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02 अक्तूबर 2012

नवरात्रारम्भ 2012


Navratri Begins - 2012

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें, नवरात्रों के समापन की विधि 


16  सितम्बर को 4.30 बजे कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त है 
आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत किया जाता है. प्रतिपदा तिथ के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प किया जाता है. वर्ष 2012 में यह व्रत 16 अक्टूबर से शुरु होकर 23 अक्तूबर तक रहेगे़. व्रत का संकल्प लेने के बाद पंडित से या स्वयं मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है. इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है. घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है. तथा "दुर्गा सप्तशती" का पाठ किया जाता है. पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिए. वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हुए इस व्रत को करते है. कहीं कहीं नवरात्रे भर रामलीलाएं भी होती है.

आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है. आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्यौहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो जाता है. नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में मां भगवती के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा की जाती है. यह महापर्व सम्पूर्ण भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. इन दिनों भक्तों को प्रातः काल स्नानादि क्रियाओं से निवृत्त होकर निष्कामपरक संकल्प कर पूजा स्थान को गोमय से लीपकर पवित्र कर लेना चाहिए और फिर षोडशोपचार विधि से माता के स्वरूपों की पूजा करना चाहिए. पूजा करने के उपरान्त इस मंत्र द्वारा माता की प्रार्थना करना चाहिए-
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमांश्रियम्| रूपंदेहि जयंदेहि यशोदेहि द्विषोजहि||पौराणिक कथानुसार महाराक्षस रावण का वध करने के लिए भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शारदीय नवरात्र का व्रत किया था और तभी जाकर उन्हें विजयश्री की प्राप्ति हुई थी. आस्थावान भक्तों में मान्यता है कि नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करने वाले पर से नवग्रहों के प्रकोप शांत हो जाता है और जीवन में उसे सुख, शांति, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है.
Sharad Navratri 2012: 16th October - 23rd October
Where: Gujarat, West Bengal and other parts of India .
Sharad Navratri in 2012 will start on 16th October - 23rd October.
‘Navratri is a festival of Hindus celebrated with devotion, love and fervour all over India. It is also called as Navratras. The mood of
Navratri is very colourful & unique.Navratri’ meaning ‘nine nights’ is a significant Hindu festival,In Gujarat, Navratri festival celebrates the worship of Goddess Jagdamba, while in West Bengal, Durga Puja is the reason to rejoice. Though, every region in India celebrates this festival in its own way, Navratri Festival is dedicated to the 3 avatars of Goddess Shakti - Durga (the warrior Goddess), Lakshmi (the Goddess of wealth), and Saraswati (the Goddess of knowledge).It incorporates veneration along with commemoration by means of song and dance. Navratri basically means 'Nine Nights' ('Nav' meaning nine and 'Ratri' meaning nights). These nights are devoted to the reverence of Goddess Durga (Maa Durga) who exists in many forms and is the manifestation of the absolute energy that pervades the Universe. During these days and nights prayers are offered to Mother Goddess. Navratri's each night is dedicated to one form of Goddess Durga. That is every ratri of the Navratri corresponds to worship of different forms of Maa Durga.:
मां शैईलपुत्री जो पर्वटराज (हिमालय पर्वत के राजा),भगवान शिव और गणेश और कार्तिकेय की माँ की पत्नी की बेटी थी;
मां - ब्रह्मचारिणी , जो दुनिया के लिए शुद्ध प्रेम का संदेश देती है;
मां चंद्रघनटा, जो न्याय स्थापित करती है और उसके सिर पर वर्धमान चाँद पहनता;मां कूशमांदा , जो दुनिया के लिए बुनियादी जरूरतों को प्रदान करती है;स्कंद मां है,जो दुनिया के लिए गलत से सही के भेदभाव का उपहार देती है;मां कात्यायिनी , जो लगातार बुराई और धोखेबाज संस्थाओं के खिलाफ लड़ाई;मां कालरात्रि , जो रक्तबीज (एक राक्षस जो कि उसके शरीर से गिर रक्त की हर बूंद से एक राक्षस का उत्पादन देवी अंततः रक्त पाला पहले यह जमीन तक पहुँच सकता है और इसलिए उसे विजय प्राप्त की है.) को मार डाला;मां चामुंडा, जिसने दो राक्षसों को मार डाला-चंदा और मुंडा और शांति बहाल;मां महागौरी जिसने की बुरी ताकतों से दुनिया आजाद;माता सीधिदार्ती , जो रहस्यवादी (यंत्र तंत्र) शक्तियों और ज्ञान (ज्ञान) का खजाना है.
Fasting in Navratri follows a practice of cleansing, and purifying one’s body and soul, which is believed to result in blessing a person with virtue.

नवरात्रे स्तुति
Navratri Stuti


मंगल की सेवा सुन मेरी देवा हाथ जोड कर तेरे द्वार खडे।
पान सुपारी ध्वजा नारियल ले ज्वाला तेरे भेंट धरें ।।
सुन जगदम्बे कर न विलम्बे सन्तन की भण्डार भरे।
सन्तन प्रतिपाली सदा कुशाली जै काली कल्याणी करे।। मंगल की ....
बुद्धि विधाता तू जगमाता मेरा कारज सिद्धि करे।
चरण कमल का लिया आसरा शरण तुम्हारी आन परे।। मंगल की ....
अब जब पीर परे भक्तन पर तब तब आय सहाय करे।
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ....
बार-बार तैं सब जग मोह्रो तरूणी रुप अनूप घरे।
माता होकर पुत्र खिलावे कहीं भार्या भोग करे।।मंगल की ....
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ....
ब्रह्रा विष्णु महेश सहसफल लिये भेंट तेरे द्वार खडे।
अटल सिंहासन बैठी माता सिर सोने का छत्र फिरे।।
बार शनीचर कुंकुम वरणों जब लौ कंठ कर हुकुम करे।
खडग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये रक्त बीज को भस्म करें।।
शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे महिषासुर को पकड दले।
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ....
आदितावार आदि को बीरा जन अपने को कष्ट हरे।।
कोप होयकर दानव मारे चण्ड मुण्ड सब चूर करे।
जब तुम देखो दया रुप होय पल में संकट दूर करे।
सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता जन की अरज कबूल करें।।
सिंह पीठ कर चढी भवानी अटल भवन में राज करें।
ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे शिव शंकर जी ध्यान धरे।।
इन्द्र कृ्ष्ण तेरे करे आरती चंवर कुबेरे डुलाय रहे।
जय जननी जय मातु भवानी अटल भुवन में राज्य करे।। 

नवरात्रा-देवी के नौ रुपों का पूजन
Navratri - Puja of the Nine Forms of Devi


प्रत्येक वर्ष में दो बार नवरात्रे आते है. पहले नवरात्रे चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरु होकर चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तक चलते है. अगले नवरात्रे शारदीय नवरात्रे कहलाते है. ये नवरात्रे आश्चिन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरु होकर नवमी तिथि तक रहते है. दोनों ही नवरात्रों में देवी का पूजन किया जाता है. देवी का पूजन करने की विधि दोनों ही नवरात्रों में लगभग एक समान रहती है.

आश्चिन मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के ठिक बाद दशहरा पर्व मनाया जाता है. नवरात्रे और दशहरा प्रत्येक वर्ष परंपरागत रुप से उत्साह और धार्मिक निष्ठा से मनाया जाता है. इन पर्वों का धार्मिक व आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार से विशेष महत्व है. नवरात्रों में माता के नौ रुपों की पूजा की जाती है. यही कारण है, कि इसे नवरात्रा के नाम से भी जाना जाता है.

नवरात्रा पूजन प्रारम्भ विधि
Method of Beginning Navratri Puja


नवरात्रे चैत्र मास के हो, या फिर शारदीय नवरात्रे हो, दोनों ही में प्रतिपदा तिथि के दिन कलश स्थापना कि जाती है. कलश स्थापना करने से भी पहले उपवासक को नवरात्रे व्रत का संकल्प लिया जाता है. कलश से संबन्धित एक मान्यता के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है. इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है.

कलश स्थापना करने से पहले भूमि को गंगा जल छिडकर शुद्ध किया जाता है. भूमि शुद्ध करने के लिये गाय का गोबर भी प्रयोग किया जा सकता है. पूजा में सभी नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशापालकों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी को आमंत्रित किया जाता है. पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता है.

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें, नवरात्रों के समापन की विधि
Method of Worshiping Mata and Concluding Navratri

नवरात्रों के विषय में मान्यता है कि देवता भी मां भगवती की पूजा किया करते है. नवरात्रों में मां भगवती के नौ विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है. मां भगवती को शक्ति कहा गया है. नवरात्रों में नौ दिन क्रमश शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्ययायनी, कालरात्रि, मां गौरी और सिद्धिदात्रि की पूजा की जाती है.

प्रतिपदा तिथि में पूजा प्रारम्भ करना
Begin Puja on Pratipada Day

नवरात्रों में माता की पूजा करने के लिये मां भगवती की प्रतिमा के सामने किसी बडे बर्तन में रेत भरकर उसमें जौ उगने के लिये रखे जाते है. इस के एक और पानी से भरा कलश स्थापित किया जाता है. कलश पर कच्चा नारियल रखा जाता है. कलश स्थापना के बाद मां भगवती की अंखंड ज्योति जलाई जाती है. यह ज्योति पूरे नौ नवरात्रे दिन रात जलती रहनी चाहिए.

सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है. उसके बाद श्री वरूण देव, श्री विष्णु देव की पूजा की जाती है. शिव, सूर्य, चन्द्रादि नवग्रह की पूजा भी की जाती है.

प्रतिदिन पाठ करना
Reading Every Day

उपरोक्त देवताओं कि पूजा करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है. नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन उपवास रख कर दुर्गा सप्तशती और देवी का पाठ किया जाता है. इन दिनों में इन पाठों का विशेष महत्व है. माता दुर्गा को अनेक नामों से जाना जाता है. उसे ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बलपर्दा, शुभ, निशुभं हरणी, महिषासुर मर्दनी, चंद-मुंड विनाशिनी, परमेश्वरी, ब्रह्मा, विष्णु और शिव को वरदान देने वाली भी कहा जाता है. इसके अतिरिक्त निम्न मंत्र का भी जाप किया जा सकता है.

या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नम: ।।


नवरात्रे में नवग्रह शात्नि पूजा विधि
Navgrah Shastri Puja Method on Navratri

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ ग्रहों की शान्ति पूजा की जाती है. प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शान्ति हेतू पूजा की जाती है. द्वितीया तिथि के दिन राहू ग्रह की शान्ति पूजा की जाती है. तृ्तिया के दिन बृ्हस्पति के दिन, चतुर्थी के दिन शनि ग्रह, पंचमी के दिन बुध, षष्ठी के दिन केतु, सप्तमी के दिन शुक्र, अष्टमी के दिन सूर्य व नवमी के दिन चन्द्र देव की शान्ति पूजा की जाती है.

यह शान्ति क्रिया शुरु करने से पहले कलश की स्थापना और माता की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर एक यंत्र बनाया जाता है. इस यंत्र में नौ खाने बनाये जाते है. पहले तीन खानों में उसमें बुध, शुक्र, चन्द्र, बीच में गुरु, सुर्य, मंगल और नीचे के खानों में केतु, शनि, राहू को स्थान दिया जाता है.

इसके बाद नवग्रह बीच मंत्र की पूजा की जाती है. इसके बाद नवग्रह शात्नि संकल्प लिया जाता है. इसके बाद दिन अनुसार ग्रह के मंत्र का जा किया जाता है.

ग्रहों के मंत्र इस प्रकार है.

सूर्य बीज मंत्र - ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
चन्द्र बीज मंत्र - ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:
मंगल बीज मंत्र- ऊँ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध बीज मंत्र - उँ ब्रां ब्रीं ब्रौ स: बुधाय नम:
गुरु बीज मंत्र - ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
शुक्र बीज मंत्र - ऊँ द्रां द्रीं द्रौ स: शुक्राय नम:
शनि बीज मंत्र - ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:
राहू बीज मंत्र - उँ भ्रां भ्रीं भौं स: राहुवे नम:
केतु बीज मंत्र - उँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: 

दुर्गासप्तशती में सात सौ महामंत्र होने से इसे सप्तशती कहते है. सप्तशती उपासना से असाध्य रोग दूर होते है. और आराधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

नवरात्रों में ध्यान देने योग्य बातें
Important things to be Kept in Mind During Navratri

नवरात्रों की पूजा करते समय ध्यान देने योग्य यह विशेष बात है कि एक ही घर में तीन शक्तियों की पूजा नहीं करनी चाहिए. देगी को कनेर और सुगन्धित फूल प्रिय है. इसलिये पूजा के लिये इन्ही फूलों का प्रयोग करें, कलश स्थापना दिन में ही करें, मां की प्रतिमा को लाल वस्त्रों से ही सजायें. साधना करने वाले को लाल वस्त्र या गर्म आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए.

उपवासक को क्या नहीं करना चाहिए
Things Should be Avoided by those Who Fast

नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए. मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए. ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए. नवरात्रे की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर साथ ही दक्षिणा देनी चाहिए.

लडके को भैरव का रुप माना जाता है. कंजनों को भोजन करवाने से एक दिन पूर्व रात्रि को हवन कराना विशेष शुभ माना जाता है. कंजकों को भोजन करवाने के बाद उगे हुए जौ और रेत को जल में विसर्जित कर दिया जाता है. कुछ जौं को जड सहित उखाडकर समृ्द्धि हेतू घर की तिजौरी या धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए.
कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए. इससे घर से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है. और नारियल को माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप खा लिया जाता है.

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