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17 नवंबर 2012

जब हनुमान जी ने किया था समुद्र लंघन


जामवंत के वचन सुनकर श्री हनुमान जी परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मानो समस्त ब्रह्मांड को कम्पायमान करते हुए सिंहनाद किया। वह वानरों को संबोधित कर कहने लगे ‘‘वानरो! मैं समुद्र को लांघ कर लंका को भस्म कर डालूंगा और रावण को उसके कुल सहित मार कर जानकी जी को ले आऊंगा। यदि कहो तो रावण के गले में रस्सी डालकर और लंका को त्रिकूट-पर्वत सहित उखाड़कर भगवान श्री राम के चरणों में डाल दूं।’’

हनुमान जी के इस प्रकार के वचन सुनकर जाम्बवान ने कहा, ‘‘ हे वीरों में श्रेष्ठ पवन पुत्र हनुमान! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभ लक्षणा जानकी जी को जीती- जागती देखकर ही वापस लौट आओ। हे राम भक्त! तुम्हारा कल्याण हो।’’ बड़े-बूढ़े वानर शिरोमणियों के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर हनुमान जी ने अपनी पूंछ को बारम्बार घुमाया और भगवान श्री राम के बल का स्मरण किया। हनुमान जी का रूप उस समय बड़ा ही उत्तम दिखाई पड़ रहा था। इसके बाद वह वानरों के बीच से उठ कर खड़े हो गए।

उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो आया। उस अवस्था में हनुमान जी ने बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम करके इस प्रकार कहा, ‘‘आकाश में विचरने वाले वायु देव का मैं पुत्र हूं। उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। उनका औरस पुत्र होने के कारण मेरे अंदर भी उन्हीं की शक्ति है। अपनी भुजाओं के वेग से मैं समुद्र को विक्षुब्ध कर सकता हूं। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेह कुमारी जानकी जी का दर्शन करूंगा। अत: अब तुम लोग आनंदपूर्वक सारी चिंता छोड़कर खुशियां मनाओ। पवन पुत्र हनुमान जी की बातें सुनकर वानर सेनापति जाम्बवान को बड़ी प्रसन्नता हुई और वानरों का शोक जाता रहा।

उन्होंने कहा, ‘‘हनुमान! ये सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं। तुमने अपने बंधुओं का सारा शोक नष्ट कर दिया। ऋषियों के प्रसाद, वृद्ध वानरों की अनुमति तथा भगवान श्री राम की कृपा से तुम इस महासागर को सहज ही पार कर जाओ। जब तक तुम लौट कर यहां आओगे, तब तक हम तुम्हारी प्रतीक्षा में एक पैर से खड़े रहेंगे, क्योंकि हम सभी वानरों के प्राण इस समय तुम्हारे ही अधीन हैं।’’ इसके बाद छलांग लगाने के लिए श्री हनुमान जी महेंद्र पर्वत के शिखर पर पहुंच गए।

उन्होंने मन ही मन छलांग लगाने की योजना बनाते हुए चित्त को एकाग्र कर श्री राम-स्मरण किया। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा को ऊंचा किया और बड़े ही वेग से शरीर को सिकोड़ कर महेंद्र पर्वत के शिखर से छलांग लगा दी। कपिवर हनुमान जी के चरणों से दब कर वह पर्वत कांप उठा और दो घड़ी तक लगातार डगमगाता रहा। आकाश मार्ग से हनुमान जी ने वानरों से कहा, ‘‘वानरो! यदि मैं जनक नंदिनी सीता जी को नहीं देखूंगा तो इसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊंगा। यदि मुझे स्वर्ग में भी मां सीता के दर्शन नहीं हुए तो राक्षस राज रावण को ही बांध लाऊंगा।’’

ऐसा कह कर हनुमान जी विघ्न बाधाओं का कोई विचार किए बिना बड़े ही वेग से दक्षिण दिशा में आगे बढ़े। हनुमान जी के वेग से टूट कर ऊपर उठे वृक्ष उनके पीछे एक मुहूर्त तक ऐसे चले जैसे राजा के पीछे उसके सैनिक चलते हैं।

महावीर हनुमान सुरसा के मुंह में

सुरसा के मुंह में

हनुमान जी को आकाश में बिना विश्राम लिए लगातार उड़ते देख कर समुद्र ने सोचा कि यह प्रभु श्री राम जी का कार्य पूरा करने के लिए जा रहे हैं। किसी प्रकार थोड़ी देर के लिए विश्राम दिलाकर इनकी थकान दूर करनी चाहिए। अत: समुद्र ने अपने जल के भीतर रहने वाले मैनाक पर्वत से कहा, ‘‘मैनाक! तुम थोड़ी देर के लिए ऊपर उठ कर अपनी चोटी पर हनुमान को बिठा कर उनकी थकान दूर करो।’’

समुद्र का आदेश पाकर मैनाक प्रसन्न होकर हनुमान जी को विश्राम देने के लिए तुरन्त उनके पास आ पहुंचा। उसने उनसे अपनी सुंदर चोटी पर विश्राम के लिए निवेदन किया। उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘मैनाक! तुम्हारा कहना ठीक है लेकिन भगवान श्री रामचंद्र जी का कार्य पूरा किए बिना मेरे लिए विश्राम करने का कोई प्रश्र ही नहीं उठता।’’ ऐसा कह कर उन्होंने मैनाक को हाथ से छूकर प्रणाम किया और आगे चल दिए।

हनुमान जी को लंका की ओर प्रस्थान करते देख कर देवताओं ने सोचा कि यह रावण जैसे बलवान राक्षस की नगरी में जा रहे हैं। अत: इनके बल-बुद्धि की विशेष परीक्षा कर लेना इस समय अत्यंत आवश्यक है। यह सोचकर उन्होंने नागों की माता सुरसा से कहा, ‘‘देवी सुरसा! तुम हनुमान के बल-बुद्धि की परीक्षा लो।’’ देवताओं की बात सुनकर सुरसा तुरन्त एक राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान जी के सामने जा पहुंची।

उसने उनका मार्ग रोकते हुए कहा, ‘‘वानरवीर! देवताओं ने आज मुझे तुमको अपना आहार बनाने के लिए भेजा है।’’ उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘माता! इस समय मैं प्रभु श्री रामचंद्र जी के कार्य से जा रहा हूं। उनका कार्य पूरा करके मुझे लौट आने दो। उसके बाद मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे मुंह में प्रविष्ट हो जाऊंगा। इस समय तुम मुझे मत रोको, यह तुमसे मेरी प्रार्थना है।’’इस प्रकार हनुमान जी ने सुरसा से बहुत प्रार्थना की लेकिन वह किसी प्रकार भी उन्हें जाने न दे रही थी।

अंत में हनुमान जी ने क्रुद्ध होकर कहा, ‘‘अच्छा तो लो तुम मुझे अपना आहार बनाओ।’’ उनके ऐसा कहते ही सुरसा अपना मुंह सोलह योजन तक फैलाकर उनकी ओर बढ़ी। हनुमान जी ने तुरन्त अपना आकार उससे दोगुना अर्थात 32 योजन तक बढ़ा लिया। इस प्रकार जैसे-जैसे वह अपने मुख का आकार बढ़ाती गई हनुमान जी अपने शरीर का आकार उसका दोगुना करते गए। अंत में उसने अपना मुंह फैलाकर 100 योजन तक चौड़ा कर लिया।

तब हनुमान जी तुरन्त अत्यंत छोटा रूप धारण करके उसके उस 100 योजन चौड़े मुंह में घुस कर तुरंत बाहर निकल आए। उन्होंने आकाश में खड़े होकर सुरसा से कहा, ‘‘माता! देवताओं ने तुम्हें जिस कार्य के लिए भेजा था वह पूरा हो गया है। अब मैं भगवान श्री रामचंद्र जी के कार्य के लिए अपनी यात्रा पुन: आगे बढ़ाता हूं।’’

सुरसा ने तब उनके सामने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर कहा, ‘‘महावीर हनुमान! देवताओं ने मुझे तुम्हारे बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए ही यहां भेजा था। तुम्हारे बल-बुद्धि की समानता करने वाला तीनों लोकों में कोई नहीं है। तुम शीघ्र ही भगवान श्रीरामचंद्र जी के सारे कार्य पूर्ण करोगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसा मेरा आशीर्वाद है।’’

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