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02 नवंबर 2012

करवा चौथ व्रत: परंपरा और स्वरूप



कार्तिक माह की कृष्ण चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाने वाला करकचतुर्थी यानी करवा चौथ का व्रत स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य की कामना और अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है। इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक यह करवा चौथ या करक चतुर्थी व्रत संबंधों में नई ताजगी एवं मिठास लाता है। करवा चौथ में सरगी का काफी महत्व है। सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दी जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है।

परंपरा के तौर पर यह व्रत पर्व वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है, परन्तु उत्तर-मध्य भारत में यह बहुत अधिक उत्साह व शौक से विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। हालांकि भारत में ही कई ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां इसे बिल्कुल नहीं मनाया जाता है, जैसे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में गढ़वाल, अल्मोड़ा आदि अंचलों समेत समूचा दक्षिण भारत इस व्रत से अनभिज्ञ और उदासीन है। हां, यह जरुर है कि इन क्षेत्रों में जेष्ठ में पड़ने वाले तीन दिन के वट सावित्री व्रत  की अनिवार्यता जरूर है, जिसमें सुहागन स्त्री के व्रत का वही उद्देश्य होता है, जो  करवा चौथ के व्रत का। भारतीय दर्शन की पौराणिक परंपरा के अनुसार यह पर्व उन स्त्री जातकों के लिए भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, जिनके वैवाहिक संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं या जिनके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो। यदि ऐसी स्त्रियां इस पर्व पर विधि-विधान से उपवास करके पूजा-अर्चना व कामना करती हैं तो पति-पत्नी के संबंधों में निश्चित रूप से मधुरता बढ़ेगी, आपसी सामंजस्य बढ़ेगा तथा उनके वैवाहिक जीवन से कष्ट दूर हो जाएंगे और खुशहाली आएगी। इस व्रत यह एक गहन पौराणिक मान्यता है।

इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही हो जाती है, जब सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्त्र इत्यादि देती हैं। यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है। सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मिठाई आदि को व्रती महिलाएं व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रातः काल में तारों की छांव में ग्रहण कर लेती हैं। तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है। इस दिन स्त्रियां साज-श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूजा के समय नए वस्त्र पहनती हैं।

दोपहर में सभी सुहागन स्त्रियां एक जगह एकत्रित होती हैं, शगुन के गीत आदि गाती हैं। इसके बाद शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासू मां के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं। रात के वक्त चांद निकलने के बाद अनेक पकवानों से करवा चौथ की पूजा की जाती है तथा चांद को अर्घ्य देकर उसकी पूजा करते हैं। चंद्र दर्शन के बाद छलनी से आर-पार पति का चेहरा देखकर पति के हाथों से पत्नी जल पीती है और अपने व्रत को पूर्ण करती है।

करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार करवा नाम की एक स्त्री थी। वह बहुत पतिव्रता थी। वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गांव में रहती थी। एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा होता है। तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है। वह उसके पति का पांव अपने मुंह में दबा लेता है और उसे न��ी में खींचकर ले जाने लगता है। तब उसका पति जोर-जोर से अपनी पत्नी को करवा-करवा कहके मदद के लिए पुकारने लगता है। पति की आवाज सुन कर करवा भागी-भागी वहां पहुंचती है। इसी दौरान वह अपने पति को फंसा देख मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध देती है। फिर वह यमराज से अपने पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है। करवा की करुण व्यथा देख कर यमराज उससे कहते हैं कि वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं। करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है और यमराज करवा से प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी, वह सौभाग्यवती होगी। तब से  करवा चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है।

धर्म ग्रंथों में महाभारत से संबंधित एक और पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पांडवपुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती हैं। वह भगवान श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं।

महाभारत काल में पांडवों के दुख के दिनों में श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करक चतुर्थी अर्थात करवा चौथ का व्रत रखें तो उन्हें इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। भगवान कृष्ण के कथनानुसार द्रौपदी विधि-विधान समेत करवा चौथ का व्रत रखती हैं, जिससे उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

व्रत मात्र रस्म अदायगी
आज के समय में हर छोटे-बड़े शहर से लेकर महानगरों में  करवा चौथ व्रत का आधुनिक स्वरूप बिल्कुल बदल गया है। इस व्रत पर भी बाजार कल्चर हावी हो गया है। सरगी के रूप में किस्म किस्म के महंगे रेडिमेड फूड और गिफ्ट पैक चल पड़े हैं, जो कि सास अपनी बहू को देती हैं। सुहागन की साज-सज्जा अब पार्लर आधारित हो गई है और पहनावा डिजाइनर ड्रेसों, साड़ियों, लहंगों और आधुनिक चाइनीज़ करवों तक जा पहुंचा है। यहां तक कि चांद देखने के बाद पति दर्शन की छलनी भी अब चांदी की हो गई है। रही बात मेकअप की तो उसके लिए अमीरी और दिखावे की होड़ ने सभी परंपरागत स्वरूपों पर पानी फेर दिया है। ऐसे में लगता है कि यह त्योहार मध्यवर्गीय सम्पन्नता का आडंम्बर मात्र रह गया है। लेकिन इसके विपरीत देहातों में आज भी इसका परंपरागत वजूद कायम है और वहां पर लगता है कि वास्तव में यह व्रत सुहागनों द्वारा की जाने वाली एक उपयुक्त साधना है, जिसे अधिकांश महिलाएं आज भी श्रद्धापूर्वक निभा रही हैं।

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