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11 फ़रवरी 2013

Holika dahan 2013, When to do, what to do and Puja process


होलिका दहन 2013, कब करें, कैसे करें, पूजन विधि


holika_dahan
26 मार्च 2013 मंगलवार,को होलिका दहन किया जायेगा. प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भ्रद्रारहित काल में होलिका दहन किया जाता हैं. 26 मार्च, 2013 को गोधूलि बेला में होलिका-दहन किया जा सकता है. इसलिए होलिका-दहन से पूर्व और भद्रा समय के पश्चात् होली का पूजन किया जाना चाहिए.

भद्रा के मुख का त्याग करके निशा मुख में होली का पूजन करना शुभफलदायक सिद्ध होता है,ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी पर्व-त्योहारों को मुहूर्त शुद्धि के अनुसार मनाना शुभ एवं कल्याणकारी है. हिंदू धर्म में अनगिनत मान्यताएं, परंपराएं एवं रीतियां हैं. वैसे तो समय परिवर्तन के साथ-साथ लोगों के विचार व धारणाएं बदलीं, उनके सोचने-समझने का तरीका बदला, परंतु संस्कृति का आधार अपनी जगह आज भी कायम है.

आज की युवा पीढ़ी में हमारी प्राचीन नीतियों को लेकर कई सवाल उठते हैं, परंतु भारतीय धर्म साधना के परिवेश में वर्ष भर में शायद ही ऐसा कोई त्योहार हो जिसे हमारे राज्य अपने-अपने रीति रिवाजों के अनुसार धूमधाम से न मनाते हो.

होलिका में आहुति देने वाली सामग्रियां (Things to cast into the Holi fire)

होलिका दहन होने के बाद होलिका में जिन वस्तुओं की आहुति दी जाती है, उसमें कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग है. सप्त धान्य है, गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर.

होलिका दहन की पूजा विधि (Method of Holi Pujan)

होलिका दहन करने से पहले होली की पूजा की जाती है. इस पूजा को करते समय, पूजा करने वाले व्यक्ति को होलिका के पास जाकर पूर्व या उतर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए. पूजा करने के लिये निम्न सामग्री को प्रयोग करना चाहिए.
  1. एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल आदि का प्रयोग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नई फसल के धान्यों जैसे- पके चने की बालियां व गेंहूं की बालियां भी सामग्री के रुप में रखी जाती है.

  2. इसके बाद होलिका के पास गोबर से बनी ढाल तथा अन्य खिलौने रख दिये जाते है.

  3. होलिका दहन मुहुर्त समय में जल, मोली, फूल, गुलाल तथा गुड आदि से होलिका का पूजन करना चाहिए. गोबर से बनाई गई ढाल व खिलौनों की चार मालाएं अलग से घर लाकर सुरक्षित रख ली जाती है. इसमें से एक माला पितरों के नाम की, दूसरी हनुमान जी के नाम की, तीसरी शीतला माता के नाम की तथा चौथी अपने घर- परिवार के नाम की होती है.

  4. कच्चे सूत को होलिका के चारों और तीन या सात परिक्रमा करते हुए लपेटना होता है. फिर लोटे का शुद्ध जल व अन्य पूजन की सभी वस्तुओं को एक-एक करके होलिका को समर्पित किया जाता है. रोली, अक्षत व पुष्प को भी पूजन में प्रयोग किया जाता है. गंध- पुष्प का प्रयोग करते हुए पंचोपचार विधि से होलिका का पूजन किया जाता है. पूजन के बाद जल से अर्ध्य दिया जाता है.

  5. सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में अग्नि प्रज्जवलित कर दी जाती है. इसमें अग्नि प्रज्जवलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है. सार्वजनिक होली से अग्नि लाकर घर में बनाई गई होली में अग्नि प्रज्जवलित की जाती है. अंत में सभी पुरुष रोली का टीका लगाते है, तथा महिलाएं गीत गाती है. तथा बडों का आशिर्वाद लिया जाता है.

  6. सेंक कर लाये गये धान्यों को खाने से निरोगी रहने की मान्यता है.

  7. ऎसा माना जाता है कि होली की बची हुई अग्नि और राख को अगले दिन प्रात: घर में लाने से घर को अशुभ शक्तियों से बचाने में सहयोग मिलता है. तथा इस राख का शरीर पर लेपन भी किया जाता है.

राख का लेपन करते समय निम्न मंत्र का जाप करना कल्याणकारी रहता है

वंदितासि सुरेन्द्रेण ब्रम्हणा शंकरेण च ।
अतस्त्वं पाहि माँ देवी! भूति भूतिप्रदा भव ॥

होलिका पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. (Chant the mantra below while Holika Pujan)

अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्‌

इस मंत्र का उच्चारण एक माला, तीन माला या फिर पांच माला विषम संख्या के रुप में करना चाहिए.

होलिका पूजन के बाद होलिका दहन (Holika Dahan is done After Holi Pujan)

विधिवत रुप से होलिका का पूजन करने के बाद होलिका का दहन किया जाता है. होलिका दहन सदैव भद्रा समय के बाद ही किया जाता है. इसलिये दहन करने से भद्रा का विचार कर लेना चाहिए. ऎसा माना जाता है कि भद्रा समय में होलिका का दहन करने से क्षेत्र विशेष में अशुभ घटनाएं होने की सम्भावना बढ जाती है.

इसके अलावा चतुर्दशी तिथि, प्रतिपदा में भी होलिका का दहन नहीं किया जाता है. तथा सूर्यास्त से पहले कभी भी होलिका दहन नहीं करना चाहिए. होलिका दहन करने समय मुहूर्त आदि का ध्यान रखना शुभ माना जाता है.

आधुनिक परिपक्ष्य में होलिका दहन (Holi Dahan in the Modern Times)

आज के संदर्भ में वृ्क्षारोपण के महत्व को देखते हुए, आज होलिका में लकडियों को जलाने के स्थान पर, अपने मन से आपसी कटुता को जलाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे हम सब देश की उन्नति और विकास के लिये एक जुट होकर कार्य कर सकें. आज के समय की यह मांग है कि पेड जलाने के स्थान पर उन्हें प्रतिकात्मक रुप में जलाया जायें. इससे वायु प्रदूषण और वृ्क्षों की कमी से जूझती इस धरा को बचाया जा सकता है. प्रकृ्ति को बचाये रखने से ही मनुष्य जाति को बचाया जा सकता है, यह बात हम सभी को कभी नहीं भूलनी चाहिए.

आप सभी को होली की हार्दिक शुभ कामनाएं....

Holashtak begins 2013, 19th March - Tuesday


होलाष्टक प्रारम्भ 2013, 19 मार्च - मंगलवार

hola astak

चन्द्र मास के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका पर्व मनाया जाता है. होली पर्व के आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है. होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जात सकता है. "होलाष्टक" के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है. सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है. दुलैण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है.

होली की शुरुआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलैण्डी तक रहती है. इसके कारण प्रकृ्ति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है. वर्ष 2013 में 19 मार्च, 2013 से 27 मार्च, 2013 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी. होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है.

होलिका दहन में होलाष्टक की विशेषता (The importance of Holashtak for Holika Dahan)

होलिका पूजन करने के लिये होली से आंठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी खास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है. जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है. जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है. होली का डंडा स्थापित होने के बाद संबन्धित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है.

होलाष्टक के दिन से शुरु होने वाले कार्य (The tasks to be done during Holashtak)

सबसे पहले इस दिन, होलाष्टक शुरु होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है. इस दिन इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध कर, इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है. इस दिन जगह-जगह जाकर सूखी लकडियां विशेष कर ऎसी लकडियां जो सूखने के कारण स्वयं ही पेडों से टूट्कर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर चौराहे पर एकत्र कर लिया जाता है.

होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है. इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है. व इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है. अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है. बच्चे और बडे इस दिन से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है.

होलाष्टक में कार्य निषेध (Things that shouldn't be done during Holashtak)

होलाष्टक मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है. होलाष्टक के दिन से एक ओर जहां उपरोक्त कार्यो का प्रारम्भ होता है. वहीं कुछ कार्य ऎसे भी है जिन्हें इस दिन से नहीं किया जाता है. यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है. अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठिक आठ दिन पूर्व शुरु हो जाते है.

होलाष्टक के मध्य दिनों में 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता है. यहां तक की अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शान्ति कार्य किये जाते है. इन दिनों में 16 संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है.

होलाष्टक की पौराणिक मान्यता (The significance of Holashtak from ancient times)

फाल्गुण शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन अर्थात पूर्णिमा तक होलाष्टक रहता है. इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरम्भ हो जाता है. सर्दियां अलविदा कहने लगती है, और गर्मियों का आगमन होने लगता है. साथ ही वसंत के आगमन की खुशबू फूलों की महक के साथ प्रकृ्ति में बिखरने लगती है. होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोले नाथ ने क्रोध में आकर काम देव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी.

होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को भारत के कुछ भागों में ही माना जाता है. इन मान्यताओं का विचार सबसे अधिक पंजाब में देखने में आता है. होली के रंगों की तरह होली को मनाने के ढंग में विभिन्न है. होली उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, महाराष्ट्र, उडिसा, गोवा आदि में अलग ढंग से मनाने का चलन है. देश के जिन प्रदेशो में होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को नहीं माना जाता है. उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बन्द नहीं किये जाते है.

होलाष्टक का एक अन्य रुप बीकानेर की होली (Bikaner Holi, a unique form of Holashtak)

होलाष्टक से मिलती जुलती होली की एक परम्परा राजस्थान के बीकानेर में देखने में आती है. पंजाब की तरह यहां भी होली की शुरुआत होली से आठ दिन पहले हो जाती है. फाल्गुन मास की सप्तमी तिथि से ही होली शुरु हो जाती है, जो धूलैण्डी तक रहती है. राजस्थान के बीकानेर की यह होली भी अंदर मस्ती, उल्लास के साथ साथ विषेश अंदाज समेटे हुए हैं. इस होली का प्रारम्भ भी होलाष्टक में गडने वाले डंडे के समान ही चौक में खम्भ पूजने के साथ होता है.

होली 2013, 27 मार्च : Holi 2013, 27 March



holikaभारत त्योहारों का देश है. यहां एक त्योहार कई संस्कृ्तियों, परम्पराओं और रीतियों की झलक प्रस्तुत करता है. होली शीत ऋतु के उपरांत बंसत के आगमन, चारों और रंग- बिरंगे फूलों का खिलना होली आने की ओर इशारा करता है. होली का त्योहार प्राकृ्तिक सौन्दर्य का पर्व है. होली का त्योहर प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिम के दिन मनाया जाता है. होली से ठिक एक दिन पहले रात्रि को होलिका दहन होता है. उसके अगले दिन प्रात: से ही लोग रंग खेलना प्रारम्भ कर देते हे. वर्ष 2013 में 27 मार्च के दिन होली रंगोत्सव मनाया जाएगा. इस होली को धुलैण्डी के नाम से भी जाना जाता है.

होली का त्योहार मस्ती और रंग का पर्व है. यह पर्व बंसत ऋतु से चालीस दिन पहले मनाया जाता है. सामान्य रुप से देखे तो होली समाज से बैर-द्वेष को छोडकर एक दुसरे से मेल मिलाप करने का पर्व है. इस अवसर पर लोग जल में रंग मिलाकर, एक -दूसरे को रंगों से सरोबोर करते है. टेसू के फूलों से युक्त जल में चन्दन, केसर और गुलाब तथा इत्र इत्यादि से बनाये गये प्राकृतिक रंग इस उत्सव की खूबसुरती बढा देते है.

प्राचीन काल की होली (Holi in ancient times)

पौराणिक समय में श्री कृ्ष्ण और राधा की बरसाने की होली के साथ ही होली के उत्सव की शुरुआत हुई. फिर इस होली को मुगलों ने अपने ढंग से खेला. मुगल सम्राज्य के समय में होली की तैयारियां कई दिन पहले ही प्रारम्भ हो जाती थी. मुगलों के द्वारा होली खेलने के संकेत कई ऎतिहासिक पुस्तकों में मिलते है. जिसमें अकबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां और बहादुरशाह जफर मुख्य बादशाह थे जिनके समय में होळी खेली जाती थी.

अकबर काल में होली के दिन बाकायदा बडे बडे बरतनों में प्राकृ्तिक वस्तुओं का प्रयोग करते हुए, रंग तैयार किये जाते थें. रंग के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों का भी प्रबन्ध होता था. राग-रंग का माहौल होता है. तानसेन अपनी आवाज से सभी को मोहित कर देते है. कुछ इसी प्रकार का माहौल जहांगीर और बहादुरशाह जफर के समय में होली के दिन होता था. ऎसे अवसरों पर आम जनता को भी बादशाह के करीब जाने, उनसे मिलने के अवसर प्राप्त होते थे.

आज होली के रंग, इसकी धूम केवल भारत तथा उसके प्रदेशों तक ही सीमित नहीं है, अपितु होली का उडता हुआ रंग आज दूसरों देशों तक भी जा पहुंचा है. ऎसा लगता है कि हमारी परम्पराओं ने अपनी सीमाओं का विस्तार कर लिया है. यह पर्व स्नेह और प्रेम का है. इस पर्व पर रंग की तरंग में छाने वाली मस्ती पर संयम रखते हुए, अपनी मर्यादाओं की सीमा में रहकर, इस पर्व का आनन्द लेना चाहिए.

आज की होली (Holi celebration in modern times)

प्राचीन काल में होली खेलने के लिये पिचकारियों का प्रयोग होता था, परन्तु समय का पहिया घूमा ओर समय बदल गया, आज पिचकारियों से होली केवल बच्चे ही खेलते है. प्रत्येक वर्ग होली खेलने के लिये अपने अलग तरह के संसाधनों का प्रयोग करता है, उच्च वर्ग एक और जहां, इत्र, चंदन और उतम स्तर के गुलाल को प्रयोग करता है. वहीं, दुसरा वर्ग पानी, मिट्टी ओर कभी कभी कीचड से भी होली खेल कर होली के त्यौहार को मना लेता है.

होली का त्यौहार बाल, युवा, वृ्द्ध, स्त्री- पुरुष, बिना किसी भेद भाव से उंच नीच का विचार किये बिना, एक-दूसरे पर रंग डालते है. धूलैण्डी की सुबह, घर पर होली की शुभकामनाएं देने वाली की भीड लग जाती है. होली के दिन जाने - पहचाने चेहरे भी होली के रंगों में छुपकर अनजाने से लगते है. होली पर बडों को सम्मान देने के लिये पैरों पर गुलाल लगा कर आशिर्वाद लिया जाता है. समान उम्र का होने पर गुलाल माथे पर लगा कर गले से लगा लिया जाता है. और जो छोटा हों, तो स्नेह से गुलाल लगा दिया जाता है.

होली की विशेषता (The Special thing about Holi)

भारत के सभी त्यौहारों पर कोई न कोई खास पकवान बनाया जाता है. खाने के साथ अपनी खुशियों को मनाने का अपना ही एक अलग मजा है. इस दिन विशेष रुप से ठंडाई बनाई जाती है. जिसमें केसर, काजू, बादाम और ढेर सारा दूध मिलाकर इसे बेहद स्वादिष्ट बना दिया जाता है. ठंडाई के साथ ही बनती है, खोये की गुजिया और साथ में कांजी इन सभी से होली की शुभकामनाएं देने वाले मेहमानों की आवभगत की जाती है. और आपस में बैर-मिटाकर गले से लगा लिया जाता है. दुश्मनों को भी दोस्त बनाने वाला यह पर्व कई दोनों तक सबके चेहरों पर अपना रंग छोड जाता है.

होली का पर्व सूरज के चढने के साथ ही अपने रंग में आता है. होली खेलने वाली की टोलियां नाचती-गाती, ढोल- मृ्दगं बजाती, लोकगीत गाती सभी के घर आती है, ओर हर घर से कुछ जन इस टोली में शामिल हो जाती है, दोपहर तक यह टोली बढती-बढती एक बडे झूंड में बदल जाती है. नाच -गाने के साथ ही होली खेलने आई इन टोलियों पर भांग का नशा भी चढा होता है. जो सायंकाल तक सूरज ढलने के बाद ही उतरता है.

होली की टोली के लोकगीतों में प्रेम के साथ साथ विरह का भाव भी देखने में आते है. इस दिन होली है.........की गूंज हर ओर से आ रही होती है.

होली में भावनाओं की अभिव्यक्ति (Holi and self-expression

होली भारतीय समाज में लोकजनों की भावनाओं की अभिव्यक्ति का आईना है. यहां परिवार को समाज से जोडने के लिये होली जैसे पर्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है. समाज को एक-दूसरे से जोडे रखने और करीब लाने के लिये होली जैसे पर्व आज समाज की जरूरत बन कर रह गये है. आधुनिकता की दौड में शहरों में व्यक्ति भावना शून्य हो गया है. गांवों में एक और जहां किसी एक व्यक्ति के बीमार पडने पर सभी ग्रामीण हाल चाल पूछने आते है., किसी एक पर विपदा आने पर वह विपदा पूरे गांव की होती है. इसके विपरीत शहरों में साथ वाले फलैट में कौन रहता है, यह जानने में भी कई बरस लग जाते है. सभी मायनों में देखा जाये तो आज होली की जरूरत शहरों के इस मौन को तोडने के लिये सबसे अधिक है.

Mahakumbha weeds

महाकुम्भ में मातम

मौनी अमावस्या के दूसरे शाही स्नान के बाद लौट रहे श्रद्धालुओं की भीड़ की वजह से इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गई। हादसे में कम से कम 40 लोगों के मारे जाने की खबर है। तस्वीरें आपको विचलित भी कर सकती हैं। हादसे की कहानी जानिए तस्वीरों की जुबानी...
Photo - इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हादसा
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Photo - जब आस्था ने ली जान


महाकुंभ में मातम, 40 श्रद्धालुओं की मौत

 महाकुंभ में मौनी अमवस्या पर रेलवे और मेला प्रशासन की बदइंतजामी 40 लोगों के लिए काल बन गई। रविवार को दिन में महाकुंभ के मेले में मची भगदड़ में 4 स्नानार्थियों की मौत के बाद भी रेलवे प्रशासन भारी भीड़ को लेकर नहीं चेता और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के प्लैटफॉर्म नंबर 6 पर बड़ा हादसा हो गया। करीब शाम सात बजे पटना जाने के लिए इंतजार कर रही भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए फुट ओवरब्रिज पर सुरक्षा बलों के अचानक लाठीचार्ज करने से भगदड़ मच गई।
इस भगदड़ में सीढ़ी से जल्दी नीचे भागने के चक्कर में बड़ी संख्या में लोग गिरते चले गए। देर रात तक अधिकारियों ने 36 श्रद्धालुओं के मौत की पुष्टि कर दी थी। इनमें 27 महिलाएं, एक बारह वर्षीय बच्चा और एक आठ वर्षीय बच्ची शामिल है। इसके साथ ही 100 से अधिक घायल थे। सरकार ने हादसे की जांच के आदेश दिए है। उत्तर प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिवार वालों को 5 लाख रुपये और गंभरीर रूप से घायलों को एक लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हादसे के करीब दो घंटे बाद अधिकारी पहुंचे और उसके बाद ही राहत कार्य शुरू हो सका। कई जख्मी लोग प्लैटफॉर्म पर तड़पते रहे, लेकिन उन्हें अस्पताल पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं था। देर से राहत कार्य शुरू होने के चलते मृतकों की संख्या खासी बढ़ गई। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि प्लैटफॉर्म्स पर दोपहर बाद से ही काफी भीड़ थी। स्नानार्थी अपने घरों को लौटने के लिए रेलवे स्टेशन पर जमा होना शुरू हो गए थे। हादसे से थोड़ी ही देर पहले पटना की स्पेशल ट्रेन पर सवार होने के लिए अचानक बाहर से भीड़ का एक रेला आया। रेलवे पुलिस कर्मियों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठियां फटकारीं, तो भगदड़ मच गई। भगदड़ में कई लोग गिर पड़े। पीछे से आई भीड़ उन्हें रौंदते हुए भागी। हादसे के बाद घायलों और मरने वालों के परिवार वाले बचाव के लिए गुहार लगा रहे थे, मगर उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। दो घंटे बाद रेलवे पुलिस और स्वयंसेवी संस्थाओं के सदस्यों की मदद से घायलों को बाहर निकाला गया और रेलवे अस्पताल लाया गया। बाद में इन सभी को स्थानीय अस्पताल पहुंचाया गया।
रविवार को मौनी अमावस्या के अवसर पर दूसरे शाही के दौरान 3 करोड़ से ज्यादा लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। वो तमाम इंतजाम मौनी अमावस्या पर्व पर छितरा गए, जिसकी महीने भर पहले से प्लैनिंग थी। मेले में भीड़ के दबाव में दोपहर 4 लोगों की मौत हो गई, हालांकि प्रशासन ने एक की ही पुष्टि की है। सेक्टर 12 में दोपहर एक बजे भीड़ के दबाव में अफरातफरी मच गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। इस दौरान एक वृद्ध की मौत हो गई। इनकी शिनाख्त गोविंद राय (62) के रूप में की गई। वह पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के रहने वाले थे। उनकी पत्नी माया राय ने बताया कि वह भीड़ में कुचल गए। इसी सेक्टर में तेलूराम (55) का भी शव पाया गया। वह हरियाणा के करनाल जिले के किजना थाना क्षेत्र स्थित बिजपुर गांव के थे। बाद में एक अज्ञात वृद्ध महिला का भी शव पाया गया। आयुक्त देवेश चतुर्वेदी और पुलिस आईजी आलोक शर्मा ने बताया कि उन्हें एक व्यक्ति की मौत की खबर मिली है। उसके कारणों की जांच कराई जा रही है।

पीएम और सीएम ने जताया शोक
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उत्तर प्रदेश के मु्ख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस घटना पर गहरा दुख जताया है। पीएम ने मुआवजे का भी ऐलान किया। अखिलेश ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने घटना के कारणों की जांच के लिए आईएएस जगन मैथ्यूज के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय जांच कमिटी गठित की है। साथ ही मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को पांच लाख और घायलों को एक लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान किया है। रेल मंत्री पवन बंसल ने मृतकों के परिजनों को पीएम फंड से मुआवजा देने की घोषणा की है।


इन हेल्पलाइन नंबर्स पर कर आप अपने करीबियों/परिजनों की जानकारी ले सकते हैं:-

रेलवे-1072

इलाहाबाद- 0532- 2408149, 2408128

नई दिल्ली-011-23342954

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