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10 जुलाई 2013

श्री जगन्नाथ : जगत पसारे हाथ



भारत की सात पुरियों तथा चार धामों में से एक शंख क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र, श्री क्षेत्र, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथपुरी आदि अनेक विशेषणों से प्रख्यात पुरी ओडिसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर, नीलसागर के किनारे (बंगाल की खाड़ी के पास) बसी है। समुद्र तट  के लगभग डेढ़ किलोमीटर उत्तर में नीलगिरि पर्वत पर वहां के प्रधान देवता जगन्नाथ जी का प्रख्यात ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। यह मंदिर कलिंग वास्तुशैली में  कृष्णवर्णी पत्थरों को तराशकर सन् 1198 में नरेश चीडग़ंग ने निर्मित कराया था, किंतु मूल मंदिर का निर्माण कब किसने कराया यह ज्ञात नहीं है, जबकि पौराणिक आख्यानानुसार इसे राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कराया था। मंदिर के सिंह द्वार के सम्मुख 11 मीटर ऊंचा गरुड़ स्तंभ है जिसे लगभग सात शताब्दी पूर्व महाराज दिव्य सिंह देव ने कोणार्क के सूर्य मंदिर से लाकर यहां स्थापित कराया था। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि पुरी के इस जगन्नाथ मंदिर की छवि ऐसी है जो बुद्ध, बौद्ध संघ तथा बौद्ध दर्शन-धर्म का प्रतिनिधित्व करती है। जनश्रुति है कि यहीं गौतम बुद्ध के दांत भी रखे थे जिन्हें  बाद में श्रीलंका भेज दिया गया। किंवदंती है कि इस मंदिर में जगन्नाथ जी की प्रतिमा में चैतन्य महाप्रभु विलीन हो गये थे।

श्री जगन्नाथ जी श्रीकृष्ण रूप में विष्णु जी के अवतार हैं। वैष्णव मतानुसार  जगन्नाथ जी राधाकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक हैं। उन्हीं से  संपूर्ण सृष्टिï प्रोद्भूत है। जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर ब्रह्मï तथा श्रीकृष्ण की कला के एक रूप हैं। इसी से वहां होने वाले समस्त अनुष्ठïान श्रीकृष्ण जी की  जीवन की घटनाओं से संबंधित होते हैं तथा पुरी की रथयात्रा श्रीकृष्ण के गोकुल  से मथुरा यात्रा की प्रतीक। रथयात्रा का आयोजन सहस्राब्दियों से एक महोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होता है। उल्लेख्य है कि पहले यह देव-उत्सव मात्र पुरी तक सीमित था किंतु आज यह विश्वव्यापी उत्सव बन गया है। दस दिवसीय यह उत्सव आषाढ़  शुक्ल एकादशी को श्री जगन्नाथ जी, बलभद्र जी, सुभद्रा जी की प्रतिमाओं को रत्नवेदिका पर स्थापित करने के पश्चात संपूर्ण होता है। द्वितीया को सुदर्शन चक्र सहित तीनों मूर्तियों को मुख्य मंदिर से ढोल -नगारे,  शंख-ध्वनि के साथ हाथों में उठाकर बाहर लाया जाता है तथा वहां खड़े तीन 50-60 फुट ऊंचे नये बने काष्ठï  रथों पर विराजमान कराया जाता है। वहां  से हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन रस्सी के सहारे  पांच किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर तक ले जाते हैं जहां भगवान दशमी तक विश्राम करके पुन: लौटते हैं। लौटते हुए भी रथ खींचकर मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है।
द्वितीया के दिन बाहर खड़े सज्जित रथों पर पूरी श्रद्धा सहित मूर्तियां रखी जाती हैं। सबसे आगे रहता है लाल-हरे रंग से सजा तालध्वज रथ जिस पर बलभद्र जी का विग्रह, बीच में नीले लाल रंग से सजा तर्पदलन या पद्म-ध्वज रथ जिस पर सुभद्रा जी तथा सुदर्शन चक्र, सबसे पीछे लाल-पीले रंग से सज्जित गरुड़ ध्वज रथ पर जगन्नाथ जी की प्रतिमा रखी जाती है। पुरी राजवंश के राजा इन रथों पर पवित्र जल का स्राव करते हैं तथा सोने के झाड़ू से बुहारते हैं। तब हजारों श्रद्धालु रस्सी के सहारे रथों को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।  इस दस दिवसीय महोत्सव में रथ संचालन, पूजन, दर्शन, भोग आदि की संपूर्ण व्यवस्था पुजारी नहीं बल्कि कोल, भील, किरात जाति वाले करते हैं। दशमी को रथ गुंडीचा मंदिर में घुमाया जाता है। फिर वापसी यात्रा भी उसी प्रकार  प्रारंभ होती है जैसे द्वितीया को रवानगी यात्रा हुई थी। रथयात्रा का यह महोत्सव विश्व में अनूठा, विलक्षण महापर्व है जिसमें जीव का ब्रह्मï से साक्षात् मिलन होता है, जीवात्मा-परमात्मा से जुड़ता है और स्कंदपुराणानुसार उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं  तथा उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिलती है।
हिन्दू पंचांग में प्रति तीन वर्ष के अंतराल पर पुरुषोत्तम मास आता है। जिस साल आषाढ़ पुरुषोत्तम मास होता है  उस साल रथयात्रा नवकलेवर महापर्व के रूप में मनाते हैं। भगवान की पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर परिसर में कोयनी बैकुंठ में महासमाधि दे दी जाती है एवं दारु वृक्ष के काष्ठ से नयी प्रतिमाएं बनाकर (नया कलेवर धारण कर) रथयात्रा पर उन्हीं को विराजित कराया जाता है। प्रतिवर्ष रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ हो जाता है जिसके लिए काष्ठï  आदि का संचयन वसंत पंचमी से किया जाने लगता है। रथ निर्माण में लौह सामग्री, कील,कांटे का प्रयोग वर्जित होता है। रथयात्रा, स्वयं भगवान तथा मंदिर अनेक विलक्षणताएं समेटे हुए हैं। कहीं भी काष्ठï  की प्रतिमा या खंडित प्रतिमा की पूजा नहीं होती परंतु पुरी में इसका अपवाद है क्योंकि प्रतिमाएं काष्ठï की तथा खंडित होती हैं। सर्वत्र कृष्ण के साथ राधा पूजी जाती हैं। जगन्नाथ धाम में कृष्ण के साथ में सुभद्रा की पूजा होती है, राधा की नहीं।
भगवान के भक्त  भोग खिचड़ी प्रसाद एक साथ एक पंक्ति में बैठकर ग्रहण करते हैं जो वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है।

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