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10 अप्रैल 2012

श्रीमहाकालेश्वर / Shri MahaKaleshwar

Shri Mahakaleshwar Jyotirling, Ujjain

धर्मग्रंथों में श्रीमहाकालेश्वर की अवंतिकापुरी की महिमा का बडा गुणगान किया गया है। अवंतिका का अर्थ है- समस्त प्राणियों की रक्षा करने में समर्थ।

युगों से महाकालेश्वर की नगरी अवंतिका अपने नाम को सार्थक सिद्ध कर रही है। भूलोक के अधिपति महाकालेश्वर की यहां उपस्थिति ही इस पुरी को दिव्यता देने के लिए पर्याप्त है। इसीलिए पुराणों में इसका एक नाम महाकाल-वन भी है। ब्रह्माण्ड में सर्वपूज्य माने गये तीन शिवलिङ्गों में अवंतिकानाथ श्रीमहाकाल को भू-लोक का स्वामी बताया गया है-

आकाशेतारकंलिङ्गम्पातालेहाटकेश्वरम्
भूलोकेचमहाकालंलिङ्गत्रयनमोऽस्तुते॥


लिंगपुराण का कथन है कि सृष्टि का प्रारंभ अवंतिका से ही हुआ है। मनीषियों का भी यही मानना है कि सृष्टि की शुरुआत और अंत का सूत्र महाकाल में ही निहित है। युग-परिवर्तन के साथ अवंतिका के नाम भी बदलते रहे हैं। भगवान शंकर के द्वारा त्रिपुरासुर का वध किये जाने पर विजय के उपलक्ष्य में अवंतिका को उज्जयिनी कहा गया। उज्जयिनी का अर्थ है- उत्कर्ष के साथ जय देने वाली।

शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास में अवंतिका [उज्जयिनी] की तीर्थयात्रा का अतिशय माहात्म्य है। विशेषकर वैशाख के कृष्णपक्ष में दशमी से अमावस्या तक पंचेशानि-यात्रा करने में समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा अवंतिकापुरी की यात्रा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। पंचेशानि- यात्रा से तात्पर्य है-अवंतिका [उज्जयिनी] के पांच प्रमुख शिवलिङ्गों की यात्रा। ये हैं- महाकालेश्वर, पिंगलेश्वर, कायावरोहणेश्वर, बिल्वेश्वर, दु‌र्द्धरेश्वर।अवंतिकानाथ महाकालेश्वर का उनके चारों द्वारपालसहित सविधि दर्शन करना ही इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य है। अत: इसे अवंतिका-चारद्वार यात्रा भी कहा जा सकता है। इस पुरी के केंद्रीय स्थान पर श्रीमहाकालेश्वर विराजमान हैं, जो स्वयंभू शिवलिङ्ग हैं। द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में केवल श्रीमहाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी हैं। अतएव दक्षिण दिशा के स्वामी- मृत्यु के देवता यम इनके सेवक हैं। काल के नियंत्रक केवल श्रीमहाकाल ही हैं। तभी तो यह कहावत प्रसिद्ध है-

अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चंडाल का। 
काल उसका क्या करे, जो भक्त हो महाकाल का॥

पहले महाकाल की भस्म आरती में चिता-भस्म का ही प्रयोग होता था, किन्तु महात्मा गांधी के आग्रह के पश्चात शास्त्रीय विधि से निर्मित उपल-भस्म से भस्मार्ती होने लगी।

पंचेशानि अर्थात् पंच ईशान [शिव] की यात्रा का शुभारम्भ श्रीमहाकालेश्वर मंदिर से होता है। पुण्य सलिला शिप्रा में स्नान करके श्रीमहाकालेश्वर मंदिर के परिसर में स्थित नागचंद्रेश्वर का पूजन करने के उपरान्त पंचेशानि-यात्रा शुरू होती है। वैशाख-कृष्ण-दशमी से अमावस्या तक तीर्थयात्री 118  किलोमीटर की परिक्रमा पूर्ण करते हैं। अवंतिकापुरी [महाकाल-वन] के 84 सिद्धलिङ्गों में अंतिम चार शिवलिङ्ग चारों दिशाओं में इसकी रक्षा में तत्पर चार द्वारपाल हैं।

पिंगलेश्वर

यह स्थल उज्जयिनी के पूर्व में है। अवंतिकापुरी के 84 सिद्धलिङ्गों [महादेवों] में यह 81वां शिवलिङ्ग है। इन्हें महाकाल-वन के पूर्वद्वार का अधिपति माना जाता है। भोपाल से उज्जयिनी जाने वाली बडी रेल लाईन पर अवंतिका [उज्जैन] से पूर्व इस नाम का स्टेशन आता है। पंचेशानि-यात्रा का यह पहला पडाव है। उज्जयिनी का यह पूर्वद्वार धर्मद्वार है, जिसके द्वारपाल पिंगलेश्वर की विधिपूर्वक पूजा तथा यहां दान करने से श्रद्धालु यात्री स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है।

कायावरोहणेश्वर

यह स्थान उज्जयिनी के दक्षिण में स्थित है। चौरासी महादेवों में से यह 82वां सिद्धलिङ्ग है। इसे महाकाल-वन का दक्षिणद्वार मानते हैं।

उज्जयिनी से इंदौर जाने वाले सडक मार्ग पर त्रिवेणी से यहां तक बस-टेम्पो मिलते हैं। पंचेशानि-यात्रा का यह दूसरा पडाव है। अवंतिकापुरी के द्वितीय द्वारपाल कायावरोहणेश्वर का मंदिर करोहनग्राम में स्थित है। उज्जयिनी का यह दक्षिणद्वार अर्थद्वार हैं। यहां अर्चना करने से सुख-समृद्धि और संपत्ति प्राप्त होती है।

बिल्वेश्वर

यह स्थान उज्जयिनी के पश्चिम में गंभीर नदी के तट पर अम्बोदिया ग्राम के पास स्थित है। चौरासी महादेवों में यह 83वां सिद्धलिङ्ग हैं। महाकाल-वन का यह पश्चिमद्वार है। इसके समीप ही गंभीर नदी पर बांध बना है, जिससे उज्जयिनी को पेयजल की आपूर्ति होती है। पंचेशानि-यात्रा का यह तीसरा पडाव है। अवंतिकापुरी के पश्चिमी द्वार कामद्वार के द्वारपाल बिल्वेश्वर पंचेशानि-यात्रा करनेवाले की सभी कामनाएं पूर्ण करते हैं।

दु‌र्द्धरेश्वर

यह स्थल उज्जयिनी के उत्तर में जैथलग्राम में है। चौरासी महादेवों में यह 84वां सिद्धलिङ्ग है। महाकाल-वन का यह उत्तरी-द्वार है। पंचेशानि-यात्रा का यह चौथा पडाव है। अवंतिकापुरी के चौथे द्वार मोक्षद्वार के अधिपति दु‌र्द्धरेश्वर के दर्शन-पूजन से भक्त भव-बंधन से मुक्त होता है।

भगवान शिव पंचानन अर्थात पांच मुख वाले हैं।

उनका पंचाक्षर मंत्र- नम: शिवाय... सबके लिए कल्याणकारी है। शिव के नेत्राश्रुओं से उत्पन्न रुद्राक्ष भी सामान्यत: पंचमुखी होता है। पंचेशानि-यात्रा पंचतत्वों से निर्मित मानव-काया को पूर्णत:शुद्ध कर देती है और तब जीव स्वत: शिवत्व प्राप्त कर लेता है। अवंतिकापुरी की तीर्थयात्रा भोग के साथ मोक्ष भी प्रदान करती है। आइये अवंतिकानाथ श्रीमहाकाल की स्तुति करें-

अवन्तिकायांविहितावतारंमुक्तिप्रदानायचसज्जनानाम्।
अकालमृत्यो:परिरक्षणार्थ वन्दे महाकाल महासुरेशम्॥

कल्याणकारी पंचमुखी हनुमान

Jai Shri Hanuman

हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा है। एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके। ऐसा वरदान प्राप्त करके वह भयंकर उत्पात मचाने लगा। सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की। तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया। 

मान्यता है कि भक्तों का कल्याण करने के लिए ही पंचमुखीहनुमान का अवतार हुआ। हनुमानजी का एकमुखी,पंचमुखीऔर एकादशमुखीस्वरूप प्रसिद्ध है। चार मुख वाले ब्रह्मा, पांच मुख वाली गायत्री, छह मुख वाले कार्तिकेय, चतुर्भुजविष्णु, अष्टभुजीदुर्गा, दशमुखीगणेश के समान पांच मुख वाले हनुमान की भी मान्यता है।

पंचमुखीहनुमानजी का अवतार मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को माना जाता है। शंकर के अवतार हनुमान ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। इसकी आराधना से बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता बढती है। आनंद रामायण के अनुसार, विराट स्वरूप वाले हनुमान पांच मुख, पंद्रह नेत्र और दस भुजाओं से सुशोभित हैं। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित हैं।

पंचमुख हनुमान के पूर्व की ओर का मुख वानर का है। जिसकी प्रभा करोडों सूर्यो के समान है। पूर्व मुख वाले हनुमान का स्मरण करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है। पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड का है। ये विघ्न निवारक माने जाते हैं। गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं। हनुमानजी का उत्तर की ओर मुख शूकर का है। इनकी आराधना करने से सकल सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।

भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए हनुमान भगवान नृसिंह के रूप में स्तंभ से प्रकट हुए और हिरण्यकश्यपुका वध किया। यही उनका दक्षिणमुखहै। उनका यह रूप भक्तों के भय को दूर करता है।

श्री हनुमान का ऊ‌र्ध्वमुख घोडे के समान है। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर उनका यह रूप प्रकट हुआ था। मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए। कष्ट में पडे भक्तों को वे शरण देते हैं। ऐसे पांच मुंह वाले रुद्र कहलाने वाले हनुमान बडे दयालु हैं।

हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा है। एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके। ऐसा वरदान प्राप्त करके वह भयंकर उत्पात मचाने लगा। सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की। तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया।

मान्यता है कि पंचमुखीहनुमान की पूजा-अर्चना से सभी देवताओं की उपासना का फल मिलता है। हनुमान के पांचों मुखों में तीन-तीन सुंदर आंखें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों तापों को छुडाने वाली हैं। ये मनुष्य के सभी विकारों को दूर करने वाले माने जाते हैं। शत्रुओं का नाश करने वाले हनुमानजी का हमेशा स्मरण करना चाहिए।

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