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18 अक्तूबर 2012

दशहरा पर्व पर श्रीराम की आराधना करें


लोकाभिरामं रणरंगधीरं, राजीव नेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं, श्रीरामचद्रं शरणं प्रपद्ये।


रावण एवं अन्य राक्षसों से त्रस्त होकर देव‍तागण भगवान विष्णु से रावण-वध के लिए प्रार्थना करते हैं। तब भगवान विष्णु लोकहित के लिए, लोक कल्याण के लिए, असत्य पर सत्य की विजय के लिए, पृथ्वी के उद्धार के लिए एवं अत्याचार के नाश के लिए राजा दशरथ के यहां पुत्र रत्न के रूप में उत्पन्न होते हैं। यही राम असत्य पर सत्य की विजय के रूप में रावण का वध करते हैं।

ऐसे भगवान श्रीराम को हम प्रणाम करते हैं। जिन्होंने देवताओं की प्रार्थना सुनकर रावण का युद्ध में संहार किया। भगवान राम ने दशहरे के साथ यह संदेश जोड़ा कि शत्रुता व्यक्ति से नहीं उसके बुरे कर्म से होनी चाहिए। इस दिन श्रीराम प्रभु के चरित्र से नम्रता, प्रेम एवं उदारता का ही संदेश हम अपने ह्रदय में बसा सकते हैं। स्वयं श्रीराम ने रावण के युद्ध के बाद उस परिवार से शत्रुता त्याग कर अपनी उदारता, विनम्रता एवं प्रेम का संदेश दिया।

जाति-‍पाति धनु धर्म बड़ाई |  प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।
सब ‍तजि तुम्हहि रहई उर लाई। तेहि के ह्रदय रहहु रघुराई।।


अर्थात् जाति-पाति, धर्म, धन, व प्रिय परिवार सबको छोड़ कर जो केवल प्रभु को अपने ह्रदय में धारण किए रहता है उसका कल्याण होता है। हे प्रभु राम! आप सबके ह्रदय में निवास करें।

प्रभु भक्ति में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं किया जाता है। स्वयं राम शबरी के यहां बेर खाने जाते हैं, तो शबरी से कहते हैं :

कह रघुपति सुनि भामिनी बाता
मानऊं एक भगति कर नाता।
जाति-‍पाति-कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई।।
भगति हीन नर सोहई कैसा।
बिनु जल वारिद देखिय जैसा।।


प्रभु राम कहते है- देवी! मेरी बात सुनो। मैं तो केवल एक भक्ति का नाता मानता हूं। जाति-पाति, कुल, धर्म, बल, कुटुंब, गुण और चतुराई इन सबके होते हुए भी भक्ति से रहित मनुष्य वैसा ही लगता है जैसा जल से रहित बादल।

इसलिए प्रभु की भक्ति किसी भी प्रकार के बंधन वाली नहीं है। प्रभु को पूर्ण मन से सुमिरन करें। वह ह्रदय में निवास करेंगे। दशहरे के दिन भगवान श्रीराम से निम्नलिखित उक्तियों से प्रार्थना करनी चाहिए।

करउ सो मम उर धाम।
अर्थात्- प्रभु मेरे ह्रदय में निवास करें।

मम ह्रदयं करहु निकेत।
अर्थात्- प्रभु मेरे ह्रदय में अपना घर बना लें।

ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।

अर्थात्- हे प्रभु राम! आम हमारे ह्रदय में बस कर काम-क्रोध और अहंकार को नष्ट कर दीजिए।

ऐसी प्रार्थना कर प्रभु के भक्ति में लीन होकर ह्रदय रूपी राम को जगा कर अंदर के अहंकार, पाप, क्रोध, मद वाले रावण का दहन करें एवं श्रीराम को प्रणाम करें। भक्तप्रिय प्रभु नारायण-दशरथ पुत्र, सभी मनोरथ पूर्ण करेंगे।

राम नाम उर मैं गहिओ जा कै राम नहीं कोई।।
जिंह सिमरन संकट मिटै दरसु तुम्हारे होई।।


जिनके सुंदर नाम को ह्रदय में (ग्रहण) बसा लेने मात्र से सारे काम पूर्ण हो जाते है। जिनके समान कोई दूजा नहीं है। जिनके स्मरण मात्र से सारे संकट मिट जाते हैं। ऐसे प्रभु श्रीराम को कोटि-कोटि प्रणाम है।

यह प्रार्थना करने मात्र से दसों इंद्रियों पर विजय प्राप्त की जा सकती है और दशहरा सार्थक होगा।

श्री राम सा मर्यादित बनूँ, क्रोध और अंहकार पर विजय करूँ!
श्री दुर्गा विराजे मेरे ह्रदय में, ताकि मैं अभय बनूँ!
श्री हनुमान सी भक्ति हो मेरी, श्री शिव के जैसा साक्षी भाव वरु!
विजयादशमी के अवसर पर माता भगवती और भगवान् श्रीराम के चरणों में निज जीवन समर्पित करूँ!राजेश मिश्रा

विजयादशमी : संकल्प का पर्व


गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥'
'डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥' 

यह है रावण का अहंकार जो कि मरते समय भी उसका साथ नहीं छोड़ रहा है। अभी भी वह घोर गर्जना के साथ राम को मिटाने की बात कह रहा है। इसके साथ ही राम रावण को मार देते हैं। यह रावण अति असाधारण है कि मरने के बाद जब वह वीर जमीन पर गिरता है तो भूचाल आ जाता है, समुद्र में तूफान उठ जाता है। नदियाँ अपने मार्ग बदल देती हैं। अनेक वानरों और राक्षसों को दबाते हुए उसका धड़ पृथ्वी पर गिर जाता है। 

गजब है राम कथा कि इतने धुराधरस महामानव को मारने के बाद भी राम सिर्फ एक चरित्र है, एक पात्र है। एक पुरुष कितना उत्तम हो सकता है, इसका आदर्श है। मानवीय गरिमा का चरम प्रतिनिधि है। वह ईश्वर नहीं है। वह लीला भी नहीं कर रहा है। वह एक चरित्र है, जो रोता भी है, हँसता भी है। प्रेम भी करता है, क्रोध भी करता है, आशंकित भी है। क्या होगा आगे, इस संबंध में विस्मय से भरा हुआ भी है। विश्वास भी करता है तो शंका भी उसके चरित्र का हिस्सा है। 

एक मनुष्य जब अपनी पूरी गरिमा के साथ, पूरी मर्यादा के साथ अपने पूरे स्वभाव के साथ उपस्थित होता है तो वह राम है। राम इस संस्कृति का एक ऐसा आदर्श है, जिसने प्रेम, सत्यता और भायप के अनोखे प्रतिमान स्थापित किए। जिसके सामने आज सदियों बाद भी सम्पूर्ण भारतीय जनमानस नतमस्तक है।

रावण प्रतीक है अहंकार का, पद का, प्रतिष्ठा का, शौर्य का, शक्ति का, साहस का। या ऐसे कहें कि यह प्रतीक मनुष्य की क्षमता का चरम प्रतीक है। कितना साहस है उस चरित्र में जो अपने हाथ से अपना सिर भी काट सकता है। नीति शास्त्र का बड़ा पंडित है लेकिन सत्य के पीछे खड़ा नहीं होता बल्कि सत्य को अपने पीछे खड़ा कर लेता है। 

सब जानता है लेकिन अपनी बुद्धि का प्रयोग सत्य को झुठलाने के लिए करता है। समय पड़ने पर वह चोरी भी कर लेता है और शास्त्र ज्ञान से उसे भी सही घोषित करता है। समय के हिसाब से छल-कपट भरे निर्णय लेने में उसका कोई सानी नहीं। 

जब आदमी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करता है तभी वह रावण बनने की ओर अग्रसर हो जाता है। महाराजा रावण ने उसी अहम के वशीभूत होकर व्यक्ति की उस स्वतंत्रता पर आक्षेप लगाया जो मनुष्य का सबसे बड़ा अधिकार है। आचार्य चतुरसेन ने लिखा है कि रावण पूरे विश्व को एक ही संस्कृति में ढालना चाहता था। वह अपने फरसे के दम पर बलात्‌ लोगों को रक्ष संस्कृति के नीचे लाना चाहता था, जिसमें सभी लोग एक ही प्रकार की जीवन शैली के अंतर्गत रहें। लेकिन एकता की कल्पना ही अपने आप में उलझी हुई है।

यह विश्व कभी भी एक नहीं हो सकता है। इस सृष्टि में दूसरे का एक्ज़िसटेंस ही यूनिकनेस को दर्शाता है। दूसरे का होना ही यह बताता है कि तुम्हारे जैसा कोई नहीं। लेकिन हम इस आधारभूत तथ्य को भी नहीं समझ पाते और रावण की तरह तलवार और फरसे के दम पर एक-सा बनाने की कोशिश करते हैं। इस जगत में एक ही पेड़ के दो पत्ते भी कभी एक नहीं हो सकते, तब मनुष्य की तो बात ही छोड़ दें। मनुष्य उस नियंता की चरम प्रदर्शना है।

परमात्मा बनने की, नियंता बनने की, दूसरे का भाग्य और व्यवहार, सोच तय करने की मनुष्य में प्रबल आकांक्षा रहती है। आम से आम आदमी में भी कहीं गहरे यह आकांक्षा छुपी रहती है कि सूरज भी मेरे हिसाब से उदित हो। रावण प्रारंभ में एक अतिसामान्य आदमी था, जिसकी झलक रामचरित मानस में कुछ यूँ मिलती हैः अंगद रावण के इतिहास के बारे में चुटकी लेते हुए कहते हैं कि जितने रावणों के बारे में मैं जानता हूँ, तू सुन और बता कि उनमें से तू कौन-सा है। अंगद की वाणी का तुलसी के शब्दों में उल्लेख करना रोचक होगाः

'बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला॥ 
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥
एक कहत मोहि सकुच अति, रहा बालि कीं काँख। 
इन्ह मह रावन तैं कवन , सत्य बदहि तजि माख॥' 

ये सभी वही रावण थे दशग्रीव दशानन रावण! लेकिन यदि आदमी के पास शक्ति आ जाए तो वह कितना भयानक आचरण कर सकता है। राम-रावण कथा ऐसे साधारण मनुष्यों की कहानी है जिसमें शक्ति दोनों के पास थी। एक के पास अहंकार की शक्ति, दूसरे के पास सत्य की शक्ति। सत्य की शक्ति की इससे बड़ी प्रतीक कथा नहीं हो सकती कि एक निर्वासित राजपुरुष बंदरों-भालुओं को इकट्ठा कर उस महाशक्तिमान रावण को हरा देता है। उस रावण को, जिसकी शक्ति की झलक रामचरित मानस में कुछ यूँ देखने को मिलती हैः- 

'दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥' 
'भुजबल बिस्व बस्य करि, राखेस कोउ न सुतंत्र॥'
'मंडलीक मनि रावन, राज करइ निज मंत्र॥'

सत्य का विजय पर्व : विजयादशमी

विजयादशमी विशेष

अन्याय, अत्याचार, अहंकार, विघटन और आतंकवाद आदि संसार के कलुष कलंक हैं। इतिहास पुराण गवाह हैं कि समय-समय पर ये कलुष सिर उठाते रहे हैं। त्रेता युग में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, खरदूषण, ताड़का, त्रिशरा आदि और द्वापर में कंस, पूतना, बकासुर के अलावा दुर्योधन आदि कौरवों के रूप में हों या इस युग में अन्याय और आतंकवाद के तरह-तरह के चेहरे हों। इन कलुषों पर श्रीराम जैसे आदर्श महापुरुष साधन संपदा नहीं होते हुए भी केवल आत्मबल के माध्यम से इन पर विजय होते रहे हैं। 

ऋषि विश्वामित्र के साथ ताड़क वन प्रदेश में ताड़का आदि के नेतृत्व में प्रशिक्षित हो रहे आतताइयों को ध्वस्त कर छोटी अवस्था से ही श्रीराम-लक्ष्मण ने राष्ट्र रक्षा का पहला अध्याय लिखा। उसके बाद वनवास के समय वनमाफियाओं द्वारा उजाड़े गए दंडक वन में ग्यारह वर्ष तक रहते हुए वन और वृक्षों की सेवा की। 

रोपे गए वृक्षों का जानकी जी ने वनवासी स्त्रियों के साथ सिंचन किया तथा लक्ष्मण जी ने धनुषबाण लेकर उनकी रक्षा की। इस प्रकार प्रकृति पर्यावरण की सुरक्षा के लिए वनों के महत्व को समाज के सामने प्रस्तुत किया। 

इसी प्रकार पंचवटी प्रदेश जहां खरदूषण की देख-रेख में सीमा पार से घुसे आतंकी भारत को अस्थिर करने के लिए प्रशिक्षण ले रहे थे। सूर्पणखा विषकन्या के रूप में रावण की सत्ता का विस्तार करने का उपक्रम चला रही थी। उसे कुरूप बनाकर खरदूषण समेत सारे आततताई उपद्रवियों का सफाया कर सुदूर लंका में बैठे रावण को मानो चुनौती दे डाली । 

रावण द्वारा सीता का हरण कोई सामान्य अपहरण नहीं था। वह एक राष्ट्र की अस्मिता एवं संस्कृति का हरण था। जिसकी रक्षा के लिए भगवान श्रीराम ने रीछ, वानरों जैसे सामान्य प्राणियों को संगठित किया। वन में रहने वाले सामान्य जीवों में इतनी शक्ति उभार देना साधारण नायकों के वश का काम नहीं हो सकता कि अजेय और दुर्लंघ्य कहे जाने वाले समुद्र से घिरे लंका जैसे दुर्ग का भेदन कर राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा कर सके।

रामचरित अपने समय और बाद की पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल है कि किस प्रकार शौर्य, शक्ति आचरण एवं नीति से किसी राष्ट्र की अखंडता को बचाया जा सकता है। 

आधुनिक परिवेश में विश्व के प्रत्येक राष्ट्र पर आतंकवाद का असुर सुरसा के मुख की तरह फैलता जा रहा है। मनोरंजन के लिहाज से प्रस्तुत की जाने वाली रामलीलाओं में राम का चरित्र भले ही हल्के-फुल्के ढंग से पेश किया जाता हो लेकिन हजारों लाखों लोगों के लिए वह जीवन में स्फूर्ति और प्रेरणा जगाने वाला केंद्र है। 

भारत के अतिरिक्त विश्व के अन्य सभी राष्ट्र श्रीराम के शील, सौंदर्य, राजनीतिक कुशलता तथा सामरिक वैश्विक रणनीति के परिप्रेक्ष में राम को ही अपना आदर्श मानव निर्माण की दिशा में अपनी इष्ट मान रहे हैं। 

ऐसे में विजयादशमी पर्व पर यदि भारत वर्ष के नीतिनियामकों सुधी राष्ट्रभक्त इस अवसर पर श्रीरामचन्द्र जी के जीवन से सात्विकता, आत्मीयता, निर्भीकता एवं राष्ट्र रक्षा की प्रेरणा लें तथा समाज के राष्ट्रविरोधी प्रच्छन्न तत्वों से संघर्ष करने के साहस का परिचय दें तो भारतवर्ष की अखंडता, नैतिकता तथा चारित्रिक सौम्यता के निर्माण के क्षेत्र में अद्भुत सराहनीय प्रयास होगा। 

'भूमि सप्त सागर मेखला भूप एक रघुपति कोसला' कहकर एक तरह से भारत की एकता और समरस संस्कृति का परिचय देते हैं। राम और रावण दोनों ही शिव-शक्ति के अन्य उपासक थे लेकिन रावण अपनी साधना और भक्ति का उपयोग मान, सत्ता प्राप्ति, समाज को पीड़ित करने तथा विषयों के भोग में कर रहा था। 

जबकि भगवान श्रीराम की साधना अखिल ब्रह्मांड के कल्याण के उद्देश्य को लेकर थी। अंतर्मुखी साधना-साधक की प्रत्येक इंद्रिय को विषयों से निवृत्त करती है। ‍विजयादशमी पर्व की शुमकामनाएं!

सती माता कैसे बन गई शक्ति?




प्रजापति दक्ष की पुत्री सती को शैलपुत्री भी कहा जाता था और उसे आर्यों की रानी भी कहा जाता था। दक्ष का राज्य हिमालय के कश्मीर इलाके में था। यह देवी ऋषि कश्यप के साथ मिलकर असुरों का संहार करती थी।

मां सती ने एक दिन कैलाशवासी शिव के दर्शन किए और वह उनके प्रेम में पड़ गई। एक तरफ आर्य थे तो दूसरी तरफ अनार्य। लेकिन सती ने प्रजापति दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया। दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि सती ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी वेशभूषा और शक्ल दक्ष को कतई पसंद नहीं थी।

दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई। लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती के लिए अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना हृदय विदारक और घोर अपमानजनक था। यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।

सती को दर्द इस बात का भी था कि वह अपने पति के मना करने के बावजूद इस यज्ञ में चली आई थी और अपने दस शक्तिशाली (दस महाविद्या) रूप बताकर-डराकर पति शिव को इस बात के लिए विवश कर दिया था कि उन्हें सती को वहां जाने की आज्ञा देना पड़ी। पति के प्रति खुद के द्वारा किए गया ऐसा व्यवहार और पिता द्वारा पति का किया गया अपमान सती बर्दाश्त नहीं कर पाई और यज्ञ कुंड में कूद गई। बस यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है। इसके बाद मां के नौ जन्मों की कहानी शुरू होती है।

यह खबर सुनते ही शिव ने वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ने तांडव नृत्य किया। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए।

इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं, लेकिन कुछ शक्तिपीठों का पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में होने के कारण उनका अस्तित्व खतरें में है।

सती ही है शक्ति : शक्ति से सृजन होता है और शक्ति से ही विध्वंस। वेद कहते हैं शक्ति से ही यह ब्रह्मांड चलायमान है। ...शरीर या मन में यदि शक्ति नहीं है तो शरीर और मन का क्या उपयोग। शक्ति के बल पर ही हम संसार में विद्यमान हैं। शक्ति ही ब्रह्मांड की ऊर्जा है।

मां पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर मां प्रकृति है। जहां भी सृजन की शक्ति है वहां प्रकृति ही मानी गई है। इसीलिए मां को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।

अनादिकाल की परंपरा ने मां के रूप और उनके जीवन रहस्य को बहुत ही विरोधाभासिक बना दिया है। वेदों में ब्रह्मांड की शक्ति को चिद् या प्रकृति कहा गया है। गीता में इसे परा कहा गया है। इसी तरह प्रत्येक ग्रंथों में इस शक्ति को अलग-अलग नाम दिया गया है, लेकिन इसका शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती से कोई संबंध नहीं।

इस समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त है सिद्धियां और शक्तियां। स्वयं हमारे भीतर भी कई तरह की शक्तियां है। ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, मन:शक्ति और क्रियाशक्ति आदि। अनंत है शक्तियां। वेद में इसे चित्त शक्ति कहा गया है। जिससे ब्रह्मांड का जन्म होता है। यह शक्ति सभी के भीतर होती है।

शाक्त धर्म का उद्‍येश्य :

शक्ति का संचय करो। शक्ति की उपासना करो। शक्ति ही जीवन है। शक्ति ही धर्म है। शक्ति ही सत्य है। शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति ही हम सभी की आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। तभी तो नाथ और शाक्त सम्प्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं।

मेरी ब्लॉग सूची

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