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10 जुलाई 2013

रथयात्रा महोत्सव

काष्ठ विग्रहावतार का रहस्य


पुरी मंदिर में काष्ठ विग्रहों के होने के आख्यान पुराणों में उपलब्ध हैं। भगवान ने काष्ठï का विग्रहावतार क्यों धारण किया? इस संबंध में सर्वप्रथम भगवान द्वारा कहे वचन हैं कि एक बार चित्ररथ नामक गन्धर्व ने एक ऋषि से अनाचार किया तो उसने भगवान के सामने उसका अपराध बताया। श्रीहरि ने उस समय प्रतिज्ञा की कि यदि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो कलियुग में मेरा काष्ठï का विग्रह हो। किंतु उस गन्धर्व को अर्जुन व सुभद्रा ने अभयदान दे दिया। भगवान ने अपने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठï विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की एक अन्य कथा ब्रह्मï पुराण में वर्णित है कि सत्युग में एक प्रजावत्सल, धर्म में निष्ठïा रखने वाले राजा इंद्रद्युम्न हुए। उनके मन में विचार आया कि मैं किस प्रकार भगवान की आराधना करके उनके दर्शन करूं। इसके लिए उन्होंने पुरुषोत्तम क्षेत्र को चुना तथा सैन्य बल व अन्य सेवकों सहित दक्षिण समुद्र के तट पर विश्राम किया। उस मानस तीर्थ क्षेत्र में पहले इंद्रनील मणि से निर्मित भगवान की एक प्रतिमा थी जिसके दर्शन करके कोई भी बैकुंठ धाम चला जाता था। इस पर यमराज ने प्रभु से कहा कि इससे मेरी आपके द्वारा निर्धारित धर्म-मर्यादा नष्टï हो रही है। कृपया आप उस प्रतिमा को वहां से हटा लें। भगवान ने उसे बालुका में छिपा दिया। राजा ने वहां यज्ञ, दान-पुण्य करके मंदिर निर्माण आरंभ किया। एक दिन वह रात में धरती पर आसन बिछाकर सो गए। उन्हें स्वप्न में भगवान ने चतुर्भुजी रूप का दर्शन कराया तथा अपनी छिपी सनातनी प्रतिमा की प्राप्ति का उपाय बताया कि ‘प्रात: समुद्र तट पर जाना जहां एक विशाल वृक्ष सुशोभित है। तुम अकेले ही उसे काटना। वहां एक अद्भुत वस्तु दिखाई देगी। तुम उस काटे हुए वृक्ष की लकड़ी से उस दिव्य प्रतिमा का निर्माण करना।Ó राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने दो ब्राह्मïण वेशधारी दिव्य पुरुष देखे। उनके द्वारा वृक्ष काटने का कारण पूछने पर राजा ने सब कुछ बता दिया। तब उनमें से एक ने कहा, ‘ये मेरे साथी शिल्पी विश्वकर्मा हैं जो प्रतिमा निर्माण करेंगे।Ó फिर राजा ने उनसे पूछा कि ‘गुप्त रूप से आप कौन हैं।Ó तब भगवान ने अपना परिचय दिया तथा अन्तध्र्यान हो गये। फिर प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। पहली मूर्ति बलराम, दूसरी श्री जगन्नाथ, तीसरी उनकी बहन सुभद्रा जी की थी। फिर राजा ने उन काष्ठï मूर्तियों को धूमधाम से पुण्य स्थान में प्रवेश कराया तथा प्रतिष्ठïा कराई और परम पद को प्राप्त किया।
भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की ऐसी ही एक कथा स्कंद पुराण में भी है जिसके अनुसार यहां पहले नीलाचल पर्वत था जहां नीलमाधव जी का श्री विग्रह था। फिर कालक्रम से वह पर्वत पाताल में चला गया। देवता लोग विग्रह को स्वर्ग लोक ले गए। अत: इस क्षेत्र को उनकी पावन स्मृति में आज भी नीलाचल कहा जाता है तथा तभी से काष्ठï विग्रहावतार की उपासना होती आ रही है। इस कथा के अनुसार एक बार सत्यवादी व धर्मात्मा राजा इंद्रद्युम्न ने अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को ऐसे क्षेत्र को ढूंढऩे का आदेश दिया जहां उन्हें साक्षात् जगन्नाथ अवतार के दर्शन हो सकें। विद्यापति शबर दीपकाश्रम गए जहां उन्हें शबर विश्वावसु मिले। विद्यापति ने वहां विश्राम किया और अपने वहां आने का उद्देश्य बताया। शबर उसे रौहिण कुंड तथा कल्पवट के बीच में ले गया जहां भगवान जगन्नाथ विराजमान थे। उसने विद्यापति को कुछ दिव्य वस्तुएं भी उपहार में दीं जो देवता वहां आकर चढ़ाया करते थे। विद्यापति ने प्रसन्न होकर कहा कि उनके राजा वहां आएंगे और एक मंदिर का निर्माण करेंगे। शबर ने बताया कि राजा जगन्नाथ अवतार स्वरूप का दर्शन न कर पाएंगे क्योंकि भगवान स्वर्णमयी बालुका में अदृश्य हो जाएंगे। किंतु भगवान गदाधर-स्वरूप में उन्हें दर्शन देंगे और उनके आदेशानुसार राजा भगवान की काष्ठï की मूर्तियों को ब्रह्मïा जी द्वारा स्थापित कराके पूजा करेंगे। विद्यापति ने ये सभी बातें आकर राजा को बतायीं। तत्पश्चात् राजा श्री क्षेत्र आए, उपासना करके यज्ञ किया तथा सभी तीर्थों के दर्शन किए। वहां नारद जी भी आए और उनसे कहा , ‘तुम्हारा भाग्योदय शुरू होने वाला है। यहां भगवान के शरीर का एक रोम गिरने से वह वृक्षभाव को प्राप्त हो जाएगा। इस धरती पर स्थावर रूप में वह भगवान का अंशावतार होगा। वृक्षरूप में प्रकटित यज्ञेश्वर को तुम महावेदी पर स्थापित करना।Ó तत्पश्चात् राजा ने स्वप्न में सभी कुछ साक्षात् देखा, भगवान के दर्शन किए तथा उनके आदेशानुसार ब्राह्मïणों द्वारा उस वृक्ष को वहां मंगवाया। तब आकाशवाणी हुई, ‘सभी प्रकार से गुप्त रखी हुई महावेदी पर भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। जो वृद्ध शिल्पी यहां उपस्थित हैं उन्हें भीतर प्रवेश कराके दरवा•ाा बंद कर देना। शिल्पकार को कोई न देखे, जो देखेगा वह अंधा हो जाएगा।Ó इंद्रद्युम्न की रानी विमला ने शिल्पकार की भूख-प्यास की चिंता करते हुए दरवाजा खोल दिया किंतु वहां शिल्पकार न था। वहां बलदेव, सुभद्रा, सुदर्शन चक्र तथा भगवान की काष्ठ की अद्र्धनिर्मित प्रतिमाएं थीं। राजा ने उन्हें प्रतिष्ठिïत कराके पूजा-अर्चना की।

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