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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

04 मई 2012

Vastu Shastra Tips


वर्तमान समय में सुविधा जुटाना आसान है। परंतु शांति इतनी सहजता से नहीं प्राप्त होती। हमारे घर में सभी सुख-सुविधा का सामान है, परंतु शांति पाने के लिए हम तरस जाते हैं। वास्तु शास्त्र द्वारा घर में कुछ मामूली बदलाव कर आप घर एवं बाहर शांति का अनुभव कर सकते हैं।

- घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
- घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है।
- घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।
- दिन में एक बार चांदी के ग्लास का पानी पिये। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।
- अपने घर में चटकीले रंग नहीं कराये।
- किचन का पत्थर काला नहीं रखें।
- कंटीले पौधे घर में नहीं लगाएं।
- भोजन रसोईघर में बैठकर ही करें।
- शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।
इन छोटे-छोटे उपायों से आप शांति का अनुभव करेंगे।

कौन सी वस्तु कहां रखें:
- सोते समय सिर दक्षिण में पैर उत्तर दिशा में रखें। या सिर पश्चिम में पैर पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
- अलमारी या तिजोरी को कभी भी दक्षिणमुखी नहीं रखें।
- पूजा घर ईशान कोण में रखें।
- रसोई घर मेन स्वीच, इलेक्ट्रीक बोर्ड, टीवी इन सब को आग्नेय कोण में रखें।
- रसोई के स्टेंड का पत्थर काला नहीं रखें। दक्षिणमुखी होकर रसोई नहीं पकाए।
- शौचालय सदा नैर्ऋत्य कोण में रखने का प्रयास करें।
- फर्श या दिवारों का रंग पूर्ण सफेद नहीं रखें।
- फर्श काला नहीं रखें।
- मुख्य द्वार की दांयी और शाम को रोजाना एक दीपक लगाएं।

घर का बाहरी रंग कैसा हो-
- घर के आगे की दिवारों के रंग से भी वास्तु दोष दूर किया जा सकता है।
यदि आपका घर
- पूर्वमुखी हो तो फ्रंट में लाल, मेहरून रंग करें।
- पश्चिममुखी हो तो लाल, नारंगी, सिंदूरी रंग करें।
- उत्तरामुखी हो तो पीला, नारंगी करें।
- दक्षिणमुखी हो तो गहरा नीला रंग करें।
- किचन में लाल रंग।बेडरूम में हल्का नीला, आसमानी।
- ड्राइंग रूम में क्रीम कलर।
- पूजा घर में नारंगी रंग।
- शौचालय में गहरा नीला।
- फर्श पूर्ण सफेद न हो क्रीम रंग का होना चाहिए।

कमरो का निर्माण कैसा हो?
कमरों का निर्माण में नाप महत्वपूर्ण होते हैं। उनमें आमने-सामने की दिवारें बिल्कुल एक नाप की हो, उनमें विषमता न हो। कमरों का निर्माण भी सम ही करें। 20-10, 16-10, 10-10, 20-16 आदि विषमता में ना करें जैसे 19-16, 18-11 आदि।

बेडरूम में शयन की क्या स्थिति
बेडरूम में सोने की व्यवस्था कुछ इस तरह हो कि सिर दक्षिण मे एवं पांव उत्तर में हो।यदि यह संभव न हो तो सिराहना पश्चिम में और पैर पूर्व दिशा में हो तो बेहतर होता है। रोशनी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आंखों पर जोर न पड़े। बेड रूम के दरवाजे के पास पलंग स्थापित न करें। इससे कार्य में विफलता पैदा होती है। कम-कम से समान बेड रूम के भीतर रखे।

वास्तु शास्त्र और साज-सज्जा
घर की साज सज्जा बाहरी हो या अंदर की वह हमारी बुद्धि मन और शरीर को जरूर प्रभावित करती है। घर में यदि वस्तुएं वास्तु अनुसार सुसज्जित न हो तो वास्तु और ग्रह रश्मियों की विषमता के कारण घर में क्लेश, अशांति का जन्म होता है। घर के बाहर की साज-सज्जा बाहरी लोगों को एवं आंतरिक शृंगार हमारे अंत: करण को सौंदर्य प्रदान करता है। जिससे सुख-शांति, सौम्यता प्राप्त होती है।

भवन निर्माण के समय ध्यान रखें। भवन के अंदर के कमरों का ढलान उत्तर दिशा की तरफ न हो। ऐसा हो जाने से भवन स्वामी हमेशा ऋणी रहता है। ईशान कोण की तरफ नाली न रखें। इससे खर्च बढ़ता है।
शौचालय: शौचालय का निर्माण पूर्वोत्तर ईशान कोण में न करें। इससे सदा दरिद्रता बनी रहती है। शौचालय का निर्माण वायव्य दिशा में हो तो बेहतर होता है।

कमरों में ज्यादा छिद्रों का ना होना आपको स्वस्थ और शांतिपूर्वक रखेगा


कौन से रंग का हो स्टडी रूम?
रंग का भी अध्ययन कक्ष में बड़ा प्रभाव पड़ता है। आइए जानते हैं कौन-कौन से रंग आपके अध्ययन को बेहतर बनाते हैं। तथा कौन से रंग का स्टडी रूम में त्याग करना चाहिए।अध्ययन कक्ष में हल्का पीला रंग, हल्का लाल रंग, हल्का हरा रंग आपकी बुद्धि को ऊर्जा प्रदान करता है। तथा पढ़ी हुयी बाते याद रहती है। पढ़ते समय आलस्य नही आता, स्फुर्ती बनी रहती है। हरा और लाल रंग सर्वथा अध्ययन के लिए उपयोगी है। लाल रंग से मन भटकता नहीं हैं, तथा हरा रंग हमें सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है।नीले, काले, जामुनी जैसे रंगो का स्टडी रूम में त्याग करना चाहिए, यह रंग नकारात्मक उर्जा के कारक है। ऐसे कमरो में बैठकर कि गयी पढ़ाई निरर्थक हो जाती है।

सोनपुर मेला/ Sonepur Mela

विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला


बिहार के छपरा जिले के सोनपुर में कार्तिक माह में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। सोनपुर में प्रसिद्ध ऐतिहासिक हरिहरनाथ जी का मन्दिर है। सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बङा पशु मेला हैं। हमारे गाँव भेल्दी और पुरे छपरा जिले के लोग  इस मेले को हरिहरक्षेत्र मेला के नाम से पुकारते है। साथ ही इसे स्थानीय भाषा में ‘छत्तर मेला’ के नाम से पुकारते हैं।

भगवान् विष्णु मगरमच्छ से गज को बचाते हुए।. 
सोनपुर मेले का ज्यादा फोटो देखने के लिए निचे जाएँ...

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।

हिंदू धर्म में कार्तिक महीने का पौराणिक रूप से विशेष महत्व है। यह कई मायनों में दूसरे महीनों से भिन्न है। इस पूरे महीने में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं। इसी महीने की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर में गंगा और गंडक नदियों के संगम तट पर विशाल मेला लगता है। इस पावन अवसर पर गंडक नदी के दूसरे तट पर विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु मेला देखने और पावन संगम में डुबकी लगाने आते हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार सोनपुर की इस धरती ने कभी शक्ति पर भक्ति की विजय का संदेश दिया था। हम जब हाजीपुर रेलवे जंक्शन पर उतरते हैं तो स्टेशन के बाहर हमें ग्राह (मगरमच्छ) से गज (हाथी) को बचाते हुए भगवान विष्णु की प्रतिमायें दिखायी देती हैं। ऐसी मान्यता है कि एक बार विष्णु भक्त गज जब गंडक नदी में अपनी प्यास बुझाने गया, तो ग्राह ने उसका पैर अपने जबड़ों में भींच लिया और गज को पानी के अंदर खींचने लगा। इस संकट की घड़ी में गज ने अपने आराध्य विष्णुजी का स्मरण किया। गज की गुहार पर भगवान विष्णुजी आये और उन्होंने ग्राह को मारकर गज के प्राणों की रक्षा की। शक्ति पर भक्ति की इसी विजय के कारण इस स्थान विशेष का नाम `कौनहारा’ पड़ा। आज भी लाखों श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन कौनहारा घाट पर गंडक नदी में स्नान करते हैं और ईश्वर की कृपा की कामना करते हैं। यह सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हो चूका है। यहाँ से कुछ ही दुरी पर स्थित मंदिर में भगवान विष्णु और शिव की एक साथ प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसमें दोनों की पूजा एक साथ होती है। विष्णु (हरि) और शंकर (हर) के एकसाथ होने के कारण इस क्षेत्र को `हरिहर क्षेत्र’ भी कहा जाता है। विश्व में सोनपुर मेले के नाम से विख्यात यह मेला क्षेत्र में `छत्तर मेला’ के नाम से मशहूर है। सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। इस मेले में उन्नत नस्लों की गाय-भैंस, हाथी-घोड़े, ऊंट और दूसरे जानवरों तथा पशु-पक्षियों का क्रय-विक्रय होता है। गंगा और गंडक के मिलाप स्थल पर लगनेवाले इस मेले का इतिहास राजा चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए हाथी और घोड़ों की खरीददारी इसी मेले से करते थे। हालांकि आज भी इस मेले में हाथी और घोड़े काफी संख्या में खरीदी-बिक्री के लिए लाये जाते हैं, लेकिन वन्य जीवों की खरीददारी पर क़ानूनी प्रतिबंध के कारण रफ्ता-रफ्ता इस मेले का आकर्षण कम होता जा रहा है। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर एक माह तक चलनेवाले इस मेले में केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से लगायी जानेवाली तरह-तरह की प्रदर्शनियां लोगों के आकर्षण का केंद्र होती हैं।

यहां लगे थियेटर के तंबुओं में शाम को लोकगीतों और फिल्मी गीतों पर जब बालाओं के कदम थिरकते हैं तो मेले में दिनभर घूमने से होनेवाली थकान काफूर हो जाती है। इस मेले में पशु-पशुओं के अलावा विभिन्न प्रदेशों की कला-संस्कृति से संबद्ध वस्तुओं की खरीदी-बिक्री भी की जाती है, साथ ही राज्य के विभिन्न विभागों की लोक संस्कृतियों की मनोहारी झांकियां भी पूरे महीनेभर प्रदर्शित की जाती हैं। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी इस मेले का आनंद उठाते हैं। यह मेला धार्मिक एकता और सद्भाव की अनूठी मिसाल भी पेश करता है। मेले में बिना किसी भेदभाव के सभी जाति-धर्मों के लोग शरीक होते हैं। यही नहीं, मेले के दौरान प्रसिद्ध हरिहरनाथ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने में आम हिंदू भक्तों को भले ही मशक्कत करनी पड़े, लेकिन पेंटर शमीम मोहम्मद तथा उनके शार्गिदों के लिए यह सुलभ है। शमीम अहमद का परिवार 50 वर्षों से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिस्थापित शिव-विष्णु की मूर्तियांे के रंग रोगन में लगा है। शमीम अहमद के हाथों साल में दो बार भादों और कार्तिक महीने में हरिहरनाथ मंदिर की मूर्तियों का रंगरोगन के बाद ही इनकी पूर्जा अर्चना शुरू की जाती है।


यहीं पर हाजीपुर और सोनपुर को जोड़नेवाला ऐतिहासिक दर्शनीय पुल है जिसे अंगरेजों ने 1817 में बनवाया था। इससे लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर विश्व का सबसे लंबा पुल `महात्मा गांधी सेतु’ है जो राजधानी पटना और हाजीपुर को जोड़ता है। इसकी लंबाई लगभग 12 किलोमीटर है। रात के समय सोनपुर मेले से इस पुल पर जलते बिजली के बल्बों की रोशनी में पुल ऐसा लगता है मानो गंगाजी के गले में मोतियों का हार चमक रहा हो। यह क्षेत्र मीठे केले की बेती के लिए मशहूर है। यहां के केले में जो स्वाद है वह अनयत्र कहीं नहीं मिलता। यह मौसम केले के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस महीने में केले का स्वाद और मिठास बढ़ जाती है। इसलिए मेला देखेने आये लोग यहां के केले का स्वाद लेना नहीं भूलते।


























RAJESH MISHRA


राजेश मिश्रा द्वारा, भेल्दी, छपरा, बिहार

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