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20 दिसंबर 2013

साई की लीला

भेदभाव मिट गए और वह साई बाबा का भक्त हो गया



अहमदनगर में दादा साहब नामक एक डॉक्टर था. वह भगवान श्रीराम का परम भक्त था. एक बार वह डॉक्टर अपने किसी मामलतदार मित्र के साथ शिरडी आया. मामलतदार साई बाबा का भक्त था. उसने डॉक्टर को साई बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद चलने को कहा. डॉक्टर बोला कि वह मुसलमान के सामने सिर नहीं झुकाएगा. दरअसल, उसने सुन रखा था कि साई बाबा मुसलमान हैं. मामलतदार ने उससे मस्जिद चलने का आग्रह यह कहते हुए किया कि साई बाबा को प्रणाम करने के लिए उस पर कोई दबाव नहीं डालेगा. अंतत: डॉक्टर मस्जिद जाने के लिए तैयार हो गया. मामलतदार और डॉक्टर दोनों ही साई बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद गए. वहां पहुंचने पर डॉक्टर सबसे आगे चला और साई बाबा के पास पहुंच कर उसने उन्हें साष्टांग प्रणाम भी किया. यह देखकर सबको आश्‍चर्य हुआ. लोगों ने उस राम भक्त डॉक्टर से पूछा कि अपने विचार और निश्‍चय के विरुद्ध आपने ऐसा क्यों किया, तो उसने बताया कि आसन पर स्वयं भगवान श्रीराम पीत वस्त्र पहने, मुकुट धारण किए और हाथों में धनुष-बाण लिए बैठे थे. उसने साई बाबा को बार-बार देखा, तो उसे एक बार श्रीराम और दूसरी बार साई बाबा दिखाई देते थे. दोनों के दर्शन उसे एक के बाद एक, लगातार होते रहे. वह हैरान हो गया. उसके मन से सब भेदभाव मिट गए और वह साई बाबा का भक्त हो गया. उसने कहा, यह मुसलमान नहीं हो सकता, यह तो परब्रह्म का योगावतार है. 


ऐसे ही एक बार साई बाबा के एक भक्त बाला गनपत शिंपी को मलेरिया हो गया. उन्होंने तरह-तरह की दवाएं लीं और उपचार कराए, पर उनका ज्वर हटता ही नहीं था. बीमारी असाध्य हो गई. उनकी पत्नी और वह चिंतित रहने लगे. बाला जी गनपत शिंपी और उनकी पत्नी ने साई बाबा की शरण में जाने का निश्‍चय किया. दोनों शिरडी गए और साई बाबा के दर्शन कर उन्हें अपना कष्ट बताया. बाबा ने रोग से छुटकारा पाने का विचित्र उपाय बताया. उन्होंने तात्या कोते पाटिल को दही और भात लाने को कहा. वह ले आया. साई बाबा ने बाला गनपत शिंपी से कहा, दही और भात को मिला दो, बाहर लक्ष्मी मंदिर के पास जाओ और वहां एक काले कुत्ते को यह दही-भात खिला दो. काला कुत्ता तुम्हें मंदिर के पास मिलेगा. दही-भात लेकर पति-पत्नी लक्ष्मी मंदिर के पास गए. वहां उन्हें एक काला कुत्ता दिखाई दिया, जो उन दोनों को देखकर पूंछ हिलाने लगा. बाला जी गनपत शिंपी ने उस कुत्ते के सामने दही-भात रख दिया. कुत्ते ने खाया और खाते ही मुंह फेरकर जंगल में भाग गया. आश्‍चर्य है कि इसके बाद बाला जी गनपत शिंपी का मलेरिया ज्वर ख़त्म हो गया. 

आटा, धूनी और बवंडर

साई बाबा की दया और चमत्कारों के जो अनुभव एक साथ अनेक व्यक्तियों को हुए, उनकी परिगणना सामूहिक अनुभव में की जा सकती है. शिरडी में प्राय: सभी लोग साई बाबा के भक्त थे. बाबा अपने भक्तों का बड़ा ध्यान रखते थे और उनकी रक्षा करने के लिए सदा तत्पर भी रहते थे. 1910 के आसपास शिरडी के चारों ओर विसूचिका का भयंकर प्रकोप हुआ. लोग बड़ी संख्या में मरने लगे. सैकड़ों मील तक हैज़े का आतंक छा गया. गांव के गांव श्मशान जैसे बन गए. शिरडी के लोग भी घबरा गए, किंतु उनकी रक्षा के लिए साई बाबा ने उपाय सोच लिया था. एक दिन सुबह साई बाबा ने मुंह-हाथ धोया और चक्की से गेहूं पीसने की तैयारी की. उन्होंने फ़र्श पर बोरा बिछाया और उस पर चक्की रखी. चक्की के मुंह में गेहूं डालकर वह खूंटी पकड़ कर पिसाई करने लगे. बोरे पर चक्की के चारों ओर आटा निकलने लगा. पर्याप्त मात्रा में आटा हो जाने पर बाबा ने भक्तों से कहा कि वे उस आटे को शिरडी की सीमा के चारों तरफ़ डाल दें. भक्तों ने वैसा ही किया और आटे की रेखा ह़ैजा रूपी रावण के लिए लक्ष्मण रेखा बन गई. शिरडी में कहीं पर भी किसी को धीरे-धीरे विसूचिका नहीं हुई. आटे द्वारा ह़ैजे को रोक देने के चमत्कार की बात चारों तरफ़ फैल गई. आटा अथवा विसूचिका निरोधक पाउडर लेने के लिए दूसरे गांवों से हज़ारों लोग शिरडी आने लगे. साई बाबा चक्की चलाते रहे, आटा बांटते रहे और ह़ैजे का नामोनिशान मिटाते रहे. जहां-जहां और जिस-जिस घर में वह आटा गया, वहां से ह़ैजा छू मंतर हो गया. तत्कालीन अंग्रेज सरकार भी साई बाबा का यह चमत्कार देखकर दंग रह गई. साई बाबा तो मायापति परब्रह्म परमात्मा थे. प्रकृति पर उनका पूरा नियंत्रण था. अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश उनके आधिन में थे. उनकी द्वारका माई मस्जिद में रात-दिन धूनी जलती रहती थी. 

एक दिन दोपहर के समय साई बाबा के साथ लोग धूनी के पास बैठे थे. अचानक धूनी में आग की प्रचंड लपटें निकलीं और वह छत के आड़े खंभे (राफ्टर) को छूने लगी. यह देखकर लोग भयभीत हो गए, पर किसी में साहस नहीं था कि वह बाबा से धूनी में पानी डालकर ज्वाला को शांत करने का अनुरोध करे. अंतर्यामी साई बाबा जल्दी ही जान गए कि क्या हो रहा है. उन्होंने अपने डंडा (सटका) उठाया और सामने के खंभे को यह कहते हुए मारना शुरू किया कि नीचे उतरो, शांत हो जाओ. सटके के प्रत्येक आघात पर ज्वाला नीचे उतरती गई और कुछ ही क्षणों में धूनी की आग सामान्य हो गई. 

एक बार शिरडी में शाम के समय भयानक झंझावात उठा. आकाश में काले-काले बादल उमड़-घुमड़ कर छा गए. तेज आंधी चलने लगी, बादल गरजने लगे, रह-रहकर बिजली कौंधने लगी और मूसलाधार बारिश होने लगी. थोड़ी ही देर में चारों तरफ़ बाढ़ आ गई. लोग त्राहि-त्राहि करने लगे. शिरडी के सभी लोग, पशु-पक्षी आदि डर कर मस्जिद में आ गए. लोगों ने साई बाबा से रक्षा करने की प्रार्थना की. बाबा को दया आई. वह बाहर आए और मस्जिद के दरवाजे पर खड़े होकर आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने गरज कर कहा, बंद करो और अपने क्रोध को शांत करो. कुछ ही क्षणों में वर्षा बंद हो गई और आंधी रुक गई. बादल छंट गए और चंद्रमा निकल आया. लोग साई बाबा की जय-जयकार करते हुए अपने-अपने घर चले गए. यहां यह बताना ज़रूरी है कि द्वापर में परब्रह्म साई बाबा ने ही इंद्र के कोप से ब्रज की रक्षा की थी. इन कथाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि बाबा का अपने भक्तों के प्रति स्नेह कुछ ऐसा था कि वह उनके लिए प्रकृति से भी टकरा सकते थे. बाबा की महिमा अपरंपार है.

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