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20 दिसंबर 2013

साई की महिमा


जब हम इस धरती पर पैदा होते हैं तो मानव की न कोई जाति होती है और न ही उसका कोई धर्म. मानव को बांटने का काम हम लोग ही करते हैं. हमारे साधु-संतों और समाज सुधारकों ने हमेशा समाज में एकता कायम करने के लिए लोगों को जागरूक किया. समाज में इसी वर्गीकरण की दीवार को और एकता भाव को मजबूत करने के लिए शिरडी के साई बाबा को हम याद करते हैं.
शिरडी के साई बाबा को कुछ लोग दैवीय अवतार तो कुछ लोग चमत्कारी मानते हैं, लेकिन समाज में उन पर कोई सवाल नहीं उठाता कि वह हिंदू थे या मुसलमान. साई बाबा कहते थे कि सबका मालिक एक है. साई बाबा धर्म और जात-पात की बेड़ियों को तोड़कर एक विशुद्ध संत की तस्वीर समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं. साई सभी जीवात्माओं की पुकार सुनने व उनके कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए. शिरडी के साई बाबा ने सबका मालिक एक है, के उद्घोष के साथ सम्पूर्ण जगत को सर्वशक्तिमान ईश्‍वर के स्वरूप का साक्षात्कार कराया. उन्होंने समाज को बताया कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है. साई कई ऐसे चमत्कार किए, जिससे लोग उन्हें भगवान मानने लगे. साई बाबा के भक्तों की संख्या को लाखों-करोड़ो में नहीं आंका जा सकता. साई एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जो धर्म की सीमाओं में बंधे नहीं थे. 
सच तो यह है कि हिंदू और मुसलमान दोनों उनके अनुयायी हैं. साई के अनुसार, कोई भी इंसान धैर्य और सच्ची श्रद्धा की भावना रखकर ही ईश्‍वर की प्राप्ति कर सकता है. श्रद्धा और सबूरी यानी संयम उनके विचार दर्शन के सार हैं. 
ऐसा माना जाता है कि साई 16 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गांव पहुंचे और उसी स्थान पर निवास किया. कुछ लोग कहते हैं कि साई के पास अद्भुत शक्तियां थीं, जिनसे वह लोगों की मदद करते थे. साई ने इस बात को कभी नहीं स्वीकारा. वे कहा करते थे कि मैं लोगों का गुलाम हूं और समाज में सभी लोगों की मदद करना मेरी जिम्मेदारी है. साई हमेशा फकीर की तरह साधारण वेशभूषा में रहते थे. वह जमीन पर सोते थे और लोगों से भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे. उनके आखों में चमक थी, जो लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती थी. साई बाबा का एक ही काम था, लोगों में ईश्‍वर के प्रति विश्‍वास पैदा करना. साई ने समाज में लोगों के कष्टों का निवारण किया. जो भी उनके पास आया, वह निराश होकर कभी वापस नहीं गया. वह समाज के प्रत्येक लोगों के प्रति सद्भाव रखते थे. साई के यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जात-पात, धर्म-मजहब का कोई भेदभाव नहीं था. समाज के सभी जाति के लोग उनके पास आते थे. साई ने एक हिंदू द्वारा बनवाई गई मस्जिद को अपना बसेरा बनाया और उसे द्वारकामाई का नाम दिया. भक्तों को साई में सभी देवताओं के दर्शन होते थे. साई सत्य, प्रेम, दया, करुणा के प्रतिमूर्ति थे. साई अपने अपमान की कभी चिंता नहीं करते थे और वह सबके साथ मिलकर रहते थे. वे सभी मनुष्यों के साथ बैठकर कव्वाली, नृत्य, गजल देखते और अपना सिर हिलाकर प्रशंसा भी करते थे. इन सबके बावजूद भी साई की समाधि भंग नहीं होती थी. साई एक जगह निवास करते थे, लेकिन उन्हें विश्‍व के समस्त व्यवहारों का पूर्ण ज्ञान था. साई हमेशा जन कल्याण के लिए काम करते थे. 
साई हिंदू और मुसलमान दोनों थे. इस तरह से वे सद्भाव की सच्ची मिसाल पेश करते थे. वह मलिन वेशभूषा में रहते थे और सदा अल्लाह मालिक है, जपते रहते थे. द्वारिका माई नामक स्थान पर मुसलमानों का उर्स महोत्सव होता था और वहीं पर रामनवमी का कार्यक्रम भी होता था. नि:संदेह सर्वज्ञाता (साई) कृष्ण की द्वारिका के महत्व से अच्छी तरह से परिचित थे, जो स्कन्द पुराण में यों वर्णित है-
चतुर्वर्णामपि वर्गाणांयत्र द्वाराणि सर्वत:। 
अतो द्वारावतीत्युक्ता विद्वद्धिस्तत्व वादिभि:। 
साई बाबा की द्वारिका माई के द्वार सदा उद्घाटित थे-गरीब-अमीर-साधु-असाधु और हिंदू-मुसलमान सहित चारों वर्णों के लोगों के लिए जिसका द्वार हमेशा खुला रहता था, उसे ज्ञानी विद्वान द्वारिका कहते हैं. साई बाबा इस मस्जिद को नित्य दीपों से सजाते थे, जिसके लिए वह आस-पास के दुकानदारों से तेल मांग कर लाते थे. दुकानदारों ने एक दिन निश्‍चय किया कि अब मुफ्त में तेल नहीं देंगे. साई ने सभी दियों में तेल की जगह पानी भर दिया और दीप जल उठे और मस्जिद पूरी रात प्रकाश से जगमगाती रही. साई की अद्भुत लीला को देख कर दुकानदारों की आखें खुल गई. एक बार शिरडी में हैजे का घोर प्रकोप हो गया. साई बैठकर चक्की में गेहूं पीसने लगे और यह देखकर कई लोग वहां आ गए. साई को चक्की पीसते देखकर चार औरतों ने चक्की लेकर स्वयं पीसना शुरू कर दिया. पर्याप्त आटा हो गया तो साई ने उसे गांव की सीमाओं पर छिड़कवा दिया और हैजा गायब हो गया. लोग समझ गए कि बाबा ने गेहूं के रूप में हैजे को ही पीस डाला. ऐसे थे साई और ऐसी थी साई की महिमा, जिसका अनुकरण कर लोग धन्य हो जाते थे.

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