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18 सितंबर 2013

नवरात्र

पश्चिम बंगाल में बंगाली परिवारों का शारदीय नवरात्र

  • राजेश मिश्रा

व्रत, उपवास, पूजन विधि, कुमारी पूजा, लगने वाले सामानों की संक्षिप्त जानकारी

वैसे तो पश्चिम बंगाल में बंगाली परिवारों का शारदीय नवरात्र ही मुख्य पर्व होता है जिसे वे ""शारदीय दुर्गापूजा'' के रूप में मनाते हैं। पर यहां रहने वाले अबंगाली लोगों के लिए यह शारदीय उत्सव नवरात्र के रूप चरमोत्कर्ष पर रहता है। पूरे बंगाल में डांडिया व दुर्गापूजा की धूम देखते ही बनती है। पूरे 10-12 दिन बंगाल में बिजली के रंगीन बल्बों और चहल-पहल से यह नवरात्र उत्सव महाउत्सव में तब्दील हो जाता है और इसका अन्त माता दुर्गाजी के मूर्ति विसर्जन "आस्छे बछर आबार होबे' (अगले वर्ष फिर होगा) के नारे के साथ होता है। यहॉं का मूर्ति विसर्जन का रौनक भी देखते ही बनता है। इस मौके पर विशेषकर बंगाली रहन-सहन के क्षेत्रों में बंगाल का संस्कृति झलकता है। बंगाली परिवार इस दिन प्रतियोगिता आयोजित करते हैं जिसमें बच्चे से लेकर बूढ़े तक शामिल होते हैं और अपने पारंपरिक संस्कृति से जुड़े कई रीति-रिवाजों को विभिन्न प्रतियोगिताओं के तहत बच्चों एवं अबंगालियों को शिक्षा देते हैं। तत्‌पश्चात शुरू होता है "सिदूर खेला'। यानि मॉं दुर्गा को विदाई देने के लिए सुहागिन महिलाएं अपने घर से जिस तरह से कोई महिला अपने घर से बेटी की विदाई करती है उसी रह से पूरी तैयारी के साथ मंडप में मॉं को मिठा खिलाकर, पानी से पिलाकर सिंदूर लगाती हैं एवं आपस में भी सिंदूर की होली खेलती हैं जो देखने में बहुत ही आनन्द बोध होता है। मैंने इस तथ्य को इसलिए उल्लेख किया है क्योंकि मैं 1989 के बाद ज्यादातर बंगाली क्षेत्रों या बंगाली परिवार में ही अपना बसेरा (घर भाड़ा) बना रखा था।
भारतीय चिंतनधारा में साधना आध्यात्मिक ऊर्जा और दैवी चेतना के विकास का सबसे विश्वसनीय साधन माना जाता है। तन्त्रगमों के अनुसार यह साधना नित्य एवं नैमित्तिक भेद से दो प्रकार की होती है। जो साधना जीवनभर एवं निरंतर की जाती है, वह नित्य साधना कहलाती है। रुद्रयामल तंत्र के अनुसार ऐसी साधना साधक का धर्म है। किन्तु संसार एवं घर गृहस्थी के चक्रव्यूह में फंसे आम लोगों के पास न तो इतना समय होता है और नहीं इतना सामथ्र्य कि वे नित्य साधना कर सकें। अत: सद्गृहस्थों के जीवन में आने वाले कष्टों/दु:खों की निवृत्ति के लिए हमारे ऋषियों ने नैमित्तिक साधना का प्रतिपादन किया है। नैमित्तिक-साधना के इस महापर्व को नवरात्र कहते हैं।

दुर्गापूजा का प्रयोजन

महामाया के प्रभाववश सांसारिक प्राणी अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर कभी जाने और कभी अनजाने में दु:खों के दलदल में फंसता चला जाता है। जैसा कि मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है-
ज्ञानिनामपि चेतांहि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रगच्छति।।
इन सांसारिक कष्टों से, जिनको धर्म की भाषा में दुर्गति कहते हैं-इनसे मुक्ति के लिए मॉं दुर्गा की उपासना करनी चाहिए क्योंकि आराधिता सैव नृणां भोगस्वगपिवर्गहा मार्कण्डेय पुराण के इस वचन के अनुसार मॉं दुर्गा की उपासना करने से स्वर्ग जैसे भोग और मोक्ष जैसी शान्ति मिल जाती है। भारतीय जनमानस उस आद्या शक्ति दुर्गा को मॉं या माता के रूप में देखता और मानता है। इस विषय में आचार्य शंकर का मानना है कि जैसे पुत्र के कुपुत्र होने पर भी माता कुमाता नहीं होती। वैसी भगवती दुर्गा अपने भक्तों का वात्सल्य भाव से कल्याण करती है। अत: हमें उनकी पूजा/उपासना करनी चाहिए।

नवदुर्गा

एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा- दुर्गासप्तशती के इस वचन के अनुसार वह आद्यशक्ति एकमेव और अद्वितीय होते हुए भी अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए - 1. शैलपुत्री,  2. ब्रह्मचारिणी, 3. चन्द्रघण्टा, 4. कूष्माण्डा, 5.  स्कन्धमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी एवं 9. सिद्धिदात्री - इन नवदुर्गा के रूप में अवतरित होती है। वही जगन्माता सत्त्व, रजस् एवं तमस्- इन गुणों के आधार पर महाबाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

दुर्गा-दुर्गतिनाशिनी

रुद्रयामल तन्त्र में आद्याशक्ति के दुर्गा नाम का निर्वचन करते हुए प्रतिपादित किया गया है - कि जो दुर्ग के समान अपने भक्तों की रक्षा करती है अथवा जो अपने भक्तों को दुर्गति से बचाती है, वह आद्याशक्ति दुर्गा कहलाती है।

दुर्गापूजा का काल

वैदिक ज्योतिष की काल-गणना के अनुसार हमारा एक वर्ष देवी-देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। इस नियम के अनुसार मेषसंक्रांति को देवताओं का प्रात:काल और तुला संक्रांति को उनका सायंकाल होता है।
इसी आधार पर शाक्त तन्त्रों ने मेषसंक्रांति के आसपास चेत्र शुक्ल प्रतिपदा से बासन्तिक नवरात्रि और तुला संक्रांति के आसपास आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र का समय निर्धारित किया है। नवरात्रि के ये नौ दिन दुर्गा पूजा के लिए सबसे प्रशस्त होते हैं।

शारदीय नवरात्र का महत्व 

इन दोनों नवरात्रियों में शारदीय नवरात्र की महिमा सर्वोपरि है। शरदकाले महापूजा क्रियते या च वाष्रेकी। दुर्गा सप्तशती के इस वचन के अनुसार शारदीय नवरात्र की पूजा वार्षिक पूजा होने के कारण महापूजा कहलाती है। गुजरात-महाराष्ट्र से लेकर बंगाल-असम तक पूरे उत्तर भारत में इन दिनों दुर्गा पूजा का होना, घर-घर में दुर्गापाठ, व्रत-उपवास एवं कन्याओं का पूजन होगा - इसकी महिमा और जनता की आस्था के मुखर साक्ष्य हैं।

कन्या-पूजन

अपनी कुल परम्परा के अनुसार कुछ लोग नवरात्र की अष्टमी को और कुछ लोग नवमी को मॉं दुर्गा की विशेष पूजा एवं हवन करने के बाद कन्यापूजन करते हैं। कहीं-कहीं यह पूजन सप्तमी को भी करने का प्रचलन है।
कन्या पूजन में दो वर्ष से दस वर्ष तक की आयु वाली नौ कन्याओं और एक बटुक का पूजन किया जाता है। इसकी प्रक्रिया में सर्वप्रथम कन्याओं के पैर धोकर, उनके मस्तक पर रोली-चावल से टीका लगाकर, हाथ में कलावा (मौली) बॉंध, पुष्प या पुष्पमाला समर्पित कर कन्याओं को चुनरी उढ़ाकर हलवा, पूड़ी, चना एवं दक्षिणा देकर श्रद्धापूर्वक उनको प्रणाम करना चाहिए। कुछ लोग अपनी परंपरा के अनुसार कन्याओं को चूड़ी, रिबन व श्रृंगार की वस्तुएं भी भेंट करते हैं। कन्याएं मॉं दुर्गा का भौतिक एक रूप हैं। इनकी श्रृद्धाभक्ति से पूजा करने से मॉं दुर्गा प्रसन्न होती हैं।

नवरात्र में उपवास

व्रतराज के अनुसार नवरात्र के व्रत में - निराहारो फलाहारो मिताहारो हि सम्मत: - अर्थात्‌ निराहार, फलाहार या मिताहार करके व्रत रखना चाहिए। निराहार व्रत में केवल एक जोड़ा लौंग के साथ जल पीकर व्रत रखा जाता है। फलाहारी व्रत में एक समय फलाहार की वस्तुओं से भोजन किया जाता है, और मिताहारी व्रत में शुद्ध, सात्विक एवं शाकाहारी हविष्यान्न का ग्रहण होता है। नवरात्रि के व्रत में नौ दिन व्रत रखकर नवमी को कन्या पूजन के बाद पारणा किया जाता है। जिन लोगों के अष्टमी पुजती है, वे अष्टमी को कन्या पूजन के बाद पारणा कर लेते हैं। यदि नौ दिन का व्रत रखने का सामथ्र्य हो, तो नवरात्र की प्रतिपदा, सप्तमी अष्टमी एवं नवमी में किसी एक या दो दिन का व्रत अपनी श्रद्धा एवं शक्ति के अनुसार रखना चाहिए।
तन्त्रगम के अनुसार व्रत के दिनों में आचार एवं विचार की शुद्धता का पालन करने पर जोर दिया गया है। अत: व्रत के दिनों में चोरी, झूठ, क्रोध, ईष्र्या, राग, द्वेष एवं किसी भी प्रकार का छल-छिद्र नहीं करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि व्रत के दिनों में मन, वचन एवं कर्म से किसी का दिल दु:खाना नहीं चाहिए। जहां तक सम्भव हो, दूसरों का भला करना चाहिए।

पूजा के उपचार

पूजा में जो सामग्री चढ़ाई जाती है, उनको उपचार कहते हैं, ये पंचोपचार, दशोपचार एवं षोडशोपचार के भेद से तीन प्रकार के होते हैं।
पंचोपचार :  गन्ध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य - इन पॉंचों को पंचोपचार कहते हैं।
दशोपचार : 1. पाध, 2. अघ्र्य, 3. आचमनीय,  4. मधुपर्क, 5. आचमनीय, 6. गन्ध, 7. पुष्प, 8. धूप, 9. दीप एवं 10. नैवेद्य -  इनको दशोपचार कहते हैं।
षोडशोपचार : 1. आसन, 2. स्वागत, 3. पाध,    4. अर्घ्य, 5. आचमनीय, 6. मधुपर्क, 7. आचमन, 8. स्नान, 9. वस्त्र, 10. आभूषण, 11. गन्ध, 12. पुष्प, 13. धूप, 14. दीप, 15. नैवेद्य एवं प्रणामाज्जलि, इनको षोडशोपचार कहते हैं।
व्रत/उपवास के फलाहार की वस्तुएं
आलू, शक रकन्द, जिमिकन्द, दूध, दही, खोआ, खोआ से बनी मिठाइयों, कुट्ट, सिन्घाड़ा, साबूदाना, मूंगफली, मिश्री, नारियल, गोला, सूखे मेवा एवं मौसम के सभी फल-व्रतोपवास के फलाहार में प्रशस्त माने गये हैं। फलाहार की कोई भी वस्तु तेल में नहीं बनायी जाती और सादा नमक के स्थान पर सैन्धा (लाहौरी) नमक प्रयोग में लाया जाता है।
सप्तमी/अष्टमी/नवमी की पूजा
नवरात्र में अपनी कुल परम्परा के अनुसार सप्तमी, अष्टमी या नवमी को मॉं दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। इसमें एकाग्रतापूर्वक जप, श्रद्धा एवं भक्ति से पूजन एवं हवन, मनोयोगपूर्वक पाठ तथा विधिवत कन्याओं का पूजन किया जाता है। इससे मनुष्य की सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं।

17 सितंबर 2013

जनकपुर की कहानी

जनकपुर में आज भी सबकुछ  वैसा ही है जैसा माता जानकी और पुरुषोत्तम श्रीराम के विवाह के समय था


सीतामढ़ी (बिहार) से करीब 42 किलोमीटर उत्तर और नेपाल की तराई में स्थित जनकपुर, हिंदू धर्मावलम्बियों का प्रधान तीर्थ है। यहीं जानकी का विवाह हुआ था। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। प्राचीनकाल में यह मिथिला की नाभिभूमि या राजधानी थी, जहां जनक से कर्मयोग के व्यावहारिक ज्ञान हेतु देश-विदेश के जिज्ञासु जाते थे। यह विवेकियों का गढ़ था।

शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण, वृहदारण्यक उपनिषद् इत्यादि में उनकी चर्चा अनेक बार आयी है। ‘वृहद्विष्पुराण’ के अनुसार तीर्थाटन की पूर्णाहुति वहीं जाकर होती थी। वैसे तो वहां अनेक मंदिर, मंडप, कुंड इत्यादि हैं परंतु प्रमुख जानकी मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, विवाह मंडप एवं राम मंदिर हैं। उनमें प्रथम तीन तो एक ही विशाल प्रांगण में अवस्थित हैं।
किलानुमा दीवारों में घिरे वहां के सर्वप्रमुख एवं विशाल जानकी मंदिर के निर्माण की कथा है कि विवाहोपरांत जब सीता-राम जनकपुर से प्रस्थान करने लगे तो दु:ख से जनक मूर्चित हो गये। उन्होंने सीता-राम के स्मरणार्थ विश्वकर्मा को मूर्तियां तैयार करने का अनुरोध किया। कालांतर में वे मूर्तियां भूमिसात् हो गयीं।
उक्त प्रमुख मंदिर का निर्माण मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ की महारानी वृषभानुकुमारी ने संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर, उसी जगह कराया, जहां जगजननी जानकी की प्रेरणा से उनकी ही एक प्रतिमा तीर्थराज प्रयाग के साधु सुरकिशोर दास जी ने एक पेड़ की जड़ में पाई। उस मंदिर को ‘नौलखा मंदिर’ कहते हैं। इसके बरामदे पर हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठापित है।
किंवदन्तियों के अनुसार वहां जानकी मंदिर के समक्ष स्थित लक्ष्मण मंदिर का ही निर्माण सर्वप्रथम हुआ। कहा जाता है कि मिथिला में हति के पुत्र तथा कृति के पिता बहुलाश्व नाम जनकवंशीय अंतिम नरेश के समय भीषण अकाल पड़ा जिससे मुक्ति के लिए उन्होंने स्वयं उत्तराखंड में बारह वर्षों तक जब तपस्या की तो उन्हें शेष भगवान ने एक उपाय बताते हुए कहा कि ‘मैं प्रत्येक त्रेतायुग में श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के रूप में जन्म ग्रहण करता हूं, इसलिए मेरा एक मंदिर बनवायें।’ कालक्रम में वह मंदिर जब विनष्टï प्राय होने लगा तो जीर्णोद्धार कराया नजदीक के ही एक नरेश ने। जानकी मंदिर की बायीं ओर अवस्थित नण्य एवं भव्य विवाह मंडप, सीताराम के मूल विवाह मंडप ‘मणि मंडप’ से करीब दो किलोमीटर पर है, जिसके निर्माण में महन्त नवलकिशोरदास जी की प्रेरणा है। वैसे उन्होंने ‘मणि मंडप’ में ‘विवाह मंडप’ बनाने की तैयारी आरंभ कर दी थी किंतु उनकी आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर महंत रामशरणदासजी के प्रयास से नेपाल नरेश ने उस विवाह मंडप को बनवाया। उसमें सीताराम के माता-पिता के साथ ही श्रीराम एवं सीता के क्रमश: सहचर चारू शीलाजी तथा चंद्रकलाजी प्रसादजी की विशाल और भव्य प्रतिमाएं हैं किंतु देवी-देवताओं की छोटी-छोटी।
मंडप के चारों ओर चार छोटे-छोटे ‘कोहबर’ हैं जिनमें सीता-राम, माण्डवी-भरत, उर्मिला-लक्ष्मण एवं श्रुतिकीर्ति-शत्रुघ्र की मूर्तियां हैं।



राम-मंदिर के विषय में जनश्रुति है कि अनेक दिनों तक सुरकिशोरदासजी ने जब एक गाय को वहां दूध बहाते देखा तो खुदाई करायी जिसमें श्रीराम की मूर्ति मिली। वहां एक कुटिया बनाकर उसका प्रभार एक संन्यासी को सौंपा, इसलिए अद्यपर्यन्त उनके राम मंदिर के महन्त संन्यासी ही होते हैं जबकि वहां के अन्य मंदिरों के वैरागी हैं।
जनकपुर में अनेक कुंड हैं यथा-रत्ना सागर, अनुराग सरोवर, सीताकुंड इत्यादि। उनमें सर्वप्रमुख है प्रथम अर्थात् रत्नासागर जो जानकी मंदिर से करीब 9 किलोमीटर दूर ‘धनुखा’ में स्थित है। वहीं श्रीराम ने धनुष-भंग किया था। कहा जाता है कि वहां प्रत्येक पच्चीस-तीस वर्षों पर धनुष की एक विशाल आकृति बनती है जो आठ-दस दिनों तक दिखाई देती है।

मंदिर से कुछ दूर ‘दूधमती’ नदी के बारे में कहा जाता है कि जुती हुई भूमि के कुंड से उत्पन्न शिशु सीता को दूध पिलाने के उद्देश्य से कामधेनु ने जो धारा बहायी, उसने उक्त नदी का रूप धारण कर लिया।   

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