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10 जुलाई 2012

Vastu : Simple effective tips unmistakable architectural

अचूक असरकारी सरल वास्तु टिप्स 


  • घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं। इससे परिवार में प्रेम बढ़ता है। तुलसी के पत्तों के नियमित सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। 
  • ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा साफ-सुथरा रखें ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणें घर में प्रवेश कर सकें।
  • भोजन बनाते समय गृहिणी का हमेशा मुख पूर्व की ओर होना चाहिए। इससे भोजन सुपाच्य और स्वादिष्ट बनता है। साथ ही पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की पाचन शक्ति में वृद्धि होती है।
  • जो बच्चे में पढ़ने में कमजोर हैं, उन्हें पूर्व की ओर मुख करके अध्ययन करना चाहिए। इससे उन्हें लाभ होगा।
  • जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा है, उन्हें वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) के कमरे में रहना चाहिए। इससे उनका विवाह अच्छे और समृद्ध परिवार में होगा।
  • रात को सोते वक्त व्यक्ति का सिर हमेशा दक्षिण दिशा में होना चाहिए। कभी भी उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। इससे अनिद्रा रोग होने की संभावना होती है साथ ही व्यक्ति की पाचन शक्ति पर विपरीत असर पड़ता है।
  • घर में कभी-कभी नमक के पानी से पोंछा लगाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
  • घर से निकलते समय माता-पिता को विधिवत (झुककर) प्रणाम करना चाहिए। इससे बृहस्पति और बुध ठीक होते हैं। इससे व्यक्ति के जटिल से जटिल काम बन जाते हैं।
  • घर का प्रवेश द्वार एकदम स्वच्छ होना चाहिए। प्रवेश द्वार जितना स्वच्छ होगा घर में लक्ष्मी आने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।
  • प्रवेश द्वार के आगे स्वस्तिक, ॐ, शुभ-लाभ जैसे मांगलिक चिह्नों को उपयोग अवश्य करें।
  • प्रवेश द्वार पर कभी ‍भी बिना सोचे-समझे गणेशजी न लगाएं। दक्षिण या उत्तरमुखी घर के द्वार पर ही गणेशजी लगाएं।
  • विवाह पत्रिका कभी भूलकर भी न फाड़े क्योंकि इससे व्यक्ति को गुरु और मंगल का दोष लग जाता है।
  • घर में देवी-देवताओं की ज्यादा तस्वीरें न रखें और शयन कक्ष में तो बिलकुल भी नहीं।
  • शयन कक्ष में टेलीविजन कदापि न रखें क्योंकि इससे शारीरिक क्षमताओं पर विपरीत असर पड़ता है।
  • दफ्तर में काम करते समय उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके बैठें तो शुभ रहेगा, जबकि बॉस (कार्यालय प्रमुख) का केबिन नैऋत्य कोण में होना चाहिए। 
  • घर के भीतर शंख अवश्य रखें। इससे बजाने से 500 मीटर के दायरे में रोगाणु नष्ट होते हैं।
  • पक्षियों को दाना खिलाने और गाय को रोटी और चारा खिलाने से गृह दोष का निवारण होता है।

रामायण जी का महात्मय


"सिया राम जय राम जय जय राम"


>एक नियम है, मनुष्य संकल्प करता है परन्तु जब तक वह इन संकल्पों को कार्य का रूप न दे, क्रिया तब तक संकल्प सफलता की ओर अग्रसर नहीं होते। यदी कोई मनुष्य क्रिया का रूप देकर संकल्प करता है परन्तु उस पर प्रभु क़ी कृपा न हो तो भी संकल्प कीसफलता प्राप्त नहीं कर सकता। शुभ संकल्प, क्रिया और परमात्मा की कृपा, इन तीन वस्तुओं के मिलाप से भगवद कार्य की शुरुआत होती है, इन तीन वस्तुओं के संकल्प के पश्चात इश्वर कार्य का आरम्भ होता है।

वैसे तो राम क़ी कथा प्रत्येक व्यक्ति जानता है। एक सम्राट चक्रवर्ती अयोध्या के महाराज दशरथ थे जिनके चार पुत्र थे। जनकपुर में श्री राम जी का विवाह हुआ। तत्पश्चात राम को राजगद्दी मिली लेकिन उससे पहले राम को वनवास मिला। राम वियोग में दशरथ जी की मृत्यु हो गयी। राम, लक्ष्मण और सीता जी वन में गए। भारत जी चित्रकूट गए और उनकी पादुका ले आये। राम चित्रकूट में पंचवटी गए। सीता जी का उपहरण हुआ। सीता को खोजने के लिये राम ने वानर सेना भेजी। हनुमान सीता जी को खोज लाये। राम ने समुद्र के ऊपर बाँध बांधा। रामेश्वर भगवन क़ी करके लंका पर चढाई की। रावणादि रक्षसों का विनाश हुआ और पुष्पक विमान में बैठकर राम अयोध्या आये। राम जी का राज्याभिषेक हुआ, राम राज्य की स्थापना हुए और राम कथा पूरी हुए। इतनी-सी कथा गोस्वामी जी नए मानस में लिखी है। आधे मिनट में कही जाने वाली कथा के लिये इतना अधिक समय इतनी संपत्ति का खर्च, इतने सारे व्यापार-धन्दोइन को छोड़कर इसके पीछे इतना समय देते हैं। उस पर से मालूम होता है क़ी आधी मिनट में कही जाने वाली कथा रामायण नहीं है। पहले तो यह भ्रांति हट जानी चाहिए, अधिकतर तो ऐसा मन जाता था क़ी रामायण में क्या सुनना? जिन लोगों को रामचरितमानस का अनुभव नहीं है, वे लोग यह कहते हैं क़ी रामायण में क्या है? राम-रावन युद्ध है, इसमें क्या सुनना? परन्तु रामायण केवल कथा नहीं है। इतिहास नहीं है। और न ही एक सम्राट पुत्र का चरित्र है। रामायण सबसे प्रथम परात्पर ब्रह्म है। उनका एक दिव्या लीलामृत है। और साथ-साथ हम सबके जीवन में जो कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं, उसका उत्तर रामायण है। प्रमाण सहित कह सकते हैं कि जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं है, भूतकाल में नहीं थी और भविष्य में नहीं होती जिनका उत्तर रामायण में न हो। कोई कहे क़ी रामायण की कथा गाते हैं इसलिये रामायण की प्रशंसा करते हैं। परन्तु प्रमाण देकर कह सकते हैं कि हम सबके जीवन में कोई प्रश्न आये तो उसका उत्तर रामायण में है। निष्ठा, प्रेम और सत्संग होंगे तो रामायण आपके प्रश्नों का उत्तर देगी।

रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग ट्रेन के इंतज़ार में रामचरितमानस का पाठ कर रहे थे। रामायण के प्रेमी थे। उन्होंने सोचा कि ट्रेन आने में तीस मिनट हैं तो चलो रामचरितमानस का पाठ ही कर लूं। तभी एक नवदम्पत्ति जो पढ़े-लिखे थे उस बुजुर्ग की टीका करने लगे। इन लोगों ने सालों से रामायण को पकड़ा हैं छोड़ते ही नहीं हैं। स्टेशन पर भी पढने बैठ गए, युवक ने बुजुर्ग से मजाक में कहा, "अब संसार में बड़ी-बड़ी गीता लिखी जाती है बड़े-बड़े उपन्यास लिखे जाते हैं और आपने अभी तक एक ही रामायण बरसों से पकड़ी हुई हैं। छोड़ते ही नहीं हैं, इसमें ऐसा क्या है? जिसको आप पढ़ रहे हैं।" प्रारम्भ में बुजुर्ग ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। उसने आग्रह किया, "जवाब दो। क्यों आप रामायण लेकर बैठे हैं? इस में क्या है?" बुजुर्ग ने कहा, "इसमें क्या है यह तो मैं भी मालूम नहीं कर सका तुझे सबूत नहीं दे सकता। परन्तु तू तो पढ़ा लिखा व्यक्ति है, तू तो बता कि इसमें क्या नहीं है? मैं तो चिन्तक नहीं हूँ। अभ्यास भी नहीं है, इसलिये नहीं बता सकता क़ी इसमें क्या है? तू तो पंडित है तो तू ही बता सकता है इसमें क्या नहीं है?" युवक ने कहा, "यह तो आपकी बौद्धिक दलीलें हैं। क्या इसमें सब कुछ लिखा है?" बुजुर्ग ने कहा, "भाई मेरा तो विश्वास है क़ी इसमें सभी कुछ है इनकी बातचीत के दौरान ट्रेन आ गयी। भीड़ अधिक थी ट्रेन चली गयी। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्पीड पकड़ी। बुजुर्ग ने सीट मिलने के पश्चात रामचरितमानस का पाठ करना शुरू किया गाडी थोड़ी ही दूर गयी होगी क़ी उस युवक ने आवाज लगाई क़ी गाडी रोको। अन्य लोग पूछने लगे क़ी क्या हुआ? उसने कहा, "गाडी जल्दी रोगों। "ऐसा कह कर उसने जंजीर खींच दी। ट्रेन में बैठे लोग पूछने लगे क़ी गाडी क्यों रोग दी? आपको मालूम है क़ी यहाँ सूचना है क़ी बिना किसी कारणवश गाडी रुकवाने पर दंड, सजा मिल सकती है। आपने गाडी क्यों रोक दी? उसने कहा, "जल्दी में में गाडी में चढ़ गया और मेरी पत्नी रह गयी इसलिये मैंने गाडी रुकवाई है।" उस बुजुर्ग ने सुन कर उसका हाथ पकड़ा और पुछा, क़ी "भाई बुरा न माना तो कहूं। स्टेशन पर तू मेरी टीका कर रहा था क़ी रामायण में ऐसा क्या लिखा है कि पढ़ते ही रहते हो। अब तुझे कहता हूँ क़ी यदी तुने एक बार रामायण को पढ़ा होता तो तुने जो भूल आज की है वह न करता। क्यों? तू बैठ गया और तेरी पत्नी स्टेशन पर ही रह गयी। इसका भी उत्तर रामायण में है। कहीं पर लिखा है क़ी केवट नाम के भील ने राम के चारण छुए और फिर नौका में बिठाया। तब सीता जे पहले बैठी और फिर राम जी बैठे। रामायण में कहा है क़ी कोई भी वहां में बैठना हो तो पहले पत्नी को बैठाना चाहिए बाद में पुरुष को बैठना चाहिए। तूने रामायण पढ़ी होती तो यह भूल न करता।

कम से कम व्यवहार के ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका उत्तर रामायण न दे। इसलिये यह खाली कथा कहने की, कहानी की, इतिहास की खबर है। परन्तु उसके एक-एक पत्र, एक-एक प्रसंग और एक-एक चौपाई के पीछे हम सबके जीवन में आने वाली घटनाओं पर तुलसीदास जे ने प्रतिबिम्ब डाला है। उसके दर्शन करने के लिये हम दस दिन इकट्ठे होते हैं, नहीं तो किसी को भी समय नहीं है। यह कथा हमारी है। बेशक घटना त्रेतायुग में घटी हो। उस समय कपडे अलग प्रकार के पहनते होंगे। भाषा अलग होगी, रीति-रिवाज आदि में फर्क होगा, बरसों बीत गए। इसलिये परिवर्तन तो बहुत ही आया होगा। परन्तु अन्दर क़ी ओर जीवन क़ी जो घटनाएं हैं वह आज भी हम सब पर लागू होती है। ऊपर के आवरण बदल गए हैं। अंदर से सब वैसे का वैसा ही है, और उससे भी रामायण आसान अर्थ में कहूं तो सबका जीवन दर्शन है। राम कथा द्वारा दस दिन तक हमें अपने जीवन का निरंतर विचार करना है क़ी रामायण के किसी पत्र में मुझे अपना स्वरुप मालुम होगा कि रामायण का यह पत्र हमको स्पर्श करता है। और रामायण का कोई पात्र जब हम बनते हैं तब इतना विचार करना है कि रामायण के किसी पात्र में मुझे अपना स्वरुप दिखाई पड़ता है? कहीं पर हम केवट होंते, कहीं पर भील होंगे, कहीं पर तो हमको ऐसा मालूम होगा कि रामायण का यह पत्र हमको स्पर्श करता हैं। और रामायण का कोई पात्र जब हम बनते हैं तब इतना विचार करना है क़ी रामायण के पात्रों को कठिनाइयां आई तब उन्होंने कैसा बर्ताव किया? और मैं कैसे बर्ताव कर रहा हूँ। इसका हे चिंतन करना चाहिए। इसलिये हमारे जीवन क़ी कथा के अर्थ में हम आज क़ी रामायण की शुरुआत करते हैं। रामचरितमानस में लिखा है कि रामकथा को समझना हो तो जीवन में तीन वस्तुओं की जरुरत पड़ती है। अगर तीन वस्तुएं हमारे जीवन में इकट्ठी न हों तब रामचरितमानस समझ में नहीं आएगा। पहले श्रद्धा, फिर सत्संग और बाद में परमात्मा पर प्रेम होना चाहिए। श्रद्धा, सत्संग और ईष्ट प्रेम ये तीनों वस्तुएं जो मिलें तो रामायण समझ में आती है। ऐसा रामायण में लिखा है। जो तीन वस्तुएं न हों तो किसी भी संजोग में रामायण समझ में नहीं आ सकेगी।

श्रद्धा सम बल रहित, नहीं संतान कर नाथ।
तीन कह मानस अगम अति, जिन्हीं न प्रिय रघुनाथ॥

इन दोहों में ऐसा कहा है कि जिन्हें राम प्रेम नहीं है। राम के प्रति भाव नहीं, सत्संग में प्रीति नहीं और श्रद्धा नहीं उन्हें रामचरितमानस समझ में नहीं आता।

तो हम श्रद्धा, सत्संग और राम प्रेम का निर्माण करके रामायण का पान करें। मैं हमेशा कहता हूं कि हम किसी भी मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं, तब बूट बहार उतारते हैं, दो बूट-एक बुद्धि का और दूसरा अहंकार का। हमने बुद्धि और अहंदर के बूट पहने होंगे तो रामायण समझ में नहीं आएगी। बहार जाकर हम भले ही अहंकार को धारण करते हैं परन्तु इस दरबार में आने के बाद वक्ता या श्रोता को बुद्धि और अहंकार के बूट बाहर ही रखने चाहिए। वक्ता यदि बुद्धि का प्रयोग करके आएगा तो रामायण में कठिनाइयाँ उत्पन्न होंगी। रामायण में मना किया गया है। मन,वचन और कर्म से मनुष्य चतुरता को छोड़कर आये और मेरा या तुम्हारा अहंकार बाहर रह जाए तभी राम दरबार में प्रवेश करना चाहिए। रामचरितमानस को, भगवान् राम के जीवन को समझने के लिये और साथ-साथ अपना जीवन दर्शन करने के लिये हमें यह दो बूट बाहर रखने पड़ेंगे, तो रामायण तुलसीदास जी को जो सुख दे गई, स्वांत सुखाय रघुनात गाथा। वैसे हमको भी स्वांत सुख दे सकेगा।

आप यहाँ बिलकुल खाली होकर आओ। बस हमें भगवद्चरित्र सुनना है। मैं यहाँ आऊं तब सभी वस्तुएं छोड़कर आऊं, ऋतु आती है तब कोयल आती है तब कोयल अपने आप ही बोलने लगती है। उसने पहले से तैयारी नहीं की होती है। कोयल ने एक महीने पहले रियाज नहीं किया है क़ी अब बसंत ऋतु आने वाली है। अब मैं अपनी आवाज ठीक कर लूं मुझे कुहू-कुहू करनी पड़ेगी। मेघ क़ी गर्जना से मोर भी कोई तैयारी नहीं करते हैं क़ी अब मुझे बोलना है, बसंत मेघ आये तो अपने आप ही आवाज निकलने लगती है। स्वांत सुख प्राप्त करने के लिये रामायण में तुलसी जी ने लिखा है स्वांत सुख के लिये वैसे ही बुलाना भी चाहिए और स्वांत सुख के लिये सुनवाना भी चाहिए दूसरा कोई हेतु नहीं है।

इस अर्थ में हम रामायण के शुरुआत कर रहे हैं। राम कथा हमार जीवन दर्शन है। तुलसीदास जी ने रामायण को रामचरितमानस नाम दिया, रामायण नाम नहीं दिया, रामायण बहुत प्रचलित है। इसलिए हम बोलते हैं, परन्तु इस ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस रखा है, एक सरोवर क़ी उपमा रामायण को दी है। आप जानते हो क़ी मानसरोवर नाम का एक सरोवर हिमालय में है और दूसरा सरोवर तुलसीदास जी ने स्थापित किया है। जिसका नाम मानस सरोवर है, परन्तु दोनों में फर्क है।

प्रथम अंतर यदि समय, संपत्ति और शारीरिक तंदरुस्ती हो तो प्रथम मान सरोवर पर पहुंचा जा सकता है। अन्यथा नहीं। तुलसीदास जी ने चलता-फिरता मान सरोवर उत्पन्न किया जो हमारे घर में आता है। ऐसा यह मानस सरोवर है।

द्वितीय अंतर हिमालय वाले मानसरोवर में खाली पानी पड़ा है। जबकि तुलसीदास जी के मानस सरोवर में एक सिद्ध संत क़ी वाणी है। हिमालय के मान सरोवर में नहाने के पश्चात हमारे शरीर का मैल दूर होता है। जबकि मानस सरोवर शरीर के मैल के साथ मन का मैल, कलियुग का मैल और अन्य मैल दूर करता है। मानस में लिखा है-
रघुवंश भूषन चरित यह नर कहही सुनही गावही।
कलिमल मनोमल धोई बीनू श्रम राम धाम सीधा वही॥
>गोस्वामी जी कहते हैं रघुवंश के इस दिव्य चरित्र को जो गायेगा या सुनेगा तो वह कलियुग के मैल और मन के मैल से मुक्त होकर रामधाम की तरफ गति करेगा।

>तृतीय अंतर हिमालय के मान सरोवर के किनारे मोती के दाने चुगने के लिये हंस आते हैं ऐसी लोकोक्ति है। यह कितने लोगों ने देखा होगा किसी को पता नहीं है। परन्तु इस मानस सरोवर में हंस के स्थान पर परम हंस इकट्ठे होते हैं। उन हंसो को कितनों ने देखा होगा यह पता नहीं। न ही देखा है। रामायण के आस-पास परम हंस इकट्ठे होते हैं। यह तो निर्विवाद है, मानस में लिखा है जीवन मुक्त ब्रहम पर चरित सुनही तजी ध्यान। चौबीस घंटे समाधि में रहने वाले महात्मा भगवान् राम क़ी कथा सुनने के लिये ध्यान छोड़कर आते हैं। इसलिये मानस सरोवर के किनारे परम हंस इकट्ठे होते हैं। 


हिमालय के मान सरोवर में पाँव फिसले पर आदमी डूब जाता है। परन्तु इस मानस सरोवर में जो डूबता है, उसका बेडा पार हो जाता है। 


तुलसीदास जी कहते हैं क़ी कठिनाइयाँ तो हैं, हमारे यहाँ ऐसा नियम है ही। वो तो अब बदल गया होगा, बाकी जहाँ तालाब हो उसके आस-पास जंगल बहुत हो। बीच में तालाब हो, उस जंगल को पार करके तालाब की तरफ जाना पड़ता है। तो रामायण तालाब है। रामायण का सरोवर यहाँ आया है इसमें भी कठिनाइयाँ को पार करके आना पड़ेगा, और ये कठिनाइयाँ जंगल तो नहीं है अपितु घर के काम, सांसारिक कठिनाइयाँ अनेक प्रक्रतियां ये सब बीच में आने वाले जंगल हैं। इसमें से हमको जाना है, वहां तक पहुंचना है। समय निकलना पडेगा, फिर स्नान के लिये जा सकेंगे। शायद कोई पहुँच जाए तो भी कई बार ऐसा बनता है क़ी सरोवर के किनारे गया हुआ आदमी सर्दी से पीड़ित होता है। स्नान कर नहीं सकता। वहां चला तो जाए परन्तु खाली लौट आये। ऐसा तुलसीदास जी ने लिखा है। कई आदमी सरोवर तक पहुँच जाते हैं, पर जीवन में जड़ता होगी। जड़ता क़ी सर्दी आदमी को लागू हो गयी हो तो वह शायद सरोवर के किनारे जाएगा परन्तु स्नान नहीं कर सकता।
मेरे कहने का अर्थ काफी कठिनाइयओं के बाद सरोवर के पास पहुँचता है और फिर उसमें से हमें कुछ न कुछ सरोवर करना है, तो इस चलते-फिरते मान सरोवर के चार घाट हैं। जिस तरह के चार घाट हैं उसी तरह रामचरितमानस के भी चार घाट हैं। एक घाट पर भगवान् शिव जी पार्वती को कथा कहते हैं। दूसरे घाट पर याज्ञवल्क्य महाराज भारद्वाज जी को कथा कहते हैं। तीसरे घाट पर काकभुशंडि महाराज गरुड़ जी को कथा कहते हैं। अंतिम चौथे घाट पर स्वामी तुलसीदास जी अपने मन की कथा कहते हैं। रामचरितमानस में भगवान् शंकर जितना बोले हैं उनके वे सब सूत्र अलग रखने में आये, छोटी-सी पुस्तिका तैयार करने में आये तो बेदांत के शिखर की पुस्तक तैयार होती है। कारण यह है कि शंकर जी ज्ञान के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं इसलिये उसमें से अति तत्त्व ज्ञान और वेदान्त दिखलाई पड़ता है। जबकि याज्ञवल्क्य महाराज कर्म के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं, इसलिये उसमें से कर्म के सिद्धांत बहते हैं। काकभुशंडि महाराज भक्ति की भूमिका पर बोलते हैं, इसलिये उसमें भक्ति भाव और प्रेम भरा हुआ है। और तुलसीदास जी केवल शरणागति के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं। यह चार किनारे हैं। ज्ञान, कर्म, भक्ति और शरणागति। जिनको ज्ञान में रस हो उन्हें इतना आनंद रामायण दे सकती है। जिनके कर्म में रस हो उन्हें भी रामायण आनंद दे सकती सकती है। जिनके भक्ति में रस हो उसे भी रामायण आनंद दे सकती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में इन तीनों में उत्तम केवल शरणागति है। इसलिये जिनकी शरणागति में निष्ठा हो उसे भी रामायण उतना ही आनंद देगी। इस प्रकार का यह सरोवर है। चार घाट वाले रामचरितमानस का आध्यात्मिक दृष्टी से जब-जब प्रसंग आएगा तब-तब उनका चिंतन किया जाएगा। परन्तु व्यवहारिक दृष्टी से भी संसार में पिता को किस प्रकार रहना और पुत्र को किस तरह रहना चाहिए इसका स्पष्ट उदहारण रामायण में है। आज समाज में पिता-पुत्र के सम्बन्ध बिगड़ते हैं। हमारे समाज में युवक लोग माता-पिता की बात को अस्वीकार करते हैं या फिर माता-पिता के विचार युवकों को पसंद नहीं हैं। युवकों का बर्ताव माता-पिता को पसंद नहीं हैं। ऐसे जीवन में एक बार रामायण जरूर पढनी चाहिए। भाई-भाई के सम्बन्ध कैसे हों, भाइयों के बीच कैसा भाव और प्रेम होना चाहिए। ये भी रामायण में स्पष्ट लिखा है। और इन सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है क़ी दाम्पत्य जीवन कैसा होना चाहिए जो आज के युग के लिये जरूरी है। इसका सुन्दर दृष्टांत रामायण ने दिया है। आज ज्यादा से जादा चिंतित स्थिति दाम्पत्य जीवन की है। कितने आदमियों का दाम्पत्य जीवन सुखी है? पति-पत्नी बहार से जितने सुखी हैं, क्या अंदर से भी उतने ही सुखी हैं। पुराण में कहा गया है क़ी जब कलियुग का समय पूरा होगा तब कल्कि का अवतार होगा। दसवां अवतार। परन्तु कई लोग कहते हैं क़ी कलियुग पूरा हो गया है। अभी तक को अवतार क्यों नहीं हुआ है। तब हम एक ही बात कह सकते हैं क़ी भगवान् अवतार लेने के लिये कब से आकास में आये हैं। अवतार लेने के लिये बिलकुल तैयार हैं, पर उन्हें जन्म लेने के लिये योग्य माता-पिता दिखाए नहीं देते। इसलिये वह वहीं पर स्थित हैं। उन्हें अब योग्य माता-पिता दिखाई देंगे, दशरथ-कौशल्या, वासुदेव, देवकी जैसे दम्पत्तियों का दर्शन होगा तब परमात्मा का विचार करना चाहिए। हमारा दाम्पत्य इश्वर को निमंत्रण दे सके वैसा है। राम राजभवन में रहे या चित्रकूट की चोटी सी झोपडी में रहे उनके दाम्पत्य जीवन के लिये आप पूरा चरित्र पढ़िए। कितना अद्भुत है। रामचरितमानस में महत्त्व की बात यह है क़ी दाम्पत्य जीवन कैसा होना चाहिए? पति-पत्नी को कैसे जीना चाहिए? 


रामचरितमानस में लिखा है क़ी सर्वप्रथम रामायण शिवजी ने बनाई। सर्वप्रथम शंकर जी ने अपने मन में रामायण तैयार की। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसा वर्णन है क़ी इसमें सौ करोड़ मंत्र थे। सत करोड़ रामायण बोली। देवों, मनुष्यों और राक्षसों को समाचार मिले क़ी भगवान् शिवजी ने सौ करोड़ मन्त्रों वाली रामायण तैयार की है, तो वे कैलाश पर एकत्रित हुए। शंकर जी की स्तुति की। भगवान् आप तो अखंड आनंद ब्रहम हैं। आपकी सौ करोड़ मन्त्रों की रामायण है तो हम सबमें विभाजित कर दो। भगवान् शिवजी को दया आ गई और उन्होंने तैंतीस करोड़ मंत्र देवताओं को तैंतीस करोड़ मनुष्यों को और तैंतीस करोड़ दानवों को दे दिए। शिवजी के पास एक करोड़ मंत्र रह गए। देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि आप तो ब्रहम हैं। एक करोड़ मंत्र रखने की क्या जरूरत है? शंकर जी ने उन तीनों को तैंतीस लाख तैंतीस लाख मंत्र दे दिए। शिवजी के पास एक लाख मंत्र रह गए। मानवों ने फिर प्रार्थना की। शिवजी ने तैंतीस-तैंतीस हज़ार तीनों में विभाजित कर दिए। शिवजी के पास एक हज़ार मंत्र रह गए उनके एखने पर उन्होंने फिर तैंतीस सौ-तैंतीस सौ मंत्र तीनों वर्गों में बांट दिये। शिवजी के पास सौ मंत्र रह गए। देवताओं ने कहा कि महाराज सौ मन्त्रों क़ी क्या जरुरत है? हममें बाँट दीजिये। तब उन्होंने तैंतीस-तैंतीस मन्त्रों का विभाजन तीनों में कर दिया। अब एक मंत्र शिवकी के पास रहा। तीनों ने कहा क़ी इस मंत्र को भी हममे बाँट दीजिये। शिवकी ने कहा सब मंत्र अलग-अलग थी इसलिये उनका विभाजन हो सका अब एक मंत्र का तीनों में विभाजन कैसे हो? उन्होंने कहा क़ी यह जैसे भी हो इसको हम सबमें बाँट दो। संस्कृत को अनुष्टुप छ्न्द था। सब जानते हैं कि अनुष्टुप ३२ अक्षरों का होता है। उन्होंने दस-दस अक्षर उन तीनों में बाँट दिए। शिवजी के पास अब दो अक्षर रहे उन्होंने कहा क़ी यह दो अक्षर भी बाँट दो। शिवजी ने कहा कि सारी रामायण आपको मुबारक हो लेकिन मैं ये दो नहीं दूंगा। उन्होंने कहा क़ी 'रा' और 'म' ये दो अक्षर हैं जो सम्पूर्ण रामायण का निचोड़ है। सम्पूर्ण रामायण का अर्थ शब्द राम है। तुलसी दास जी कहते हैं क़ी शिवजी ने वे दो शब्द अपने हृदय में रख लिये हैं। रामायण का अर्थ ही यह है कि रामायण पूरी होने के बाद मनुष्य रामपरायण बनता है कि राम हमारे जीवन में बसे। 


सर्वप्रथम शिवजी ने इस तरह रामायण तैयार किया। इस तरह बाँट भी दिया। फिर पुस्तक के आकार में आदि कवि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण लिखी जिसे दुनिया ने स्वीकारा है। यह हमारा आदिकाव्य माना जाता है। फिर अनेक महात्माओं ने रामायण पर लिखा है। आज से चार सौ साल पहले तुलसीदास ने अस्सी साल की उम्र में रामायण लिखा। तुलसीदास संस्कृत के महान विद्वान् थे फिर भी उन्हें लगा क़ी समय ऐसा आयेगा क़ी लोग संस्कृत बराबर नहीं समझ सकेंगे, और मुझे रामायण सामान्य आदमी तक पहुंचानी है। संस्कृत में तो केवल विद्वान् लोग ही समझ सकेंगे। यदी राम राज महल छोड़कर भीलों के छोटे-से-छोटे घर में गए हों तो रामयण भी पंडित का घर छोड़कर छोटे-से-छोटे घर में पहुंचनी चाहिए। अतः संस्कृत छोड़कर उन्होंने ग्राम्य भाषा में रामायण लिखने का संकल्प किया। एक ऐसा मत तुलसी जी के जीवन चरित्र में आता है क़ी शुरुआत में उन्होंने संस्कृत में लिखने का निर्णय लिया। रोज संस्कृत में लिखते और रात को आराम करके सुबह उठते तो देखते हैं क़ी पिछला लिखा हुआ सब गायब है। थोड़े दिनों तक तो ऐसा ही चलता रहा। तुलसीदास जी नाराज हो गए क़ी मेरा सार परिश्रम निष्फल हो रहा है। तब भगवान् शंकर ने कहा क़ी गोस्वामी जी आप संस्कृत को छोड़कर हिंदी भासा में ग्रन्थ लिखे। चौपईयाँ भी लिखीं। काव्य शास्त्र में चौपाईयों की रचना एकदम सामान्य कहलाती है। चौपाएयाँ बनाना कवी के लिये आसान काम है। परन्तु तुलसीदास जी के चौपाई लिखने के बाण उनकी चौपाई दुनिया की महारानी बन गयी। यह इसका प्रमाण है क़ी संत के हाथ में जो वास्तु आये तब उनको कितना गौरव मिलता है। सात कांडों में यह कथा लिखी गयी है। बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड।
रामनवमी के दिन तुलसी दास जी ने लिखना प्रारंभ किया और यह ग्रन्थ कब समाप्त हुआ इसकी तिथि तुलसीदास जी ने नहीं बताई है। एक मत कि पूरा ग्रन्थ लिख जाने के बाद तुलसी ने ने निर्णय किया कि इस ग्रन्थ को शिवजी को अर्पण कर दूं और तब काशी में भगवान् विश्वनाथ के चरणों में अर्पण करने का उन्होंने निश्चय किया। विद्वान् ने विरोध किया कि इस हिंदी भाषा में लिखे गए ग्रन्थ को हम स्वीकार नहीं करेंगे। संस्कृत में हो तो हम इसे शास्त्र की तरह प्रधानता देंगे। यह तो एकदम ग्रामीण भाषा में लिखा गया है। लोक कथा जैसा ही लगता है। आपने कितनी सीधी भाषा में इसे लिखा है। इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे। वाद-विवाद चर्चा आदि होने के पश्चात यह निर्णय लिया गया कि भगवान् विश्वनाथ के चरणों में सबसे नीचे तुलसी जी का रामचरितमानस रखा जाए उसके ऊपर पुराण और उसके ऊपर उपनिषद उसके ऊपर संहिता और इन सब के ऊपर चारों वेद रखने में आये और दरवाजे बंद कर दिए जाएँ। यदि दूसरे दिन सब ग्रंथों के ऊपर रामचरितमानस हो तो हम इसे स्वीकृति देंगे। पंडितों का एस तरह का आग्रह तुलसीदास जी के लिये सबसे बड़ी परीक्षा थी। उन्होंने यह सब स्वीकार कर लिया। रामचरितमानस सबसे नीचे और उसके ऊपर भारतीय संस्कृति के सभी ग्रन्थ रखे गए सारी रात तुलसी जे ने सजल नेत्रों से राम भजन किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब दुसरे दिन विद्वान् लोग मन्दिर गए तो सबसे ऊपर रामचरितमानस था और उसके प्रथम पृष्ठ पर भगवान् शिवजी ने सही की थी। सत्यं शिवम् सुन्दरं। इतने शब्द रामचरितमानस को भगवान् शिव ने दिए। विद्वान् दंग रह गए इस दृश्य को देख करके तुलसी जी के चरणों में गिर पड़े। इस तरह तुलसी दास जी के ग्रन्थ को भगवान् शिव ने स्वीकृति दे दी। इस ग्रन्थ का विस्तार हुआ प्रचार हुआ। इतना बड़ा प्रमाण मिल जाने पर भी कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने इसको नहीं माना। ईर्ष्या वाले पंडितों ने निर्णय किया कि तुलसी जी के पास एक ही प्रति हस्तलिखित है। अतः इसे चोरी करके जला दिया जाए। जिससे इसका प्रचार बंद हो जाए। परन्तु जब-जब चोर तुलसी जी क़ी कुतिया में रामचरितमानस चुराने गए तब-तब वे भाग गए। पंडितों ने चोरों से पूछा कि तुलसी जे के पास कोई शास्त्र नहीं है, आँखें बंद करके राम भजन करते हैं, और सो जाने के बाद भी आप रामचरितमानस क्यों नहीं चुरा सके। तब चोरों ने कहा कि हम जब-जब गए तब-तब एक कपिल महाकाल वानर उनके द्वार पर बैठा चौकसी कर रहा है, और यह चौकसी हनुमान महाराज करते थे। इस तरह तुलसी जी का रामचरितमानस चुराया नहीं जा सका और उन्हें उनकी शरण में जाना पडा। इस तरह रामायण का प्रचार और भी तीव्र गति से होने लगा। तुलसी जी के शिष्य गोपाल नन्द से किसी ने पूछा कि आप तुलसी जी के साथ रह रहे हैं तो इस रामायण में को अभूतपूर्व घटना घटी? तब गोपाल नन्द जी ने अपने महात्म्य में लिखा है कि एक घटना घटी है। उस समय काशी का राजा और द्रविड़ का राजा दोनों सेना सहित एक जगह इकट्ठे हुए। दोनों देश के राजा विहार के लिये निकले। दोनों की रानियाँ साथ थीं, जो गर्भवती थीं। जब वे दोनों अलग होते हैं तब ये कहते हैं कि यदि मेरे घर पुत्र हुआ आपकी पुत्री हुए या मेरे पुत्री हुई या आपके पुत्र हुआ तो हम दोनों समधी बन जायेंगे। हम आज से ही उनकी सगाई कर देते हैं। यदि दोनों के पुत्र और पुत्री हुए तो बात अलग है । इस तरह संकल्प कर के दोनों अलग हुए। समयोपरान दोनों के लडकियां हुए। उस समय ऐसा था कि लड़कियों का पैदा होना अशुभ मान जाता था। लडकी पैदा हो तो उसे दूध पीते करते थे। उसे मार डालते थे। अभी भी पुत्र उत्पन्न होता है तो थाली बजाते हैं। पुत्री के उत्पन्न होते ही सब सूना-सूना सा लगता है। द्रविड़ देश के रजा के यहाँ लडकी हुए। परन्तु उसकी रानी को हुआ क़ी लोग मुझे अपशकुन वाली मानेंगे कि लडकी का जन्म हुआ। अतः उसने यह बात जाहिर नहीं की। उसने दासी को भी सावधान कर दिया। उससे कहा कि मेरे पुत्र हुआ है। द्रविड़ राजा ने काशी नरेश को खबर भिजवाई। काशी नरेश के यहाँ लडकी हुई थी। यह सुन कर द्रविड़ रजा नरेश बहुत खुश हुआ। उसने अपने लड़के को देखने की इच्छा प्रकट की। पर राने ने कहा कि ज्योतिषी ने कहा कि पुत्र की शादी से पहले यदि पिता ने मुंह देखा तो मर जाएगा। इस तरह वर्षो बीत गए। शादी क़ी तैयारियां होनी शुरू हो गयी। यहाँ से बरात लेकर काशी नरेश के यहाँ राजकुमार को जाना था। वैसे वह थी तो राजकन्या। राजकुमार तो था नहीं। राजकुमार जैसी पोशाक पहन कर मुंह न दिखाई दे, इस प्रकार चेहरा ढक के अपनी लडकी राजकुमार है ऐसा मानकर रानी उसे ब्याहने ले गयी। लग्नमंडप में राजकुमार बनी राजकन्या बैठी थी कन्यादान के समय चार फेरे लेने की तैयारी थी। अठारह साल तक उसे छिपा कर रखा। ईश्वर की प्रेरणा से उसे अपनी भूल समझ में आए। यदि दोनी की शादी हो गयी तो इनका दाम्पत्य जीवन किस काम का? यह संसार में न घटने वाले घटना कहलाई जायेगी। राजा को एक अरफ ले जाकर राने ने क्षमा माँगी और कहा कि मुझे लोग अपशगुन वाली न समझें इसलिये मैंने पुत्र उत्पन्नं की घोषणा कर दी। अथारण साल तक आपसे छिपा कर रखा। रजा बोले, "अरे! देवी तुमने मुहे पहले यह बात क्यों नहीं बताए? हम राजपुरुष हैं हम लोगों को कैसे मुंह दिखाएंगे? काशी नरेश को क्या कहेंगे?" काशी नरेश समझ गया कि कुछ गड़बड़ी है? द्रविड़ ने नरेश से मिले और पूछा कि क्या बात है। उन्होंने सारे स्थिति बताई और कहा कि मेरी रानी ने यह कपट किया है। अब क्या करुं? मुझे पता भी नहीं था। काशी के राजा भी कठिनाए में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि लोगों को पता चल जाएगो तो वे सोचेंगे कि रजा भी ऐसा करते हैं? दोनों ने निर्णय लिया कि हम छोड़ दें? समाज में मुंह नहीं दिखा सकेंगे फिर बाद में जो हो सो देखा जाएगा। शादी रूक गयी। किसी को पता नहीं कि क्या कठिनाइयाँ आईं? दोनों नरेश आत्महत्या करने बहार निकलते हैं। उस समय तुलसीदास जी हाथ में रामचरितमानस लेकर उनके पास से निकलते हैं। उस समय तुलसीदास जी भारत में प्रसिद्ध थे।दोनों राजाओं की नजर उन पर पडी और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। तुलसी जी ने पूछा, "सम्राटों, क्यों अकेले? न सेना, न संरक्षक, न घोडा-रथ? पैदल क्यों जा रहे हो? क्या है? उन्होंने कहा, "प्रभु हमारे जीवन में एक कठिनाई आई है।" "क्या?" तुलसी जी ने कहा। द्रविड़ नरेश ने कहा, "मेरे यहाँ पुत्री उत्पन्न हुई मेरी रानी ने कपट करके कहा कि पुत्र हुआ है। आज इस कन्या का कन्या के साथ विवाह हो रहा है। मंडप में रानी ने मुझे सब कुछ बताया। पहले मुझे मालूम नहीं था लेकिन अब यह झूठ कब तक छिपा रहेगा? और समाज को क्य मुंह दिखलायेंगे? इसलिये हम दोनों आत्महत्या करने जा रहे हैं।" तुलसी जी हंस पड़े। एक तो भूल कर चुके और दूसरी भूल करने जा रहे हो। जरा यह तो सोचो कि कितने पुण्यों के बाद भगवान् मनुष्य देह देता है। तुलसी जी ने अपनी चौपाई कही।

बड़े भाग मनुष्य तनु पावा। सुर दुर्गन सदग्रंथ निगाबा ॥
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाई न जेही परलोक सवारा ॥कई पुण्यों के एकठे होने के पश्चात मानव देह मिलता है और आज आप आत्महत्या करना चाहते हो। उन्होंने कहा कि "संसार से हम क्या मुंह छिपाएंगे।" तुलसी जी ने कहा, "भूल की है तो संसार को कह दो मैंने भूल की। यह कौन-सी बड़ी बात है? एक भूल कह दो तो दूसरी करने से बच जाओगे।" तुलसी जी ने कहा, "भाई मेरे पास कोई चमत्कार नहीं है। मेरे पास तो केवल रामनाम की महिमा है, पर एक काम करो। द्रविड़ देश के राजा की पुत्री को बड के नीचे बिठाओ। मैं उससे नौ दिनों तक रामायण कहूं और राजा की पुत्री उसे सुने। पूर्णहुती के बाद शायद प्रभु कोई कृपा कारें। एक बार अपनी लडकी को श्रोता बनाओ।" दोनों राजा वापस गए। शादी को बंद कर दिया। मूहर्त ठीक नहीं है ऐसा कहकर उन्होंने बात टाल दी। एक गाँव के बाहर बड के पेड़ के नीचे तुलसी दास जी बैठ गए। द्रविड़ देश दे राजा की लडकी मुख्य श्रोता के रूप में सामने बैठी नौ दिन रामचरितमानस का तुलसी जी ने अखण्ड पारायण किया। रामकथा कही। एकाग्रचित होकर उस कन्या ने तुलसी जे की कथा सुनी नवें दिन जब कथा पूरी हुए तो ठाकुर जी का जल लेकर रामायण की चौपाई द्वारा उस कन्या को आशीर्वाद देते हुए पानी का छींटा दिया। पानी की बूंदे उस कन्या पर पड़ते ही उसके शरीर में परिवतन हुआ और पुरुषत्व का निर्माण हुआ। संत क्या नहीं कर सकते? कन्या में से वह पुरुष बनी और काशी देश के राजा की लडकी के साथ उसका विवाह हुआ। तुलसी जी उनको आशीर्वाद देते हुए चले गए। जब हम यह घटना कहते हैं तो लोग पूछते हैं कि कथा तो वही है। हम कहते हैं कि हाँ। वे पूछते हैं कि आज हो सकता है? रामायण तो वही है जो तुलसी जी के पास है। हमने कहा, "जरूर हो सकता है। 105 प्रतिशत। पर शर्त यह है कि कहने वाला तुलसी दास जैसा होना चाहिए, और सुनने वाला द्रविड़ नरेश की राजकन्या जैसा होना चाहिए। यदि ये दो वस्तुएं इकट्ठी न हों तो घटना न होगी। इन दोनों के मिलाप से घटना घटेगी। एक बार मनुष्य रामायण सुने तो मानव में सचमुच ही नरत्व का निर्माण होगा। आज का मनुष्य नर होते हुए भी रोता है सिर दीवार से मारता है। रामायण सुनने के बाद उसकी हिम्मत पैदा हो जायेगी। उसमें सचमुच पुरुष्ट पैदा हो जाएगा। खुमारी का निर्माण होगा। निर्मस्यता दूर होगी और दिव्यता पैदा होगी। ऐसा इस कथा में शक्ति है।" 


'बोलो श्रीरामचंद्र जी की जय-


सत सृष्टी तांडव रचयिता, नटराज राज नमो नमः ।
आघ गुरु शंकर पिता, नटराज राज नमो नमः ।
शिरज्ञान गंगा चन्द्रमा, ब्रहम ज्योति ललाट मां ।
इष्ट नाग माला, कंठ मां, नटराज राज नमो नमः ।
ॐ श्री राम जय राम जय जय राम ।
ॐ श्री राम जय राम जय जय राम ।


॥ इति श्री रामचरितमानस महात्म्य समाप्त ॥

Lord Shiva : Nageshwar

नागेश्वर हरते हैं संकट और पीड़ा 


भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिङ्ग गुजरात राज्य में जामनगर जिले के नागेश्वर गांव में है। इस ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन का अपना धार्मिक महत्व है। मंदिर में प्राय: बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं। इस ज्योतिर्लिंङ्ग के संबंध में भी मत-मतांतर हैं। कुछ लोगों का मानना है महाराष्ट्र राज्य के हिंगोली जिले में स्थित औढ़ नागनाथ का ज्योतिर्लिंङ्ग सही है। इसके अलावा कुछ लोगों का विश्वास है कि उत्तरांचल राज्य के अल्मोड़ा जिले का जागेश्वर ज्योतिर्लिंङ्ग ही बारह ज्योतिर्लिंङ्ग में से एक है। कथा-नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग की भी दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं एक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में सुप्रिय नाम का एक वैश्य था। वह भगवान शिव का भक्त था। एक बार वह नाव में सवार होकर जा रहा था। तब दारुक नामक राक्षस ने नाव में सवार सभी लोगों को बंदी बनाकर एक कारागार में डाल दिया। सुप्रिय कारागार में भी शिव भक्ति करता रहा। कहते हैं कि शिव प्रसन्न होकर उस कारागार में ही एक ऊंचे स्थान पर ज्योतिर्लिंङ्ग रूप में प्रकट हुए और सुप्रिय को पशुपातास्त्र प्रदान किया। इस अस्त्र से दारुक व अन्य राक्षसों को उसने मार डाला। शिव तभी से यहां नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग के रूप में स्थापित हुए। दूसरी कथा यह है कि दारुक नामक एक राक्षसी थी। वह माता पार्वती की सेवा करती थी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर पार्वती ने उसे अपना निवास स्थान इच्छानुसार कहीं भी ले जाने का वर दिया। इसके बाद वह लोगों को सताने लगी। एक दिन शिव भक्त वैश्व को दारुक ने मारना चाहा। तभी शिव वहां प्रकट हुए और दारुक का अंत कर दिया। कहते हैं कि अपने भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए शिव ज्योतिर्लिंङ्ग के रूप में विराजमान हुए। भगवान का दशम अवतार नागेश्वर नाम से प्रसिद्ध है, जो अपने भक्तजनों को अर्थ और दुष्टजनों को दंड देने के लिए ही प्रकट हुए थे। इस अवतार में शिव ने दारुक दैत्य का वध कर सुप्रिय नाम वाले अपने परम भक्त एक वैश्य की रक्षा की थी।महत्वकहते हैं कि नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन से तीनों लोकों की कामनाएं पूरी होती हैं। इसका उल्लेख शिवपुराण में भी है। दर्शनार्थियों के सभी दु:ख दूर होते हैं और उसे सुख-समृद्धि मिलती है। केवल दर्शन मात्र से ही पापों से छुटकारा मिल जाता है।कब जाएं -जामनगर स्थित ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन करने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय अनुकूल रहता है।पहुंच के संसाधन -नागेश्वर मंदिर तक आप मुख्य रूप से सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं।बस सेवा- मंदिर तक पहुंचने के लिए बस सुविधा आसानी से उपलब्ध है।रेल सेवा- मंदिर से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन द्वारका है जहां से मंदिर की दूरी करीब २० किमी है। बस या कार से आप वहां पहुंच सकते हैं।वायु सेवा- जामनगर तक आपको वायु सेवा मिल सकती है। यहां हवाई अड्डा है जो द्वारका से लगभग १४५ किमी की दूरी पर है। यह मुंबई व अहमदाबाद से जुड़ा है।अन्य दर्शनीय स्थल- यहां स्थित अन्य दर्शनीय स्थानों में गोमती द्वारका, भेंट द्वारका, रणछोरजी का मंदिर, गोपी तालाब, श्रीकृष्ण महल, शारदा मठ आदि प्रमुख है । औढ़ा नागनाथ यदि तीर्थयात्री औढ़ा नागनाथ ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन करना चाहते हैं तो अक्टूबर से मार्च माह के बीच जाएं। यह समय मौसम के मान से अच्छा रहता है।

विष्णु और शिव में भेद

विष्णु++शिव 

शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। वे दोनों तो परस्पर एक-दूसरे के पूरक तत्व हैं। पुराणों के अनुसार जब-जब शिव या विष्णु पर कोई विपत्ति आई है, उन्होंने एक-दूसरे की मदद करने में देर नहीं लगाई है। श्रीरामचरितमानस में भी विष्णु ने कहा है- शिव का द्रोही तो हमारा दास कभी हो ही नहीं सकता और न ही वह मेरी कृपा हासिल कर सकता है।

इसी प्रकार रामेश्वरम में विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्र ने शिवलिंग की स्थापना कर शिव के प्रति अपनी अनन्य भक्ति का परिचय दिया। एक और प्रसंग भी मिलता है कि जब शिव की पूजा करते वक्त विष्णु को पुष्प न मिलने पर उन्होंने अपने कमल समान नेत्र चढ़ाकर अपनी पूजा को पूर्ण किया था।

श्री शिव तत्व

शिव वही तत्व है जो समस्त प्राणियों के विश्राम का स्थान है।
मूलत: शिव एवं विष्णु एक ही हैं, फिर भी उनके उपर रूप में सत्व के योग से विष्णु को सात्विक और तम के योग से रूद्र को तामस कहा जाता है। सत्वनियंता विष्णु और तमनियंता रूद्र हैं। तम ही मृत्यु है, काल है। अत: उसके नियंता महामृत्युंजय महाकालेश्वर भगवान रूद्र हैं। तम प्रधान प्रलयावस्था से ही सर्व प्रपंच की सृष्टि होती हैं।
कृष्ण के भक्त तम को बहुत ऊँचा स्थान देते हैं। जब सृष्टिकाल के उपद्रवों से जीव व्याकुल हो जाता है, तब उसको दीर्घ सुषुप्ति में विश्राम के लिए भगवान सर्वसंहार करके प्रलयावस्था व्यक्त करते हैं। यह संसार भी भगवान की कृपा ही है। तम प्रधानावस्था है, उसी से उत्पादनावस्था और पालनावस्था व्यक्त होती है। अन्त में फिर भी सबको प्रलयावस्था में जाना पड़ता है। उत्पादनावस्था के नियामक ब्रह्मा, पालनावस्था के नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्था के नियामक शिव हैं। पहले भी कारणावस्था रहती हैं, अंत में भी वही रहती है। प्रथम भी शिव हैं, अंत में भी शिव तत्व ही अवशिष्ट रहता है। तत्वज्ञ लोग उसी में आत्म-भाव करते हैं। शिव ही सर्वविद्याओं एवं भूतों के ईश्वर हैं, वही महेश्वर हैं, वही सर्वप्राणियों के हृदय में रहते हैं। एकादश प्राण रूद्र हैं। निकलने पर वे प्राणियों को रूलाते हैं, इसलिए रूद्र कहे जाते हैं। दस इन्द्रियां और मन ही एकादश रूद्र हैं। ये आध्यात्मिक रूद्र हैं। आधिदैविक एवं सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रूद्र इनसे पृथक हैं। जैसे विष्णु पाद के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही रूद्र अहंकार के अधिष्ठाता हैं।
शिव की आत्मा विष्णु और विष्णु की आत्मा शिव हैं। तम काला होता है और सत्व शुक्ल परन्तु परस्पर एक- दूसरे की ध्यानजनित तन्मयता से दोनों के ही स्वरूप में परिवर्तन हो गया अर्थात सतोगुणी विष्णु कृष्णवर्ण हो गए और तमोगुणी रूद्र शुक्लवर्ण हो गए।
श्री राधा रूप से श्री शिवरूप का प्राकट्य होता है, तो कृष्णरूप से विष्णु का, काली रूप से विष्णु का तो शंकररूप से शिव का।
कालकूट विष और शेषनाग को गले में धारण करने से भगवान की मृत्युंजयरूपता स्पष्ट है। जटामुकुट में श्रीगंगा को धारण कर विश्व मुक्ति मूल को स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्र के समीप में ही चन्द्रकला को धारण कर अपने संहारकत्व-पोषकत्व स्वरूप विरूध्द धर्माश्रयत्व को दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्म को ही अपना भूषण- बसन बनाकर संसार में वैराग्य को ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया। शिव का वाहन नंदी , तो उमा का वाहन सिंह , गणपति का मूषक, तो कार्तिकेय का वाहन मयूर है। मूर्तिमान त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवा में सदा संलग्न हैं। सुर, नर, मुनि, नाग ,गन्धर्व, किन्नर, असुर, दैत्य भूत , पिशाच, वेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिंह सभी उनको पूजते हैं। आक, धतूरा, अक्षत, बेलपत्र, जल से उनकी पूजा की जाती है। शिवजी का कुटुम्ब भी विचित्र ही है। अन्नपूर्णा का भण्डार सदा भरा, पर भोले बाबा सदा के भिखारी। कार्तिकेय सदा युध्द के लिए उध्दत, पर गणपति स्वभाव से ही शांतिप्रिय। कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणपति का मूषक, पार्वती का सिंह और शिव का नंदी, उस पर सर्पों का आभूषण। सभी एक दूसरे के शत्रु ,पर गृहपति की छत्रछाया में सभी सुख तथा शांति से रहते हैं। घर में प्राय: विचित्र स्वभाव और रूचि के लोग रहते हैं। घर की शांति के आर्दश की शिक्षा भी शिव से ही मिलती है।
भगवान शिव और अन्नपूर्णा अपने आप परम विरक्त रहकर संसार का सब ऐशवर्य श्री विष्णु और लक्ष्मी को अर्पण कर देते हैं। श्री लक्ष्मी और विष्णु भी संसार के सभी कार्यां को संभालने, सुधारने के लिए अपने आप ही अवर्तीण होते हैं।

शिवलिगों पासना का रहस्य



सत्ता के बिना आनंद नहीं और आनंद के बिना सत्ता नहीं। मूल प्रकृति (योनि) और परमात्मा (लिंग) ही संसार और जगत की उत्पत्ति के कारण हैं। समष्टि ब्रहम का प्रकृति की ओर झुकाव अधिदैविक काम है। राधाकृष्ण, गौरीशंकर , अर्धनारीश्वर का परस्पर प्रेम, परस्पर आकर्षण है और यह शुध्द प्रेम ही शुध्द काम है। यह कामेश्वर या कृष्ण का स्वरूप ही है। सत रूप गौरी एवं चितरूप शिव दोनों ही जब अर्ध्दनारीश्वर के रूप में मिथुनीभूत होते हैं, तभी पूर्ण सच्चिदानंद का भाव व्यक्त होता है, परन्तु यह भेद केवल औपचारिक ही है, वास्तव में तो वे दोनों एक ही हैं। भगवान अपने स्वरूप को देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं। बस इसी से प्रेम या काम प्रकट होता है।इसी से शिव शक्ति का संमिलन होता है। यही श्रृंगाररस है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है। उसी सौन्दर्य के कणमात्र से विष्णु ने मोहिनी रूप से शिव को मोह लिया। वही सगुण रूप में ललिता, कहीं कृष्ण रूप में प्रकट होता है।

निराकर, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरूषतत्व का प्रतीक ही लिङग है और अनन्त ब्रहमाण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनी, अर्घा या जलहरी है। न केवल पुरूष से सृष्टि हो सकती है , न केवल प्रकृति से। पुरूष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन, जड़ है।
भगवान् कहते हैं- महद्ब्रहम- प्रकृति- मेरी योनि है, उसी में मैं गर्भाधान करता हूँ, उससे महदादिक्रमण समस्त प्रजा उत्पन्न होती हैं। लिड़ग् और योनि व्यापक शब्द हैं। गेहूँ, यव आदि में भी जिस भाग में अंकुर निकलता है उसे योनि माना जाता है, दाने निकलने से पहले जो छत्र होता है वह लिड़ग् है।
उत्पत्ति का आधारक्षेत्र भग है, बीज लिड़ग् है। शिव सूक्ष्म अतीन्द्रिय लिड़ग् है। शक्ति सूक्ष्म अतीन्द्रिय योनि है। स्थूल लिड़ग् और योनि तो सूक्ष्म लिड़ग् एवं योनि की अभिव्यक्ति के संभावित रूपों में से एक रूप है। प्रतिबिम्ब मात्र है।

Mahatripur Sundari Maa

श्रीविद्या कि उपासना

 
अखिल चराचर जगत की अघिष्ठात्री शक्ति की महत्ता मातृ सत्ता के रूप में भारतीय वनाद्गमय में वर्णित है। वही शक्ति विश्व का सृजन, पालन, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह इन पंच कर्मो की नियामिका है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड की केंद्रभूता यही शक्ति शरीर में अंतर्निहित प्राण शक्ति है। इसे ही योगियों की भाषा में चेतना शक्ति अथवा कुंडलिनी शक्ति कहा गया है। अखिल ब्रह्माण्ड की प्रतीकात्मक आकृति है श्री-यंत्र।
श्रीयंत्र के मध्य बिंदु में विराजमान भगवती महात्रिपुरसुन्दरी श्री श्रीविद्या के नाम से जानी जाती हैं। इन्हें मणिपुर-द्वीप वासिनी भी कहा जाता है। श्रीविद्या धाम,इंदौर में मां की इसी इसी विश्वमोहनी स्वरूप की प्रतिष्ठा की गई है।
स्वामी गिरिजानंदजी सरस्वती का इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान है।महात्रिपुरसुंदरी का यह मंदिर श्री यंत्र की रचना के आधार पर अष्टकोणीय है, जिसके मध्य में पंच प्रेतासन पर राजराजेश्वरी जगज्जननी मां पराम्बा ललिता महात्रिपुर संुदरी श्री विद्या विराजमान हैं। सिंहासन के चार आधार-स्तम्भ के रूप में चार देव ब्रह्मा, विष्णु,रूद्र एवं इर्शान हैं। पर्यड्क पर योगिराज शिव लेटे हैं, जिनकी नाभि से निकले सहस्रदल कमल पर मातेश्वरी आसीन हैं। श्रीश्रीविद्या का स्वरूप षोडश वर्षीया बालिका का है,जिनके चार हाथ एवं तीन नेत्र हैं। भगवती ने चारों हाथों में क्रमश: इक्षु-धनुष, पंच पुष्पबाण, पाश एवं अंकुश धारण किए हैं। मुख मण्डल प्रसन्न है तथा वाम नेत्र से भगवान सदाशिव को देख रही हैं। सदगुरू के श्रीमुख से प्राप्त की जाने वाली श्रीविद्या की दीक्षा ही साधना में सफलता दिलाती है। गुरू कृपा से फलीभूत होती है। श्री विद्या उपासना करने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

ऎसे करें पूजन

माघ पूर्णिमा को भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी मां श्री विद्या की पूजा मां के स्वरूप श्री यंत्र में करें। पूर्वाभिमुख होकर बैठें। लाल आसन का प्रयोग करें। शुद्ध और स्वच्छ वस्त्रों को स्त्रान करके धारण करें। शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। स्वर्ण,रजत,कांस्य अथवा पीतल के स्वच्छ पात्र में श्रीयंत्र की स्थापना करनी चाहिए। पुष्पों,अक्षत,गुलाब जल की बूंदों से माता को आसन देकर श्रीयंत्र स्थापित करना चाहिए।भगवती के नाम से श्री यंत्र के ऊपर श्रीविद्या का आह्वान करें। तीन बार पृथक पृथक जल चढ़ाएं। पंचामृत स्त्रान करवाएं। इसके बाद तीर्थ जल से मां को स्त्रान करवाना चाहिए। चंदन-केसर से भी श्री यंत्र को स्त्रान करवाना चाहिए। इत्र, गुलाब जल से भी स्त्रान कर मां को प्रसन्न करना चाहिए। श्री सूक्त से मां का अभिषेक दूध या गुलाब जल, गंगा जलादि अथवा गन्ने के रस से करना चाहिए। नए और शुद्ध वस्त्र से श्री यंत्र का प्रोक्षण कर स्थापित करें। पंच रंग का धागा यानी कलावा मां को अर्पित करें। इसके पश्वात श्रद्धापूर्वक मां को चंदन, केसर,अक्षत, बिल्व पत्र,कुंद,जूही, गुलाब, हार श्रृंगार ,चंपा (मां को विशेष प्रिय),कमल के फूल अथवा माला चढ़ाएं। कुंकुम-चावल, हलदी,अबीर,गुलाल, मेंहदी आदि सौभाग्य वस्तुएं जगत जननी को अर्पित करें।

मंत्र जप

अति गोपनीय और गुरू मुख से ग्राह्य श्रीविद्या की दीक्षा के अभाव में जन सामान्य इन मंत्रों से मां का जप करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु श्रीविद्यारूपेण संश्रिता।
नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमो नम:।।
श्री ललिता अम्ब्कायै नम:।

श्रीविद्यायै नम:।
श्रीमत्त्रिपुर सुन्दरायै नम:।
श्री चक्रराज निलयायै नम:।

श्रीविद्या पूजन के तीन भेद हैं। यथा परापूजा,परापरा पूजा और अपरापूजा। परापूजा यह ज्ञान है। परापरा पूजा यह भक्ति है। अपरापूजा यह कर्म है। इस विद्या के फल की ओर दृष्टि रखकर उपासना करने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। फल की अपेक्षा रखे बिना उपासना करने से जल्दी सिद्धि प्राप्त होती है। ऎसा सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में कहा गया है।

आरती

जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे
मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे।। हरि ऊं जय देवि...
प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्ये
पारावारविहारिणि नारायणि ह्वद्ये।
प्रपंचसारे जगदाधारे श्रीविद्ये
प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ।। 1 ।। हरि ऊं जय देवि॥
दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने
पदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।
विकसित पंकजनयने पन्नगपतिशयने
खगपतिवहने गहने संकटवन दहने ।। 2।। हरि ऊं जय देवि॥
मंजीरांकित चरणे मणिमुक्ताभरणे
कंचुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्ब्ाुजधरणे।
शक्रामयभय हरणे भूसुर सुखकरणे
करूणां कुरू मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ।। 3।। हरि ऊं जय देवि॥
छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्
ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान।
विहरसि दानव ऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ।। 4।। हरि ऊं जय देवि॥

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