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30 अक्तूबर 2013

दिवाली पर कैसे करें लक्ष्मी पूजन


कैसे करें लक्ष्मी - गणेश का पूजन

दिवाली के दिन जहां व्यापारी अपनी दुकान या प्रतिष्ठान पर दिन के समय लक्ष्मी का पूजन करते हैं , वहीं गृहस्थ लोग शाम को प्रदोष काल में महालक्ष्मी का आह्वान करते हैं। गोधूलि लग्न में पूजा आरंभ करके महानिशीथ काल तक अपने अपने अस्तित्व के अनुसार महालक्ष्मी के पूजन को जारी रखा जाता है । लक्ष्मी पूजनकर्ता दिवाली के दिन जिन पंडित जी से लक्ष्मी का पूजन कराएं , हो सके तो उन्हें सारी रात अपने यहां रखें। उनसे श्रीसूक्त , लक्ष्मी सहस्रनाम आदि का पाठ और हवन कराएं।


कैसे करें तैयारी

एक थाल में या भूमि को शुद्ध करके नवग्रह बनाएं अथवा नवग्रह का यंत्र स्थापित करें। इसके साथ ही एक तांबे का कलश बनाएं , जिसमें गंगाजल दूध दही - शहद सुपारी सिक्के और लौंग आदि डालकर उसे लाल कपड़े से ढककर एक कच्चा नारियल कलावे से बांध कर रख दें। जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया है वहां पर रुपया , सोना या चांदी का सिक्का लक्ष्मी जी की मूर्ति अथवा मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी गणेश सरस्वती जी अथवा ब्रह्मा , विष्णु , महेश आदि देवी देवताओं की मूर्तियां अथवा चित्र सजाएं । कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रूप मानकर दूध दही और गंगाजल से स्नान कराएं। अक्षत , चंदन का श्रृंगार करके फल फूल आदि से सज्जित करें। इसके ही दाहिने ओर एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलाएं। जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है ।

क्या है लक्ष्मी पूजन की विधि

लक्ष्मीपूजनकर्ता स्नान आदि नित्यकर्म से निवृत होकर पवित्र आसन पर बैठकर आचमन , प्राणायाम करके स्वस्ति वाचन करें। अनन्तर गणेशजी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गन्ध , अक्षत , पुष्प , दूर्वा , द्रव्य और जल आदि लेकर दीपावली महोत्सव के निमित्त गणेश , अम्बिका , महालक्ष्मी , महासरस्वती , महाकाली , कुबेर आदि देवी - देवताओं के पूजनार्थ संकल्प करें। इसके बाद सर्वप्रथम गणेश और अम्बिका का पूजन करें। इसके बाद नवग्रह पूजन करके महालक्ष्मी आदि देवी - देवताओं का पूजन करें।

दिवाली पूजन मुहूर्त 2013

Diwali Puja Muhurat 2013


दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन शुभ समय मुहूर्त्त समय पर ही किया जाना चाहिए. पूजा को सांयकाल अथवा अर्द्धरात्रि को अपने शहर व स्थान के मुहुर्त्त के अनुसार ही करना चाहिए. इस वर्ष 3 नवम्बर, 2013 को  रविवार के दिन दिवाली मनाई जाएगी.  स्वाती नक्षत्र का काल रहेगा, इस दिन प्रीति योग तथा चन्दमा तुला राशि में संचार करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है.

3 नवम्बर 2013, रविवार के दिन 17:33 से लेकर 02 घण्टे 24 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा. इसे दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में उपयोग करते हैं. इस दिन पूजा स्थिर लग्न में करनी चाहिए क्योंकि शास्त्रों के अनुसार स्थिर लग्न दिवाली पूजा में उतम माना जाता है. इस दिन प्रदोष काल व स्थिर लग्न का समय सांय 18:15 से 20:09 तक रहेगा.  इसके पश्चात 18:00 से 21:00 तक शुभ चौघडिया भी रहने से मुहुर्त की शुभता बनी रहेगी.



लक्ष्मी पूजन सामग्री | Material For Lakshmi Worship

इस पूजन में रोली, मौली, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, धूप, कपूर, अगरबत्ती, गुड़, धनिया, अक्षत, फल-फूल, जौं, गेहुँ, दूर्वा, श्वेतार्क के फूल, चंदन, सिंदूर, दीपक, घृत, पंचामृत, गंगाजल, नारियल, एकाक्षी नारियल, पंचरत्न, यज्ञोपवित, मजीठ, श्वेत वस्त्र, इत्र, फुलेल, पान का पत्ता, चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, कुबेर यंत्र, श्री यंत्र, लक्ष्मी व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, मिष्ठान इत्यादि वस्तुओं को पूजन समय रखना चाहिए.

लक्ष्मी पूजन विधि व नियम | Rituals To Worship Goddess Lakshmi

लक्ष्मी पूजन घर के पूजा स्थल या तिजोरी रखने वाले स्थान पर करना चाहिए, व्यापारियों को अपनी तिजोरी के स्थान पर पूजन करना चाहिए. उक्त स्थान को गंगा जल से पवित्र करके शुद्ध कर लेना चाहिए, द्वारा व कक्ष में रंगोली को बनाना चाहिए, देवी लक्ष्मी को रंगोली अत्यंत प्रिय है. सांयकल में लक्ष्मी पूजन समय स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्रों को धारण करना चाहिए विनियोग द्वारा पूजन क्रम आरंभ करें.
अपसर्पन्त्विति मन्त्रस्य वामदेव ऋषि:, शिवो देवता, अनुष्टुप छन्द:, भूतादिविघ्नोत्सादने विनियोग:।
मंत्र :- अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिता:।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ||
लक्ष्मी व गणेश के चित्र, श्री यंत्र को लाल वस्त्र बिछाकर चौकी पर स्थापित करें.  आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर बैठे तथा यह मंत्र बोल कर अपने उपर व पूजन सामग्री पर जल छिड़कना चाहिए.
मंत्र:- ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।।
उसके बाद जल-अक्षत लेकर पूजन का संकल्प करें- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरूषस्य विष्णोराज्ञप्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोSह्नि द्वितीयपराधें श्रीश्वेतवाराहकल्पे वीवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अद्य मासोत्तमे मासे कार्तिकमासे कृष्णपक्षे पुण्यायाममावास्यायां तिथि, वार और गोत्र के नाम का उच्चारण करना चाहिए,
अहंश्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलावाप्तिकामनया ज्ञाताज्ञातकायिकवाचिकमानसिक सकलपापनिवृत्तिपूर्वकं स्थिरलक्ष्मीप्राप्तये श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं महालक्ष्मीपूजनं कुबेरादीनां च पूजनं करिष्ये। तदड्त्वेन गौरीगणपत्यादिपूजनं च करिष्ये।
अब संकल्प का जल भूमि पर छोड़ दें. सर्वप्रथम भगवान गणेश का पूजन करना चाहिए. इसके बाद गंध, अक्षत, पुष्प इत्यादि से कलश पूजन तथा उसमें स्थित देवों का षोडशपूजन करें. तत्पश्चात प्रधान पूजा में मंत्रों द्वारा भगवती महालक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करें. पूजन पूर्व श्री यंत्र, शंख, सिक्कों आदि की मंत्र द्वारा पूजा करनी चाहिए. लाल कमल पुष्प लेकर मंत्र से देवी का ध्यान करना चाहिए,

न्यास | Nyas

श्रीआनन्द कर्दम चिक्लीतेन्दिरा सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। अनुष्टुप् वृहति प्रस्तार पंक्ति छन्दोभ्यो नमः मुखे। श्रीमहालक्ष्मी देवताय नमः हृदि। श्रीमहा लक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे राज वश्यार्थे सर्व स्त्री पुरुष वश्यार्थे महा मन्त्र जपे विनियोगाय नमः।

कर-न्यास | Kar - Nyas

ॐ हिरण्मय्यै अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ चन्द्रायै तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै अनामिकाभ्यां हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै कर-तल-करपृष्ठाभ्यां फट्।

अंग-न्यास | Ang - Nyas

ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै नमः कवचाय हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट्।

ध्यान | Meditation

ॐ अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः पुञ्ज-वर्णा,
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु-
भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।।

महामन्त्र | Maha Mantra

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
विधिवत रुप से श्रीमहालक्ष्मी का पूजन करने के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करनी चाहिए. इस दिन की विशेषता लक्ष्मी जी के पूजन से संबन्धित है. इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी जी के पूजन के रुप में उनका स्वागत किया जाता है.

DHARMMARG: Diwali SMS in Hindi for Friends

DHARMMARG: Diwali SMS in Hindi for Friends: Khub meete meete pakwan khaye, sehat me char chand lagaye, log to sirf chand par gaye hai aap us se bhi upar jaye, Diwali par ...

Diwali SMS in Hindi for Friends


Khub meete meete pakwan khaye,
sehat me char chand lagaye,
log to sirf chand par gaye hai
aap us se bhi upar jaye,
Diwali par hamari yahi hai shubhkamnaye… :)
Happy Diwali 2013
Koi Muskurata hai,
Kisi ke aasu behte hai,
Dosto saal me ek baar
Diye ka dil jalta hai aur
Log usiko Diwali kehte hai..


Muskarte hanste deep tum jalana,
Jivan main nai khushiyon ko lana,
Dukh dard apne bhool kar,
Sabko gale lagna, sabko gale lagna…
“Happy Diwali 2013“

Diwali Dua SMS
Is diwali pe humari dua hai ki apka har sapnna pura ho,
duniya ke unche mukam apke ho,
shoharat ki bulandiyon par naam apka ho!
Wish you a very Happy Diwali 2013!


Diwali SMS
Charo Aur Diya Jalaao,
Apne Ghar Ko Khub Sajaao
Aaj Ki Raat Pataakhen Bajaao,
Diwali Ko Achhi Tarah Manaao,
Happy Diwali…


Hindi Diwali SMS
Dosto se har lamhe me diwali hai,
Dosti ki ye dunia diwani hai,
dosto ke bina jindgi bekar hai,
dosto se hi to jindgi me bahar hai…
Happy Diwali 2013


Sabhko Diwali Ki Shubh Kaamnaye 
Hum Dete Hai Aapko Lakho Duaye. 
Naya Varsh Ho Purane Jaisa Yaadgar, 
Aap Sabko Mile Apni Khushiyon Ka Sansar… 
Dewali ki bhaut bhaut shubhkamnaye…… 
Happy Diwali 2013 - 


Pal Pal Sunhare Fool Khile,
Kabhi Na Ho Kaanto Ka Saamna,
Jindagi Aapki Khushiyo Se Bhari Rahe,
Dipawali Par Humaari Yahi Shubhkamna.
Depawali ki dher sari shubhkamnaye…….
Happy Diwali 2013

Diwali Parva hai Khushio ka,
Ujalo ka, Laxmi ka…. Is Diwali Aapki Jindagi khushio se bhari ho,
Duniya ujalo se roshan ho, ghar par Maa Laxmi ka Aagman ho…
Happy Diwali.


Deepak ka prakash har pal aapke Jivan me ek nayi roshni de,
bas yahi shubhkamna hai hamari aapke liye Diwali ke is pawan avsar par. !! Happy Diwali !!


Jagmag Thali Sajao
Mangal Deepo ko Jalao
Apne Gharo aur Dilo main Asha ki Kiran Jagao
Khushali aur Samridhi se bhara ho apka jeevan
Isi Kamna ke Saath Shubh Deepawali.


Andhera hua dur raat ke saath
Nayi subha aayi diwali leke sath
Ab ankhne kholo dekho ek message aaya hai
Diwali ki subh kamna sath laya hai.
” Happy Diwali”


Na dimag se
Na zuban se
Na paigam se
Na message se
Na gift se
Aap ko happy diwali
Direct dil se


I Pray to God to give You:-
Shanti,
Shakti,
Sampati,
Swarup,
Saiyam,
Saadgi,
Safalta,
Samridhi,
Sanskar,
Swaasth,
Sanmaan,
Saraswati,
aur SNEH.
SHUBH DIWALI..


*Kya Bharosa
*Mobile Ka
*Battery ka
*Charger Ka
*Network Ka
*Balance Ka
*Life ka
*Time ka
*Isi Liye Advance Me
“Happy Diwali!



Is Diwali maa lakshmi aur ganesh ji 
aapke jeevan ko sukh, safalta aur 
samruddhi se bhar de. 
apko aur aapke parivaar ko hamari taraf se
HAPPY DIWALI….


Aaj 2 log aapke bare main puch rahe the maine usko aapka mobile no. de diya hai,woh jaldi hi aapke pass ate hi honge, unka naam hai KHUSI AUR KAMYABI. “WISH YOU HAPPY DIWALI…


Pal Pal Sunhare Fool Khile, 
Kabhi Na Ho Kaanto Ka Saamna, 
Jindagi Aapki Khushiyo Se Bhari Rahe, 
Dipawali Par Humaari Yahi Shubhkamna.


Laxmi aayegi itni ki sab jagah Naam hoga,
Din raat vyapar bade itna adhik kaam hoga,
Ghar Pariwar samaj me banoge Sartaj, 
Yehi Kamna hai hamari aap ke liye
Diwali ki Dhero Shubh Kamanaye…


Pathake,Phooljhariyon ke saath,
Masti se bhari ho diwali ki raat,
Pyar bhare ho din yeh saare,
Khushiyan rahe sada saath tumhare.
Happy Diwali.


Khub meete meete pakwan khaye,
sehat me char chand lagaye,
log to sirf chand par gaye hai
aap us se bhi upar jaye,
Diwali par hamari yahi hai shubhkamnaye


Sri ram ji aapke ghar sukh ki barsat karen,
Dukhon ka naas karen.
Prem ki phuljhari aur anar aapke ghar ko roshan kare.
Roshni ke diye aapki jingagi me khusiya layen.
Happy deepawali…


Kumkum bhare kadmon sey aaye LAYXMI JI apke dawar,
sukh sampati mile aapko apar,
Deepawali ki subhkamnain kare sweakar.
HAPPY DIWALI


Deep Jalte jagmagate rahe, Hum aapko Aap hame yaad aate rahe,
Jab tak zindagi hai, dua hai hamari ‘Aap Chand ki tarah Zagmagate rahe…Happy Deepavali…..


Ashirwad Mile Bado Se
Sahyog Mile Apno Se
Khusiya Mile Jag Se
Doulat Mile Rub Se
Yahi Dua Karte He Hum Dil Se
Wish YOU A VERY HAPPY DIWALI



Makki ki Roti, Nimbu ka Aachar,
Suraj Ki Kirne, Khushiyo ki Bahar,
Chand Ki Chandi, Apno ka Pyar,
Mubarak Ho Aapko, DIWALI ka Tyohar


Aayii aayii Diwali aayii,
Sath me ktini Khushiyan laayi,
Dhoom machao, mouj manao,
aap sab ko Diwali ki badhai.
Happy Diwali


Lakhsmi ka Hath ho, 
Saraswati ka Sath ho, 
Ganesh ka niwas ho, 
Aapke jeevan mai prakash hi prakash ho….
“HAPPY DIWALI”.


Is diwali pe humari dua hai ki apka har sapnna pura ho,
duniya ke unche mukam apke ho,
shoharat ki bulandiyon par naam apka ho!
Wish you a very Happy Diwali!


Phool ki shuruvat kali se hoti hai,
Zindagi ki shuruvat pyar se hoti hai,
Pyar ki shuruvat apno se hoti hai aur
apno ki shuruvat aapse hoti hai.
* Happy Diwali *


Khushian ho overflow,
Masti kabhi na ho low,
Dosti ka surur chaya rahe,
Dhan aur shorat ki ho bauchar,
Aisa aaye aapke liye,
Diwali ka tyohar


Har Khushi Aap ke Pass Pauchae 
Yeh Dil se Is Diwali Ke Waqt Aap ke Liye 
Ishwar Se Prathana Karta Hu.Happy Deepwali….


Diwali, Gul ne gulshan se gulfam bheja hai,
sitaro ne gagan se salam bheja hai,
Mubarak ho apko ye “DIWALI” .
Happy Diwali…


Khushian ho overflow,
masti kabhi na ho low,
dosti ka surur chaya rahe,
dhan aur shorat ki ho bauchar, 
aisa aaye aapke liye
DIWALI KA TYOHAR.Happy Diwali


Ek Dua Mangte hai hum apne rab se…
Chahte hai Aapki Khushi Purey imaan se,
Sab Hasratein Puri Ho Aapki,
Aur Aap Muskaraye Dil-o-Jaan se…
Happy Diwali!!

27 अक्तूबर 2013

श्याम चूड़ी बेचने आया


मनहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

झोली कंधे धरी, उस में चूड़ी भरी।
गलिओं में चोर मचाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

राधा ने सुनी, ललिता से कही।
मोहन को तरुंत बुलाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

चूड़ी लाल नहीं पहनू, चूड़ी हरी नहीं पहनू।
मुझे श्याम रंग है भाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

राधा पहनन लगी श्याम पहनाने लगे।
राधा ने हाथ बढाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

राधे कहने लगी, तुम हो छलिया बढे।
धीरे से हाथ दबाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

श्री राधे गोविंदा मन भज ले हरी का प्यारा नाम है


श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है।
गोपाला हरी का प्यारा नाम है, नंदलाला हरी का प्यारा नाम है॥

मोर मुकुट सर गल बन माला, केसर तिलक लगाए,
वृन्दावन में कुञ्ज गलिन में सब को नाच नचाए।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

गिरिधर नागर कहती मीरा, सूर को शयामल भाया,
तुकाराम और नामदेव ने विठ्ठल विठ्ठल गाया।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

नरसी ने खडताल बजा के सांवरिया को रिझाया,
शबरी ने अपने हाथों से प्रभु को बेर खिलाया।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

राधा शक्ति बिना ना कोई श्यामल दर्शन पाए,
आराधन कर राधे राधे काहना भागे आए।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

सिमरन का रस जिसको आया, वो ही जाने मन में,
निराकार साकार होतरे भगतों के आँगन में।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

श्याम सलोना कुंजबिहारी नटवर लीलाधारी,
अन्तर्वासी हरिअविनाशी लागे शरण तिहारी।
श्री राधे गोविंदा, मन भज ले हरी का प्यारा नाम है॥

जग में सुन्दर है दो नाम



जग में सुन्दर है दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम |
बोलो राम राम राम, बोलो श्याम श्याम श्याम ||

माखन ब्रज में एक चुरावे, एक बेर के खावे |
प्रेम भाव से भरे अनोखे, दोनों के है काम ||

एक कंस पापी को मारे, एक दुष्ट रावण संहारे |
दोनों दीन के दुःख हरत है, दोनों बल के धाम ||

एक ह्रदय में प्रेम बढावे, एक ताप संताप मिटावे |
दोनों सुख के सागर है, और दोनों पूरण काम ||

एक राधिका के संग राजे, एक जानकी संग बिराजे |
चाहे सीता-राम कहो, या बोलो राधे-श्याम ||

किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए


किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए।
जुबा पे राधा राधा राधा नाम हो जाए॥

जब गिरते हुए मैंने तेरे नाम लिया है।
तो गिरने ना दिया तूने, मुझे थाम लिया है॥

तुम अपने भक्तो पे कृपा करती हो, श्री राधे।
उनको अपने चरणों में जगह देती हो श्री राधे।
तुम्हारे चरणों में मेरा मुकाम हो जाए॥

मांगने वाले खाली ना लौटे, कितनी मिली खैरात ना पूछो।
उनकी कृपा तो उनकी कृपा है, उनकी कृपा की बात ना पूछो॥

ब्रज की रज में लोट कर, यमुना जल कर पान।
श्री राधा राधा रटते, या तन सों निकले प्राण॥

गर तुम ना करोगी तो कृपा कौन करेगा।
गर तुम ना सुनोगी तो मेरी कौन सुनेगा॥

डोलत फिरत मुख बोलत मैं राधे राधे, और जग जालन के ख्यालन से हट रे।
जागत, सोवत, पग जोवत में राधे राधे, रट राधे राधे त्याग उरते कपट रे॥

लाल बलबीर धर धीर रट राधे राधे, हरे कोटि बाधे रट राधे झटपट रे।
ऐ रे मन मेरे तू छोड़ के झमेले सब, रट राधे रट राधे राधे रट रे॥

श्री राधे इतनी कृपा तुम्हारी हम पे हो जाए।
किसी का नाम लूँ जुबा पे तुम्हारा नाम आये॥

वो दिन भी आये तेरे वृन्दावन आयें हम, तुम्हारे चरणों में अपने सर को झुकाएं हम।
ब्रज गलिओं में झूमे नाचे गायें हम, मेरी सारी उम्र वृन्दावन में तमाम हो जाए॥

वृन्दावन के वृक्ष को, मर्म ना जाने कोई।
डार डार और पात पात में, श्री श्री राधे राधे होए॥

अरमान मेरे दिल का मिटा क्यूँ नहीं देती, सरकार वृन्दावन में बुला क्यूँ नहीं लेती।
दीदार भी होता रहे हर वक्त बार बार, चरणों में अपने हमको बिठा क्यूँ नहीं लेती॥

श्री वृन्दावन वास मिले, अब यही हमारी आशा है।
यमुना तट छाव कुंजन की जहाँ रसिकों का वासा है॥

सेवा कुञ्ज मनोहर निधि वन, जहाँ इक रस बारो मासा है।
ललिता किशोर अब यह दिल बस, उस युगल रूप का प्यासा है॥

मैं तो आई वृन्दावन धाम किशोरी तेरे चरनन में।
किशोरी तेरे चरनन में, श्री राधे तेरे चरनन में॥

ब्रिज वृन्दावन की महारानी, मुक्ति भी यहाँ भारती पानी।
तेरे चन पड़े चारो धाम, किशोरी तेरे चरनन में॥

करो कृपा की कोर श्री राधे, दीन जजन की ओर श्री राधे।
मेरी विनती है आठो याम, किशोरी तेरे चरनन में॥

बांके ठाकुर की ठकुरानी, वृन्दावन जिन की रजधानी।
तेरे चरण दबवात श्याम, किशोरी तेरे चरनन में॥

मुझे बनो लो अपनी दासी, चाहत नित ही महल खवासी।
मुझे और ना जग से काम, किशोरी तेरे चरण में ॥

किशोरी इस से बड कर आरजू -ए-दिल नहीं कोई।
तुम्हारा नाम है बस दूसरा साहिल नहीं कोई।
तुम्हारी याद में मेरी सुबहो श्याम हो जाए॥

यह तो बता दो बरसाने वाली मैं कैसे तुम्हारी लगन छोड़ दूंगा।
तेरी दया पर यह जीवन है मेरा, मैं कैसे तुम्हारी शरण छोड़ दूंगा॥

ना पूछो किये मैंने अपराध क्या क्या, कही यह जमीन आसमा हिल ना जाये।
जब तक श्री राधा रानी शमा ना करोगी, मैं कैसे तुम्हारे चरण छोड़ दूंगा॥

बहुत ठोकरे खा चूका ज़िन्दगी में, तमन्ना तुम्हारे दीदार की है।
जब तक श्री राधा रानी दर्शा ना दोगी, मैं कैसे तुम्हारा भजन छोड़ दूंगा॥

तारो ना तारो मर्जी तुम्हारी, लेकिन मेरी आखरी बात सुन लो।
मुझ को श्री राधा रानी जो दर से हटाया, तुम्हारे ही दर पे मैं दम तोड़ दूंगा॥

मरना हो तो मैं मरू, श्री राधे के द्वार,
कभी तो लाडली पूछेगी, यह कौन पदीओ दरबार॥

आते बोलो, राधे राधे, जाते बोलो, राधे राधे।
उठते बोलो, राधे राधे, सोते बोलो, राधे राधे।
हस्ते बोलो, राधे राधे, रोते बोलो, राधे राधे॥

22 अक्तूबर 2013

मोक्ष देती हैं ये सप्तपुरियां

ये सभी सप्तपुरियां भगवान शिव को बहुत प्रिय और भक्तों के लिए मोक्षदायिनी हैं। श्रावण मास के दौरान यक्ष, किन्नर, देव, मनुष्य और दानव भी इन सप्तपुरियों के भ्रमण तीर्थ और स्नान से पाप मुक्त हो जाते है ऐसा शिवपुराण में वर्णन है।

Kashi Vishwanath_ Varanasi

काशी:-श्रावण मास में किया जाने वाला यह उत्तर भारत का प्रधान तीर्थ है। इसका नाम बनारस या वाराणसी भी है। उत्तर रेलवे की मुगल सराय से अमृतसर तथा देहरादून जाने वाली मुख्य लाइन के मुगल सराय स्टेशन से 7 मील पर काशी और उससे 4 मील आगे बनारस छावनी स्टेशन है। इलाहाबाद के प्रयाग स्टेशन से भी जंघई होकर एक सीधी लाइन काशी होती हुई बनारस छावनी तक जाती है। पूर्वोत्तर रेलवे की एक लाइन भटनी से तथा दूसरी छपरा से इलाहाबाद सिटी तक जाती है। उनसे भी बनारस सिटी होते हुए बनारस छावनी जा सकते हैं। गंगा किनारे यह भगवान शंकर की प्रसिद्ध पुरी है।

Haridwar

मायापुरी (हरिद्वार):- श्रावण मास आरंभ होते ही सारे उत्तर और मध्य भारत के शिवभक्त इस शिव चतुर्दशी को अपने क्षेत्र के शिव मंदिर में हरिद्वार का पवि़त्र गंगाजल लेने के लिए कांवड़ धारण करके हरिद्वार पहुंचते हैं। पूरे एक पखवाड़े तक हरिद्वार में शिवभक्तों की भीड़ लगी रहती है और रंगविरंगे कांवड़ का बाजार सजा रहता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोले के भक्त इन कांवड़ों को खरीद हैं और फिर पैदल ही वापसी की लंबी यात्रा पर निकल जाते हैं। प्रतिदिन लाखों भक्त हरिद्वार पहुंचते हैं और वहां से वापसी कांवड़ लेकर निकलते रहते हैं। इस दौरान समाजसेवी और शिव के भक्त गण रास्ते में इन कांवड़ धारियों के लिए भोजन.स्नान और आराम आदि की भी भंडारे के तौर पर सेवा करते हैं और थोड़े-थोड़े अन्तरराल पर सड़कों के किनारे पंडाल सेवा तत्पर रहती है। उत्तर रेलवे की मुगल सराय से अमृतसर जाने वाली मुख्य लाइन पर लक्सर स्टेशन है। वहां से एक लाइन हरिद्वार तक गई है। गंगा जी यही पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर सममतल भूमि में प्रवेश करती हैं, इससे इसे गंगा द्वार भी कहते हैं। यहां पर प्रतिदिन होने वाली मां गंगा की सांयकालीन आरती के समय श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। नदी पर तैरती दीपमालिकाओं का दृश्य देखते ही बनता है ।
Kanchi Kamkoti
कांची कामकोटि पीठ:- दक्षिण रेलवे मद्रास से धनुष्कोटि जाने वाली मुख्य लाइन के मद्रास स्टेशन से 35 मील पर चेंगलपट स्टेशन है। वहां से एक लाइन अरकोनम तक जाती है। इस लाइन पर कांजीवरम स्टेशन है। कांची कामकोटि पीठ यही पर है। इसके निकटस्थ स्टेशन का नाम कांजीवरम है किन्तु नगर का नाम कांचीपुरम है। प्राचीन काल में पितामह ब्रह्मा जी ने यहां मां भगवती के दर्शन के लिए दुष्कर तपस्या की थी। महालक्ष्मी हाथ में कमल धारण किये उनके सामने प्रकट हुईं। इस पीठ के शंकराचार्च को वार धामों के आदि गुरुओं के समतुल्य माना जिनका विशाल मठ भी कांची में स्थित है।

Ayodhya Nagri

अयोध्यापुरी:- उत्तर रेलवे की मुगल सराय लखनऊ लाइन के मुगल सराय स्टेशन से 128 मील पर अयोध्या स्टेशन है। भगवान श्री राम की यह पवित्र अवतार भूमि सरयू तट पर है। अयोध्या ऐसा तीर्थ बताते हैं जहां रामलला का जन्म हुआ और रामराज्य की स्थापना के बाद सशरीर श्रीराम अयोध्या के घाट से स्वर्ग को आरोहण कर गए अयोध्या सभी देवी देवताओं के मंदिरों की नगरी है और साधु संतों के मठ अखाड़ों के अलावा त्रेता युगीन अवशेष आज भी यहां श्रद्धालुओ के विस्मय का केन्द्र है।

Mahakal

उज्जैन की महाकालपुरी:- मध्य रेलवे की मुंबई भोपाल दिल्ली लाइन के भोपाल स्टेशन से एक लाइन उज्जैन जाती है। पश्चिम रेलवे की मुंबई कोटा दिल्ली लाइन पर नागदा स्टेशन से एक बड़ी लाइन भी उज्जैन तक गई है। उक्त लाइन के महू स्टेशन से भी एक लाइन उज्जैन को गई है। शिप्रा नदी के तट पर बसी महाकाल की यह नगरी पतित पावनी है। कहते हैं महाकाल को नमस्कार कर लेने पर फिर मृत्यु की चिनता नहीं रहती। कीट या तपंग भी यहां करने पर भगवान शिव के अनुचर होते हैं।

Dwarkapuri

द्वारकापुरी:- यह चार धामों में एक धाम भी है। पश्चिम रेलवे की सुरेंद्रनगर ओखा पोर्ट लाइन पर यह नगर समुद्र किनारे का स्टेशन है। भगवान कृष्ण ने इसे समुद्र के बीच में विशेष रूप से बसाया था।
Vrindavan

मथुरापुरी और वृन्दावन विहारी का ब्रजधाम:- पूर्वोत्तर रेलवे की आगरा फोर्ट से गोरखपुर जाने वाली लाइन तथा पश्चिम रेलवे की मुंबई कोटा दिल्ली लाइन पर मथुरा स्टेशन है। यमुना तट पर भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की अवतार भूमि का यह पवित्र नगर स्थित है। और शिव की शक्ति के लिए श्रावण के पवित्र सोमवार को मथुरा में यमुना का स्नान और बांके विहारी के मन्दिर के दर्शन पूजन से सभी सांसारिक कष्ट दूर होते हैं।

Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan

गोवर्धन पूजा – भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीला

Govardhandhari Krishnamurari


कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है । इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि उत्सव भी सम्पन्न होते है । यह ब्रजवासियो का मुख्य त्यौहार है । अन्नकुट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई । गाय बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है । गायो कामिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है । गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल,फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते है तथा परिक्रमा करते है ।
एक बार श्री कृष्ण गोप गोपियो के साथ गाये चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुचे । वहाँ उन्होने देखा कि हजारो गोपियाँ गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन प्रकार के भोजन रखकर बडें उत्साह से नाच गाकर उत्सव मना रही है । श्री कृष्ण के पूछने पर गोपियो ने बताया कि मेघो के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव हता है । कृष्ण बोले यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएँ तब तो इस उत्सव की कुछ किमत है । गोपियां बोलींतुम्हे इन्द्र की निन्दा नहीं करनी चाहीए ।

Annkut Mahotsav


श्री कृष्ण बोले वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है इसलिये हमें इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप ग्वाल अपने अपने घरों में पकवान ला लाकर श्रीकृष्ण की बताई विधी से गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे । इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न कर गोवर्धन की पूजा की जा रही है तो वह बहुत कुपित हुए और मेघ को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसाये कि वहाँ पर प्रलय आ जाये। मेघ इन्द्र की आज्ञा से मुसलाधार वर्षा करने लगे। श्रीकृष्ण ने सब गोप गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने अपने गाय बछडों को लेकर गोवर्धन की तराई में पहुंच जाएं। गोवर्धन ही मेघ से रक्षा करेंगे । सब गोप-गोपियां अपने अपने गाय बछडों, बैलों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचने लगे । श्री कृष्ण ने गोर्वधन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उँगली पर धारण कर छाता सा तान दिया । सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे । सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियो पर जल की एक बूँद भी नहीं पडी । ब्रह्याजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्री कृष्ण ने जन्म ले लिया है । उनसे तुम्हारा वैर लेना उचित नहीं है । श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव अपनी मुर्खता पर बहुत लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे । श्रीकृष्ण ने सातवेंदिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मानाया करो । तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित हो गया ।

अब यह घर-घर में प्रचलित है। इस दिन महिलाएं गोबर से आंगन में चौकोर पूरती हैं। चौकोर के मध्य साबुत अन्न रख कर लट्ठ से कूटती हैं। बहनें अपने भाईयों को केराव का दाना निगलने को देती है। साथ में मिठाईयां भी और यदि विवाहित हैं तो अपने घर में भोजन का आमंत्रण देती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह भाई-दूज कहलाता और बहन अपने भाई की मंगल कामना करती हैं। कहा जाता है कि इस दिन मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर भोजन किया था।

इस त्योहार के पीछे एक कथा प्रचलित है कहा जाता है कि यम और यमुना भाई-बहन थे। एक दिन यम ने यमुना के यहां खाना खाया और इसी दिन से ही यह त्योहार मनाया जाने लगा। गोधन कूटने के पीछे भी एक कारण है मथुरा में गोधन नाम का एक यदुवंशी रहता था। उसकी पत्नी गोपीयों के साथ कृष्ण के यहां जाती थी। जब भगवान बासुंरी की मीठी तान छोड़ते तो सारी गोपीयां नदी के किनारे चली आती जब गोधन को यह पता चला की उसकी पत्नी भी जाती है तो वह उसे देख्नने लगा तभी श्री कृष्ण ने उसे देखा और मार दिया। गोपीयों ने भी उसे लाठी- डंडे से पीटकर मार दिया। इस दिन स्त्रियां रेगनी के कांटे से अपने भाईयों को श्राप देती हैं और बाद में गोधन को कूट्कर वहां से पानी लाकर श्राप से मुक्ति दिलाने के लिये भगवान से प्रार्थना करती हैं।

21 अक्तूबर 2013

आस्था का पर्व है छठ




छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल सष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। छठ हमारे देशमें सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ । मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है । यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है । पहली बार चैत्रमें और दूसरी बार कार्तिक में । चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले पर्वको कार्तिकी छठ कहा जाता है । पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है । इस पर्व को स्त्री और पुरुष समानरूपसे मनाते हैं । छठ व्रतके संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएमें हार गए, तब द्रौपदीने छठ व्रत रखा । तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया । यह व्रत खासतौर पर भारत में बिहार व उसके आस-पास के प्रांतों में प्रचलित है। वैसे तो यह त्योहार संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है लेकिन बिहार और उत्तरप्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। लोगों को इस पर्व का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। मूलत: यह भगवान सूर्य देव की पूजा-आराधना का पर्व है। सूर्य अर्थात् रोशनी, जीवन एवं ऊष्मा के प्रतीक छठ के रूप में उन्हीं की पूजा-आराधना की जाती है। धर्म शास्त्रों में यह पर्व सुख-शांति, समृद्धि का वरदान तथा मनोवांछित फल देने वाला बताया गया है। लोकपरंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है । लोक मातृ का षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी । छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें  पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं । उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है । पर्वपालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है । पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिल सकता है । सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वीपर आती हैं । सूर्यका प्रकाश जब पृथ्वीपर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है । वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है । पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है । इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है । पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है । सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है । अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बल्कि उस धूपद्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है । छठ जैसी खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वीके भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरोंपर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं । वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है । ज्योतिषीय गणनाके अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मासकी अमावस्या के छ: दिन उपरांत आती है । ज्योतिषीय गणनापर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है । यह पर्व चार दिनोंका है । भैयादूज के तीसरे दिन से यह आरंभ होता है । पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दूकी सब्जी प्रसादके रूपमें ली जाती है । अगले दिनसे उपवास आरंभ होता है । इस दिन रात में खीर बनती है । व्रतधारी रातमें यह प्रसाद लेते हैं । तीसरे दिन डूबते हुए सूर्यको अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं । अंतिम दिन उगते हुए सूर्यको अर्घ्य चढ़ाते हैं । इस पूजामें पवित्रताका ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्ज्य है । जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं । आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्यदेवताकी मूर्तिकी स्थापना करना । पटाखे भी जलाए जाते हैं । कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्रा का भी आयोजन होता है; परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है । पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं।छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं। 


छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।भारत में सूर्योपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गई है। मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है।सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रारंभ हो गई, लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है। निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है।भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गई, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था। छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था।एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्य युक्त मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और लाउडस्पीकर के शोर से दूर यह पर्व बाँस निर्मित सूप, टोकरि, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद, और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गई उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रंथ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थअना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के साथकी जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाइ, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति भाव से पूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं।
केलवा जे फरेला घवद सेओह पर सुगा मे़ड़राय 
काँच ही बाँस के बहंगियाबहंगी लचकत जाए‘ .....
 
सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार। 
उगु  सुरुज देव भइलो अरग के बेर। 

निंदिया के मातल सुरुज अँखियो  खोले हे। 
चार कोना के पोखरवा 

हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।

04 अक्तूबर 2013

कैसे करें घट स्थापना...


आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की धूम नौ दिनों तक रहेगी। इन दिनों मां भगवती के नौ रूपों का पूजन-अर्चन होगा। आइए जानते हैं घटस्थापना कैसे करें :-

* घटस्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए।

* नित्य कर्म और स्नान के बाद ध्यान करें।

* इसके बाद पूजन स्थल से अलग एक पाटे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं।

* इस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर इस पर जल से भरा कलश स्थापित करें।
* इस कलश में शतावरी जड़ी, हलकुंड, कमल गट्टे व रजत का सिक्का डालें।

* दीप प्रज्ज्वलित कर इष्ट देव का ध्यान करें।

* तत्पश्चात देवी मंत्र का जाप करें।
* अब कलश के सामने गेहूं व जौ को मिट्टी के पात्र में रोंपें।

* इस ज्वारे को माताजी का स्वरूप मानकर पूजन करें।

* अंतिम दिन ज्वारे का विसर्जन करें।

नवरात्रि : मां दुर्गा घोड़े पर सवार होकर आएंगी

शनिवार को कलश स्थापना होने पर माता का वाहन अश्व


यूं तो मां दुर्गा का वाहन सिंह को माना जाता है। लेकिन हर साल नवरात्रि के समय तिथि के अनुसार माता अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर धरती पर आती हैं। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं।

इस संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है कि 'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता' इसका अर्थ है सोमवार व रविवार को प्रथम पूजा यानी कलश स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर आती हैं।

इसी तरह यह भी माना जाता है कि माता जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं उसके अनुसार वर्ष में होने वाली घटनाओं का भी आकलन किया जाता है।

इस वर्ष कलश स्थापना 5 अक्टूबर यानी शनिवार के दिन है। इसलिए इस वर्ष माता घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं। घोड़ा युद्ध का प्रतीक माना जाता है। घोड़े पर माता का आगमन शासन और सत्ता के लिए अशुभ माना गया है। इससे सरकार को विरोध का सामना करना पड़ता है और सत्ता परिवर्तन का योग बनता है।

बीते साल भी माता इसी वाहन पर आईं थीं जिसका परिणाम है कि पूरे साल देश की राजनीति में उथल-पुथल मची रही। देश को कई विकट स्थितियों का सामना करना पड़ा। देश के कई भागों में प्राकृतिक आपदा के कारण जान-माल का नुकसान हुआ।
इसके साथ ही विजयादशमी 13 अक्टूबर रविवार के दिन है।

शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन विजयादशमी होने पर माता हाथी पर सवार होकर वापस कैलाश की ओर प्रस्थान करती हैं। माता की विदाई हाथी पर होने से आने वाले साल में खूब वर्षा होगी। जिससे अन्न का उत्पादन खूब होगा।

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