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21 मार्च 2013

जगकल्याण का होली विशेषांक प्रकाशित

जगकल्याण का होली विशेषांक प्रकाशित हो गया है...
राजस्थान के खाटू श्यामजी, रानिसती दादीजी, सालासर बालाजी, गोविंददेवजी, गंगाराम, बाबा रामदेवजी सहित सभी दर्शनीय और पूजनीय स्थलों के साथ-साथ होली कब और कैसे मनाएं, होलिका दहन का समय का भी उल्लेख किया गया है.। वर्ष भर के पर्व त्यौहार, अमावस, पूर्णिमा के साथ-साथ वर्ष भर की एकादशियाँ, मनभावन चुटकुले, व्यंजन, दद्दू का होली दरबार, होली पर विशेष राशिफल, बच्चों के लिए कहानी-जानकारियां, महिलाओं के लिए विशेष आलेख, धुप में त्वच की देखभाल के साथ-साथ कोलकता एवं दुसरे राज्यों के सभा-संस्थाओं की ख़बरें, श्याम बाबा के भक्तों का मनभावन सन्देश और भी बहुत कुछ…. .. पढने के लिए संपर्क करें... राजेश मिश्रा- 9831057985

04 मार्च 2013

मैहर की माता मां शारदा देवी

Sharda Devi Temple Maihar
Maa Sharda Maihar : Rajesh Mishra







File:Sharada Temple Maihar.JPG

महा वीर आला-उदल को वरदान देने वाली मां शारदा देवी को पूरे देश में मैहर की माता के नाम से भक्तों के बीच में जाना जाता है। चित्रकूट से लगे सतना जनपद में स्थित मैहर कस्बे में लगभग 600 फुट की ऊंचाई वाले इस पर्वत पर विराजमान आदिशक्ति के दर्शनों के लिए भक्तों को मंदिर की 1001 सीढिय़ां चढऩी पड़ती थीं। अब रोपवे बनने से यह कठिनाई दूर हो गयी है।

इस तीर्थस्थल के सन्दर्भ में अनेक दन्तकथाएं प्रचलित है। कहते हैं आज से 200 साल पहले मैहर में महाराज दुर्जन सिंह जुदेव राज्य करते थे। उन्हीं कें राज्य का एक ग्वाला गाय चराने के लिए जंगल में आया करता था। इस घनघोर भयावह जंगल में दिन में भी रात जैसा अंधेरा छाया रहता था। तरह-तरह की डरावनी आवाजें आया करती थीं। एक दिन उसने देखा कि  उन्हीं गायों के साथ एक सुनहरी गाय कहां से आ गई और शाम होते ही वह गाय अचानक कहीं चली गई। दूसरे दिन जब वह इस पहाड़ी पर गायें लेकर आया  तो देखता है कि फिर वही गाय इन गायों के साथ मिलकर घास चर रही है। तब उसने निश्चय किया कि शाम को जब यह गाय वापस जाएगी, तब उसके पीछे-पीछे जाएगा।
गाय का पीछा करते हुए उसने देखा कि वह ऊपर पहाड़ी की चोटी में स्थित एक गुफा में चली गई और उसके अंदर जाते ही गुफा का द्वार बंद हो गया। वह  वहीं गुफा द्वार पर बैठ गया। उसे पता नहीं कि कितनी देर कें बाद गुफा का द्वार खुला। लेकिन उसे वहां एक बूढ़ी मां के दर्शन हुए। तब ग्वाले ने उस बूढ़ी महिला से कहा, ‘माई मैं आपकी गाय को चराता हूं, इसलिए मुझे पेट के वास्ते कुछ मिल जाए। मैं इसी इच्छा से आपके द्वार आया हूं।’ बूढ़ी माता अंदर गई और लकड़ी के सूप में जौ के दाने उस ग्वाले को दिए और कहा, ‘अब तू इस भयानक जंगल में अकेले न आया कर।’ वह बोला, ‘माता मेरा तो जंगल-जंगल गाय चराना ही काम है। लेकिन मां आप इस भयानक जंगल में अकेली रहती हैं? आपको डर नहीं लगता।’ तो बूढ़ी माता ने उस ग्वाले से हंसकर कहा- बेटा यह जंगल, ऊंचे पर्वत-पहाड़ ही मेरा घर हैं, में यही निवास करती हूं। इतना कह कर वह गायब हो गई। ग्वाले ने घर वापस आकर जब उस जौ के दाने वाली गठरी खोली, तो वह हैरान हो गया। जौ की जगह हीरे-मोती चमक रहे थे। उसने सोचा- मैं इसका क्या करूंगा। सुबह होते ही महाराजा  के दरबार में पेश करूंगा और उन्हें आप बीती कहानी सुनाऊंगा।
दूसरे दिन भरे दरबार में वह ग्वाला अपनी फरियाद लेकर पहुंचा और महाराजा के सामने पूरी आपबीती सुनाई। उस ग्वाले की कहानी सुन राजा ने दूसरे दिन वहां जाने का ऐलान कर, अपने महल में सोने चला गया। रात में राजा को स्वप्न में ग्वाले द्वारा बताई बूढ़ी माता के दर्शन हुए और आभास हुआ कि आदि शक्ति मां शारदा है। स्वप्न में माता ने राजा को वहां मूर्ति स्थापित करने की आज्ञा दी और कहा कि मेरे दर्शन मात्र से सभी की मनोकामनाएं पूरी होंगी। सुबह होते ही राजा ने माता के आदेशानुसार सारे कर्म पूरे करवा दिए। शीघ्र ही इस स्थान की महिमा चारों ओर फैल गई। माता के दर्शनों के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पर आने लगे और उनकी मनोवांछित मनोकामना पूरी होती गई। इसके  पश्चात माता के भक्तों ने मां शारदा को सुंदर भव्य तथा विशाल मंदिर बनवा दिया। इस समय मंदिर का पूरा कार्य शारदा समिति की जिम्मेदारी पर चल रहा है, जिसके अध्यक्ष सतना के जिलाधिकारी है।
मंदिर के इतिहास की बात करें  तो मां शारदा की प्रतिष्ठापित मूर्ति चरण के नीचे अंकित एक प्राचीन शिलालेख से मूर्ति की प्राचीन प्रामाणिकता की पुष्टि होती है। मैहर नगर के पश्चिम दिशा में चित्रकूट पर्वत में श्री आद्य शारदा देवी तथा उनके बायीं ओर प्रतिष्ठापित श्री नरसिंह भगवान की पाषाण मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा आज से लगभग 1994 वर्ष पूर्व विक्रमी संवत् 559 शक 424 चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, दिन मंगलवार, ईसवी सन् 502 में तोर मान हूण के शासन काल में श्री नुपुल देव द्वारा कराई गई थी।
शारदा प्रबंध समिति के बेटू महाराज बताते हैं, ‘जनवरी 1997 में शारदा मां के दरबार में इलाहाबाद के रहने वाले एक भक्त ने मां को भेड़ चढ़ाया था। उस वक्त बिल्ला की उम्र महज दस दिन की थी। उन्होंने बेजुबान पशु को उसी दिन से अपने पास रख लिया। वह कहीं भी रहे, आरती के समय मां के दरबार में पहुंच जाता। ग्राम मझियार के रमेश तिवारी कहते है, ‘बिल्ला उन्हें अपना दुश्मन मानता है, जो बकरा लेकर मंदिर आते है। यदि बिल्ला किसी को बकरा लेकर सीढिय़ों की ओर आता देख लेता है, तो उसका ऊपर जाना मुश्किल कर देता है।’
दूसरी ऐतिहासिक घटना के अनुसार, आल्हा- उदल नाम के दो भाई माता के परम भक्त थे। बारह साल तक कठोर साधना के उपरांत, माता शारदा ने दोनों को अमरत्व का वरदान दिया था। कहत है कि दोनों भाइयों ने भक्ति-भाव से अपनी जीभ शारदा को अर्पण कर दी थी, जिसे मां शारदा ने उसी क्षण वापस कर दिया था।



01 मार्च 2013

देवसर : राणी सती दादीजी का बलिदान स्थल


वैश्य समाज के अग्रवाल कुल की आराध्य सती नारायणी बाई (बहु प्रचलित नाम राणी सती) का मूल बलिदान (सती) स्थल ग्राम देवसर है न कि राजस्थान स्थित नगर झुन्झुनंू, जैसा कि बहुसंख्यक आराधक झुन्झुनंू स्थित भव्य एवं विशाल ‘राणी सती मंदिर’ को मानते हैं। देवसर ग्राम हरियाणा के जिला मुख्यालय भिवानी नगर से लोहारू मार्ग पर लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित है। ऐसी मान्यता एवं विश्वास है कि मार्ग शीर्ष नवमी मंगलवार संवत् 1352 तद्नुसार 6 दिसंबर सन् 1271 को नारायणी देवी ने यहीं सतीत्व ग्रहण किया था।
नारायणी देवी (प्रचलित नाम राणी सती) के पिता गुरु सामल माता गंगा देवी राजस्थान के महम नगर के ठोकला उपनगर के निवासी थे जो गोयल गौत्रीय अग्रवाल थे। इसी युगल दम्पति के यहां कन्या का जन्म हुआ जिसका नामकरण ‘नारायणी देवी’ किया गया। जन्म के समय बालिका नारायणी का चेहरा सुन्दर और तेजस्वी था। कहते हैं कि एक महात्मा ने कन्या को देखकर आशीर्वाद दिया की भावी जीवन में यह कन्या अमर सुहागिन होगी और लोग इसका श्रद्धापूर्वक स्मरण करेंगे। उस वक्त आशीर्वचन देकर महात्मा अंतध्र्यान हो गये।

बालिका नारायणी जब तेरह वर्ष की हो गयी तब माता-पिता को चिंता होने लगी। उन्होंने पुरोहित (ब्राह्मïण) को हरियाणा के हिसार में कन्या के लिये वर देखने को भेजा। ब्राह्मïण देवता विवाह का प्रस्ताव लेकर युवक तनधन दास के पिता सेठ जालान दास और माता यमुना देवी के पास पहुंचे जो नवाब हिसार के दीवान थे और अपनी न्यायप्रियता के लिये प्रसिद्ध थे। ऐसा माना जाता है कि विवाह के बाद विदाई के समय अपशकुन होने लगे थे। विवाह के अवसर पर दहेज में उपहार स्वरूप तनधन दास को अन्य सामानों के साथ श्याम वर्ण की एक सुन्दर घोड़ी भी मिली थी। नारायणी बाई के पति तनधन दास अपनी श्याम वर्ण घोड़ी पर सैर करने प्राय: भिवानी नगर तक व आगे देवसर ग्राम तक आया करते थे। जनमानस में व्याप्त विश्वास के अनुसार एक दिन नवाब के शहजादे ने तनधन दास की श्याम वर्ण घोड़ी देख ली और उसे वह काफी पसन्द आयी। शहजादे ने घोड़ी के स्वामी तनधन दास को कहा कि आपकी यह घोड़ी काफी सुन्दर है मुझे दे दो। तनधन दास ने घोड़ी का स्वामित्व छोड़ घोड़ी देने से स्पष्ट मना कर दिया। तनधन दास के अस्वीकारात्मक उत्तर से रुष्ट होकर प्रतिरोध स्वरूप नवाब के सैनिकों ने एक दिन घात लगा कर तनधन दास पर आक्रमण कर दिया। इस आकस्मिक आक्रमण से तनधन दास गंभीर रूप से घायल होकर दिवंगत हो गये। जब नारायणी देवी ने अपने दिवंगत पति का शव देखा तो वे स्वयं अपने पति का अस्त्र (भाला) तथा तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर रणचण्डी का रूप धारण कर प्रतिशोध लेने के लिये नवाब के सैनिकों से युद्ध किया। नारायणी देवी के तेज बल से सैनिक भागने लगे। तत्पश्चात नारायणी देवी ने अपने पति के शव को लाने के लिये अपने सेवक राणा से कहा और उन्होंने देवसर की पहाड़ी पर सती होने की इच्छा व्यक्त की।


जनश्रुति के अनुसार नारायणी देवी का जन्म, विवाह तथा सती होना तीनों ही दिन मंगलवार था। कहते हैं कि चिता में से दिवंगत (सती हुई) नारायणी देवी की मधुर वाणी में यह संदेश आया कि ‘मेरी चिता के तीन दिन में ठण्डी हो जाने के उपरांत भस्म को एकत्रित कर मेरी चुनरी में बांध कर रख देना। घोड़ी चलते-चलते जहां भी रुक जाये उसी स्थान पर मैं अपने पति के साथ निवास करती हुई जन कल्याण कार्य करती रहूंगी।’ उक्त कथन दिवंगत राणी सती के प्रति उनके असीम श्रद्धालु जनों के आत्म-विश्वास का प्रतीक है। घोड़ी राणी सती की चुनरी में एकत्रित भस्म को लेकर झुन्झुनूं नगर के मार्ग पर चलते-चलते एक स्थान पर रुक गयी और वहीं सेवक राणा ने सती नारायणी का स्मरण कर उसी स्थान पर भस्म को स्थापित कर उसका पूजन किया। वर्तमान में उसी स्थान पर उनकी स्मृति स्वरूप एक भव्य विशाल मंदिर का निर्माण किया गया जहां काफी संख्या में देश के विभिन्न स्थानों से उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले नर-नारी दर्शनार्थ तथा अपनी इच्छा पूर्ति की अभिलाषा लेकर उनका आशीर्वाद लेने आते हैं। प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को रानी सती का पूजन तथा आराधना दिवस मनाते हैं। झुन्झुनूं स्थित भव्य राणी सती मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार भी एक भिवानी निवासी (वर्तमान में सिंगापुर हांगकांग प्रवासी) परिवार द्वारा निर्मित है।
नारायणी देवी (राणी सती) के मूल सतीत्व स्थल ग्राम देवसर की पहाड़ी पर उनके एक अनन्य भक्त मुंबई निवासी परिवार ने उनकी स्मृति में एक सुन्दर मंदिर का निर्माण दो दशक पूर्व करा दिया। साथ में एक बहु मंजिली धर्मशाला तथा सामने एक आवासीय भवन भी बन चुका है। राणी सती मंदिर के साथ पहाड़ी पर देवी दुर्गा का एक अति भव्य नयनाभिराम मंदिर बना हुआ है जहां प्रतिवर्ष दो बार नवरात्रों का आयोजन होता है। नीचे भूमि पर आगत भक्तजन तथा दर्शनार्थियों के निवास हेतु अति सुन्दर सभी सुविधाओं से युक्त धर्मशालाएं बनी हुई हैं।

रानिसती दादीजी, देवसर : संकलन - राजेश मिश्रा

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