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27 नवंबर 2012

कार्तिक पूर्णिमा का माहत्म्य सर्वोपरि है

Hariharnath Mandir, Sonpur, Chhapra, Bihar
कार्तिक पूर्णिमा बड़ी ही पवित्र तिथि है। इस तिथि को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदि ने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। अतः इसमें स्नान, दान, होम, यज्ञ, उपासना आदि करने का अनन्त फल मिलता है। इस दिन गंगा-स्नान तथा सायंकाल दीपदान का विशेष महत्त्व है। इसी पूर्णिमा के दिन सायंकाल भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। इस कारण इस दिन किए गए दान, जप आदि का दस यज्ञों के समान फल मिलता है।

वैदिक काल में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर छपरा, जिले के सोनपुर में गंडक और गंगा के संगम तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।
इस बार 28 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र है। जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायरू श्री सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चैराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। कार्तिकी में यह तिथि देव दीपावली-महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। चान्द्रायणव्रत की समाप्ति भी आज के दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी आदि पवित्र नदियों के समीप स्नान के लिए सहस्त्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेले का रूप बन जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।

महत्त्व

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं। इसीलिए दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा बिना विष्णु, श्रीगणेश के साथ की जाती है। लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह विष्णु स्वरूप शालिग्राम से होता है। इसी खुशी में देवता स्वर्गलोक में दिवाली मनाते हैं इसीलिए इसे देव दिवाली कहा जाता है।

सफलता का मंत्र

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम...पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय.....पूर्णमेवावशिष्यते

विधि

गंध, अक्षत, पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, पीपल के पत्तों से गंगाजल से रूजन करें। पूजा गृह, नदियों, सरोवरों, मन्दिरों में दीपदान करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मिट्टी का दीपक अवश्य जलाएं। इससे हमेशा संतति सही रास्ते पर चलेगी। धन की कभी भी कमी नहीं होगी। सुख, समृद्धि में बढ़ोतरी होगी। जीवन में ऊब, उकताहट, एकरसता दूर करने का अचूक उपाय। व्रत से ऐक्सिडेंट-अकाल मृत्यु कभी नहीं होंगे। बच्चे बात मानने लगेंगे। परिवार में किसी को पानी में डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा नहीं होगा। बुरे वक्त में लिया कर्ज उतर जाएगा। आकस्मिक नेत्र रोग से बचाव होगा। नव���न मकान, वाहन आदि खरीदने के योग बनेंगे।

जीवन में सफलता के लिए क्या करें?

सर्व प्रथम लगातार परिश्रम, प्रार्थना, प्रतीक्षा करें।
सदैव प्रसन्न रहें। सबके प्रति विनम्रता बनाए रखें।
हर संकट में धैर्य रखें।
नियमित रूप से मन्दिर जाएं।
रोज सायंकाल के समय तुलसी के सामने दीपक जलाएं।
मधुर वाणी के साथ-साथ मितभाषी बनें।
घर परिवार और बाहर सबका सम्मान करें।
हो सके तो पूर्णिमा एकादशी तिथि में व्रत करें। सात्विक आहार करें।
सपरिवार संध्या आरती करें। जितना हो सके दान करें।

व्यवसाय की सफलता के लिए क्या न करें?

व्यापार स्थल पर दिन में न सोयें। गद्दी में बैठकर किसी की निंदा न करें।
विशेष परिस्थिति जब तक न हो, उधार न ही दें और न ही लें।
उधार की रकम न मिलने पर किसी का अपमान न करें।
लेद-देन के दौरान क्रोध बिल्कुल न करें। कामकाजी व्यक्ति/नौकर पर काम न छोड़ें।
लाभ कमाने के लिए खराब सामान बेचने का प्रयास न करें।
पुराने अनुभव पर आधारित काम न छोड़ें।

17 नवंबर 2012

जब हनुमान जी ने किया था समुद्र लंघन


जामवंत के वचन सुनकर श्री हनुमान जी परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मानो समस्त ब्रह्मांड को कम्पायमान करते हुए सिंहनाद किया। वह वानरों को संबोधित कर कहने लगे ‘‘वानरो! मैं समुद्र को लांघ कर लंका को भस्म कर डालूंगा और रावण को उसके कुल सहित मार कर जानकी जी को ले आऊंगा। यदि कहो तो रावण के गले में रस्सी डालकर और लंका को त्रिकूट-पर्वत सहित उखाड़कर भगवान श्री राम के चरणों में डाल दूं।’’

हनुमान जी के इस प्रकार के वचन सुनकर जाम्बवान ने कहा, ‘‘ हे वीरों में श्रेष्ठ पवन पुत्र हनुमान! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभ लक्षणा जानकी जी को जीती- जागती देखकर ही वापस लौट आओ। हे राम भक्त! तुम्हारा कल्याण हो।’’ बड़े-बूढ़े वानर शिरोमणियों के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर हनुमान जी ने अपनी पूंछ को बारम्बार घुमाया और भगवान श्री राम के बल का स्मरण किया। हनुमान जी का रूप उस समय बड़ा ही उत्तम दिखाई पड़ रहा था। इसके बाद वह वानरों के बीच से उठ कर खड़े हो गए।

उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो आया। उस अवस्था में हनुमान जी ने बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम करके इस प्रकार कहा, ‘‘आकाश में विचरने वाले वायु देव का मैं पुत्र हूं। उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। उनका औरस पुत्र होने के कारण मेरे अंदर भी उन्हीं की शक्ति है। अपनी भुजाओं के वेग से मैं समुद्र को विक्षुब्ध कर सकता हूं। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेह कुमारी जानकी जी का दर्शन करूंगा। अत: अब तुम लोग आनंदपूर्वक सारी चिंता छोड़कर खुशियां मनाओ। पवन पुत्र हनुमान जी की बातें सुनकर वानर सेनापति जाम्बवान को बड़ी प्रसन्नता हुई और वानरों का शोक जाता रहा।

उन्होंने कहा, ‘‘हनुमान! ये सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं। तुमने अपने बंधुओं का सारा शोक नष्ट कर दिया। ऋषियों के प्रसाद, वृद्ध वानरों की अनुमति तथा भगवान श्री राम की कृपा से तुम इस महासागर को सहज ही पार कर जाओ। जब तक तुम लौट कर यहां आओगे, तब तक हम तुम्हारी प्रतीक्षा में एक पैर से खड़े रहेंगे, क्योंकि हम सभी वानरों के प्राण इस समय तुम्हारे ही अधीन हैं।’’ इसके बाद छलांग लगाने के लिए श्री हनुमान जी महेंद्र पर्वत के शिखर पर पहुंच गए।

उन्होंने मन ही मन छलांग लगाने की योजना बनाते हुए चित्त को एकाग्र कर श्री राम-स्मरण किया। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा को ऊंचा किया और बड़े ही वेग से शरीर को सिकोड़ कर महेंद्र पर्वत के शिखर से छलांग लगा दी। कपिवर हनुमान जी के चरणों से दब कर वह पर्वत कांप उठा और दो घड़ी तक लगातार डगमगाता रहा। आकाश मार्ग से हनुमान जी ने वानरों से कहा, ‘‘वानरो! यदि मैं जनक नंदिनी सीता जी को नहीं देखूंगा तो इसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊंगा। यदि मुझे स्वर्ग में भी मां सीता के दर्शन नहीं हुए तो राक्षस राज रावण को ही बांध लाऊंगा।’’

ऐसा कह कर हनुमान जी विघ्न बाधाओं का कोई विचार किए बिना बड़े ही वेग से दक्षिण दिशा में आगे बढ़े। हनुमान जी के वेग से टूट कर ऊपर उठे वृक्ष उनके पीछे एक मुहूर्त तक ऐसे चले जैसे राजा के पीछे उसके सैनिक चलते हैं।

महावीर हनुमान सुरसा के मुंह में

सुरसा के मुंह में

हनुमान जी को आकाश में बिना विश्राम लिए लगातार उड़ते देख कर समुद्र ने सोचा कि यह प्रभु श्री राम जी का कार्य पूरा करने के लिए जा रहे हैं। किसी प्रकार थोड़ी देर के लिए विश्राम दिलाकर इनकी थकान दूर करनी चाहिए। अत: समुद्र ने अपने जल के भीतर रहने वाले मैनाक पर्वत से कहा, ‘‘मैनाक! तुम थोड़ी देर के लिए ऊपर उठ कर अपनी चोटी पर हनुमान को बिठा कर उनकी थकान दूर करो।’’

समुद्र का आदेश पाकर मैनाक प्रसन्न होकर हनुमान जी को विश्राम देने के लिए तुरन्त उनके पास आ पहुंचा। उसने उनसे अपनी सुंदर चोटी पर विश्राम के लिए निवेदन किया। उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘मैनाक! तुम्हारा कहना ठीक है लेकिन भगवान श्री रामचंद्र जी का कार्य पूरा किए बिना मेरे लिए विश्राम करने का कोई प्रश्र ही नहीं उठता।’’ ऐसा कह कर उन्होंने मैनाक को हाथ से छूकर प्रणाम किया और आगे चल दिए।

हनुमान जी को लंका की ओर प्रस्थान करते देख कर देवताओं ने सोचा कि यह रावण जैसे बलवान राक्षस की नगरी में जा रहे हैं। अत: इनके बल-बुद्धि की विशेष परीक्षा कर लेना इस समय अत्यंत आवश्यक है। यह सोचकर उन्होंने नागों की माता सुरसा से कहा, ‘‘देवी सुरसा! तुम हनुमान के बल-बुद्धि की परीक्षा लो।’’ देवताओं की बात सुनकर सुरसा तुरन्त एक राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान जी के सामने जा पहुंची।

उसने उनका मार्ग रोकते हुए कहा, ‘‘वानरवीर! देवताओं ने आज मुझे तुमको अपना आहार बनाने के लिए भेजा है।’’ उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘माता! इस समय मैं प्रभु श्री रामचंद्र जी के कार्य से जा रहा हूं। उनका कार्य पूरा करके मुझे लौट आने दो। उसके बाद मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे मुंह में प्रविष्ट हो जाऊंगा। इस समय तुम मुझे मत रोको, यह तुमसे मेरी प्रार्थना है।’’इस प्रकार हनुमान जी ने सुरसा से बहुत प्रार्थना की लेकिन वह किसी प्रकार भी उन्हें जाने न दे रही थी।

अंत में हनुमान जी ने क्रुद्ध होकर कहा, ‘‘अच्छा तो लो तुम मुझे अपना आहार बनाओ।’’ उनके ऐसा कहते ही सुरसा अपना मुंह सोलह योजन तक फैलाकर उनकी ओर बढ़ी। हनुमान जी ने तुरन्त अपना आकार उससे दोगुना अर्थात 32 योजन तक बढ़ा लिया। इस प्रकार जैसे-जैसे वह अपने मुख का आकार बढ़ाती गई हनुमान जी अपने शरीर का आकार उसका दोगुना करते गए। अंत में उसने अपना मुंह फैलाकर 100 योजन तक चौड़ा कर लिया।

तब हनुमान जी तुरन्त अत्यंत छोटा रूप धारण करके उसके उस 100 योजन चौड़े मुंह में घुस कर तुरंत बाहर निकल आए। उन्होंने आकाश में खड़े होकर सुरसा से कहा, ‘‘माता! देवताओं ने तुम्हें जिस कार्य के लिए भेजा था वह पूरा हो गया है। अब मैं भगवान श्री रामचंद्र जी के कार्य के लिए अपनी यात्रा पुन: आगे बढ़ाता हूं।’’

सुरसा ने तब उनके सामने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर कहा, ‘‘महावीर हनुमान! देवताओं ने मुझे तुम्हारे बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए ही यहां भेजा था। तुम्हारे बल-बुद्धि की समानता करने वाला तीनों लोकों में कोई नहीं है। तुम शीघ्र ही भगवान श्रीरामचंद्र जी के सारे कार्य पूर्ण करोगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसा मेरा आशीर्वाद है।’’

03 नवंबर 2012

क्या है छठ पूजा की महिमा, क्यों देते हैं सूर्य को अर्घ

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छठ पूजा व्रत 2015 के महत्त्वपूर्ण दिवस-

नहा खा – 15, नवम्बर 2015 

खरना / लोहंडा - 16 , नवम्बर 2015

सांझा अर्ग - 17नवम्बर 2015

सुबह अर्ग - 18 , नवम्बर 2015
पारण - 18, नवम्बर 2015







उत्सव का स्वरूप

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

लोहंडा और खरना

दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

क्या है छठ पूजा की महिमा, क्यों देते हैं सूर्य को अर्घ

इस पर्व के बारे में पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। मैथिल वर्षकृत्य विधि में भी 'प्रतिशर षष्ठी' की महिमा के बारे में बताया गया है। बताया जाता है कि सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। पूजा के बाद कर्ण किसी भी याचक को इस व्रत को सभी हिंदू अत्यंत भक्ति भाव व श्रद्धा से मनाते हैं। सूर्याअर्घ के बाद व्रतियों से प्रसाद मांगकर खाने का प्रावधान है। प्रसाद में ऋतुफल के अतिरिक्त गेहूं के आंटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ठेकुआ व चावल के आंटे से गुड़ से बने भूसवा का होना अनिवार्य है। षष्ठी के दिन समीप की नदी या जलाशयों के तट पर अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ समर्पित कर पर्व की समाप्ति होती है।

पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाली व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन करते हैं। इसके बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं। व्रत समाप्त होने के बाद व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं।

मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल (खरना पूजन) से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है।

02 नवंबर 2012

करवा चौथ व्रत: परंपरा और स्वरूप



कार्तिक माह की कृष्ण चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाने वाला करकचतुर्थी यानी करवा चौथ का व्रत स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य की कामना और अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है। इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक यह करवा चौथ या करक चतुर्थी व्रत संबंधों में नई ताजगी एवं मिठास लाता है। करवा चौथ में सरगी का काफी महत्व है। सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दी जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है।

परंपरा के तौर पर यह व्रत पर्व वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है, परन्तु उत्तर-मध्य भारत में यह बहुत अधिक उत्साह व शौक से विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। हालांकि भारत में ही कई ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां इसे बिल्कुल नहीं मनाया जाता है, जैसे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में गढ़वाल, अल्मोड़ा आदि अंचलों समेत समूचा दक्षिण भारत इस व्रत से अनभिज्ञ और उदासीन है। हां, यह जरुर है कि इन क्षेत्रों में जेष्ठ में पड़ने वाले तीन दिन के वट सावित्री व्रत  की अनिवार्यता जरूर है, जिसमें सुहागन स्त्री के व्रत का वही उद्देश्य होता है, जो  करवा चौथ के व्रत का। भारतीय दर्शन की पौराणिक परंपरा के अनुसार यह पर्व उन स्त्री जातकों के लिए भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, जिनके वैवाहिक संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं या जिनके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो। यदि ऐसी स्त्रियां इस पर्व पर विधि-विधान से उपवास करके पूजा-अर्चना व कामना करती हैं तो पति-पत्नी के संबंधों में निश्चित रूप से मधुरता बढ़ेगी, आपसी सामंजस्य बढ़ेगा तथा उनके वैवाहिक जीवन से कष्ट दूर हो जाएंगे और खुशहाली आएगी। इस व्रत यह एक गहन पौराणिक मान्यता है।

इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही हो जाती है, जब सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्त्र इत्यादि देती हैं। यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है। सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मिठाई आदि को व्रती महिलाएं व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रातः काल में तारों की छांव में ग्रहण कर लेती हैं। तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है। इस दिन स्त्रियां साज-श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूजा के समय नए वस्त्र पहनती हैं।

दोपहर में सभी सुहागन स्त्रियां एक जगह एकत्रित होती हैं, शगुन के गीत आदि गाती हैं। इसके बाद शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासू मां के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं। रात के वक्त चांद निकलने के बाद अनेक पकवानों से करवा चौथ की पूजा की जाती है तथा चांद को अर्घ्य देकर उसकी पूजा करते हैं। चंद्र दर्शन के बाद छलनी से आर-पार पति का चेहरा देखकर पति के हाथों से पत्नी जल पीती है और अपने व्रत को पूर्ण करती है।

करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार करवा नाम की एक स्त्री थी। वह बहुत पतिव्रता थी। वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गांव में रहती थी। एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा होता है। तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है। वह उसके पति का पांव अपने मुंह में दबा लेता है और उसे न��ी में खींचकर ले जाने लगता है। तब उसका पति जोर-जोर से अपनी पत्नी को करवा-करवा कहके मदद के लिए पुकारने लगता है। पति की आवाज सुन कर करवा भागी-भागी वहां पहुंचती है। इसी दौरान वह अपने पति को फंसा देख मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध देती है। फिर वह यमराज से अपने पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है। करवा की करुण व्यथा देख कर यमराज उससे कहते हैं कि वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं। करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है और यमराज करवा से प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी, वह सौभाग्यवती होगी। तब से  करवा चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है।

धर्म ग्रंथों में महाभारत से संबंधित एक और पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पांडवपुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती हैं। वह भगवान श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं।

महाभारत काल में पांडवों के दुख के दिनों में श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करक चतुर्थी अर्थात करवा चौथ का व्रत रखें तो उन्हें इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। भगवान कृष्ण के कथनानुसार द्रौपदी विधि-विधान समेत करवा चौथ का व्रत रखती हैं, जिससे उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

व्रत मात्र रस्म अदायगी
आज के समय में हर छोटे-बड़े शहर से लेकर महानगरों में  करवा चौथ व्रत का आधुनिक स्वरूप बिल्कुल बदल गया है। इस व्रत पर भी बाजार कल्चर हावी हो गया है। सरगी के रूप में किस्म किस्म के महंगे रेडिमेड फूड और गिफ्ट पैक चल पड़े हैं, जो कि सास अपनी बहू को देती हैं। सुहागन की साज-सज्जा अब पार्लर आधारित हो गई है और पहनावा डिजाइनर ड्रेसों, साड़ियों, लहंगों और आधुनिक चाइनीज़ करवों तक जा पहुंचा है। यहां तक कि चांद देखने के बाद पति दर्शन की छलनी भी अब चांदी की हो गई है। रही बात मेकअप की तो उसके लिए अमीरी और दिखावे की होड़ ने सभी परंपरागत स्वरूपों पर पानी फेर दिया है। ऐसे में लगता है कि यह त्योहार मध्यवर्गीय सम्पन्नता का आडंम्बर मात्र रह गया है। लेकिन इसके विपरीत देहातों में आज भी इसका परंपरागत वजूद कायम है और वहां पर लगता है कि वास्तव में यह व्रत सुहागनों द्वारा की जाने वाली एक उपयुक्त साधना है, जिसे अधिकांश महिलाएं आज भी श्रद्धापूर्वक निभा रही हैं।

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