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08 मई 2012

Trichur Pooram Festival

 त्रिचूर पूरम के मेले की भव्यता


Trichur Pooram Festival

अपनी गरिमा, भव्यता और शानो शौकत के लिए त्रिचूर का मेला न केवल केरल में बल्कि समूचे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है। केरल में कहा जाता है कि जिसने त्रिचूर पूरम नहीं देखा उसने कुछ नहीं देखा। त्रिचूर पूरम का अर्थ है त्रिचूर महोत्सव।
Trichur Pooram Festival

Trichur Pooram Festival

इस मेले की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं। मेले से जुड़े लोग हाथियों के प्रशिक्षण, छातों की मरम्मत, आभूषणों की सफाई और आतिशबाजी के निर्माण में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि किसी को खाने-पीने और सोने की सुध नहीं रहती। मेले के दिनों में अपेक्षाकृत सूनसान, शांत और गतिहीन त्रिचूर नगर भीड़भाड़, कोलाहल और आनंद-उल्लास से जीवंत हो उठता है। 

त्रिचूर नगर का नाम इस नगर के आराध्य देव भगवान शिव के नाम पर है। त्रिचूर के पास एक हजार फुट ऊंचे पर्वत शिखर पर भगवान शिव का विशाल मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर को श्री शिव पेरूर कहा जाता था। कालांतर में जनता की टकसाल में श्री शिव पेरूर तिरू शिव पेरूर और फिर त्रिसूर और अंततः अंग्रेजी भाषा के प्रभाव में त्रिचूर हो गया। 

पूरम का शाब्दिक अर्थ होता है उत्सव। यह उत्सव कैसे शुरू हुआ यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। इसके जन्म का इतिहास पौराणिक किवदंतियों और मिथकों से दबा पड़ा है। अधिकांश लोगों का मत है कि यह उत्सव पहले अराट्टपूड़ा पूरम के रूप में शुरू हुआ। एक वर्ष भारी वर्षा के कारण शोभा यात्रा त्रिचूर से अराट्टपूरड़ा नहीं जा सकी। अतः महोत्सव का आयोजन त्रिचूर में ही किया गया और तब से यह वहीं किया जा रहा है। 

त्रिचूर पूरम के अवसर पर नगर के विभिन्न मंदिरों से देवी-देवताओं की चित्ताकर्षक शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। आकर्षक साज-सज्जा में देवताओं की सवारी लिए विभिन्न रंगों से सजे हाथियों के समूह नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक हाथी में कोलम अथवा प्रतीक चिन्ह होता है। उस पर हाथी के स्वामी और मंदिर का चित्र बना होता है। प्रमुख पुजारी के पीछे दो अन्य लोग बैठे होते हैं। उनके हाथों में परम्परागत आलवट्टम और वेंजामरम होते हैं। ये हाथी नगर के बीच में होकर धीरे-धीरे पारमेक्वावु मंदिर या तिरुवम्बाड़ी मंदिर की ओर बढ़ते हैं। त्रिचूर का मेला इन दो मंदिरों के हाथियों के बीच प्रतियोगिता के लिए भी प्रसिद्ध है। 

सूर्योदय के साथ त्रिचूर का समस्त नगर जीवंत हो उठता है। विभिन्न मंदिरों में पूरम से जुड़े विभिन्न विधि-विधान, अनुष्ठान और पूजा-अर्चना की जाती है। फिर मंदिर से नयनाभिराम वस्त्रों, आभूषणों और रंगों से सजे हाथी मंद-मंद गति से निकलते हैं और वड़क्कुनाथम मंदिर की ओर बढ़ते हैं। 

दोपहर को मड़तले वरवे का आयोजन किया जाता है। तिरुवम्बाड़ी मंदिर से तीन हाथी मंदिर मडम जाते हैं जहां पूरम में इस्तेमाल के लिए शुद्ध सोने के वस्त्राभूषण रखे जाते हैं। वड्क्कुनाथन मंदिर के मार्ग पर हाथी प्रत्येक घर के दरवाजे पर रुकते हैं। प्रत्येक घर की मालकिन हाथी के सामने एक परा लगभग 10 किलोग्राम धान और दीवट रखती है। हाथी कुछ धान लेकर परिवार की सुख-समृद्धि का आर्शीवाद देता है। इसे ‘परा एडुक्कल कहते हैं। वड़क्कुनाथन मंदिर के मैदान में एकत्र होने से पहले सभी हाथी इलंजी वृक्ष पर जाकर देवी को फूल चढ़ाते हैं। यही इलंजी तारा मेलम है जो नगाड़ों के नाद से वातावरण को धीर-गंभीर बना देता है। 

आतिश बाज़ी  का नज़ारा 

आतिशबाजी का मनमोहक नज़ारा
सांयकाल पांच बजे वडक्कुनाथन को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद हाथी मंदिर के दक्षिणी दरवाजे से बाहर निकलते हैं। इसे इरक्कम कहते हैं। इसके बाद आंखों को चौंधियां देने वाले चमकते-दमकते वस्त्राभूषणों से सज्जित और विभिन्न रंगों से चित्रित तीस हाथी मैदान में एक दूसरे के सामने, प्रत्येक ओर 15-15 खड़े होकर अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं। सूर्य की किरणों से हाथियों पर सजी जरी की झूल झिलमिलाने लगती है।

रात के अंतिम प्रहर में लगभग तीन बजे आतिशबाजी शुरू होती है। इसकी तैयारी काफी समय और श्रम लगाकर की जाती है। आतिशबाजी लगभग तीन घंटे चलती है। इस दौरान आकाश प्रकाशमान हो उठता है। आतिशबाजी की समाप्ति के साथ ढोल वादक पांडि मेडम की ध्वनि निकालते हैं जो महावतों और हाथियों के लिए अपने-अपने मंदिरों को जाने का संकेत होता है। इसी के साथ इस भव्य और मनमोहक समारोह की समाप्ति हो जाती है।


Thrissur Pooram Festival, Kerala

थ्रिसुर पूरम की धूम  मची है केरल  में

Thrissur Pooram Festival, Kerala
थ्रिसुर। केरल में थ्रिसुर पूरम की हर वर्ष  की भांति इस  वर्ष  भी धूम धाम से मनाई जा रही है । महोत्सव में  सजे-धजे हाथी शहर भर में अपनी कौशल दीखा रहे हैं। इस दौरान आतिशबाजी का नज़ारा सबको मोहित कर रहा है। 
मलयालम कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष मेडम के महीने में (मध्य अप्रैल से मध्य मई) पूरम मनाया जाता है। थ्रिसुर के तत्कालीन महाराज सक्थन थम्पूरम ने 18वीं सदी में इस उत्सव का प्रारम्भ किया था। पारम्परिक रीति रिवाजों के अनुसार पूरम के दिन मंगलवार को करीब 50 सुसज्जिात हाथी रंगबिरंगी छतरियों 'कुडमत्तम' के साथ थ्रिसुर शहर के मध्य से गुजरते है।

करीब 36 घंटे तक चलने वाले इस उत्सव मेंअगले दिन तड़के आतिशबाजी होती है जिसे देखने के लिए राज्य भर से लोग आते है। इस उत्सव में तिरुवम्बादी के वदाकुन्नाथन मंदिर एवं कृष्णा मंदिर और परामेक्कावु का देवी मंदिर भाग लेते है।

Thrissur Pooram Festival, Kerala

Thrissur Pooram Festival, Kerala

Thrissur Pooram Festival, Kerala
उत्सव के आयोजक ने कहा, ''इस वर्ष हम ध्वनि प्रदूषण घटाने के लिए रिमोट संचालित पटाखों का इस्तेमाल करेगे। हमारा ध्यान पटाखों के रंगारंग प्रदर्शन पर है।'' थ्रिसुर पूरम अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र के लिए भी प्रसिद्ध है। इस उत्सव में सभी धर्मो के लोग उत्साह से भाग लेते है।

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