आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

17 जनवरी 2013

चारधाम : हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ स्थल


पुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ

Rajesh Mishra, Kolkata

श्रद्धा के चार धाम पुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ, हिन्दू धर्म के प्राचीनतम धाम हैं। शंकराचार्य ने पूरे देश की यात्रा करने के बाद इन स्थानों को हिन्दू धर्म के चार धामों के रूप में मान्यता दी। ये चार धाम भगवान विष्णु के अवतार से जुडे हुए हैं। चार धाम की यात्रा बहुत लम्बी है और हर किसी के लिये सम्भव भी नहीं। इसीलिये कई बार लोग हिमालय की सुरम्य वादियों में स्थित गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के रूप में छोटा चार धाम की यात्रा भी करते हैं। इसके बावजूद हर व्यक्ति अपने जीवन में एक बार चार धाम की यात्रा जरूर करना चाहता है। ऐसी मान्यता है कि चारधाम की यात्रा करने वाले व्यक्ति को न सिर्फ स्वर्ग की प्राप्ति होती है, वरन उसका अगला जन्म भी सफल हो जाता है। *** संकलन : राजेश मिश्रा***


हम सब बचपन से ही अक्सर अपने बड़ों से चारधाम यात्रा के बारे में सुनते हैं, कि चारधाम यात्रा का बहुत महत्व होता है, चारधाम करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं। इस स्थान के संबंध में यह भी कहा जाता है कि यह वही स्थल है जहां पृथ्वी और स्वर्ग एकाकार होते हैं। तो आइए आज हम भी थोड़ा चारधाम के बारे मे जानें।
चारधाम मे भारत के चार दिशाओं के महत्वपूर्ण मंदिर आते हैं। ये मंदिर हैं- जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ। इन मंदिरों की स्थापना 8वीं सदी में आदिशंकराचार्य ने की थी। इन चारों मंदिरों की अपनी अलग महत्ता है। हालांकि अधिकांशत: श्रद्धालु लोगों द्वारा कही बातों के अनुसार गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ को ही चारधाम के रूप में मानकर चलते हैं लेकिन यह एक अक्षरश: सत्य है कि 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा जो चारोंधाम की स्थापना की गई थी उसमें जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम्‌, द्वारका और बद्रीनाथ है। यह चारों धाम हिंदू धर्म में अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिनके महत्व की चर्चा वेदों व पुराणों तक में मिलती है।
बाद मे इस यात्रा को हिमालय की चार धाम यात्रा के नाम से जाना जाने लगा है। तीर्थयात्रियों के लिए यह एक प्रमुख तीर्थस्थल बन गया है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा पर्यटकों, तीर्थयात्रियों की सालाना तादाद से लगाया जा सकता है।

जगन्नाथ पुरी 

Sri Jagannathji Mandir, Puri
पुरी का श्री जगन्नाथ मन्दिर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत का स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथ पुरी या पुरी कहलाती है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मन्दिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। मन्दिर उडीसा के पुरी शहर में है। उडिया स्थापत्य कला और शिल्प का आश्चर्यजनक प्रयोग इस मन्दिर में हुआ है। यह देश के भव्यतम मन्दिरों में से एक है। मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तम्भ है। मन्दिर के भीतर आन्तरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां हैं। इसके अलावा मन्दिर के शिखर पर विष्णु का श्रीचक्र है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु का है। 
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, इस मन्दिर के मुख्य देवी देवता हैं। इनकी मूर्तियां एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। पुरी का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है रथ यात्रा। यह आषाढ शुक्ल की द्वितीया को आयोजित होता है। उत्सव के दौरान तीनों मूर्तियों को भव्य तरीके से सजाकर विशाल रथों में यात्रा पर निकालते हैं। जगन्नाथ मन्दिर की रसोई भी काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह भारत की सबसे बडी रसोई है। इस रसोई में भगवान को चढाया जाने वाला महाप्रसाद तैयार किया जाता है। 
Sri Rameshwaram

रामेश्वरम

रामेश्वरम तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यहां स्थापित शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण पूर्व में रामेश्वरम हिंद महासागर और बंगाल की खाडी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुन्दर द्वीप है। यहां भगवान राम ने लंका पर चढाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिस पर चढकर वानर सेना लंका पहुंची थी। आज भी सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देने की बात कही जाती है। यहां के मन्दिर का गलियारा विश्व का सबसे लम्बा गलियारा है। मन्दिर में विशालाक्षी जी के गर्भगृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताया गया है। रामेश्वरम का मन्दिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुन्दर नमूना है। इसका प्रवेश द्वार चालीस फीट ऊंचा है। मन्दिर के अन्दर सैकडों विशाल खम्भे हैं, जो देखने में एक जैसे लगते हैं। हर खम्भे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है। खम्भों पर की गई कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते हैं। 
रामनाथ जी के मन्दिर के भीतरी भाग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहा जाता है कि मन्दिर निर्माण के लिये पत्थर लंका से आया था। रामनाथपुरम के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा है। ऐसी मान्यता है कि यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिये रामनाथपुरम जाते हैं। रामेश्वरम शहर से करीब डेढ मील उत्तर-पूर्व में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी सी पहाडी है। हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिये छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढाई करने के लिये यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुन्दर मन्दिर बना हुआ है, जहां श्रीराम के चरण-चिह्नों की पूजा की जाती है। इसे पादुका मन्दिर कहते हैं। रामेश्वरम में रामनाथजी के मन्दिर के पूर्वी द्वार के सामने सीताकुण्ड है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिये आग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्निकुण्ड से जल उमड आया। इसी स्थान को सीताकुण्ड कहते हैं। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है। यहां पर बिना किसी खतरे के स्नान किया जा सकता है। यहीं हनुमान कुण्ड में तैरते हुए पत्थर भी दिखाई देते हैं। जा सकता है।
Sri Dwarkanathji

द्वारका

द्वारका धाम समुद्र के किनारे स्थित है। इसे हजारों वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने बसाया था। यहीं बैठकर उन्होंने पाण्डवों को सहारा दिया और धर्म की जीत कराई। शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। चारों धामों में से एक द्वारका की सुन्दरता देखते बनती है। समुद्र की उठती लहरें श्रद्धालुओं का मन मोह लेती हैं। द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे गोमती तालाब कहते हैं। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते हैं। गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट हैं। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। आस्था की इस बडी नगरी में पहुंचे श्रद्धालु इस निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद ही पूजा-अर्चना करने के लिये आगे बढते हैं। लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिण्ड-दान करने के लिये भी आते हैं। 
Sri Badrinathji

बद्रीनाथ

हिमालय के शिखर पर स्थित बद्रीनाथ मन्दिर हिन्दुओं की आस्था का बहुत बडा केन्द्र है। यह चार धामों में से एक है। बद्रीनाथ मन्दिर उत्तराखण्ड राज्य में अलकनन्दा नदी के किनारे है। यह मन्दिर भगवान विष्णु के रूप में बद्रीनाथ को समर्पित है। बद्रीनाथ मन्दिर को आदिकाल से स्थापित और सतयुग का पावन धाम माना जाता है। इसकी स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने की थी। सतयुग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन से यह पावन धाम मुक्तिप्रदा के नाम से विख्यात हुआ। त्रेता में इसे योगी सिद्धा नाम से जाना गया, द्वापर में विशाला नाम से जाना गया। कलियुग में यह धाम बद्रिकाश्रम (बद्रीनाथ) कहलाया। बद्रीनाथ मन्दिर की पुनर्स्थापना आदि शंकराचार्य ने करवाई थी। इस मन्दिर की महिमा का वर्णन स्कंद पुराण, केदारखण्ड, श्रीमदभागवत आदि में भी आता है। बद्रीनाथ के दर्शन से पूर्व केदारनाथ के दर्शनों का भी महात्म्य माना जाता है। 
बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट अप्रैल के अंत या मई के प्रथम पखवाडे में दर्शन के लिये खोल दिये जाते हैं। लगभग छह महीने तक पूजा अर्चना चलने के बाद नवम्बर के दूसरे सप्ताह में मन्दिर के कपाट बन्द कर दिये जाते हैं। यहां भगवान श्री की दिव्य मूर्ति हरित वर्ण की पाषाण शिला में निर्मित है, जिसकी ऊंचाई लगभग डेढ फीट है। भगवान श्री पदमासन में योग मुद्रा में विराजमान है। यहां भगवान श्री का दर्शन साधक को गम्भीरता प्रदान करता है। भगवान बद्रीनाथ की बायीं तरफ देवर्षि नारद की मूर्ति है। बद्रीनाथ के बारे में कहा जाता है कि यहां द्वापर में भगवान नारायण के सखा उद्धव पधारे थे। इस कारण शीतकाल में देवपूजा के समय उद्धव जी की पूजा होती है। 

13 जनवरी 2013

कुंभ 2013 - 360 साल बाद अमृत योग


कुंभ पर्व को फलदायी बनाने के लिए ग्रहों ने भी मैत्री कर ली है। ग्रह मंडल की सत्ता में 14 जनवरी से परिवर्तन होने जा रहा है। नई सत्ता पूरे एक माह यानि 13 फरवरी तक राज करेगी। ऐसी स्थिति 360 वर्ष बाद बनने जा रही है। शुक्र और बृहस्पति के गुरुओं ने भी एक दूसरे के घर में डेरा डाल दिया है। इसे भी काफी शुभकारी बताया जा रहा है। शनि भी उच्चराशि में बैठा है। ऐसे ही समय सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहा है। ज्योर्तिविद् इसे अमृत योग बता रहे हैं।

कुंभ के पहले स्नान मकर संक्रांति से ही ग्रहों की उच्च स्थिति ने इस पर्व को अमृत योग में बदल दिया है। मकर संक्रांति सोमवार 14 जनवरी को दोपहर 12.21 बजे से लग रही है। सोमवार को संक्रांति की शुरुआत काफी अच्छी मानी जाती है। इसे ध्वांछी योग कहा जाता है। यह योग पूरे एक माह तक फलदायी रहता है। ज्योतिष, कर्मकांड एवं अध्यात्म शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ.गिरिजा शंकर शास्त्री ने बताया कि इस बार कुंभ पर्व चार ग्रहों सूर्य, चंद्र, गुरु एवं शनि के प्रभाव में हो रहा है। शनि तुला राशि में बैठकर उच्च स्थिति बना रहा है।

साथ ही दैत्यों और देवताओं के गुरुओं शुक्र एवं बृहस्पति ने अपने घरों में परिवर्तन कर लिया है। ऐसी स्थिति 360 वर्ष बाद बन रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2001 कुंभ पर्व से अधिक फलदायी स्थिति इस बार बनी है। उस कुंभ में तीन ग्रहों की दृष्टि थी। उस समय शनि उच्च का नहीं था। इस बार चार ग्रह एक साथ बैठ गए हैं। बृहस्पति एवं शुक्त्र दोनों ही तेजस्वी, ज्ञान और अध्यात्म के ग्रह माने जाते हैं। शनि के भी शुक्र के घर में बैठ जाने से इसका प्रभाव बढ़ गया है। इसी समय सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। डॉ.शास्त्री ने कहा कि 14 जनवरी को सूर्य उत्तरायण हो रहा है।

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    8 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook