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14 जनवरी 2012

Shahi Makar Sankranti Photos

शाही मकर संक्रांति मनाने का अंदाज़
 
मकर संक्रांति का महत्व क्यों?


Rajesh Mishra (The wake, News Editor) Visit Gangasagar


'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
हे सूर्य! हमें भी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो...

हिंदू धर्म ने माह को दो भागों में बाँटा है- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं।

सूर्य पर आधारित हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। होली, दीपावली, दुर्गोत्सव, शिवरात्रि और अन्य कई त्योहार जहाँ विशेष कथा पर आधारित हैं, वहीं मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। मकर संक्रांति का महत्व हिंदू धर्मावलंबियों के लिए वैसा ही है जैसे वृक्षों में पीपल, हाथियों में ऐरावत और पहाड़ों में हिमालय।

सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। यही एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है।

इसी दिन से हमारी धरती एक नए वर्ष में और सूर्य एक नई गति में प्रवेश करता है। वैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि 21 मार्च को धरती सूर्य का एक चक्कर पूर्ण कर लेती है तो इस मान ने नववर्ष तभी मनाया जाना चाहिए। इसी 21 मार्च के आसपास ही विक्रम संवत का नववर्ष शुरू होता है और गुड़ी पड़वा मनाया जाता है, किंतु 14 जनवरी ऐसा दिन है, जबकि धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है। जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।

मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था, कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएँ या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। दक्षिणायन में देह छोड़ने पर बहुत काल तक आत्मा को अंधकार का सामना करना पड़ सकता है। सब कुछ प्रकृति के नियम के तहत है, इसलिए सभी कुछ प्रकृति से बद्ध है। पौधा प्रकाश में अच्छे से खिलता है, अंधकार में सिकुड़ भी सकता है। इसीलिए मृत्यु हो तो प्रकाश में हो ताकि साफ-साफ दिखाई दे कि हमारी गति और स्थिति क्या है। क्या हम इसमें सुधार कर सकते हैं? क्या हमारे लिए उपयुक्त चयन का मौका है?

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। (श्लोक-24-25)






मकर संक्रांति / MAKAR SANKRANTI

धर्म और प्रेम का पर्व मकर संक्रांति


भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति आपसी मनमुटाव को तिलांजलि देकर प्रेम बढ़ाने हेतु मनाई जाती है। इस दिन की आने वाली धार्मिक कृतियों के कारण जीवों में प्रेमभाव बढ़ने में और नकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर जाने में सहायता मिलती है। इस निमित्त पाठकों के लिए ग्रंथों से प्राप्त मकर संक्रांति की जानकारी दे रहे हैं।

कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को दक्षिणायन कहते हैं। सूर्य के दक्षिणायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होने से सूर्य के दक्षिणायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य का उत्तरायन आरंभ होता है। सूर्य के उत्तरायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत हो जाने से सूर्य के उत्तरायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-सत्तवात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है।

इस कारण यह काल साधना करने वालों के लिए पोषक होता है। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होने से इस काल में वातावरण भी सदा की तुलना में अधिक शीतल होता है। इस काल में तिल भक्षण अधिक लाभदायक होता है। तिल के तेल में सत्व-रिंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। इसके अतिरिक्त तिल भक्षण से शरीर की चंद्र नाड़ी कार्यरत होती है।

इससे जीव वातावरण से तुरंत समन्वय साध सकता है, क्योंकि इस समय ब्रह्मांड की भी चंद्र नाड़ी ही कार्यरत होती है। जीव के शरीर का वातावरण व ब्रह्मांड का वातावरण एक हो जाने से साधना करते समय जीव के सामने किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आती।

साधना की दृष्टि से महत्व 



मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले जीव को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीव में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है।

इस दिन रज-तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ उठाने का प्रत्येक जीव प्रयास करे। मकर संक्रांति का दिन साधना के लिए अनुकूल है। इसलिए इस काल में अधिक से अधिक साधना कर ईश्वर एवं गुरु से चैतन्य प्राप्त करने का प्रयास करें। 

संक्रांति पर ब्रह्म मुहूर्त में करें स्नान


मकर संक्रांति के अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त में ही स्नान करना अच्छा माना जाता है। कुछ लोग गंगा जी जाकर स्नान करते हैं तो जो नहीं जा पाते वे घरों में ही पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान कर मकर संक्रांति का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। इस दिन खिचड़ी का दान किया जाएगा।

पूर्व उत्तरप्रदेश में इसे खिचड़ी संक्रांति भी कहते हैं। कहा जाता है कि जाड़े के दिनों में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो माघ का महीना प्रारंभ हो जाता है। इस महीने उड़द की खिचड़ी एवं रेवड़ी-मूंगफली खाने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। इस प्रकार यह पर्व प्रकृति परिवर्तन के साथ शरीर का संतुलन बनाए रखने की ओर भी इशारा करता है।

उत्तराखंड के लोग इसे घुघुतिया त्योहार भी कहते हैं जिसमें आटे को गुड़ या शहद में तैयार कर शकरपारे बनाए जाते हैं तथा सुबह स्नान करने के बाद 'काले कौआ काले पूस की रोटी माघ में खाले' के नारे लगाते हुए छोटे-छोटे बच्चे घुघुत को कौआ को बुलाकर खिलाएंगे।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं समस्त प्रकृतियां, ऋतु एवं महीने सब मुझसे ही पैदा होते हैं। इसलिए भारतीय उपासना पद्धति में प्रत्येक ऋतु, मास, पक्ष, सप्ताह एवं दिन-रात परामात्मा के स्वरूप ही माने गए हैं। इसीलिए हमारी उपासना सनातन उपासना कहलाती है।

हर दिन किसी न किसी देवता की उपासना से जुड़ा होने से नित उत्सव का आनंद लोगों को मिलता ही रहता है। साथ ही किसी विशेष पर्व पर होने वाले धार्मिक उत्सव में तो सारा जनमानस एक-साथ आनंद में झूमने लगता है।

इसी कड़ी में है लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व जो हमें धार्मिक अनुष्ठान करते हुए प्रकृति से जुड़े रहने का संदेश देता है। इसकी धूम गांव, नगर, शहर हर जगह दिखाई देती है।

ज्योतिषियों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन तिल का उपयोग 6 प्रकार से करना चाहिए। तिल का तेल जल में डालकर स्नान, तिल के तेल की शरीर पर मालिश करके स्नान, तिल का उपयोग हवन सामग्री में, तिलयुक्त जल का सेवन, तिल व गुडयुक्त मिठाई व भोजन का सेवन, तिल का दान करने से शारीरिक, धार्मिक व अन्य लाभ तथा पुण्य प्राप्त होते हैं।

इसके अतिरिक्त पूजन में चंदन से अष्ठदल का कमल बनाकर उसमें सूर्यदेव का चित्र स्थापित करें। शाम को तिलयुक्त भोजन से अपना व्रत खोलें।

मकर संक्रांति का संदेश!


हमारे देश में अधिकांश त्योहार महज रूढ़ियों और परंपराओं से जुड़े न होकर उनके पीछे ज्ञान, विज्ञान, कुदरत स्वास्थ्य और आयुर्वेद जैसे तमाम मुद्दे जुड़े हैं। मसलन 'मकर संक्रांति' को ही लें - पौष मास में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है।

यूं तो सूर्य साल भर में 12 राशियों से होकर गुजरता है। लेकिन इसमें भी 'कर्क' और 'मकर' राशि में इसके प्रवेश का विशेष महत्व है। क्योंकि मकर में प्रवेश के साथ सूर्य 'उत्तरायण' हो जाता है। जिसके साथ बढ़ती गति के चलते दिन बड़ा तो रात छोटी हो जाती है। जबकि कर्क में सूर्य के 'दक्षिणायन' होने से रात बड़ी और दिन छोटा हो जाता है।

पुराणों के मुताबिक 'उत्तरायण' का विशेष महत्व है और इस दौरान आई मृत्यु में 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है। यही वजह रही कि महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने तक इंतजार किया था।

'मकर संक्रांति' यानी प्रकाश पर अंधकार के विजय का पर्व। मानवीय जीवन जो प्रकाश और अंधकार से घिरा है। अंधकार से प्रकाश को जाने के इस संक्रमण का दौर अज्ञान के अंधेरे में घिरे मानवी मन को ज्ञान के प्रकाश से निखार देता है।

आप जरा इसके व्यावहारिक नजरिए पर गौर करें - ग्रामीण कहावत के मुताबिक 'धन के पंद्रह, मकर पच्चीस चिल्ला जाड़े दिन चालीस।' जाड़ा पूरे चालीस दिन का होता है। जिसमें से सूर्य के धनु राशि में रहते पंद्रह दिन ठंड अपने पूरे शबाब पर होती है।

सूर्य के उत्तरायण होते ही दिन बड़ा होने के साथ कुदरत भी राहत महसूस करती है। वहीं तिळ-गुड आपस में मेलजोल बढ़ाने के साथ आपसी बैर-भाव भूल कर प्यार और सुलह का निर्माण करने का संदेश देता है क्योंकि मीठा बोलने से दिल खुश और सोच सकारात्मक होती है।

मकर संक्रांति के दिन महासंयोगों का मुहूर्त

महामुहूर्त के साथ 15 को मनेगी मकर संक्रांति





मकर संक्रांति अश्व पर सवार होकर 15 जनवरी को सुबह 6.22 बजे दक्षिण दिशा की ओर जाएगी। 28 वर्ष बाद मकर संक्रांति के दिन महासंयोगों का मुहूर्त बन रहा है। ऐसा ही महामुहूर्त का संयोग सन 1984 को मकर संक्रांति के दिन बना था। अब 100 वर्ष बाद ही ऐसा मुहूर्त अगली सदी में बनेगा।

ज्योतिषियों के अनुसार कन्या राशि पर चंद्रमा होने से भद्रा पाताल लोक में निवास करेगा। पृथ्वी पर भद्रा के नहीं होने से मकर संक्रांति पर भद्रा का रोड़ा नहीं होगा।

उत्तरायण सूर्य कराएंगे शुभ कार्य : ज्योतिषाचार्य धर्मेन्द्र शास्त्री ने बताया कि सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य उत्तरायण होने के साथ ही देवताओं के दिन भी शुरू हो जाएंगे। सूर्य सिद्घांत के अनुसार कर्क से धनु के सूर्य तक 6 माह देवताओं की रात्रि होती है और मकर से मिथुन के सूर्य तक 6 माह देवताओं के दिन होते हैं।

इसके साथ ही सूर्य देव इस समय पृथ्वी के निकट होते हैं। इसलिए देवताओं के दिन की शुरुआत का पहला दिन मकर संक्रांति सभी शुभ कार्यों के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

सुबह से शाम तक रहेगा पुण्यकाल : मकर संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगा। पुण्यकाल में तीर्थ स्थान में स्नान, दान, जाप, हवन, तुलादान, गौदान, स्वर्ण दान आदि का विशेष महत्व है।

इस दिन सूर्यदेव अपनी राशि बदलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति पर तिल का लेप लगाकर स्नान करने के अलावा दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

महामुहूर्त की शुरुआत : विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार का शुभारंभ, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, विधारंभ सहित अन्य कार्य महामुहूर्त में प्रारंभ करने पर फलदायी होते हैं।

क्या होगा मकर संक्रांति का राशिफल पर प्रभाव
मेष- ईष्ट सिद्धि
वृषभ - धर्म लाभ
मिथुन - कष्ट
कर्क - सम्मान
सिंह - भय
कन्या - यश
तुला- कलह
वृश्चिक - लाभ
धनु - संतोष
मकर - धन लाभ
कुंभ - हानि
मीन - लाभ।

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