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07 मार्च 2012

Rangon ka Tyohar Hai Holi


जानिए होली के महत्वपूर्ण


प्रतीकों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। और हो भी क्यों नहीं, ये बड़े मजेदार होते हैं। किसी भी संदर्भ को प्रदर्शित करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले बिंदु-रूप, छोटे-रूप या लघु-रूप चिह्न को प्रतीक कहते हैं। प्रतीकों से किसी भी संदर्भ को विस्तृत रूप में देखा जा सकता है। आज की तेज-रफ्तार जिंदगी में प्रतीकों का बहुतायत उपयोग होने लगा है।

जैसे पटाखों की बात निकलते ही हमें दीपावली की याद आ जाती है तो हमने पटाखे को दीपावली का प्रतीक मान लिया। इसी प्रकार हर्षोल्लास के पर्व होली के भी कई प्रतीक हैं जिनसे हमें इस त्योहार के होने के अहसास में बढ़ोतरी होती है।

रंग :
होली मुख्यतः रंगों का ही त्योहार है। लाल, गुलाबी, हरा, नीला, पीला आदि कई रंगों की चमक का नाम है होली। या यूं कहिए होली और रंग एक-दूसरे के पूरक हैं। होली का त्योहार हो और रंगों की बात न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। होली का सबसे पहला प्रतीक रंग ही है। रंगों के बिना होली अधूरी है। एक-दूसरे को रंग लगाने की होड़ तथा विभिन्न रंगों से पुते चेहरे अनायास ही होली का उल्लास दुगुना कर देते हैं।

गुलाल :
होली के दूसरे प्रतीक का नाम है गुलाल। इस दिन सभी को गुलाल लगाकर खुशी का इजहार किया जाता है। इसके अंतर्गत जहां बड़े-बुजुर्गों को गुलाल का टीका लगाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है, वहीं छोटों तथा बराबरी वालों के पूरे चेहरे पर गुलाल मसलकर हंसी-ठिठोली की जाती है।

भांग व ठंडाई :
होली त्योहार है मस्ती का, उमंग का, उल्लास का। इसका एक प्रतीक भांग व ठंडाई को भी माना गया है क्योंकि हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती करने के लिए आदमी का बेझिझक स्वभाव होना जरूरी है और भांग व ठंडाई के सेवन से आदमी की झिझक मिट जाती है और वह बेझिझक हो अपने को उन्मुक्त वातावरण में ढाल लेता है फिर उसके बाद होती है मस्ती और सिर्फ मस्ती।

प्रह्लाद व होलिका :

पौराणिक कथाओं को देखें तो होली का मुख्य प्रतीक भक्त प्रह्लाद और निर्दयी होलिका ही है। जब भक्त प्रह्लाद अपने क्रूर और निर्दयी पिता हिरण्यकश्यप को भगवान न मानकर प्रभु विष्णु की भक्ति करने लगा तो पिता ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका को, जिसे न जलने का वरदान प्राप्त था, आज्ञा दी कि वह प्रह्लाद को लेकर जलती लकड़ियों के ढेर पर बैठ जाए। होलिका ने ऐसा ही किया। मगर ईश्वर चमत्कार ने होलिका को तो जला दिया मगर प्रह्लाद को बचा लिया। तभी से होलिका दहन प्रचलन में है।

पिचकारी और गुब्बारे :
होली पर जब रंगों की बात चलती है तो पहला प्रश्न उठता है उन्हें लगाया कैसे जाए। हम हरएक को तो पकड़-पकड़कर रंग लगा नहीं सकते। ऐसी स्थिति में होली के एक और प्रतीक पिचकारी और गुब्बारों का जन्म हुआ। इनसे हम दूर खड़े व्यक्ति को भी रंगों से सराबोर कर लेते हैं। पानी में रंग घोलो, पिचकारी या गुब्बारों में भरो और दे मारो अपने मनचाहे निशाने पर।

हुड़दंग या गेर :
रंगों के त्योहार का नाम होली है और होली पर हुड़दंग होता ही है क्योंकि उमंग और उल्लास हुड़दंग से ही आता है। कोई चीख रहा है, कोई गा रहा है, कोई किसी को रंग लगाने के लिए उसके पीछे दौड़ रहा है, किसी को कोई जबर्दस्ती रंग के हौज में डुबो रहा है, कोई गप्पे लगा रहा है तो कोई भाँग के नशे में उल्टी-सीधी हरकतें कर औरों का मनोरंजन कर रहा है। ये सब हुड़दंग में ही तो आते हैं।

सोचो! भला ये सब न हो तो होली का मजा आ पाएगा क्या? शायद नहीं। यही हुड़दंग जब सामूहिक रूप धारण करता है तो वह गेर बन जाती है। फिर इसमें रंगों के इस खेल का दायरा बढ़ जाता है। लगभग प्रत्येक गांव, कस्बे, शहर में एक गेर जरूर निकलती है। गेर में सारे गम और दुश्मनी भूलकर लोग गले मिल जाते हैं और खुशियां मनाते हैं।

गुजिया :
होली सिर्फ रंग, मस्ती और हुड़दंग का ही नाम नहीं है, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां खाने-खिलाने का नाम भी है। इसमें सबसे पसंदीदा मिठाई को होली का प्रतीक मान लिया गया है और वह है गुजिया। यह कई प्रकार से बनाई जाती है जैसे- मावे की, खोबरे की, गुड़-तिल्ली की आदि। इस दिन गुजिया बनाकर खाने-खिलाने का रिवाज है। इसीलिए इसे भी होली-प्रतीकों में शुमार कर लिया गया है।

टेसू के फूल :

बसंत आते ही मौसम अंगड़ाई लेता है। ठंड गुलाबी होते-होते बिदाई की तैयारी में रहती है। आम बौराने लगते हैं। चारों ओर फूल ही फूल खिले रहते हैं और इन फूलों में अधिकता रहती है टेसू के फूलों की। इन फूलों को पलाश, किंशुक या खाखरे भी कहते हैं। पुराने जमाने में टेसू के फूलों का ही रंग बनाकर होली पर इसका प्रयोग किया जाता था।

जब आदमी तिथि भूल जाए, उसे कैलेंडर उपलब्ध न हो तो वह सिर्फ टेसू के फूल देखकर कह सकता है कि अब होली का त्योहार आ गया।

होलिकोत्सव....


एकता और सद्भावना का पर्व होली!
प्रेम और भाईचारे से मनाएं होली



होलाष्टक से धुलैंडी तक होली उत्सव का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। वस्तुतः यह पर्व सामाजिक एकता का सबसे बड़ा पर्व है जिसमें स्वामी-सेवक, छोटे-बड़े सभी प्रकार के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। साथ ही सारा समाज होली के रंग में रंग जाता है। होली में दिखनेवाली हंसी ठिठोली आपसी संवाद में निहित हैं।

बसंत पचंमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे होते हैं। जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है। आम्रमंजरियों पर भ्रमरावलियां मंडराने लगती हैं। प्रकृति में एक नई मादकता का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार होली पर्व के आते ही एक नवीन रौनक, नवीन उत्साह एवं उमंग की लहर दिखाई देने लगती है।

होली जहां एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है वहीं यह रंगों का त्योहार भी है। वृद्ध, नर-नारी सभी इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह एक देशव्यापी त्योहार भी है। इसमें जाति भेद को कोई स्थान नहीं है। इस अवसर पर लकड़ियों तथा कंड़ों आदि का ढेर लगाकर होलिका पूजन किया जाता है फिर उसमें आग लगाई जाती है।

पूजन के समय मंत्र का उच्चारण किया जाता है -

असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।

इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ पर्व भी कहा जाता है। खेत से नवीन अन्न को यज्ञ में हवन कर प्रदान करने की परंपरा भी है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होलिकोत्सव मनाने के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। यहां कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया गया है : -

ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से है। भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्रि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इस त्योहार का प्रचलन हुआ।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर पेड़ की शाखा को जमीन में गाड़ दिया जाता है। सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं।

यह त्योहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य प्रति अग्नि स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा था कि ऐसा करने से प्रह्लाद जल जाएगा तथा होलिका बच निकलेगी। हिरण्यकशिपु की बहन ने ऐसा ही किया। होलिका तो जल गई पर प्रह्लाद जीवित बच गए। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।

इस दिन आम्रमंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है। कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविंद पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक में वास करते हैं।

भविष्यपुराण में कहा गया है कि एक बार नारदजी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा- राजन्‌! फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिए जिससे संपूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक हंसे। बालक गांव के बाहर से लकड़ी कंडे लाकर ढेर लगाएं। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत्‌ पूजन करें। होलिका दहन करें। ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

होली एक आनंदोल्लास का पर्व है। इसमें जहां एक ओर उत्साह उमंग की लहरें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयां भी आ गई हैं। कुछ लोग इस अवसर पर गुलाल के स्थान पर कीचड़, गोबर, मिट्टी आदि भी फेंकते हैं। ऐसा करने से मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील एवं गंदे हंसी मजाक के हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः इन सबका त्याग करना चाहिए।

होली मित्रता एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेष भाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिए। एकता, सद्भावना का परिचय देना चाहिए। यही इस पर्व का मूल उद्देश्य एवं संदेश है।

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