच्चाई यह है कि समय के साथ इसमें बदलाव भी होते रहे हैं। पहले जहां राजा या अमीर ही यह पूजा करवाते थे, वहीं आज यह क्लबों, संगठनों और सोसाइटीज भी कराने लगी हैं। प्रारंभ में जहां मां दुर्गा की पूजा अकेले की जाती थी, वहीं आज शक्ति स्वरूपा को उनके पूरे परिवार के साथ पूजा जाता है। 

आजकल दुर्गा का सबसे मान्य रूप आठ हाथों वाली मां दुर्गा की मूर्ति है, जो शेर पर सवार हैं। उनके दो हाथों को छोड़कर हर हाथ में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र हैं। शेष दोनों हाथों से वह भाला पकड़े हुए हैं, जो महिषासुर की छाती में घुसा हुआ है। दुर्गा पूजा के लिए तैयार की जाने वाली ज्यादातर मूर्तियों में देवी के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक को भी दर्शाया जाता है। इनमें से लक्ष्मी धन की देवी हैं। सरस्वती ज्ञान और बुद्घि की भगवती हैं। कार्तिक रूप के देवता हैं और गणेश के बिना किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं हो सकती। 

ड्रम बजाना दुर्गा पूजा का अहम अंग माना जाता है। ड्रम के कई प्रकार हैं, जिन्हें काफी पसंद किया जाता है। 'ढाक' ऐसा ही ड्रम है, जिसे कोलकाता के लोग खूब पसंद करते हैं। इसे षष्ठी के दिन से ही बजाया जाता है। इसे एक तरफ मोटी और दूसरी तरफ पतली छड़ी से थाप दी जाती है। यूं तो दुर्गा पूजा का आयोजन दस दिनों तक किया जाता है, लेकिन कोलकाता में मुख्य पूजा का आरंभ भी षष्ठी की शाम से ही माना जाता है। इसके कुछ घंटों के बाद ही सप्तमी आरंभ हो जाती है।

इस दिन मां देवी में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। परंपरा है कि देवी के प्राण नजदीकी नदी से लाकर देवी की मूर्ति में प्रतिष्ठापित किए जाते हैं। इसके बाद मुख्य पूजा की शुरुआत होती है। इसके लिए सबसे मुख्य समय अष्टमी और नवमी के मिलन का होता है, जिसे संदिक्षण काल कहते हैं। इसके बाद नवमी और फिर दशमी को मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता है। 
पूजा की रस्म 

आश्विन के पहले चांद के साथ ही मां की पूजा शुरू हो जाती है, जबकि मां की मूर्ति की पूजा महाअष्टमी से प्रारंभ होती है यानी तीन दिनों की ही मुख्य पूजा होती है, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी। विभिन्न विधि-विधानों, मंत्र और श्लोकों से स्तुति के साथ ही पूजा आरंभ होती है। फिर आरती के साथ ही समापन भी हो जाता है। 

महाषष्ठी : इस दिन मां के चेहरे से पर्दे को हटाया जाता है। इस प्रक्रिया में भी विधि पर काफी ध्यान दिया जाता है। 

महासप्तमी : इस दिन नौ तरह के पेड़ों की पूजा मां दुर्गा का प्रतीक समझकर की जाती है। 

महाअष्टमी : अष्टमी के दिन पंडालों में मां के दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। घरों में होने वाली पूजा में कुंआरी पूजा का खास महत्व है। इसी दिन संधि पूजा भी कराई जाती है, जो अष्टमी और नवमी को जोड़ने के लिए होती है। 

महानवमी : संधि पूजा के समापन के साथ ही महानवमी आरंभ हो जाती है। इसी दिन देवी को भोग भी लगाया जाता है। 

दशमी : मां को अश्रुपूर्ण विदाई इसी दिन की जाती है। मां की मूर्ति को तालाब या नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। इसी दिन विजयादशमी का पर्व पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है। 

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