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09 मई 2012

रथयात्रा – मोक्ष की ओर प्रयाण

रथयात्रा का दृश्य : राजेश मिश्रा


थयात्रा का शाब्दिक अर्थ है- रथ में बैठकर घूमने निकलना। समग्र भारत में यह उत्सव खूब उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण अथवा जगन्नाथ और श्रीराम की प्रतिमा को रथ में रखा जाता है। इस रथ को बहुत ही भक्तिभावपूर्वक श्रद्धालु खींचते हैं, और उसे लक्ष्मीजी, राधिकाजी अथवा सीताजी के मंदिर ले जाया जाता है। अंत में वह जगन्नाथ पुरी के गुंडिया मंदिर में ले जाया जाता है। जहाँ भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभाद्रा की काष्ठ की प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।

रथयात्रा असाढ़ सुद द्वितीया के दिन शुरू होती है और आठ दिनों तक चलती है। यह भारत के चार बड़े धामों में से एक है। इस जगन्नाथपुरी में यह उत्सव सबसे अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभाद्रा के साथ तीन अलग-अलग रथों पर पुरी के मार्गों पर नगरयात्रा करने निकलते हैं। इस अवसर पर पूरे विश्व से एकत्र हुए हजारों यात्रियों द्वारा इस रथ को खींचा जाता है।

पुरी के इस उत्सव की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे सभी जातियों के लोग रथ खींचने का अधिकार रखते हैं। पूजा और अन्य धार्मिक विधियाँ संपन्न होने के बाद सबेरे यह रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। पुरी के राजा गजपति सोने के झाड़ू से मार्ग साफ करते हैं। रथ को विविध रंगों के कपड़ों से सजाया जाता है और उनके अलग-अलग नाम रखे जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का ‘नंदिघोष’, बलराम के रथ का ‘तालध्वज’ तथा सुभाद्राजी के रथ का ‘दर्पदलन’ नाम रखा जाता है। नंदिघोष का रंग लाल और पीला, तालध्वज का रंग लाल और हरा तथा दर्पदलन का रंग लाल और नीला रखा जाता है। पुरी में देवी सुभाद्रा की पूजा होने पर भी उन्हें हिंदू पुराणों में देवी नहीं कहा गया है। मात्र महाभारत में सुभाद्रा भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की प्रिय बहन होने का उल्लेख किया गया है।
जगन्नाथ_बलभद्र_सुभद्रा

पुरी की ये तीनों प्रतिमाएँ भारत के सभी देवी – देवताओं की तरह नहीं होतीं। वे आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक साम्यता रखती हैं। पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के दौरान बनाया गया है। उसके बाद जगन्नाथजी के 120 मंदिर बनाए गए हैं। रथयात्रा शुरू होने से पहले सभी रथों को उचित ढंग से आयोजित किया जाता है। सर्व प्रथम बड़े भाई बलराम का 44 फुट ऊँचा रथ, उसके बाद देवी सुभाद्रा का 43 फुट ऊँचा रथ और अंत में 45 फुट ऊँचा श्री जगन्नाथजी का रथ सुबह से नगरयात्रा पर निकलकर पूरे दिन शहर के मार्गों पर घूमता रहता है और गडिया मंदिर की तरफ धीमी गति से आगे बढ़ता रहता है। और शाम को मंदिर में रथ का आगमन होता है।

ये तीनों आठ दिनों तक आराम करते हैं और नौवें दिन सुबह पूजा विधि करने के बाद वे वापस मंदिर में आते हैं। रथयात्रा के पहले दिन सभी रथों को मुख मार्ग की तरफ उचित क्रम में संयोजित किया जाता है। रथ वापस लौटने की यात्रा को उड़िया भाषा में ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है, जो सुबह शुरू होकर जगन्नाथ मंदिर के सामने पूरी होती है। श्रीकृष्ण, बलराम और सुभाद्रा तीनों को उनके रथ में स्थापित किया जाता है और एकादशी तक उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद पुनः उन्हें अपने-अपने स्थान पर मंदिर में बिराजमान किया जाता है।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को नित्य पकाए हुए भोजन का भोग लगाया जाता है। परंतु रथयात्रा के दिन एक लाख चौदह हजार लोग रसोई कार्यक्रम में तथा अन्य व्यवस्था में लगे होते हैं। जबकि 6000 पुजारी पूजाविधि में कार्यरत होते हैं। उड़ीसा में दस दिनों तक चलनेवाले एक राष्ट्रीय उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग उत्साहपूर्वक उमड़ पड़ते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रसोई में ब्राह्मण एक ही थाली में अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करते हैं, यहाँ जात-पाँत का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता। श्रीक्षेत्र पुरी में कोई जातिवाद नहीं है। सभी भगवान जगन्नाथ की संतानें हैं और उनकी नजर में सभी एक समान हैं।

प्रतिवर्ष तीनों रथ लकड़ी से बनाए जाते हैं, जिसमें लोहे का बिलकुल उपयोग नहीं किया जाता। बसंत पंचमी के दिन लकड़ी एकत्र की जाती है और तीज के दिन रथ बनाना शुरू होता है। रथ यात्रा के थोड़े दिन पहले ही उसका निर्माण कार्य पूरा होता है।

जगन्नाथ मंदिर कला और शिल्प स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है। 214 फुट ऊँचा यह मंदिर भुनेश्वर के शिव मंदिर या लिंगराज मंदिर जैसा लगता है।

यहाँ एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रतिवर्ष नया रथ बनता है, परंतु भगवान की प्रतिमाएँ वही रहती हैं। परंतु 8 से 19 वर्ष में असाढ़ अधिक मास आने पर तीनों मूर्तियाँ नई बनाई जाती हैं। इस प्रसंग को ‘नवकलेवर’ अर्थात् ‘नया शरीर’ कहा जाता है। तब पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर के अंदर स्थित कोयली वैकुंठ नामक स्थान में जमीन में गाड़ दी जाती है।

इस वर्ष रथयात्रा 21 जून 2012 को शुरू होगी और 29 जून 2012 को संपन्न होगी। इस समयावधि को शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

Vat Savitri Vrat


वट सावित्री व्रत एवं पर्यावरण


वट सावित्री व्रत केवल एक व्रत ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति परंपरा का वह अहम हिस्सा है जो हमें पर्यावरण से जोड़े रखती है। यह व्रत हमें सन्देश देती है कि अगर पेड़-पौधे नहीं रहे तो पृथ्वी पर जीवन नहीं बचेगा और जब जीवन ही नहीं बचेगा तो फिर हम कैसे सौभाग्यवती बनेंगे । पेड़ पौधे ही हैं जो प्रकृति से जहरीले कार्बन डॉइ ऑक्साइड को सोख कर जीवनदायी ऑक्सीजन हमें देते हैं । इस व्रत का भी यही उद्देश्य है कि व्रत के बहाने ही सही, वृक्षों को बचाएं ताकि आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर व स्‍वच्‍छ जीवन दे सकें । 

व्रत की कहानी

प्राचीन काल की बात है। मद्र देश में अश्वपति नाम के राजा हुआ करते थे। वह बड़े ही सत्यवादी और धर्मात्मा थे। उन्हें जीवन में सभी प्रकार का सुख हासिल था बस एक ही बात का दु:ख था कि उनको कोई सन्तान नहीं थी। इस बात को लेकर वह काफी चिन्तित भी रहा करते थे। किसी ने उन्हें सन्तान प्राप्ति के व्रत के बारे में बताया तो उन्होंने 18 वर्षों तक सावित्री देवी की कठोर तपस्या की। सावित्री देवी इस तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और राजा को कन्या प्राप्ति का वर दिया। जिससे राजा की पत्नी ने एक सुन्दर सी कन्या को जन्म दिया जिसका सावित्री नाम रखा गया। वह कन्या अत्यन्त ही सुन्दर थी। जब सावित्री बड़ी हो गई तो उसके लिए योग्य वर की खोज की जाने लगी। सावित्री ने सत्यवान नामक युवा को चुना । जन्‍म कुंडली के हिसाब से सत्‍यवान की आयु मात्रा एक वर्ष शेष बची थी। परन्तुसावित्री ने न केवल सत्‍यवान से शादी कि बल्कि अपने पतिव्रता दम पर यमराज से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद लेकर सत्यवान के प्राण वापस लिए। इस दिन वट वृक्ष की पूजा इसलिए होती है कि सत्यवान ने अपने प्राण इसी वृक्ष के नीचे त्यागे थे और जब प्राण वापस मिले तो इसी वृक्ष के नीचे वह थे। इसलिए इस दिन वट वृक्ष पूजन की अपनी अलग महत्ता है।

गीता में भी दी गई है पेड़ो की महत्ता


भारतीय संस्कृति में शुरू से ही वृक्षों की महत्ता बताई गई है अगर हम खुली हवा में खुलकर श्वास ले पाते हैं तो इसमें भी वृक्षों की अहम भूमिका है तभी तो प्राचीन काल में ऋषि-मुनि तपस्या और चिन्तन-मनन के लिए वनों में ही बास करते थे। देखा जाए तो मनुष्य का जीवन और उसका ज्ञान-विज्ञान वनों में ही विकसित हुआ है। भारतीय संस्कृति और धर्म-कर्म के सन्दर्भ में गौर करने वाली बात यह है कि वैदिक काल में भी भारतीय मनीषी प्रकृति के उपासक थे। वे वनस्पतियों को अपने धर्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व देते थे। वनस्पति व वृक्षों में रुद्र के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए वैदिक ऋषि कहते थे `नमो वृक्षेभ्यों हरिकेशेभ्यो नम:।´ गीता में भी श्रीकृष्ण वृक्षों की महिमा बताते हैं।

वट वृक्ष में है त्रिदेव का वास



अब बात करते हैं वट वृक्ष की, जिसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग मे शिव वास करते है। देवी सावित्रीभी वट वृक्ष में ही प्रतिष्ठित रहती हैं। यह भी मान्यता है कि बड़ का पेड़ हमारे सब गुप्त भेदों को जानता है। इसी अक्षय वट पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने बालरूप में मार्कण्डेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिए थे। प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाध्व के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने संगल स्थित अक्षय वट को तीर्थराज का छत्रा कहा है। 

कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्‍यम

पांच वटों से युक्त स्थान को पंचवटी कहा गया है। धर्मिक मान्यता के अनुसार कुम जमुनि के परामर्श से भगवान श्रीराम ने सीता एवं लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। अगर इसी चीज को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है। जैसे वट वृक्ष दीर्घ काल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घ आयु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। वास्तव में वट सावित्री का व्रत और पूजन वृक्ष देव और प्रकृति को हमारी कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्यम है।

घर-परिवार में सुख-समृद्धि लाने वाले वृक्ष

आवासीय परिसर के समीप बिल्व, अनार, नागकेसर, कटहल और नारियल के वृक्ष हमेशा शुभफलकारी होते हैं। इसी प्रकार जंभीरी, आम, केला, निर्गुडी, जौ, अशोक, सिरसा और चमेली आदि सुगंधित वृक्ष घर समीप शुभ होते हैं। जिन भवनों के पश्चिम में कमल के फूलों सहित जल हो, उतर में खाई हो, पूर्व में फलवाले वृक्ष हो और दक्षिण में दूध वाले वृक्ष हों। जिस मन्दिर के मध्य में बिल्वपत्रा, आम, अनार के वृक्ष हों, वहां दोष नहीं रहता है। 
जम्बीर, पुष्प के वृक्ष पलाश, अनार, चमेली, शतपत्रा, केसर, नारियल, पुष्प् और कनेर से परिपूर्ण घर सुख और ऐश्वर्य प्रदान करता है। ऐसी मान्यता भी है कि जिस घर में हरी-भरी मनीप्लांट की बेल होती है, वहां पैसे की कमी नहीं रहती है।

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