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20 दिसंबर 2013

शिरडी के साई बाबा

साई बाबा / SAI BABA

आज विश्‍व का कोई ऐसा देश नहीं है, जहां के लोग श्री शिरडी के साई बाबा के नाम से परिचित न हों. वह भारत के ही नहीं अपितु पूरे विश्‍व के आध्यात्मिक विभूति थे. मानयता है कि उनका जन्म लगभग 1838 ई. में महाराष्ट्र के पथरी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन उन्हें कुछ वर्ष तक एक मुस्लिम फकीर परिवार ने पाला था. उसके बाद साई शेलू गांव के एक ब्राह्मण संत गुरु वेंकुशा के आश्रम में 12 वर्ष तक रहे थे. 1854 में साई अपने गुरु के आदेश और आशीर्वाद से शिरडी गांव में चले गए थे. वहां लगभग दो माह तक एक युवक संत के रूप में रहने के बाद साई अचानक वहां से चले गए थे. तीन वर्ष बीतने के बाद 1858 में एक बारात के साथ बैलगाड़ी में बैठकर शिरडी आए थे और फिर वहीं बस गए थे. वहां साई ने एक त्यागी हुई पुरानी वीरान पड़ी हुई मस्जिद को अपना स्थान बनाया और जो द्वारिका माई के नाम से प्रसिद्ध है. यह नाम साई के द्वारा ही दिया गया है. साई 60 वर्षों तक उसी मस्जिद में रहे थे और 80 वर्ष के आयु में साई ने शिरडी में ही अपना प्राण त्यागा था. साई ने किसी को भी अपने परिवार, जाति धर्म के बारे में नहीं बताया था, लेकिन कुछ प्रमाणों से माना जाता है कि वह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. वे शिरडी में फकीर का एक सीधा-सादा जीवन व्यतीत करते थे. वे हमेशा अल्लाह मालिक है, कहते रहते थे. 
साई मानवों व पशु-पक्षियों सभी को अपना प्रेम और सद्भाव देते थे. उनके पास संस्कृत, उर्दू, अरबी, मराठी, हिंदी, और तमिल भाषाओं की जानकारी थी. साई शिरडी गांव में केवल पांच परिवारों से ही रोज दिन में दो बार भिक्षा मांग कर लाते थे. जो भी भिक्षा में मिल जाता, उसे द्वारिका माई में लाते थे और सभी को मिट्टी के बर्तन (परात) में सभी को मिलाकर रख देते थे. कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया आकर उनका एक अंश आकर खा जाते थे, तब उसके बाद बचे भिक्षा को भक्तों के साथ मिल-बांट कर खाते थे. साई के द्वारा द्वारिका माई में स्थापित की गई धुनी आज भी लगातार प्रज्ज्वलित हो रही है. साई अपने भक्तों कों और वहां वाले आंगतुकों को धुनी की भस्म(ऊदी) को आशीर्वाद के साथ दिया करते थे और उनके सभी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्ट दूर हो जाते थे और वे त्रिकालदर्शी थे. लोगों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में जानते थे, पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के पूर्व जन्मों के बारे में उन्हें पूर्ण जानकारी होती थी. साई ने जिसको आशीर्वाद दे दिया, वह हमेशा ही प्रसन्न होकर रहता था. साई ने कई अत्यंत रोमांचकारी चमत्कार किए थे. उन्होंने केवल स्वाभाविक रूप से करुणावश चमत्कार किया था. दिखाने के लिए नहीं, जैसा कि आजकल कई संत करते हैं. साई के चमत्कारों तथा भक्तों पर अनुग्रह की ख्याति धीरे-धीरे भारत समेत पूरे विश्‍व में फैल गई. उन्हें विश्‍व गुरु स्वीकार किया गया है. 
साई के शिरडी में रहते समय साठ वर्षों के दौरान हजारों दुखी भक्त और याचक उनकी कृपा पाने के लिए आए थे और सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हुई थी. महाराष्ट्र के एक महान भक्त श्री दामोलक हेमाडयंत ने साई से प्राथना की थी कि वे उनके दिव्य जीवन, चमत्कारों और उपदेशों पर एक ग्रंथ लिखने की अनुमति दे दें. साई ने अपना आशीर्वाद देते हुए कहा था श्री साई सत् चरित्र लेखक के लिए मेरी पूर्ण अनुमति है, जो प्रेम पूर्वक मेरा नाम स्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा. उसकी भक्ति में दिनों-दिन वृद्धि होगी. जो मेरे चरित्र और कार्यो का श्रद्धापूर्वक गायन करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सहायता करूंगा. साई कहते हैं, जो भक्त उनको हृदय और प्राणों से चाहेगा, उससे वे सदैव प्रसन्न रहेंगे. साई की लीलाओं का जो कीर्तन करेगा, उसे परमानंद और चिर-संतोेष की प्राप्ति हो जाएगी. 
साई कहते हैं यह मेरा वैशिष्ठय है कि जो कोई अनन्य भाव से ही मेरी शरण आता है, जो श्रद्धापूर्वक मेरा निरन्तर पूजन, स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूं. साई कहते हैं कि मेरी कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनो, मनन करो. सुख और शांति प्राप्ति का सरल मार्ग यही है. केवल साई के उच्चारण मात्र से उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे.

साई के ग्यारह वचन 

जो शिरडी आएगा, आपद दूर भगाएगा. 
च़ढे समाधि की सीढ़ी पर, पैर तले दु:ख की पीढ़ी पर. 
त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौड़ा आऊंगा. 
मन में रखना दृढ़ विश्‍वास, करे समाधि पूरी आस. 
मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो. 
मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए. 
जैसा भाव रहा जिस मन का, वैसै रूप हैं मेरे मन का. 
भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा. 
आ सहायता लो भरपूर, जो मांगा वह नहीं है दूर. 
मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया. 
धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

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