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19 फ़रवरी 2013

दुःख दूर करने व सुखी बनाने वाले ये वास्तु नियम

घर निर्माण के समय या निर्माण हो गया हो तब भी इन वास्तु बातों का ध्यान रखकर सुधार करा लें तो पूरा परिवार स्वस्थ रहेगा व सुखमय जीवन व्यतीत करेगा... राजेश मिश्रा 



इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थयखुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता हैपरन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है.

वास्तुशास्त्र- अर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल देउसे पुत्र-पौत्रादिसुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो. यहाँ हम अपने पाठकों को जानकारी दे रहे हैं कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन न करने से पारिवारिक सदस्यों को किस तरह से नाना प्रकार के रोगों का सामना करना पड सकता है.
उत्तर दिशा में दोष-
उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरूष का ह्रदय स्थल माना जाता है. जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है.
यदि उत्तर दिशा ऊँची हो और उसमें चबूतरे बने होंतो घर में गुर्दे का रोगकान का रोग,रक्त संबंधी बीमारियाँथकावटआलसघुटने इत्यादि की बीमारियाँ बनी रहेंगीं.
यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत होतो परिवार की स्त्रियों को रूग्णता का शिकार होना पडता है.
बचाव के उपाय :-
यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जायेतो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय:स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा. रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पडेगा.
इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल में 'बुध यन्त्रस्थापित करें.
परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे.
भवन के प्रवेशद्वार पर संगीतमय घंटियाँ लगायें.
उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा(Parrot Green) रंग करवायें.

पश्चिम दिशा में दोष:-
पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है. यह स्थान कालपुरूष का पेटगुप्ताँग एवं प्रजनन अंग है. यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे होंतो परिवार में फेफडेमुखछाती और चमडी इत्यादि के रोगों का सामना करना पडता है. 
यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगातो पुरूष संतान की रोग बीमारी पर व्यर्थ धन का व्यय होता रहेगा. 
यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकरबाहर जाए तोपरिवार के पुरूष सदस्यों को लम्बी बीमारियों का शिकार होना पडेगा. 
यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर होतो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा. 
यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें आ जायेंतो गृहस्वामी के गुप्ताँग में अवश्य कोई बीमारी होगी. 
यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान होतो पारिवारिक सदस्यों को गर्मीपित्त और फोडे-फिन्सीमस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी.
बचाव के उपाय:-
ऎसी स्थिति में पश्चिमी दिवार पर 'वरूण यन्त्रस्थापित करें. परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करे. 
पश्चिम की दिवार को थोडा ऊँचा रखें और इस दिशा में ढाल न रखें. 
पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें.

पूर्व दिशा में दोष:-
यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा होतो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों,परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थकमजोर स्मरणशक्ति वालीपढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी.
यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर होतो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारीस्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.
घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कटगन्दगी एवं पत्थरमिट्टी इत्यादि के ढेर होंतो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है.
भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान होतो गृहस्वामी यकृतगलेगाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु कोप्राप्त हो जाता है.
यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची होतो संतान हानि का सामना करना पडता है.
अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाएतो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं.
बचाव के उपाय:-
पूर्व दिशा में पानीपानी की टंकीनलहैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.
पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य हैजो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार पर 'सूर्य यन्त्रस्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.
पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी.

दक्षिण दिशा में दोष:-
दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल हैजो कि कालपुरूष के बायें सीनेफेफडे और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है.

यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआँदरारकचराकूडादानकोई पुराना सामान इत्यादि हो,तो गृहस्वामी को ह्रदय रोगजोडों का दर्दखून की कमीपीलियाआँखों की बीमारी,कोलेस्ट्राल बढ जाना अथवा हाजमे की खराबीजन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पडता है. दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊँचा चबूतरा बनाया गया होतो परिवार की स्त्रियों को घबराहटबेचैनीब्लडप्रैशरमूर्च्छाजन्य रोगों  से पीडा का कष्ट भोगना पडता है. 
यदि दक्षिणी भाग नीचा होओर उत्तर से अधिक रिक्त स्थान होतो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगें. उन्हे उच्चरक्तचापपाचनक्रिया की गडबडीखून की कमीअचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पडेगा. दक्षिण पिशाच का निवास हैइसलिए इस तरफ थोडी जगह खाली छोडकर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए. 
यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाएतो ऎसा भवन दीर्घ व्याधियाँ एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है.
बचाव के उपाय:-
यदि दक्षिणी भाग ऊँचा होतो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगें. इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें.
घर के पूजनस्थल में 'श्री हनुमंतयन्त्रस्थापित करें. दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु का 'मंगलयन्त्र'  लगायें. 
प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूँड वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें.

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