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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

24 जुलाई 2013

शिव अभिषेक में बिल्व पत्र का महत्व



पुराणों में श्रावण मास में भगवान आशुतोष की अर्चना को शुभ फलदायी बताया गया है। शिव अभिषेक में नैवेद्य के रूप में बिल्व पत्रों का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि शिवप्रिय बिल्व साक्षात् महादेव स्वरूप है तथा बिल्व पत्र में तीनों लोक के तीर्थ स्थापित हैं। इस प्रकार बिल्व के दर्शन मात्र से ही उपासक को समस्त तीर्थों के दर्शन का फल प्राप्त हो जाता है तथा शिव अभिषेक में प्रयोग करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है। बिल्व की महत्ता का वर्णन करते हुए शिवपुराण में वर्णित है कि बिल्व की जड़ों के समीप शिवलिंग स्थापित करने से उपासक के महापातक भी कट जाते हैं तथा दानादि कर्म से निर्धनता दूर होती है व नियमित रूप से बिल्व पत्रों से भगवान शिव का अभिषेक करने वाला उपासक अंततोगत्वा शिवलोक को प्राप्त होकर शिवमय हो जाता है। लिंगपुराण में वर्णित है कि यदि उपासक को शिव अभिषेक हेतु नूतन बिल्व पत्र की प्राप्ति न हो तो वह अर्पित किये हुए बिल्व पत्र को धोकर शिव अर्चना में प्रयोग करे। इसी में उपासक का कल्याण हो जाता है। इस प्रकार शिवपूजन में बिल्व पत्र की महत्ता स्वयं सिद्ध हो जाती है।
शास्त्रों में बिल्व को अनेक नामों से परिभाषित किया गया है जिनमें शांडिल्य, शिव, शिवप्रिय, पापहन, जय, विजय, विष्णु, त्रिनपत, श्राद्धदेवक आदि मुख्य हैं। तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए उपासक के लिए बिल्व वृक्ष की जड़ के पास दीपक प्रज्वलित करना शुभ बताया गया है। ऐसा माना गया है कि जो व्यक्ति बिल्व वृक्ष का रोपण करता है, उसके कुल में कई पीढिय़ों तक लक्ष्मी निवास करती है। शिव अभिषेक हेतु तीन, पांच, अथवा सात के समूह वाले बिल्व पत्र का प्रयोग कल्याणकारी है। इनमें पांच अथवा सात पत्रों के समूह की विशिष्टता है। उपासक को निम्र मंत्र के साथ बिल्व पत्र तोड़कर भगवान शिव को अर्पित करने चाहिए-

‘अमृतोद्धव श्रीवृक्ष महादेवप्रिय: सदा।
गृहमि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।’

उपासक को चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति के अलावा सोमवार के दिवस बिल्व पत्रों को नहीं तोडऩा चाहिए। बिल्व न केवल धार्मिक बल्कि औषधीय गुणों से संपन्न होता है। हमारे शास्त्रों में सृष्टि के प्रारंभ से ही पर्यावरण को विशेष महत्व प्रदान किया गया है तथा पीपल, नीम, अशोक, आम, शमी, रुद्राक्ष आदि के पूजन के साथ ही मामूली-सी दुर्वा घास की तुलना भी भगवान राम के वर्ण से करना व इसे मंगलकारी पदार्थों की श्रेणी में रखना यही सिद्ध करता है कि वे लोग न केवल पर्यावरण के प्रति जागरूक थे बल्कि अपने धार्मिक व नैतिक कर्तव्यों को भली -भांति समझते थे। उपासक हेतु शिव अभिषेक में बिल्व पत्र अर्पित करते समय निम्र मंत्र का उच्चारण मंगलमयी व मोक्षकारी है—

‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्र च त्रिधायुतम्।त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।

22 जुलाई 2013

कोलकाता सभा-संस्था समाचार

ऋषि नित्यप्रज्ञा ने किये घुसुड़ीधाम में बाबा श्याम के दर्शन



गुरु पूर्णिमा महोत्सव के लिये बंग्लौर से कोलकाता प्रवास पर आये दि आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर जी के परम कृपा पात्र ऋषि नित्यप्रज्ञा जी जन-जन की आस्था के पावन धाम श्री श्याम मंदिर घुसुड़ीधाम में आज पधारे और बाबा श्याम के दर्शन  किये । मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही पहले से प्रतीक्षारत्‌ भक्तों ने पुष्प वर्षा कर उनकी अगुवानी की । तत्पश्चात्‌ मंदिर परिसर में मंदिर के प्रबंध न्यासी श्री बिनोद टिबड़ेवाल और ट्रस्टी श्री किशन कासुका ने दुपट्टा ओढ़ाकर व स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका सम्मान किया । उन्होंने श्री श्याम मंदिर घुसुड़ीधाम को सकारात्मक उर्जा से भरपूर केन्द्र बताते हुए कहा कि हर धार्मिक केन्द्र आध्यात्मिक केन्द्र भी बने जिससे लोगों का समुचित कल्याण हो सके ।

उन्होंने कहा कि 99 प्रतिशत रोग मन से उत्पन्न होने वाले हैं और इसकी जड़ें मन में समाहित रहती हैं । हम जैसा सोचते हैं वैसा हमारे साथ होता जाता है । अतः हमें अपनी सोच को सदैव सकारात्मक रखना होगा । इस संदर्भ में उन्होंने श्रद्धेय श्री श्री रविशंकर जी द्वारा प्रचलित श्वसन प्रक्रिया "सुदर्शन क्रिया' को सर्वोत्तम बताते हुए उपस्थित लोगों का आह्‌वान किया कि वे इस विधि को जानें और इसका नियमित उपयोग करें क्योंकि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो मन को सदैव प्रसन्न रखती है । जिस तरह शरीर की स्वच्छता के लिये रोज नहाना जरुरी है उसी तरह मन की शुद्धि के लिये यह प्रक्रिया जरुरी है । उन्होंने इस प्रक्रिया को असाध्य से असाध्य रोगों में भी अत्यंत कारगर बताया ।
उल्लेखनीय है कि ऋषि नित्यप्रज्ञा जी आज शेक्सपीयर सरणी स्थित कला मंदिर प्रेक्षागृह में सायं 6.30 बजे से दि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव के मुख्य समारोह में उपस्थित थीं जहां गुरु पूजा के पश्चात्‌ सुमेरु संध्या का कार्यक्रम हुआ।

जनसेवा भक्त मण्डल के शीतल प्याऊ का उद्‌घाटन

उत्तर हावड़ा की 37 वर्ष प्राचीन धर्मनिष्ठ सामाजिक संस्था जनसेवा भक्त मण्डल, बांधाघाट की ओर से श्री मुरारीलाल चौमाल परिवार द्वारा प्रदत्त शीतल प्याऊ का उद्‌घाटन बाबूडांगा (श्री रामढैंग रोड) में स्थित "स्वामी विवेकान्द सब पेयाचीर आसर' संस्था के परिसर में विशिष्ट सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री हेमन्त बर्मन के कर-कमलों से सम्पन्न हुआ । मण्डल के सचिव श्री किशन लाल चौमाल ने बताया कि अंचल के लोगों को ठंडा पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से यह सेवा शुरू की गई है । शिघ्र ही कुछ अन्य स्थानों पर भी यह सेवा शुरू करने की योजना है । इस अवसर पर सर्वश्री बिशन शर्मा, बिनोद भुवालका, विष्णु पौद्दार, प्रदीप केडिया, पवन शर्मा, विकाश शर्मा, गोविन्द टिबड़ेवाल, बिनोद जोशी, विशाल छकड़ा विशेष रूप से सक्रिय रहे ।

कोलकाता सभा-संस्था समाचार

महावीर सेवा सदन में नयी एम्बुलेन्स का लोकार्पण

महावीर सेवा सदन द्वारा विकलांग सेवा का निरंतर विस्तार हो रहा है। पिछले 27 वर्षों में सदन द्वारा एक लाख चालीस हजार से ज्यादा लोगों को कृत्रिम अंग व अन्य सहायता प्रदान करके उन्हें जीवन के सामान्य दौर में वापस लाने का महद्‌कार्य हुआ है और इन सभी सेवाकार्यों में समाजसेवियों का सहयोग सदैव प्राप्त होता रहा है। आज इसी श़ृंखला को आगे बढ़ाते हुए समाजसेवी गिरधारीलाल सुल्तानिया द्वारा प्रदत्त एक एम्बुलेंस का लोकार्पण हुआ है। इससे हम जरूरतमंद लोगों को और ज्यादा सुविधा दे पायेंगे। यह बात सेवा सदन के कोषाध्यक्ष विजय सिंह चौरड़िया ने कल महावीर सेवा सदन में आयोजित एम्बुलेंस लोकार्पण समारोह के अवसर पर अपने स्वागत  वक्तव्य में कही। बुगेन्सू हरी लक्ष्मी फाउंडेशन के सौजन्य से समाजसेवी गिरधारीलाल सुल्तानिया द्वारा प्रदत्त एम्बुलेन्स के लोकार्पण के अवसर पर सावित्री देवी झुनझुनवाला, कमल काजडीया, सुशील अग्रवाल, किशन अग्रवाल एवं सेवा सदन के चक्षु विभाग के डॉ. हरेश शाह उपस्थित थे।

सत्‌ संगम में गुरु पूर्णिमा उत्सव

आध्यात्मिक ज्ञान संस्थान सत्‌ संगम द्वारा 205, रविन्द्र सरणी अपर इंडिया ए. ट्रस्ट सभागार में गुरू पूर्णिमा उत्सव आं. जयदयाल (त्यागी) के सान्निध्य में मनाया गया। इस अवसर पर श्री सत्यनारायण भगवान की श्रवण कथा, संगीत, व्यास पूजा, आदि विविध कार्यक्रम सम्पन्न हुए। सत्‌ संगम के प्रधान सचिव ईश्वर प्रसाद कानोड़िया ने उत्तराखंड पीड़ितों की सहायता करने वालों का अभिनन्दन किया, समस्त योगदानकर्त्ताओं के प्रति आभार प्रकट किया और कहा कि गुरुओं, कथाकारों, कीर्तनकारों सभी को अपनी आय का एक भाग केदारनाथ पीड़ितों की सहायतार्थ करनी चाहिए। संगीत कानोड़िया, ममता शर्मा का विशेष योगदान रहा।

गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष में भंडारे का आयोजन

परमार्थ के चेयरमैन प्रकाश जाजोदिया एवं संस्थापक सचिव नागेश सिंह के तत्वावधान में शोभाराम बैसाख स्ट्रीट एवं कलाकार स्ट्रीट (भंडारा चौक) के संगम स्थल पर पूजा-अर्चना के बाद भंडारा का वितरण किया गया। उपस्थित थे बड़ाबाजार जिला कांग्रेस के अध्यक्ष संतोष पाठक (पार्षद), समाजसेवी संजय मजेजी, भोला यादव, विक्रम कठोर, रूपनारायण देरासरी, रामबाबू शुक्ला, ददन सिंह, अवधेश पाण्डेय इत्यादि।

मैथिली लोकगीत पर आधारित गीत-गाईन प्रतियोगिता

मैथिली लोकगीतों को बचाने के लिए युवतियों को आगे आना होगा। मैथिली लोकगीतों से भरे पूरे मिथिला से लोक गीतों के विलुप्त होने से मिथिला ही नहीं सम्पूर्ण भारत के लोक संस्कति पर ग्रहण लग जायेगा। उक्त बातें मिथिला विकास परिषद के कोर कमिटी की बैठक में परिषद के अध्यक्ष अशोक झा ने कहा। कोर कमिटी में निर्णय लिया गया कि हर वर्ष की भांति 11 अगस्त को परिषद के महिला शाखा मिथिला महिला मंच के द्वारा महाजाति सदन के संयुक्त भवन में मैथिली लोकगीतों पर आधारित मैथिली गीत गाईन प्रतियोगिता का आयोजन किया जायेगा। उक्त कार्यक्रम का संयोजक मैथिली रंगमंच की द्वय कलाकार श्रीमती रूपा चौधरी एवं श्रीमती संगीता झा को बनाया गया है।

21 जुलाई की घटना मानव अधिकार का हनन : सीपीडीआर

1993 के 21 जुलाई की पुलिस की क्रूरता के कारण 13 लोगों की अपनी जान गंवानी पड़ी थी। मृतकों की याद में मानव अधिकार संगठन सीपीडीआर बड़ाबाजार जिला कमिटी के तत्वावधान में बालकृष्ण विट्ठलनाथ बालिका विद्यालय के हॉल में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस मौके पर बड़ाबाजार जिला के अध्यक्ष मनोज सिंह पराशर ने मृतकों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि 21 जुलाई केदिन मृतकों की छाती पर चली गोली का दर्द हम आज भी महसूस करते हैं। उन्होंने कहा कि इसी दिन घटी यह घटना मानव अधिकार का उल्लंघन है। इस प्रकार की अन्य घटनाओं में भी कईयों की मौत हुई है। जिला के महासचिव पं. लाल बहादुर पाठक ने कहा कि मानव हत्या महापाप है। राजनीति में मानव हत्या उचित नहीं है इसे शीघ्र बन्द होना चाहिए। बड़ाबाजार जिला के उत्तम सोनकर, आनन्द तिवारी, प्रमोद अग्रवाल, ढुलीचंद ढल्ला, सुशील दूबे, आर.आर. पाण्डेय सहित सैकड़ों मानव अधिकार कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।

पानी टंकी शिव मंदिर का हीरक जयंती समारोह

सलकिया के विजय मुखर्जी रोड स्थित पानी टंकी शिव मंदिर का हीरक जयंती समारोह आज संपन्न हुआ। लगभग 75 वर्ष पहले हिन्दी भाषी लोगों ने मंदिर की स्थापना की थी। लेकिन इसकी अवस्था काफी जीर्ण हो गई थी। स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का आधुनिकीकरण किया गया और सभी आधुनिक सुविधायें उपलब्ध कराई गई है। विधायक अशोक घोष ने इस काम में पूरा सहयोग दिया और उन्होंने भव्य मंदिर निर्माण में सहयोग के लिए सभी को धन्यवाद दिया। इस मौके पर विजय गुप्ता, सुग्रीव सिंह, अरजित भट्टगल, सुरेन्द्र सिंह ने हीरक जयंती समारोह में भाग लिया। मंदिर के व्यवस्थापक मनु सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मंदिर के आसपास के इलाके में लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया था, उन सभी को बेदखल कर भव्य मंदिर का निर्माण किया है। इसमें सहयोग करने के लिए उन्होंने सभी को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन आनंद सिंह (जुगनु) ने किया।

18 जुलाई 2013

Sai Baba Ka Naya Mandir bana Sodpur men

सोदपुर में साईं मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा-भव्य उद्‌घाटन

साईं मंदिर सोदपुर में उद्घाटन के मौके पर जगकल्याण के संपादक संजय अगरवाल, साईं बाबा
परम भक्त
कुंदन सिकरिया के साथ जगकल्याण के समाचार संपादक राजेश मिश्रा

कोलकाता। पूर्वोत्तर भारत में निर्मित भव्य श्री साईं मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा एवं उद्‌घाटन समारोह 10 जुलाई को सोदपुर में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम संयोजक श्री कुंदन सिकरिया एवं संजय मेहरा ने बताया कि कार्यक्रम में प्रात: कांकड़ आरती, दोपहर 12 बजे से श्री साईं सचरित्र पाठ, नृत्य नाटिका सहित भजन गायक अनिल लाटा के नेतृत्व में किया गया। तत्पण्चरत्‌ भजनों का दौर शुरू हुआ जिसमें भारतवर्ष के प्रसिद्ध गायक कलाकारों ने देर रात तक सुमधुर भजनों की रसवर्षा की। कार्यक्रम का संचालन सच्चिदानंद पारीक ने किया। राजा बिस्कुट कंपनी के प्रमुख श्री लोकनाथ गुप्ता ने इस मौके पर बताया कि राजा बिस्कुट फैक्टरी के बगल में श्री साईं मंदिर बन जाने से उन साईं भक्तों को सुविधा होगी, जो कि शिरडी नहीं पहुंच पाते हैं। हमारा प्रयास भक्तों को यहीं पर बाबा का दर्शन-पूजन कराना है। कार्यक्रम में स्थानीय विधायक निर्मल कुमार घोष तथा अन्य गणमान्य अतिथिगण एवं भारी संख्या में बाबा के भक्त उपस्थित थे। 

13 जुलाई 2013

ध्यान : शुरुआत के लिये 10 सरल सुझाव

आँखे बंद करके शांत बैठना कठिन लगता है ? इसके लिये चिंता न करें आप ऐसें अकेले नहीं है | ये कुछ सरल उपाय हैं, उस व्यक्ति के लिये जो ध्यान करना शुरू करना चाहता है | इस अभ्यास में जैसे आप नियमित होंगे, आप निश्चित ही इसके और गहन में जायेंगे | इसकी शुरुआत इन 10 सरल सुझावों के साथ करें |

सुविधाजनक समय को चुने : ध्यान वास्तव में विश्राम का समय है, इसलिये इसे अपनी सुविधा के अनुसार करें | ऐसा समय चुने जिसमे आप को कोई परेशान न कर सके और आप विश्राम और आनंद लेने के लिये स्वतंत्र हो | सूर्योदय और सूर्यास्त का समय जब प्रकृति दिन और रात में परिवर्तित होती है, यह समय इसका अभ्यास करने लिये सबसे आदर्श है |

शांत स्थान चुने : सुविधाजनक समय के जैसे सुविधाजनक स्थान को चुने जहां आप को कोई परेशान न कर सके | शांत और शान्तिप्पूर्ण वातावरण ध्यान के अनुभव को और अधिक आनंदमय और विश्रामदायक बनाता है |

आराम से बैठें : आप की मुद्रा से बहुत फर्क पड़ता है | यह निश्चित कर ले कि आप आराम से, सुखद और स्थिर है | सीधे बैठें और रीड की हड्डी सीधी रखे, अपने कंधे और गर्दन को विश्रामदेह रखे और पूरी प्रक्रिया के दौरान आँखे बंद ही रखें | आप को पद्मासन (कमल मुद्रा ) में बैठना होगा, यह ध्यान के बारे में आम कल्पना है |

पेट को खाली रखे : भोजन से पहले ध्यान का अच्छा समय होता है | भोजन के बाद में आप को नींद लग सकती है | जब आप को काफी भूख लगी हो तो ध्यान करने का अधिक प्रयास न करें | भूख की ऐंठन के कारण आपको इसे करने में कठिनाई होगी और हो सकता है कि पूरे वक्त आप सिर्फ खाने के बारे में सोचे | ऐसें में आप भोजन के दो घंटे उपरांत ध्यान कर सकते हैं|

इसे वार्मअप से शुरू करें : थोड़ी देर का वार्मअप या सूक्ष्म योग ध्यान के पहले करने से आपका रक्त के परिसंचरण में सुधार होता है, शरीर की जड़ता और बैचेनी दूर होती है और शरीर हल्का महसूस होता है | आप स्थिरता के साथ अधिक समय बैठ सकेंगे |


कुछ लंबी गहरी सांसे लीजिये : यह आसानी से ध्यान करने की तैयारी है | ध्यान के पहले गहरी सांस लेना और छोड़ना और नाड़ी शोधन प्राणायाम करना अच्छा होता है | इससे सांस की लय स्थिर हो जाती है और मन शांतिपूर्ण ध्यान अवस्था में चला जाता है |

अपने चेहरे पर सौम्य मुस्कान बना कर रखें : आप फर्क महसूस करेंगे | एक निरंतर सौम्य मुस्कान से आप आराम औए शांति महसूस करेंगे और यह आपके ध्यान के अनुभव को बढ़ाता है |

निर्देशित ध्यान से शरू करें : नये लोगों के लिये ध्यान का अभ्यास करने के लिये निर्देशित ध्यान का सहारा लेना अच्छा होगा| इससे आप की ध्यान के अभ्यास की शुरुआत हो जायेगी | आप को सिर्फ आँखों को बंद करके आराम करना है और निर्देशों को सुनकर उसका पालन करते हुये अनुभव का आनंद लेना है |

अपनी आँखों को धीरे धीरे सौम्यता से खोले: जैसे आप ध्यान के अंत में पहुंचे तो अपनी आँखों को खोलने में जल्दी न करें और चलने न लग जायें | अपनी आँखे धीरे धीरे खोले और अपने प्रति और वातावरण के प्रति सजग होने के लिये समय लें |

ताज़गी का अनुभव करें और दिन का आनंद लें : ध्यान तत्काल ऊर्जा बूस्टर के जैसे है | अपने दिनचर्या में कुछ मिनटों का ध्यान आपको में दिन भर उर्जावान रखेगा | उतना समय निकाले और अपने लिये ध्यान के आश्चर्यों का अनुभव करें |

10 जुलाई 2013

साम्य और एकता की प्रतीक पुरी रथयात्रा


श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथपुरी) का महत्व वर्णनातीत है। वेद, उपनिषद् तथा पुराणों में पुरुषोत्तम की प्रशस्ति वर्णित है। श्री जगन्नाथ जी का दूसरा नाम पुरुषोत्तम और धाम का नाम भी पुरुषोत्तम है। यह परम रहस्यमय देवता हैं। वे शैवों के लिए शिव, वेदान्तियों के लिए ब्रह्म, जैनियों के लिए ऋषभनाथ और गाणपत्यों के लिए गणेश हैं। अत: जो जिस रूप से दर्शन करना चाहे, उसके लिए उसी रूप में श्री जगन्नाथ जी विद्यमान हैं। पुरी धाम कलियुग का पवित्र धाम है। श्री जगन्नाथ जी के प्राकट्य की रहस्यमय कथा ब्रह्म पुराण तथा स्कंद पुराण में वर्णित है। जगन्नाथ जी अजन्मा और सर्वव्यापक होने पर भी दारुब्रह्म के रूप में अपनी अद्भुत लीला दर्शाते आ रहे हैं। जगन्नाथ क्षेत्र में जगन्मैत्री की श्रेष्ठ भावना सन्निहित है। उसका प्रमाण श्री जगदीश रथयात्रा है। इस स्थान पर सर्वप्रथम नीलांचल-संज्ञक पर्वत ही था तथा सर्वदेवाराधनीय भगवान नीलमाधव जी का विग्रह उक्त पर्वत पर ही था। कालक्रम से यह पर्वत पाताल में चला गया। देवता लोग भगवद्विग्रह को स्र्वगलोक ले गये। इस क्षेत्र को उन्हीं की पावन स्मृति में आज भी श्रद्धा से ‘नीलांचल’ कहा जाता है। श्री जगन्नाथ मंदिर शिखर पर संलग्नचक्र ‘नीलच्छत्र’ के दर्शन जहां तक होते रहते हैं, वह संपूर्ण क्षेत्र ही श्री जगन्नाथ पुरी है। श्री जगन्नाथ जी की द्वादश यात्राओं में गुण्डिचा यात्रा मुख्य है। यहीं मंदिर में विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा उनकी बहिन सुभद्रा जी की दारु प्रतिमाएं बनाई थीं। महाराज इंद्रद्युम्र तथा उनकी पत्नी विमला की भक्ति व श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें इन मूर्तियों को प्रतिष्ठित करने का आदेश दिया था। प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथयात्रा संपन्न होती है जिसमें न केवल भारत अपितु विदेशों से भी श्रद्धालु भाग लेते हैं। रथ को खींचने तथा उसके दर्शन करने की होड़ लगी रहती है। करोड़ों लोगों का लक्ष्य एक ही होता है। इसीलिए यह रथयात्रा साम्य तथा एकता की प्रतीक मानी जाती है।
श्री जगन्ननाथ पुरी रथयात्रा के महत्व व परिणामों का विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है। उस समय रथ पर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्री जगन्नाथ जी का लोग भक्ति पूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान के धाम में निवास होता है। जो श्रेष्ठ पुरुष रथ के आगे नृत्य करके गाते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य रथ के आगे खड़े होकर चंवर, व्यंजन, फूल के गुच्छों अथवा वस्त्रों से भगवान पुरुषोत्तम को हवा करते हैं, वह ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस समय दिया-दान भी अक्षय फल प्रदान करता है। जो अज्ञानी और अविश्वासी हैं, उनके मन में विश्वास उत्पन्न करने के लिए भगवान विष्णु प्रतिवर्ष यात्रा आरंभ करते हैं। इसकी पृष्ठभूमि माता रोहिणी द्वारा व्रज-लीला सुनाने, कृष्ण, बलराम व सुभद्रा का द्वार पर बैठने, माता की परम पावन वार्ता से उनका प्रेमानंद में विह्वल होना, उनके अंगों का संकुचित होकर निश्चल स्थावर प्रतिमूर्ति स्वरूप परिलक्षित होना, नारद का वहां आना, भगवान से उसी रूप में वहां विराजमान रहने का आग्रह करना तथा भगवान के इस आग्रह को स्वीकार करना, आदि का प्रसंग है। स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्रद्युम्र को स्वयं भगवान ने कहा कि उनका जन्म स्थान उन्हें अत्यंत प्रिय है, अत: वे वर्ष में एक बार वहां अवश्य आएंगे।
रथयात्रा में तीनों रथों के विभिन्न नाम परम्परागत हैं। बलभद्र जी के रथ का नाम तालध्वज, सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन और जगन्नाथ जी के रथ का नाम नन्दीघोष है। पुरी के महाराजा प्रथम सेवक होने के नाते रथों को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं तथा उसके बाद रथों को खींचा जाता है। ये रथ प्रतिवर्ष लकड़ी के बनाये जाते हैं और इनमें तीनों विग्रह भी काष्ठ के होते हैं। काष्ठ के विग्रहावतार धारण करने के विषय में एक प्रसंग है कि एक बार भक्तों के अधीन होकर और भक्तों की श्रेष्ठता दिखाते हुए भगवान ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो मेरा कलियुग में काष्ठ का विग्रह हो। उस ऋषि के अपराध करने वाले गन्धर्व को अर्जुन और सुभद्रा ने अभयदान दिया था। भगवान ने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठ विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। रथयात्रा में विभिन्न स्थानीय पारंपरिक रीति-रिवाजों को बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाया जाता है। रथयात्रा उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। वैष्णवों की यह मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं जगन्नाथ जी हैं क्योंकि वे ही पूर्ण परब्रह्म हैं।
इस प्रकार पुरी की रथयात्रा पारंपरिक प्राचीन प्रथा का निर्वहन है जो जन-जन को भगवान का सामीप्य प्रदान कराने हेतु है। रथारूढ़ भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से मनुष्य को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

श्री जगन्नाथ : जगत पसारे हाथ



भारत की सात पुरियों तथा चार धामों में से एक शंख क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र, श्री क्षेत्र, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथपुरी आदि अनेक विशेषणों से प्रख्यात पुरी ओडिसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर, नीलसागर के किनारे (बंगाल की खाड़ी के पास) बसी है। समुद्र तट  के लगभग डेढ़ किलोमीटर उत्तर में नीलगिरि पर्वत पर वहां के प्रधान देवता जगन्नाथ जी का प्रख्यात ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। यह मंदिर कलिंग वास्तुशैली में  कृष्णवर्णी पत्थरों को तराशकर सन् 1198 में नरेश चीडग़ंग ने निर्मित कराया था, किंतु मूल मंदिर का निर्माण कब किसने कराया यह ज्ञात नहीं है, जबकि पौराणिक आख्यानानुसार इसे राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कराया था। मंदिर के सिंह द्वार के सम्मुख 11 मीटर ऊंचा गरुड़ स्तंभ है जिसे लगभग सात शताब्दी पूर्व महाराज दिव्य सिंह देव ने कोणार्क के सूर्य मंदिर से लाकर यहां स्थापित कराया था। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि पुरी के इस जगन्नाथ मंदिर की छवि ऐसी है जो बुद्ध, बौद्ध संघ तथा बौद्ध दर्शन-धर्म का प्रतिनिधित्व करती है। जनश्रुति है कि यहीं गौतम बुद्ध के दांत भी रखे थे जिन्हें  बाद में श्रीलंका भेज दिया गया। किंवदंती है कि इस मंदिर में जगन्नाथ जी की प्रतिमा में चैतन्य महाप्रभु विलीन हो गये थे।

श्री जगन्नाथ जी श्रीकृष्ण रूप में विष्णु जी के अवतार हैं। वैष्णव मतानुसार  जगन्नाथ जी राधाकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक हैं। उन्हीं से  संपूर्ण सृष्टिï प्रोद्भूत है। जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर ब्रह्मï तथा श्रीकृष्ण की कला के एक रूप हैं। इसी से वहां होने वाले समस्त अनुष्ठïान श्रीकृष्ण जी की  जीवन की घटनाओं से संबंधित होते हैं तथा पुरी की रथयात्रा श्रीकृष्ण के गोकुल  से मथुरा यात्रा की प्रतीक। रथयात्रा का आयोजन सहस्राब्दियों से एक महोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होता है। उल्लेख्य है कि पहले यह देव-उत्सव मात्र पुरी तक सीमित था किंतु आज यह विश्वव्यापी उत्सव बन गया है। दस दिवसीय यह उत्सव आषाढ़  शुक्ल एकादशी को श्री जगन्नाथ जी, बलभद्र जी, सुभद्रा जी की प्रतिमाओं को रत्नवेदिका पर स्थापित करने के पश्चात संपूर्ण होता है। द्वितीया को सुदर्शन चक्र सहित तीनों मूर्तियों को मुख्य मंदिर से ढोल -नगारे,  शंख-ध्वनि के साथ हाथों में उठाकर बाहर लाया जाता है तथा वहां खड़े तीन 50-60 फुट ऊंचे नये बने काष्ठï  रथों पर विराजमान कराया जाता है। वहां  से हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन रस्सी के सहारे  पांच किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर तक ले जाते हैं जहां भगवान दशमी तक विश्राम करके पुन: लौटते हैं। लौटते हुए भी रथ खींचकर मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है।
द्वितीया के दिन बाहर खड़े सज्जित रथों पर पूरी श्रद्धा सहित मूर्तियां रखी जाती हैं। सबसे आगे रहता है लाल-हरे रंग से सजा तालध्वज रथ जिस पर बलभद्र जी का विग्रह, बीच में नीले लाल रंग से सजा तर्पदलन या पद्म-ध्वज रथ जिस पर सुभद्रा जी तथा सुदर्शन चक्र, सबसे पीछे लाल-पीले रंग से सज्जित गरुड़ ध्वज रथ पर जगन्नाथ जी की प्रतिमा रखी जाती है। पुरी राजवंश के राजा इन रथों पर पवित्र जल का स्राव करते हैं तथा सोने के झाड़ू से बुहारते हैं। तब हजारों श्रद्धालु रस्सी के सहारे रथों को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।  इस दस दिवसीय महोत्सव में रथ संचालन, पूजन, दर्शन, भोग आदि की संपूर्ण व्यवस्था पुजारी नहीं बल्कि कोल, भील, किरात जाति वाले करते हैं। दशमी को रथ गुंडीचा मंदिर में घुमाया जाता है। फिर वापसी यात्रा भी उसी प्रकार  प्रारंभ होती है जैसे द्वितीया को रवानगी यात्रा हुई थी। रथयात्रा का यह महोत्सव विश्व में अनूठा, विलक्षण महापर्व है जिसमें जीव का ब्रह्मï से साक्षात् मिलन होता है, जीवात्मा-परमात्मा से जुड़ता है और स्कंदपुराणानुसार उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं  तथा उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिलती है।
हिन्दू पंचांग में प्रति तीन वर्ष के अंतराल पर पुरुषोत्तम मास आता है। जिस साल आषाढ़ पुरुषोत्तम मास होता है  उस साल रथयात्रा नवकलेवर महापर्व के रूप में मनाते हैं। भगवान की पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर परिसर में कोयनी बैकुंठ में महासमाधि दे दी जाती है एवं दारु वृक्ष के काष्ठ से नयी प्रतिमाएं बनाकर (नया कलेवर धारण कर) रथयात्रा पर उन्हीं को विराजित कराया जाता है। प्रतिवर्ष रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ हो जाता है जिसके लिए काष्ठï  आदि का संचयन वसंत पंचमी से किया जाने लगता है। रथ निर्माण में लौह सामग्री, कील,कांटे का प्रयोग वर्जित होता है। रथयात्रा, स्वयं भगवान तथा मंदिर अनेक विलक्षणताएं समेटे हुए हैं। कहीं भी काष्ठï  की प्रतिमा या खंडित प्रतिमा की पूजा नहीं होती परंतु पुरी में इसका अपवाद है क्योंकि प्रतिमाएं काष्ठï की तथा खंडित होती हैं। सर्वत्र कृष्ण के साथ राधा पूजी जाती हैं। जगन्नाथ धाम में कृष्ण के साथ में सुभद्रा की पूजा होती है, राधा की नहीं।
भगवान के भक्त  भोग खिचड़ी प्रसाद एक साथ एक पंक्ति में बैठकर ग्रहण करते हैं जो वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है।

रथयात्रा महोत्सव

काष्ठ विग्रहावतार का रहस्य


पुरी मंदिर में काष्ठ विग्रहों के होने के आख्यान पुराणों में उपलब्ध हैं। भगवान ने काष्ठï का विग्रहावतार क्यों धारण किया? इस संबंध में सर्वप्रथम भगवान द्वारा कहे वचन हैं कि एक बार चित्ररथ नामक गन्धर्व ने एक ऋषि से अनाचार किया तो उसने भगवान के सामने उसका अपराध बताया। श्रीहरि ने उस समय प्रतिज्ञा की कि यदि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो कलियुग में मेरा काष्ठï का विग्रह हो। किंतु उस गन्धर्व को अर्जुन व सुभद्रा ने अभयदान दे दिया। भगवान ने अपने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठï विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की एक अन्य कथा ब्रह्मï पुराण में वर्णित है कि सत्युग में एक प्रजावत्सल, धर्म में निष्ठïा रखने वाले राजा इंद्रद्युम्न हुए। उनके मन में विचार आया कि मैं किस प्रकार भगवान की आराधना करके उनके दर्शन करूं। इसके लिए उन्होंने पुरुषोत्तम क्षेत्र को चुना तथा सैन्य बल व अन्य सेवकों सहित दक्षिण समुद्र के तट पर विश्राम किया। उस मानस तीर्थ क्षेत्र में पहले इंद्रनील मणि से निर्मित भगवान की एक प्रतिमा थी जिसके दर्शन करके कोई भी बैकुंठ धाम चला जाता था। इस पर यमराज ने प्रभु से कहा कि इससे मेरी आपके द्वारा निर्धारित धर्म-मर्यादा नष्टï हो रही है। कृपया आप उस प्रतिमा को वहां से हटा लें। भगवान ने उसे बालुका में छिपा दिया। राजा ने वहां यज्ञ, दान-पुण्य करके मंदिर निर्माण आरंभ किया। एक दिन वह रात में धरती पर आसन बिछाकर सो गए। उन्हें स्वप्न में भगवान ने चतुर्भुजी रूप का दर्शन कराया तथा अपनी छिपी सनातनी प्रतिमा की प्राप्ति का उपाय बताया कि ‘प्रात: समुद्र तट पर जाना जहां एक विशाल वृक्ष सुशोभित है। तुम अकेले ही उसे काटना। वहां एक अद्भुत वस्तु दिखाई देगी। तुम उस काटे हुए वृक्ष की लकड़ी से उस दिव्य प्रतिमा का निर्माण करना।Ó राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने दो ब्राह्मïण वेशधारी दिव्य पुरुष देखे। उनके द्वारा वृक्ष काटने का कारण पूछने पर राजा ने सब कुछ बता दिया। तब उनमें से एक ने कहा, ‘ये मेरे साथी शिल्पी विश्वकर्मा हैं जो प्रतिमा निर्माण करेंगे।Ó फिर राजा ने उनसे पूछा कि ‘गुप्त रूप से आप कौन हैं।Ó तब भगवान ने अपना परिचय दिया तथा अन्तध्र्यान हो गये। फिर प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। पहली मूर्ति बलराम, दूसरी श्री जगन्नाथ, तीसरी उनकी बहन सुभद्रा जी की थी। फिर राजा ने उन काष्ठï मूर्तियों को धूमधाम से पुण्य स्थान में प्रवेश कराया तथा प्रतिष्ठïा कराई और परम पद को प्राप्त किया।
भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की ऐसी ही एक कथा स्कंद पुराण में भी है जिसके अनुसार यहां पहले नीलाचल पर्वत था जहां नीलमाधव जी का श्री विग्रह था। फिर कालक्रम से वह पर्वत पाताल में चला गया। देवता लोग विग्रह को स्वर्ग लोक ले गए। अत: इस क्षेत्र को उनकी पावन स्मृति में आज भी नीलाचल कहा जाता है तथा तभी से काष्ठï विग्रहावतार की उपासना होती आ रही है। इस कथा के अनुसार एक बार सत्यवादी व धर्मात्मा राजा इंद्रद्युम्न ने अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को ऐसे क्षेत्र को ढूंढऩे का आदेश दिया जहां उन्हें साक्षात् जगन्नाथ अवतार के दर्शन हो सकें। विद्यापति शबर दीपकाश्रम गए जहां उन्हें शबर विश्वावसु मिले। विद्यापति ने वहां विश्राम किया और अपने वहां आने का उद्देश्य बताया। शबर उसे रौहिण कुंड तथा कल्पवट के बीच में ले गया जहां भगवान जगन्नाथ विराजमान थे। उसने विद्यापति को कुछ दिव्य वस्तुएं भी उपहार में दीं जो देवता वहां आकर चढ़ाया करते थे। विद्यापति ने प्रसन्न होकर कहा कि उनके राजा वहां आएंगे और एक मंदिर का निर्माण करेंगे। शबर ने बताया कि राजा जगन्नाथ अवतार स्वरूप का दर्शन न कर पाएंगे क्योंकि भगवान स्वर्णमयी बालुका में अदृश्य हो जाएंगे। किंतु भगवान गदाधर-स्वरूप में उन्हें दर्शन देंगे और उनके आदेशानुसार राजा भगवान की काष्ठï की मूर्तियों को ब्रह्मïा जी द्वारा स्थापित कराके पूजा करेंगे। विद्यापति ने ये सभी बातें आकर राजा को बतायीं। तत्पश्चात् राजा श्री क्षेत्र आए, उपासना करके यज्ञ किया तथा सभी तीर्थों के दर्शन किए। वहां नारद जी भी आए और उनसे कहा , ‘तुम्हारा भाग्योदय शुरू होने वाला है। यहां भगवान के शरीर का एक रोम गिरने से वह वृक्षभाव को प्राप्त हो जाएगा। इस धरती पर स्थावर रूप में वह भगवान का अंशावतार होगा। वृक्षरूप में प्रकटित यज्ञेश्वर को तुम महावेदी पर स्थापित करना।Ó तत्पश्चात् राजा ने स्वप्न में सभी कुछ साक्षात् देखा, भगवान के दर्शन किए तथा उनके आदेशानुसार ब्राह्मïणों द्वारा उस वृक्ष को वहां मंगवाया। तब आकाशवाणी हुई, ‘सभी प्रकार से गुप्त रखी हुई महावेदी पर भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। जो वृद्ध शिल्पी यहां उपस्थित हैं उन्हें भीतर प्रवेश कराके दरवा•ाा बंद कर देना। शिल्पकार को कोई न देखे, जो देखेगा वह अंधा हो जाएगा।Ó इंद्रद्युम्न की रानी विमला ने शिल्पकार की भूख-प्यास की चिंता करते हुए दरवाजा खोल दिया किंतु वहां शिल्पकार न था। वहां बलदेव, सुभद्रा, सुदर्शन चक्र तथा भगवान की काष्ठ की अद्र्धनिर्मित प्रतिमाएं थीं। राजा ने उन्हें प्रतिष्ठिïत कराके पूजा-अर्चना की।

03 जुलाई 2013

माँ गंगा ने क्यों उत्पात मचाया केदारनाथ में


इंसानी छेड़छाड़ से क्रोधित हुईं नदियां

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा ने हमें कई सबक दिये हैं। हमें बताया कि नदियों के नैसर्गिक प्रवाह में यदि भवन संस्कृति बाधक बनती है तो उसे कोप का भाजन बनना पड़ेगा। सबक सरकारों के लिए भी है कि आपदा प्रबंधन के मामले में सरकारी तंत्र विफल रहा है। यात्रियों के लिए भी सबक है कि हिमालय पर्यटन मौज-मस्ती नहीं, आस्था का विषय है, जिसे कष्टों के साथ जिया जा सकता है। आम लोगों के लिए सबक यह है कि वे प्रकृति से सामंजस्य बनाकर जियें और आपदाओं से निपटने का हौसला और ज़ज्बा भी रखें। एस.एम.ए. काजमी का एक विश्लेषण।
प्रतिष्ठित केदार मंदिर के पुजारी धीरेंद्र भट्ट जैसे लोगों के लिए चार धाम यात्रा का सीजन जीविकोपार्जन का जरिया होता है। मई से अक्तूबर तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु देश के कोने-कोने से यहां आते हैं। यात्रा की शुरुआत के दौरान उमड़ी तीर्थयात्रियों की भीड़ से उम्मीद जगी थी कि यह सीजन सार्थक रहेगा। इस बार 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मंदिर परिसर में कपाट खुलने के बाद अच्छी शुरुआत हुई थी।
लेकिन पंद्रह जून को शुरू हुई मूसलाधार बारिश जो कि अगले दिन भी जारी रही, ने सारी तस्वीर ही बदलकर रख दी। शाम होते-होते स्थिति चिंताजनक हो गई। मंदिर के निकट नदी व जलधाराएं उफान पर आ गईं। भयाक्रांत श्रद्धालुओं ने मंदिर के निकट स्थित होटलों व धर्मशालाओं में शरण लेना शुरू किया। धीरेंद्र मुख्य मंदिर के भवन की तरफ शरण लेने भागे। उन्होंने मंदिर के पीछे उफनती जलधारा की चिंघाड़ सुनी। अथाह जलराशि बड़े पत्थरों व मलबे को लिये मंदिर की बाहरी सीमा पर आई और मंदिर परिसर में शरण लिये सैकड़ों श्रद्धालुओं को लील गई।
देखते ही देखते मंदिर दस फीट ऊंची रेत व मलबे की गाद से भर गया जिसके नीचे बड़ी संख्या में श्रद्धालु दब गये। वह उन चुनिंदा भाग्यवान लोगों में शामिल थे जो मौत के इस तांडव के चश्मदीद गवाह थे। केदारनाथ के ऊपरी इलाके में बादल फटा जिससे उपजी अथाह जलराशि तेज गति से आई और इस इलाके में बने घरों, होटलों, धर्मशालाओं को लोगों समेत बहा ले गई। सारा केदारनाथ क्षेत्र दस फीट ऊंची रेत की परत में दब गया जिसमें अनेक श्रद्धालु जि़ंदा दफन हो गये।
पंद्रह जून को मंदिर परिसर में खासी चहलपहल थी क्योंकि यह यात्रा सीजन का चरम होता है। लोगों की कोशिश होती है कि मानूसन से पहले यात्रा पूरी कर लें, इसलिए तकरीबन दस हजार तीर्थयात्री केदारनाथ में मौजूद थे और शेष बेस कैंप फाटा में मौजूद थे। वहां से 15 कि.मी. की यात्रा पूरी करके केदारनाथ धाम पहुंचा जाता है।

रामबाड़ा की तबाही

केदारनाथ के बाद सबसे ज्यादा नुकसान इस मार्ग पर पडऩे वाले रामबाड़ा को पहुंचा। केदारनाथ की ऊंची पहाडिय़ों व अन्य धाराओं से आये पानी ने रामबाड़ा को पूरी तरह तबाह कर दिया और सैकड़ों लोग मारे गये। मृतकों की मंदाकिनी के उफनते पानी में जल समाधि बन गई। बचे लोग जान बचाने के लिए ऊंची पहाडिय़ों व जंगलों की शरण में गये। अधिकांश मौतें केदारनाथ और यात्रा मार्ग में हुईं। तकरीबन आठ हजार तीर्थयात्री व स्थानीय लोग पुल व सड़कों के बह जाने से फंस गये।

हेमकुंट साहिब

निकटवर्ती चमोली जनपद में भी स्थिति खासी चिंताजनक रही। तीन दिन में लगातार जारी बारिश व बादल फटने से आई अथाह जलराशि से अलकनंदा में आये उफान ने गोबिंदघाट स्थित बेस कैंप को चपेट में ले लिया। अलकनंदा के तट पर बने भवन और एक गुरुद्वारा क्षतिग्रस्त हुआ। गोबिंदघाट में खड़े श्रद्धालुओं के सैकड़ों वाहन पानी का सैलाब बहा ले गया। कुछ लोग जान बचाने के लिए पहाडिय़ों की तरफ भागे तो कुछ मलबे में दब गये। हेमकुंट साहिब मार्ग पर आने वाले अधिकांश पुल बह गये। सौभाग्य से केदारनाथ के मुकाबले यहां मानवीय क्षति कम हुई।

उत्तरकाशी के तीर्थस्थल

गंगोत्री और यमुनोत्री तीर्थ के लिए निकले श्रद्धालुओं के लिए भी स्थिति कम विषम न थी। गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच सौ कि.मी. के रास्ते पर भगीरथी के किनारों पर भारी तबाही हुई। नदी के किनारे स्थित भवन, होटल व पुल बह गये। गंगोत्री-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सड़कें व संपर्क मार्ग बह गये। हालांकि, बद्रीनाथ से किसी मानवीय क्षति के खबरें नहीं आईं लेकिन जगह-जगह सड़कें बह गईं। वहां पंद्रह हज़ार यात्री फंस गये। गढ़वाल मंडल के पांच तीर्थों में तकरीबन 70 हज़ार तीर्थयात्री और पर्यटक फंस गये थे।

आपदा के संकेत

इस आपदा की असली वजह एक पखवाड़े पहले मानसून का आगमन था। उसके साथ पश्चिमी विक्षोभ ने मिलकर अतिवृष्टि व बादल फटने की घटनाओं को अंजाम दिया। यह क्रम 15 से 19 जून तक चला। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम का ही नतीजा था कि सामान्य 99 मिमी के मुकाबले 378 मिमी वर्षा 1 से 21 जून के मध्य हुई। रुद्रप्रयाग जनपद जहां केदारनाथ तीर्थ स्थित है, वहां सामान्य 121 के मुकाबले 579 मिमी वर्षा दर्ज की गई। इसी प्रकार चमोली में 61 के मुकाबले 378 मिमी तथा उत्तरकाशी में 77 के मुकाबले 447 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई। इस अतिवृष्टि से 1300 सड़कें तथा तकरीबन 150 पुल क्षतिग्रस्त होने से यात्री जहां-तहां फंस गये।

प्रशासनिक विफलता

राज्य में आई अब तक की सबसे बड़ी आपदा से निपटने में प्रशासन की संवेदनहीनता व अक्षमता ही उजागर हुई। मुख्यमंत्री 16 जून को दिल्ली में थे और अगले दिन दोपहर बाद ही पहुंच सके। सड़कें और संचार तंत्र के ध्वस्त होने से प्रशासन पंगु हो गया। भगवान-भरोसे फंसे तीर्थयात्री और पर्यटक सुरक्षा व खाने की तलाश में भटकते रहे। इसीलिए जब 18 जून को मुख्यमंत्री रुद्रप्रयाग पहुंचे तो जनाक्रोश का सामना करना पड़ा। राज्य के कृषि मंत्री हरक सिंह रावत को स्वीकारना पड़ा कि इतनी बड़ी आपदा से जूझना राज्य सरकार के लिए मुश्किल है। सेना व आईटीबीपी की पहल के बाद 17 जून के उपरांत राहत कार्य गति पकड़ सका।

राहत कार्य में तेजी

सेना ने गोबिंदघाट व हेमकुंट साहिब मार्ग में फंसे लोगों को जोशीमठ पहुंचाने तथा आईटीबीपी ने केदारनाथ-रुद्रप्रयाग क्षेत्र में बचाव अभियान शुरू किया। विषम परिस्थितियों में काम करते हुए सेना ने भारतीय वायु सेना तथा सेना के हेलीकाप्टरों की मदद से फंसे लोगों को सुरक्षित इलाकों में पहुंचाने का काम किया। राज्य सरकार ने भी एक दर्जन हेलीकाप्टर किराये पर लेकर राहत व बचाव कार्य तेज किया। उधर सीमा सड़क संगठन के जवानों ने क्षतिग्रस्त सड़कों को ठीक करने का बड़ा अभियान चलाया। 21 जून तक गंगोत्री-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग को खोल दिया गया। इस तरह तकरीबन छह हजार लोगों को निकाला जा सका। बाईस जून तक 35000 तीर्थयात्री व पर्यटक विभिन्न स्थानों पर फंसे हुए थे। पांच हजार के करीब हर्शिल और गंगोत्री, उत्तरकाशी, तीन हजार गंगरिहा, चमोली व पांच हजार बद्रीनाथ में फंसे थे। केंद्र सरकार व सेना ने उन्हें जल्दी निकालने की बात कही।

स्थानीय लोगों की उपेक्षा

केंद्र व राज्य सरकार का ध्यान देशभर से आये तीर्थयात्रियों व पर्यटकों को बचाने में लगा रहा, लेकिन स्थानीय लोग आपदा से सर्वाधिक प्रभावित हुए। तकरीबन चार सौ भवन, नब्बे धर्मशालाएं, होटल, घर, जो नदियों के किनारे स्थित थे, जल सुनामी में बह गये। जबकि तकरीबन पांच सौ मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गये। इसके अलावा जानवरों के बाड़े तथा उपजाऊ जमीन जल-सुनामी बहा ले गई।

यक्ष-प्रश्न

नदियों के तट व जलधाराओं के निकट भवन निर्माण को लेकर स्पष्ट कायदे-कानून न होने से भी क्षति का आंकड़ा बढ़ा है। केंद्र सरकार की ओर से निर्देश थे कि गंगोत्री से उत्तरकाशी की तरफ भगीरथी के दोनों तरफ पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है जिसका स्थानीय लोगों व सरकार द्वारा पालन नहीं हुआ। अब राज्य सरकार केंद्र से अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए कह रही है ताकि अवैध निर्माण पर अंकुश लगाया जा सके।
राज्य में प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास होने के बावजूद प्रशासन को आपदा प्रबंधन के लिए सक्षम नहीं बनाया गया। बावजूद इसके कि राज्य में आपदा प्रबंधन मंत्रालय बना हुआ है लेकिन राज्य प्रशासन प्राकृतिक आपदाएं आने पर सशस्त्र बलों की मदद की बाट जोहता रहता है।
वास्तव में आज भूकंपीय दृष्टि से अति संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में निर्माण कार्य को नियंत्रित करने की जरूरत है। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की संख्या को बेहतर प्रबंधन की दृष्टि से नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। साथ ही राज्य सरकार को ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए स्थानीय लोगों तथा सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

आपदाओं का इतिहास

1978 –     कनोलिया गाड़, उत्तरकाशी में भूस्खलन, अनेक लोगों की मृत्यु।
1980 –     ग्यानस्यूं गांव में बादल फटा, कई लोग मरे।
1991 –     उत्तरकाशी में भूकंप, हज़ार लोग मरे।
1998 –     चमोली के मानसूना गांव में भूस्खलन 69 लोग मरे।
1998 -    पिथौरागढ़ में भूस्खलन, 350 लोग मरे।
1999 –     चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी में भूकंप, 110 लोगों की मृत्यु।
2002 –     बूढ़ा केदार में अंगूरा गांव बहा, 28 लोग मरे
2003 –     वरुणावत, उत्तरकाशी में भूस्खलन।
2010 -    उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग में बादल फटने से 65 मरे, छह लाख प्रभावित।
2012 –     भगीरथी घाटी (उत्तरकाशी) में बादल फटने से 39 मरे, छह सौ करोड़ की संपत्ति नष्ट।

अमरनाथ यात्रा के लिए क्या है सबसे जरूरी


आपकी यात्रा सुखमय हो, इसके लिए आप यात्रा पर निकलने से पहले जानें कुछ जरूरी बातें..

जम्मू-कश्मीर से बाहर के प्रीपेड सिम लखनपुर सीमा में प्रवेश करते ही बंद हो जाते हैं, जबकि पोस्टपेड मोबाइल चलते रहते हैं। इस बार प्रशासन की ओर से आधार शिविर भगवती नगर में ही प्रीपेड सिम उपलब्ध करवाए जाएंगे, जिनकी वेलिडिटी पांच से सात दिन तक रहेगी।

यह एक रोमांचकारी एवं दुर्गम यात्रा है, इसलिए इसकी तैयारी के लिए श्रद्धालुओं को रोजाना 4 से 5 किलोमीटर पैदल चलने का अभ्यास करना चाहिए। साथ ही योग आदि से शारीरिक क्षमता में वृद्धि करने का भी प्रयास करना चाहिए।

यात्रा के दौरान मौसम बेहद सर्द रहता है। इसलिए यात्रियों को अपने साथ पर्याप्त ऊनी कपड़े, बिस्तर बंद, गर्म मोजे, ट्रैकिंग शूज, कोल्ड क्रीम, मंकी कैप, रेनकोट, टॉर्च, छड़ी, दस्ताने आदि भी रखने चाहिए। यहां तापमान कभी-कभी पांच डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे चला जाता है। वहीं बारिश कभी भी अचानक हो सकती है। इसलिए आपका सारा सामान प्लास्टिक अथवा वॉटर प्रूफ बैग में बंद होना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर में पॉलीथिन पर प्रतिबंध है, इसलिए प्रकृति के संरक्षण हेतु इस का ध्यान रखें।

साड़ी पारंपरिक भारतीय परिधान है, लेकिन यात्रा की दृष्टि से यह सुविधाजनक नहीं है। इसलिए बेहतर है कि महिलाएं सलवार-कमीज, पैंट-जींस अथवा ट्रैक सूट आदि का चयन करें।

यह दुर्गम यात्रा है, इसलिए छह सप्ताह से अधिक गर्भवती महिलाओं, 75 वर्ष से ऊपर के वृद्ध और 13 साल से छोटी उम्र के बच्चों को इस बार यात्रा करने की अनुमति नहीं है।

यात्रा के दौरान कुली या घोड़े वाले को अपने साथ रखें, क्योंकि यात्रा के दौरान आपको किसी भी चीज की अचानक जरूरत पड़ सकती है। घोड़ा अथवा खच्चर लेने से पूर्व मोलभाव भी कर लें।

यात्रा के दौरान इस्तेमाल के लिए एक पानी की बोतल, सूखे मेवे, भुने हुए चने, टॉफी, गुड़, चॉकलेट आदि भी अपने साथ रखें।

ध्यान रहे, यात्रा कभी अकेले न करें, बल्कि समूह के साथ रहें। अजनबी व्यक्ति पर विश्वास कर कोई भी वस्तु ग्रहण न करें।

अपनी जेब में सदैव अपना आई कार्ड अथवा किसी पर्ची पर अपना और अपने साथी-समूह का नाम, पता तथा फोन नंबर लिखकर रखें।

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश सभी शिव-तत्व हैं, इसलिए यात्रा के दौरान शिव और प्रकृति दोनों का सम्मान करें। शॉर्ट कट का इस्तेमाल करने से बचें।

अमरनाथ में शेषनाग का महत्व


बर्फानी बाबा के दर्शनों के लिए अमरनाथ यात्रा शुरू हो चुकी है। हजारों की तादाद में देश भर के शिव भक्त अमरनाथ की पवित्र गुफा के दर्शन को जम्मू कश्मीर पहुंच रहे हैं। भगवान शिव की आस्था के इस मार्ग में जहां यात्रियों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है वहीं यहां आने पर प्रकृति की सुंदरता के अद्भुत दर्शन भी करने को मिलते हैं।


अमरनाथ यात्रा में शेषनाग झील का धार्मिक महत्व है। यह कश्मीर वैली के लोकप्रिय टूरिस्ट जगहों में से एक हैं। यह पहलगाम से लगभग 23 किलोमीटर जबकि श्रीनगर से लगभग 120 किलोमीटर दूर है। यहां से अमरनाथ गुफा 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यह झील जमीन से 3658 की ऊंचाई पर स्थित है। शेषनाग झील की अधिकतम लंबाई 1.1 किलोमीटर है जबकि इसकी चौड़ाई 0.7 किलोमीटर है। इस चारों ओर चौदह-पन्द्रह हजार फीट ऊंचे-ऊंचे पर्वत हैं।

शेषनाग झील हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। सर्दियों में यह झील जम जाती है जहां पहुंचना कठिन हो जाता है। इस झील को चारो ओर से कई ग्लेशियरों ने अपने आगोश में ले रखा है। यहीं से लिद्दर नदी निकलती है जो पहलगाम की सुन्दरता में चार चांद लगा देती है।

भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार शेषनाग का मतलब सांपों के राजा से लिया जाता है। ऐसी धारणा है कि जब शिव जी माता पार्वती को अमरकथा सुनाने अमरनाथ ले जा रहे थे, तो उनका इरादा था कि इस कथा को कोई ना सुने इसलिए शेषनाग को इस झील में छोड़ दिया। ताकि कोई इस झील को पार करके आगे न जा पाए। आज भी कहा जाता है कि कभी-कभी झील के पानी में शेषनाग दिखाई देते हैं।

यह इलाका दुर्गम होने की वजह से यहां न तो कोई होटल है और न ही कोई गेस्ट हाउस। अधिकतर यात्री चन्दनवाड़ी ठहरते हैं और वहां से 16 किलोमीटर पैदल चलकर या फिर पोनी पर बैठकर इस झील के दर्शन करने आते हैं। अगर यात्री इस झील के आसपास रुकना भी चाहते हैं तो यहां कई तरह के तम्बू उपलब्ध हैं और राज्य सरकार द्वारा प्रबंध किए जाते हैं। यह तम्बू अप्रैल से जून महीने तक उपलब्ध रहते हैं। इस तरह के तम्बुओं की कीमत एक रात के लिए 400 रुपए तक है।

यहां आते समय ध्यान रखें कि आपके पास पानी की बोतल और बरसात से बचने के लिए छाता और रेनकोट जरूर हो। आप ठंड से बचने का सभी सामान साथ ले जाएं। साथ ही चेहरे और शरीर पर लगाने के लिए क्त्रीम का भी प्रबंध करने के बाद ही जाएं। खाने में आप सूखे मेवे और चॉकलेट रखना ना भूलें।

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