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13 दिसंबर 2012

महाकुम्भ मेला 2013


महाकुम्भ मेला 2013 की महत्वपूर्ण तिथियॉं 


27 (रविवार) जनवरी - पौष   पूर्णिमा
6 फरवरी (बुधवार) एकादशी स्नान
10 फरवरी (रविवार) मौनी अमावस्या स्नान (मुख्य स्नान दिवस)
15 फरवरी (शुक्रवार) बसंत पंचमी स्नान
17 फरवरी (रविवार) रथ सप्तमी स्नान
18 फरवरी (सोमवार) भीष्म अष्टमी स्नान
25 फरवरी (सोमवार) माघी पूर्णिमा स्नान
maha kumbh mela
MAHAKUMBHA

इलाहाबाद की ख्याति दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल की है। यहां संगम में स्नान के लिए हर साल माघ मेला, हर 3 साल पर कुंभ मेला, हर 6 साल पर अर्धकुंभ मेला और हर 12 साल पर पूर्णकुंभ मेला लगता है और हर 144 साल पर महाकुंभ मेला लगता है जिसमें दुनिया भर से करोड़ों लोग पहुंचते हैं।
तीर्थराज के नाम से मशहूर प्रयाग महाकुंभ शुरू होने जा रहा है, विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले में इस बार 10 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है, तैयारियां जोरों पर हैं, पूरे शहर को एक नई शक्ल दी जा रही है।
कुंभ की तैयारियों के लिए इलाहाबाद का पूरा प्रशासन एकजुट होकर काम कर रहा है। करीब 50 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले मेला क्षेत्र को श्रद्धालुओं के रहने लायक बनाने का काम अभी से होने लगा है। सिर्फ मेले की तैयारी पर करीब 300 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा शहर में नई सड़कें, नालियां और चौराहों को बनाने का काम भी चल रहा है। ये सब मिलाकर 1,000-1,200 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है। ये सारी तैयारियां इस तरीके से हो रही हैं कि कुंभ स्नान के लिए आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को कोई दिक्कत ना हो।
इस बार कुंभ मेला के तैयारी के खर्च में जेएनएनयूआरएम और नेशनल गंगा रिवर मिशन अथॉरिटी का खर्च भी शामिल है। कुंभ मेला इलाहाबाद में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है और इस दौरान यहां की आबादी विश्व में एक शहर की सबसे ज्यादा आबादी होती है। कुंभ मेले की तैयारी और इलाहाबाद में इस दौरान आए लोगों के लिए समुचित इंतजाम, अपने आप में एक रिकॉर्ड से कम नहीं है। और यही कुंभ इलाहाबाद के हजारों लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी है।
इलाहाबाद के लिए पर्यटन से आय का बड़ा स्त्रोत भी है। जाहिर तौर पर इस मेले में वो क्षमता है, जो इलाहाबाद को सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी बनाता है।
 महाकुम्भ पर्व इलाहाबाद में मनाया जाता है। इस प्रकार भारत वर्ष में महाकुम्भ मेला संसार का सबसे बड़ा मेला होता है।
अनगिनत लोग इतने बड़े जनसमूह के रूप में अपना समय एवं धन व्यय करके कुम्भ पर्व पर अमृत प्राप्त करने की अभिलाषा से आते हैं। प्रत्येक प्राणी चर या अचर, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति आदि ग्रहों एवं भीमकाय नक्षत्रों, जो सूर्य से भी कई-कई लाख गुना बड़े हैं से पृथ्वी पर आ रही प्राण ऊर्जा से जीवित रहता है। इस प्राण ऊर्जा की प्रकृति, तीव्रता, सघनता एवं विभव आदि पर्यावरण के अनुसार परिवर्तित होती रहती है तथा ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति आदि ग्रहों एवं तारा समूहों से उत्सर्जित ऊर्जा से बनता है तथा यह पर्यावरण विभिन्न ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति परिवर्तन के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। ब्रह्माण्डीय पर्यावरण के परिवर्तन के कारण ही पृथ्वी पर प्रत्येक वर्ष मौसम में परिवर्तन होता रहता है जिसके फलस्वरूप किसी वर्ष फसल बहुत अच्छी हाती है, फल बहुत मीठे आते हैं तथा सामान्य जन का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा किसी वर्ष फसल में कीड़ा लग जाता है, फलों में स्वाद नहीं होता या महामारी आदि होती है।
प्राण ऊर्जा आकाश से पृथ्वी की ओर छोटे-छोटे लाखों चमकीले कणों के रूप में हर समय आती रहती है जिसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दो मिनट आकाश की ओर ध्यान से देखने पर आभास कर सकता है। इसकी तीव्रता एवं सघनता आकाश में बादल होने पर कम तथा आकाश स्वच्छ होने पर अधिक दिखाई देती है। यह प्राण ऊर्जा जल में घुलनशील होने के कारण हिलते हुए और बहते हुए जल में अधिक मात्राा में शीघ्र घुल जाती है। ब्रह्माण्ड को ऊर्जा का समुद्र कहते हैं और ग्रहादि के परिभ्रमण से इस समुद्र का मन्थन होता है। ग्रहों एवं नक्षत्रों के योग से जो अमृतमयी ब्रह्माण्डीय बनता है उसको अमृतमयी कुम्भ की संज्ञा दी गई है। स्पष्ट है कि कुम्भ महापर्व अमृतयमी ब्रह्माण्डीय पर्यावरण अर्थात् अमृतमयी प्राण ऊर्जा का एक उदाहरण है जो ग्रह और नक्षत्र के योग से बनता है।गुरु ग्रह बारह वर्ष बाद कुम्भ राशि पर आता है। गुरु कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में आने पर हरिद्वार में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।मेष राशि में गुरु व मकर में सूर्य होने पर प्रयाग में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।सिंह राशि में गुरु, मेष में सूर्य व तुला में चन्द्र होने पर उज्जैन में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।कर्क राशि में गुरु, कर्क राशि में सूर्य, चन्द्र के योग होने पर नासिक में पूर्ण कुम्भ होता है।

उक्त ग्रह योग समस्त स्थानों पर एक समान होते हैं। लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों ने पर्यावरण का अध्ययन करके सामान्य जन को इसका लाभ पहुंचाने की दृष्टि से चार ऐसे स्थान का चयन किया आध्यात्मिक दृष्टि से पवित्र और प्राकृतिक रूप से वहां शुद्ध जल नदी सदृश उपलब्ध रहता है। इस जल में स्नान करना अमृतमयी बताया गया है। वस्तुतः प्राचीन काल में वर्तमान काल की तरह शुद्ध जल प्राप्त करने की सुविधाएं प्राप्त नहीं थी। शुद्ध जल से स्नान के लिए पूर्णतः नदियों पर ही आश्रित रहना पड़ता था। आजकल तो शुद्ध जल घर पर ही उपलब्ध हो जाता है। अतः शुद्ध जल को खुले एवं बड़े पात्रों में रात्रि में खुले आकाश में कुम्भ काल में रख दिया जाए तो उस जल में भी लगभग वहीं गुण आ जाते हैं जो इन स्थानों में उन कालों में आते थे।
 ऐसे व्यक्ति जो कुम्भ पर्व काल में हरिद्वार आदि स्थानों पर नहीं जा पाते वे कुम्भ पर्वकाल के अमृतमयी पर्यावरण का अत्यधिक लाभ घर रहकर ही उठा सकते हैं। लेकिन अधिक लाभ जोकि स्थान विशेष की विशिष्ट ऊर्जा के कारण उक्त स्थान पर जाने पर ही प्राप्त होता है।

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