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03 जुलाई 2013

माँ गंगा ने क्यों उत्पात मचाया केदारनाथ में


इंसानी छेड़छाड़ से क्रोधित हुईं नदियां

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा ने हमें कई सबक दिये हैं। हमें बताया कि नदियों के नैसर्गिक प्रवाह में यदि भवन संस्कृति बाधक बनती है तो उसे कोप का भाजन बनना पड़ेगा। सबक सरकारों के लिए भी है कि आपदा प्रबंधन के मामले में सरकारी तंत्र विफल रहा है। यात्रियों के लिए भी सबक है कि हिमालय पर्यटन मौज-मस्ती नहीं, आस्था का विषय है, जिसे कष्टों के साथ जिया जा सकता है। आम लोगों के लिए सबक यह है कि वे प्रकृति से सामंजस्य बनाकर जियें और आपदाओं से निपटने का हौसला और ज़ज्बा भी रखें। एस.एम.ए. काजमी का एक विश्लेषण।
प्रतिष्ठित केदार मंदिर के पुजारी धीरेंद्र भट्ट जैसे लोगों के लिए चार धाम यात्रा का सीजन जीविकोपार्जन का जरिया होता है। मई से अक्तूबर तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु देश के कोने-कोने से यहां आते हैं। यात्रा की शुरुआत के दौरान उमड़ी तीर्थयात्रियों की भीड़ से उम्मीद जगी थी कि यह सीजन सार्थक रहेगा। इस बार 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मंदिर परिसर में कपाट खुलने के बाद अच्छी शुरुआत हुई थी।
लेकिन पंद्रह जून को शुरू हुई मूसलाधार बारिश जो कि अगले दिन भी जारी रही, ने सारी तस्वीर ही बदलकर रख दी। शाम होते-होते स्थिति चिंताजनक हो गई। मंदिर के निकट नदी व जलधाराएं उफान पर आ गईं। भयाक्रांत श्रद्धालुओं ने मंदिर के निकट स्थित होटलों व धर्मशालाओं में शरण लेना शुरू किया। धीरेंद्र मुख्य मंदिर के भवन की तरफ शरण लेने भागे। उन्होंने मंदिर के पीछे उफनती जलधारा की चिंघाड़ सुनी। अथाह जलराशि बड़े पत्थरों व मलबे को लिये मंदिर की बाहरी सीमा पर आई और मंदिर परिसर में शरण लिये सैकड़ों श्रद्धालुओं को लील गई।
देखते ही देखते मंदिर दस फीट ऊंची रेत व मलबे की गाद से भर गया जिसके नीचे बड़ी संख्या में श्रद्धालु दब गये। वह उन चुनिंदा भाग्यवान लोगों में शामिल थे जो मौत के इस तांडव के चश्मदीद गवाह थे। केदारनाथ के ऊपरी इलाके में बादल फटा जिससे उपजी अथाह जलराशि तेज गति से आई और इस इलाके में बने घरों, होटलों, धर्मशालाओं को लोगों समेत बहा ले गई। सारा केदारनाथ क्षेत्र दस फीट ऊंची रेत की परत में दब गया जिसमें अनेक श्रद्धालु जि़ंदा दफन हो गये।
पंद्रह जून को मंदिर परिसर में खासी चहलपहल थी क्योंकि यह यात्रा सीजन का चरम होता है। लोगों की कोशिश होती है कि मानूसन से पहले यात्रा पूरी कर लें, इसलिए तकरीबन दस हजार तीर्थयात्री केदारनाथ में मौजूद थे और शेष बेस कैंप फाटा में मौजूद थे। वहां से 15 कि.मी. की यात्रा पूरी करके केदारनाथ धाम पहुंचा जाता है।

रामबाड़ा की तबाही

केदारनाथ के बाद सबसे ज्यादा नुकसान इस मार्ग पर पडऩे वाले रामबाड़ा को पहुंचा। केदारनाथ की ऊंची पहाडिय़ों व अन्य धाराओं से आये पानी ने रामबाड़ा को पूरी तरह तबाह कर दिया और सैकड़ों लोग मारे गये। मृतकों की मंदाकिनी के उफनते पानी में जल समाधि बन गई। बचे लोग जान बचाने के लिए ऊंची पहाडिय़ों व जंगलों की शरण में गये। अधिकांश मौतें केदारनाथ और यात्रा मार्ग में हुईं। तकरीबन आठ हजार तीर्थयात्री व स्थानीय लोग पुल व सड़कों के बह जाने से फंस गये।

हेमकुंट साहिब

निकटवर्ती चमोली जनपद में भी स्थिति खासी चिंताजनक रही। तीन दिन में लगातार जारी बारिश व बादल फटने से आई अथाह जलराशि से अलकनंदा में आये उफान ने गोबिंदघाट स्थित बेस कैंप को चपेट में ले लिया। अलकनंदा के तट पर बने भवन और एक गुरुद्वारा क्षतिग्रस्त हुआ। गोबिंदघाट में खड़े श्रद्धालुओं के सैकड़ों वाहन पानी का सैलाब बहा ले गया। कुछ लोग जान बचाने के लिए पहाडिय़ों की तरफ भागे तो कुछ मलबे में दब गये। हेमकुंट साहिब मार्ग पर आने वाले अधिकांश पुल बह गये। सौभाग्य से केदारनाथ के मुकाबले यहां मानवीय क्षति कम हुई।

उत्तरकाशी के तीर्थस्थल

गंगोत्री और यमुनोत्री तीर्थ के लिए निकले श्रद्धालुओं के लिए भी स्थिति कम विषम न थी। गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच सौ कि.मी. के रास्ते पर भगीरथी के किनारों पर भारी तबाही हुई। नदी के किनारे स्थित भवन, होटल व पुल बह गये। गंगोत्री-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सड़कें व संपर्क मार्ग बह गये। हालांकि, बद्रीनाथ से किसी मानवीय क्षति के खबरें नहीं आईं लेकिन जगह-जगह सड़कें बह गईं। वहां पंद्रह हज़ार यात्री फंस गये। गढ़वाल मंडल के पांच तीर्थों में तकरीबन 70 हज़ार तीर्थयात्री और पर्यटक फंस गये थे।

आपदा के संकेत

इस आपदा की असली वजह एक पखवाड़े पहले मानसून का आगमन था। उसके साथ पश्चिमी विक्षोभ ने मिलकर अतिवृष्टि व बादल फटने की घटनाओं को अंजाम दिया। यह क्रम 15 से 19 जून तक चला। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम का ही नतीजा था कि सामान्य 99 मिमी के मुकाबले 378 मिमी वर्षा 1 से 21 जून के मध्य हुई। रुद्रप्रयाग जनपद जहां केदारनाथ तीर्थ स्थित है, वहां सामान्य 121 के मुकाबले 579 मिमी वर्षा दर्ज की गई। इसी प्रकार चमोली में 61 के मुकाबले 378 मिमी तथा उत्तरकाशी में 77 के मुकाबले 447 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई। इस अतिवृष्टि से 1300 सड़कें तथा तकरीबन 150 पुल क्षतिग्रस्त होने से यात्री जहां-तहां फंस गये।

प्रशासनिक विफलता

राज्य में आई अब तक की सबसे बड़ी आपदा से निपटने में प्रशासन की संवेदनहीनता व अक्षमता ही उजागर हुई। मुख्यमंत्री 16 जून को दिल्ली में थे और अगले दिन दोपहर बाद ही पहुंच सके। सड़कें और संचार तंत्र के ध्वस्त होने से प्रशासन पंगु हो गया। भगवान-भरोसे फंसे तीर्थयात्री और पर्यटक सुरक्षा व खाने की तलाश में भटकते रहे। इसीलिए जब 18 जून को मुख्यमंत्री रुद्रप्रयाग पहुंचे तो जनाक्रोश का सामना करना पड़ा। राज्य के कृषि मंत्री हरक सिंह रावत को स्वीकारना पड़ा कि इतनी बड़ी आपदा से जूझना राज्य सरकार के लिए मुश्किल है। सेना व आईटीबीपी की पहल के बाद 17 जून के उपरांत राहत कार्य गति पकड़ सका।

राहत कार्य में तेजी

सेना ने गोबिंदघाट व हेमकुंट साहिब मार्ग में फंसे लोगों को जोशीमठ पहुंचाने तथा आईटीबीपी ने केदारनाथ-रुद्रप्रयाग क्षेत्र में बचाव अभियान शुरू किया। विषम परिस्थितियों में काम करते हुए सेना ने भारतीय वायु सेना तथा सेना के हेलीकाप्टरों की मदद से फंसे लोगों को सुरक्षित इलाकों में पहुंचाने का काम किया। राज्य सरकार ने भी एक दर्जन हेलीकाप्टर किराये पर लेकर राहत व बचाव कार्य तेज किया। उधर सीमा सड़क संगठन के जवानों ने क्षतिग्रस्त सड़कों को ठीक करने का बड़ा अभियान चलाया। 21 जून तक गंगोत्री-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग को खोल दिया गया। इस तरह तकरीबन छह हजार लोगों को निकाला जा सका। बाईस जून तक 35000 तीर्थयात्री व पर्यटक विभिन्न स्थानों पर फंसे हुए थे। पांच हजार के करीब हर्शिल और गंगोत्री, उत्तरकाशी, तीन हजार गंगरिहा, चमोली व पांच हजार बद्रीनाथ में फंसे थे। केंद्र सरकार व सेना ने उन्हें जल्दी निकालने की बात कही।

स्थानीय लोगों की उपेक्षा

केंद्र व राज्य सरकार का ध्यान देशभर से आये तीर्थयात्रियों व पर्यटकों को बचाने में लगा रहा, लेकिन स्थानीय लोग आपदा से सर्वाधिक प्रभावित हुए। तकरीबन चार सौ भवन, नब्बे धर्मशालाएं, होटल, घर, जो नदियों के किनारे स्थित थे, जल सुनामी में बह गये। जबकि तकरीबन पांच सौ मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गये। इसके अलावा जानवरों के बाड़े तथा उपजाऊ जमीन जल-सुनामी बहा ले गई।

यक्ष-प्रश्न

नदियों के तट व जलधाराओं के निकट भवन निर्माण को लेकर स्पष्ट कायदे-कानून न होने से भी क्षति का आंकड़ा बढ़ा है। केंद्र सरकार की ओर से निर्देश थे कि गंगोत्री से उत्तरकाशी की तरफ भगीरथी के दोनों तरफ पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है जिसका स्थानीय लोगों व सरकार द्वारा पालन नहीं हुआ। अब राज्य सरकार केंद्र से अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए कह रही है ताकि अवैध निर्माण पर अंकुश लगाया जा सके।
राज्य में प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास होने के बावजूद प्रशासन को आपदा प्रबंधन के लिए सक्षम नहीं बनाया गया। बावजूद इसके कि राज्य में आपदा प्रबंधन मंत्रालय बना हुआ है लेकिन राज्य प्रशासन प्राकृतिक आपदाएं आने पर सशस्त्र बलों की मदद की बाट जोहता रहता है।
वास्तव में आज भूकंपीय दृष्टि से अति संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में निर्माण कार्य को नियंत्रित करने की जरूरत है। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की संख्या को बेहतर प्रबंधन की दृष्टि से नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। साथ ही राज्य सरकार को ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए स्थानीय लोगों तथा सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

आपदाओं का इतिहास

1978 –     कनोलिया गाड़, उत्तरकाशी में भूस्खलन, अनेक लोगों की मृत्यु।
1980 –     ग्यानस्यूं गांव में बादल फटा, कई लोग मरे।
1991 –     उत्तरकाशी में भूकंप, हज़ार लोग मरे।
1998 –     चमोली के मानसूना गांव में भूस्खलन 69 लोग मरे।
1998 -    पिथौरागढ़ में भूस्खलन, 350 लोग मरे।
1999 –     चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी में भूकंप, 110 लोगों की मृत्यु।
2002 –     बूढ़ा केदार में अंगूरा गांव बहा, 28 लोग मरे
2003 –     वरुणावत, उत्तरकाशी में भूस्खलन।
2010 -    उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग में बादल फटने से 65 मरे, छह लाख प्रभावित।
2012 –     भगीरथी घाटी (उत्तरकाशी) में बादल फटने से 39 मरे, छह सौ करोड़ की संपत्ति नष्ट।

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