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03 सितंबर 2012

सिकन्दर शाह ने मन्दिर तोड़कर बनवाई

हजरत पंडुआ की अदीना मस्जिद



Adina Masjid, built in 1369 by Sultan Sikander Shah. One of the largest mosques in India, it also typifies the most developed mosque architecture of the period, the orthodox design being based on the great 8th century mosque of Damascus. Carved basalt masonry from earlier Hindu temples is used to support the 88 brick arches and 378 identical small domes.

अदीना अर्थात् जुम्मे की मस्जिद पश्चिम बंगाल के पश्चिमी दिनाजपुर जिले के रायगंज और मालदा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग -34 पर स्थित है। पहली नजर में ही इस इमारत का दोरंगा स्वरूप दिखाई देता है। जमीन से 10 फुट ऊपर तक इसका रंग भूरा है जो वस्तुत: पत्थर की ईंटों का रंग है। उससे 12 फुट ऊपर तक का भाग लाल ईंटों का बना है। स्पष्ट है कि वर्तमान मस्जिद का निर्माण पहले बनी किसी इमारत के ऊपर किया गया था।

मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद कुछ कदम चलते ही बाहरी दीवारों पर हिन्दू देवताओं की प्रतिमाओं के चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं। इनको ठोस पत्थर पर उकेरा गया है, जो बाहर की तरफ लगी उन लाल पत्थर की ईंटों से मिलता-जुलता है। एक पत्थर पर गणेश और उनकी अर्धांगिनी उकेरे दिखाई देते हैं। ऐसे ही उत्कीर्ण किए अनेक चित्र हैं। इनमें प्रवेश द्वार तथा उत्तरी और पूर्वी पार्श्व द्वारों के शीर्ष भी शामिल हैं। मस्जिद के भीतर किए गए पत्थर के काम से भी यही विश्वास होता है कि यह इमारत मूलत: एक मन्दिर की थी।

उत्तरी दीवार में पत्थर को काटकर बनाए गए लगभग 20 आले हैं। ये सभी मन्दिर में की जाने वाली पत्थर की कटाई के प्रमाण हैं। यदि इस विषय में कोई शंका हो भी तो उसका निराकरण इमाम के प्रयोग के लिए बनाए गए चबूतरे को देखकर हो जाता है। उसकी अंतिम सीढ़ी के पत्थर पर दो स्त्रियों की आकृतियां पत्थर को काटकर बनाई गई हैं। यद्यपि उनका चेहरा खण्डित कर दिया गया है, फिर भी वे स्पष्टत: मानव प्रतिमाएं हैं।

स्थानीय दंत कथा के अनुसार अदीना मस्जिद का निर्माण सुल्तान जलालुद्दीन मोहम्मद शाह द्वारा करवाया गया था। उसका पूर्व नाम जादू था और उसके पिता राजा गणेश ने 12 वर्ष की आयु में उसका मतान्तरण कराकर उसे मुसलमान बनवा दिया था। बाद में राजा को अपने कृत्य पर पाश्चाताप हुआ और उसने स्वर्णधेनु यज्ञ करवाया, लेकिन जादू अर्थात् जलालुद्दीन मोहम्मद शाह ने इस्लाम मत छोड़ने से इनकार कर दिया। इस पर हिन्दू दरबारियों ने जादू के भाई महेन्द्र देव को राजगद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। इससे जलालुद्दीन इतना नाराज हुआ कि वह मूर्तिभंजक बन गया। उसने मन्दिरों और मूर्तियों का विध्वंस करने के अतिरिक्त अनेक हिन्दुओं को जबरन इस्लाम मत स्वीकार करने को मजबूर किया।

लेकिन इस कथा से यह बात स्पष्ट नहीं होती कि मस्जिद का निर्माण कराते समय कोई मुसलमान उसमें हिन्दू देवताओं की आकृतियों से सज्जित पत्थरों का प्रयोग करने में गर्व क्यों करेगा। यह बात समझ में नहीं आती कि कोई मुसलमान अपने मत के विरुद्ध जाकर मस्जिद के बाहर की ओर, द्वारों के शीर्ष पर, दीवारों पर या चबूतरे के नीचे हिन्दू देवताओं की आकृतियों का उत्कीर्णन कैसे करवा सकता है? इन सबसे यही सिद्ध होता है कि अदीना मस्जिद भ्रष्ट किए गए मन्दिर के ऊपर बनाई गई है।

दिल्ली लौटकर मैंने अदीना मस्जिद से संबंधित साहित्य की खोजबीन की। स्पष्टत: इसके बारे में काफी शोध किया गया है। गौर व पंडुआ के संस्मरण मोहम्मद आबिद अली खां द्वारा लिखे गए और बाद में उनकी एच.ई. स्ट्रेपल्स, आई.ई.एस. द्वारा पुनरीक्षा की गई। उन्हें 1979 में एशियन पब्लिकेशन सर्विसेज, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया। मूलत: यह पुस्तक 1924 में मालदा में प्रकाशित हुई थी। इसमें मूल शोध कार्य और साथ ही पूर्व अध्ययनों का भी उल्लेख है। संदर्भ ग्रंथों की सूची में 32 विभिन्न ग्रंथों के नाम दिए गए हैं।

एक अपेक्षाकृत आधुनिक रचना डा. सैयद महमूदुल हसन द्वारा लिखित "मोस्क आर्कीटेक्चर आफ प्रीमुगल बंगाल' है। यह रचना मूलत: लंदन वि·श्वविद्यालय के लिए 1965 में तैयार किया गया शोध प्रबंध था। डा. हसन ढाका के वि·श्वविद्यालय कालेज में स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष थे। उन्होंने अनेक ब्रिटिश विद्वानों के उद्दरण दिए हैं, जिनमें भारतीय पुरातत्व विभाग के विख्यात निदेशक सर एलेक्जेंडर कनिंघम के उद्धरण भी शामिल हैं।

अदीना मस्जिद का निर्माण किसने और क्यों करवाया-इस विषय से संबंधित स्थानीय दंतकथा प्रकटत: असत्य प्रतीत होती है। विद्वानों का मत है कि इसकी स्थापना सुल्तान सिकंदर शाह ने 1364-1374 ई. के बीच करवाई थी। इस विषय में विशेषकर जे एच. रेवनशा और अन्य विद्वानों के बीच मतभेद है कि मध्यकालीन बंगाल की राजधानी अधिक प्राचीन है या हजरत पंडुआ, जहां अदीना स्थित है, अधिक प्राचीन है।

इस विवाद का यही महत्त्व है कि इस मस्जिद के निर्माण में इस्लामी काल से पूर्व के भवनों का कितना मलबा प्रयोग में लाया जा सका होगा। डा. हसन ने इतनी निष्पक्षता अवश्य दिखाई है कि उन्होंने अनेक विद्वानों के मत का विस्तार से उल्लेख किया है। लेकिन उन्होंने इस आरोप के संबंध में अपनी अप्रसन्नता भी प्रकट की है कि उसके निर्माण में हिन्दू इमारतों की सामग्री का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ, उनका कहना है, "इलाहीबख्श, क्रीटन, रेवेनशा, बुकानान, हेमिल्टन, वेस्टमेकाट, बेगलर, कनिंघम, किंग सहित अनेक इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने गैर इस्लामी सामग्री का प्रयोग किए जाने के प्रमाणों का बखान किया है। लेकिन उनमें से किसी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि गौर और हजरत पंडुआ के भव्य स्मारकों के निर्माण के लिए उस समय मंदिरों को तोड़कर सामग्री प्राप्त की गई थी।' उन्होंने ई.जी. हेवेल पर यह आरोप लगाया है कि हेवेल इतने असहिष्णु थे कि उन्होंने मुस्लिम निर्माताओं को विशाल महराबों, गुम्बदों, मीनारों और महीन नक्काशी के कार्य का श्रेय भी नहीं दिया है। उनका मत है कि हजरत पंडुआ की अदीना मस्जिद की केन्द्रीय महराब का वास्तुशिल्प हिन्दू वास्तुशिल्प होना इतना स्पष्ट है कि उस पर किसी प्रकार की कोई टिप्पणी अनावश्यक है।








बंगाल से संबंधित 1888 की पुरातत्व सर्वेक्षण रपट में जे.डी. बेगलर ने यह मत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है कि अदीना मस्जिद पहले एक मन्दिर था। उनके शब्दों में-"मुसलमान उस स्थान पर अपने पंथ की इबादतगाह (अर्थात् नमाज अदा करने का स्थान) बनाकर खुश हुए, जहां घृणित काफिरों का पूजा स्थल था।' खुर्शीदे जहांनुमा, जिसका अनुवाद एच.बीवरेज ने किया और जो "जनरल आफ एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल', खंड 44, भाग 1, 1895 में हुआ था, में बीवेरज ने लिखा है- "अदीना मस्जिद उस स्थान पर खड़ी है जहां मुस्लिमकाल से पूर्व किसी समय एक विख्यात व महत्त्वपूर्ण मन्दिर था।'

"जनरल आफ एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल', खंड 28, भाग 1,1932 में एस.के. सरस्वती ने भी यह बात जोर देकर कही है कि यह मस्जिद मूलत: हिन्दू इमारत थी। मैं यहां उनका उद्धरण नहीं देना चाहता, क्योंकि वह हिन्दू थे और उनका विचार पक्षपातपूर्ण हो सकता था। मेरी दृष्टि में इस विवादपूर्ण विषय में मुसलमान, ईसाई और ब्रिटिश विद्वानों का मत अधिक वि·श्वसनीय है।

एक वस्तुनिष्ठ प्रेक्षक के रूप में सर एलेकजेंडर कनिंघम पर बहुत लोगों ने भरोसा किया है। उनके मतानुसार, अदीना मस्जिद का चबूतरा स्पष्टत: हिन्दू स्थापत्य का नमूना है। हिन्दू स्थापत्य शैली के चौखटों, स्तम्भों, स्तम्भ शीर्षों, स्तम्भों के गोलाकार शिल्प, पत्थर पर की गई नक्काशियों, दीवारों के अधोभागों आदि का इस प्रकार कामचलाऊ प्रयोग किया गया है कि उनका तात्कालिक उपयोग लगभग असंभव हो गया है। लेकिन इस विवाद को शुरु करने का श्रेय मालदा के मुंशी इलाहीबख्श को दिया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा है- "अदीना मस्जिद की चौखट के सामने एक टूटी और चमकाई हुई मूर्ति थी, और इधर-उधर अन्य मूर्तियां पड़ी थीं। अत: ऐसा प्रतीत होता है कि यह मस्जिद मूलत: एक मुर्तियुक्त मन्दिर था।'

 
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- प्रफुल्ल गोरडिया
साभार : पांचजन्य 

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