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28 फ़रवरी 2013

Maha Shivaratri Muhurta 2013

Maha Shivaratri Pujan

Maha Shivaratri Muhurta


Nishita Kaal Puja Time = 24:12+ to 25:01+
Duration = 0 Hours 48 Mins
Next Day Maha Shivaratri Parana Time = After 06:43

Ratri First Prahar Puja Time = 18:30 to 21:33
Ratri Second Prahar Puja Time = 21:33 to 24:36+
Ratri Third Prahar Puja Time = 24:36+ to 27:40+
Ratri Fourth Prahar Puja Time = 27:40+ to 30:43+
Panchang for Maha Shivaratri Day
Choghadiya Muhurat on Maha Shivaratri

जब हनुमान जी ने धरा पंचमुखी रूप और बचाया श्रीराम-लक्ष्मण को


अंजनीसुत महावीर श्रीराम भक्त हनुमान ऐसे भारतीय पौराणिक चरित्र हैं जिनके व्यक्तित्व के सम्मुख युक्ति, भक्ति, साहस एवं बल स्वयं ही बौने नजर आते हैं। संपूर्ण रामायण महाकाव्य के वह केंद्रीय पात्र हैं। श्री राम के प्रत्येक कष्टï को दूर करने में उनकी प्रमुख भूमिका है। इन्हीं हनुमान जी का एक रूप है पंचमुखी हनुमान। यह रूप उन्होंने कब क्यों और किस उद्देश्य से धारण किया इसके संदर्भ में पुराणों में एक अद्भुत कथा वर्णित है।

श्रीराम-रावण युद्ध के मध्य एक समय ऐसा आया जब रावण को अपनी सहायता के लिए अपने भाई अहिरावण का स्मरण करना पड़ा। वह तंत्र-मंत्र का प्रकांड पंडित एवं मां भवानी का अनन्य भक्त था। अपने भाई रावण के संकट को दूर करने का उसने एक सहज उपाय निकाल लिया। यदि श्रीराम एवं लक्ष्मण का ही अपहरण कर लिया जाए तो युद्ध तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। उसने ऐसी माया रची कि सारी सेना प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न हो गयी और वह श्री राम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें निद्रावस्था में ही पाताल-लोक ले गया।

जागने पर जब इस संकट का भान हुआ और विभीषण ने यह रहस्य खोला कि ऐसा दु:साहस केवल अहिरावण ही कर सकता है तो सदा की भांति सबकी आंखें संकट मोचन हनुमानजी पर ही जा टिकीं। हनुमान जी तत्काल पाताल लोक पहुंचे। द्वार पर रक्षक के रूप में मकरध्वज से युद्ध कर और उसे हराकर जब वह पातालपुरी के महल में पहुंचे तो श्रीराम एवं लक्ष्मण जी को बंधक-अवस्था में पाया। वहां भिन्न-भिन्न दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे और मां भवानी के सम्मुख श्रीराम एवं लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी थी। अहिरावण का अंत करना है तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिम्ह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन पांच मुखों को धारण कर उन्होंने एक साथ सारे दीपकों को बुझाकर अहिरावण का अंत किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त किया। सागर पार करते समय एक मछली ने उनके स्वेद की एक बूंद ग्रहण कर लेने से गर्भ धारण कर मकरध्वज को जन्म दिया था अत: मकरध्वज हनुमान जी का पुत्र है, ऐसा जानकर श्रीराम ने मकरध्वज को पातालपुरी का राज्य सौंपने का हनुमान जी को आदेश दिया। हनुमान जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया और वापस उन दोनों को लेकर सागर तट पर युद्धस्थल पर लौट आये।

हनुमान जी के इस अद्भुत स्वरूप के विग्रह देश में कई स्थानों पर स्थापित किए गए हैं। इनमें रामेश्वर में स्थापित पंचमुखी हनुमान मंदिर में इनके भव्य विग्रह के संबंध में एक भिन्न कथा है। पुराण में ही वर्णित इस कथा के अनुसार एकार एक असुर, जिसका नाम मायिल-रावण था, भगवान विष्णु का चक्र ही चुरा ले गया। जब आंजनेय हनुमान जी को यह ज्ञात हुआ तो उनके हृदय में सुदर्शन चक्र को वापस लाकर विष्णु जी को सौंपने की इच्छा जाग्रत हुई। मायिल अपना रूप बदलने में माहिर था। हनुमान जी के संकल्प को जानकर भगवान विष्णु ने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया, साथ ही इच्छानुसार वायुगमन की शक्ति के साथ गरुड़-मुख, भय उत्पन्न करने वाला नरसिम्ह-मुख तथा हयग्रीव एवं वराह मुख प्रदान किया। पार्वती जी ने उन्हें कमल पुष्प एवं यम-धर्मराज ने उन्हें पाश नामक अस्त्र प्रदान किया। यह आशीर्वाद एवं इन सबकी शक्तियों के साथ हनुमान जी मायिल पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे। तभी से उनके इस पंचमुखी स्वरूप को भी मान्यता प्राप्त हुई। ऐसा विश्वास किया जाता है कि उनके इस पंचमुखी विग्रह की आराधना से कोई भी व्यक्ति नरसिम्ह मुख की सहायता से शत्रु पर विजय, गुरुड़ मुख की सहायता से सभी दोषों पर विजय वराहमुख की सहायता से समस्त प्रकार की समृद्धि एवं संपत्ति तथा हयग्रीव मुख की सहायता से ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। हनुमान स्वयं साहस एवं आत्मविश्वास पैदा करते हैं।

इस स्वरूप का दूसरा महत्वपूर्ण मंदिर प्रख्यात संत राघवेंद्र स्वामी के ध्यान स्थल कुंभकोरण-तमिलनाडु में है। तमिलनाडु के ही थिरुबेल्लूर नगर में पंचमुखी हनुमान जी की 12 मीटर ऊंची हरे ग्रेनाइट की प्रतिमा है।
अन्य कई स्थानों पर भी पंचमुखी स्वरूप के छोटे-बड़े मंदिर हैं। शक्ति, आत्मविश्वास, विनम्रता, भक्ति, विश्वसनीयता एवं ज्ञान के अपार भंडार हनुमान ही वास्तव में ऐसे पुराण-पुरुष हैं जो न केवल अपने आराधकों वरन् संपूर्ण विश्व को भय एवं संकटों से मुक्त करते हैं और उनका संपूर्ण चरित्र एक ही संदेश देता है महावीर बनना है तो पहले हनुमान बनना होगा। हनुमान अर्थात् वह जिसने अपने अभिमान का हनन कर लिया है।

<<<<<<< जय श्री राम >>>>>

Rivers of India


भारत की नदियाँ


भारत की नदियों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे, हिमाचल से निकलने वाली नदियाँ, डेक्‍कन से निकलने वाली नदियाँ, तटवर्ती नदियाँ, ओर अंतर्देशीय नालों से द्रोणी क्षेत्र की नदियाँ।
हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बर्फ और ग्‍लेशियरों के पिघलने से बनी हैं अत: इनमें पूरे वर्ष के दौरान निरन्‍तर प्रवाह बना रहता है। मॉनसून माह के दौरान हिमालय क्षेत्र में बहुत अधिक वृष्टि होती है और नदियाँ बारिश पर निर्भर हैं अत: इसके आयतन में उतार चढ़ाव होता है। इनमें से कई अस्‍थायी होती हैं। तटवर्ती नदियाँ, विशेषकर पश्चिमी तट पर, लंबाई में छोटी होती हैं और उनका सीमित जलग्रहण क्षेत्र होता है। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी होती है। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी होती हैं। पश्चिमी राजस्‍थान के अंतर्देशीय नाला द्रोणी क्षेत्र की कुछ्‍ नदियाँ हैं। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी प्रकृति की हैं।
हिमाचल से निकलने वाली नदी की मुख्‍य प्रणाली सिंधु और गंगा ब्रहमपुत्र मेघना नदी की प्रणाली की तरह है। सिंधु नदी, जो विश्‍व की महान, नदियों में एक है, तिब्‍बत में मानसरोवर के निकट से निकलती है और भारत से होकर बहती है और तत्‍पश्‍चात् पाकिस्‍तान से हो कर और अंतत: कराची के निकट अरब सागर में मिल जाती है। भारतीय क्षेत्र में बहने वाली इसकी सहायक नदियों में सतलुज (तिब्‍बत से निकलती है), व्‍यास, रावी, चेनाब, और झेलम है। गंगा-ब्रह्मपुत्र मेघना एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण प्रणाली है जिसका उप द्रोणी क्षेत्र भागीरथी और अलकनंदा में हैं, जो देवप्रयाग में मिलकर गंगा बन जाती है। यह उत्‍तरांचल, उत्‍तर प्रदेश, बिहार और प.बंगाल से होकर बहती है। राजमहल की पहाडियों के नीचे भागीरथी नदी,जो पुराने समय में मुख्‍य नदी हुआ करती थी, निकलती है जबकि पद्भा पूरब की ओर बहती है और बांग्‍लादेश में प्रवेश करती है। यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानदी, और सोन गंगा की महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ है। चंबल और बेतवा महत्‍वपूर्ण उप सहायक नदियाँ हैं जो गंगा से मिलने से पहले यमुना में मिल जाती हैं। पद्मा और ब्रह्मपुत्र बांग्‍लादेश में मिलती है और पद्मा अथवा गंगा के रुप में बहती रहती है। ब्रह्मपुत्र तिब्‍बत से निकलती है, जहाँ इसे सांगणो कहा जाता है और भारत में अरुणाचल प्रदेश तक प्रवेश करने तथा यह काफी लंबी दूरी तय करती है, यहाँ इसे दिहांग कहा जाता है। पासी घाट के निकट देबांग और लोहित ब्रह्मपुत्र नदी से मिल जाती है और यह संयुक्‍त नदी पूरे असम से होकर एक संकीर्ण घाटी में बहती है। यह घुबरी के अनुप्रवाह में बांग्‍लादेश में प्रवेश करती है।
भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ सुबसिरी, जिया भरेली, घनसिरी, पुथिभारी, पागलादिया और मानस हैं। बांग्‍लादेश में ब्रह्मपुत्र तिस्‍त आदि के प्रवाह में मिल जाती है और अंतत: गंगा में मिल जाती है। मेघना की मुख्‍य नदी बराक नदी मणिपुर की पहाडियों में से निकलती है। इसकी महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ मक्‍कू, ट्रांग, तुईवई, जिरी, सोनई, रुक्‍वी, कचरवल, घालरेवरी, लांगाचिनी, महुवा और जातिंगा हैं। बराक नदी बांग्‍लादेश में भैरव बाजार के निकट गंगा-‍ब्रह्मपुत्र के मिलने तक बहती रहती है।
दक्‍कन क्षेत्र में अधिकांश नदी प्रणालियाँ सामान्‍यत पूर्व दिशा में बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं।
गोदावरी, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी, आदि पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं और नर्मदा, ताप्‍ती पश्चिम की बहने वाली प्रमुख नदियाँ है। दक्षिणी प्रायद्वीप में गोदावरी का दूसरी सबसे बड़ी नदी का द्रोणी क्षेत्र है जो भारत के क्षेत्र 10 प्रतिशत भाग है। इसके बाद कृष्‍णा नदी के द्रोणी क्षेत्र का स्‍थान है जबकि महानदी का तीसरा स्‍थान है। डेक्‍कन के ऊपरी भूभाग में नर्मदा का द्रोणी क्षेत्र है, यह अरब सागर की ओर बहती है, बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं दक्षिण में कावेरी के समान आकार की है और परन्‍तु इसकी विशेषताएँ और बनावट अलग है।
कई प्रकार की तटवर्ती नदियाँ हैं जो अपेक्षाकृत छोटी हैं। ऐसी नदियों में काफी कम नदियाँ-पूर्वी तट के डेल्‍टा के निकट समुद्र में मिलती है, जबकि पश्चिम तट पर ऐसी 600 नदियाँ है।
राजस्‍थान में ऐसी कुछ नदियाँ है जो समुद्र में नहीं मिलती हैं। ये खारे झीलों में मिल जाती है और रेत में समाप्‍त हो जाती हैं जिसकी समुद्र में कोई निकासी नहीं होती है। इसके अतिरिक्‍त कुछ मरुस्‍थल की नदियाँ होती है जो कुछ दूरी तक बहती हैं और मरुस्‍थल में लुप्‍त हो जाती है। ऐसी नदियों में लुनी और मच्‍छ, स्‍पेन, सरस्‍वती, बानस और घग्‍गर जैसी अन्‍य नदियाँ हैं।

TOURISM RAJASTHAN


"राजस्थान के तीर्थ स्थल"

राजस्थान को देव भूमि भी कहा जाता है। राजस्थान में तीर्थ न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण जाने जाते हैं, बल्कि तीर्थ स्थल का प्राकृतिक सौंदर्य और वातावरण इसे परिपूर्ण बनाता है। यहां के कुछ तीर्थ स्थलों को बहुत ही जाग्रत (सिद्ध) माना जाता है।

1.तीर्थराज पुष्कर -

यह अजमेर से 11 किमी दूर है। पुष्कर ब्रह्माजी के मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम आदि तीर्थोँ के बाद पुष्कर में भी स्नान करना आवश्यक माना है । कहा जाता है कि विश्वामित्र ने यहाँ पर तपस्या की थी व भगवान राम ने यहाँ गया कुंड पर पिता दशरथ का पिण्ड तर्पण किया था। पांडवो ने भी अपने निर्वासित काल का कुछ समय पुष्कर में बिताया था। पुष्कर को गायत्री का जन्मस्थल भी माना जाता है। यहाँ प्रतिदिन तीर्थयात्री आते हैं लेकिन प्रसिद्ध पुष्कर मेले में हजारों देशी-विदेशी तीर्थयात्री आते हैं। यह मेला कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है।

2. कपिलमुनि का कोलायत -

सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल की तपोभूमि कोलायत बीकानेर से लगभग 50 किमी दूर है। कार्तिक माह (विशेषकर पूर्णिमा) में यहाँ झील में स्नान का विशेष महत्व है।

3. भर्तृहरि -

अलवर से 35 किमी दूर है यह नाथपंथ की अलख जगाने वाले राजा से संत बने भर्तृहरि का समाधि स्थल। यहाँ भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को मेला लगता है । कनफडे नाथ साधुओं के लिए इस तीर्थ की विशेष मान्यता है।

4. रामद्वारा, शाहपुरा (भीलवाड़ा) -

यह भीलवाडा करीब 50 किमी दूर है व सडक मार्ग द्वारा जिला मुख्यालय से जुडा हुआ हैं। यह रामस्नेही सम्प्रदाय के श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। इस संप्रदाय का मुख्य मंदिर रामद्वारा के नाम से जाना जाता हैं। यहॉ पूरे भारत से और विदेशों तक से तीर्थयात्री आते हैं। यह शहर लोक देवताओं की फड पेंटिंग्स के लिए भी प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी वीर बाँकुरे केसरसिंह बारहठ की हवेली एक स्मारक के रूप में यहाँ विद्यमान हैं। यहॉ होली के दूसरे दिन प्रसिद्ध फूलडोल मेला लगता हैं, जो लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता हैं। यहॉं के ढाई इंची गुलाब जामुन मिठाई बहुत प्रसिद्ध है।

5. खाटूश्यामजी -

जयपुर से करीब 80 किमी दूर सीकर जिले मेँ स्थित खाटूश्यामजी का बहुत ही प्राचीन मंदिर स्थित है। यहाँ भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की पूजा श्याम के रूप में की जाती है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया था कि कलयुग में उसकी पूजा श्याम (कृष्ण स्वरूप) के नाम से होगी। खाटू में श्याम के मस्तक स्वरूप की पूजा होती है, जबकि निकट ही स्थित रींगस में धड़ स्वरूप की पूजा की जाती है। प्रतिवर्ष यहाँ फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में नवमी से द्वादशी तक विशाल मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों भक्तगण पहुँचते हैं। हजारों लोग यहाँ पदयात्रा करके भी पहुँचते हैं, वहीं कई लोग दंडवत करते हुए श्याम के दरबार में अर्चना करने आते हैं। प्रत्येक एकादशी व रविवार को भी यहाँ भक्तों की लंबी कतारें लगी रहती हैं।

6. हनुमानगढ़ का सिल्ला माता मंदिर-

सिल्ला माता का मंदिर 18 वीं शताब्दी में स्थापित है। यह कहा जाता है कि मंदिर में स्थापित माता जी सिल्ल पत्थर घग्घर नदी में बहकर आया था। यह मंदिर हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर वैदिक नदी सरस्वती के प्राचीन बहाव क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर की मान्यता है कि सिल्ला माता के सिल पीर में जो कोई भी दूध व पानी चढ़ाता है, उसके त्वचा सम्बन्धी रोगों का निवारण हो जाता है। इस मंदिर में प्रत्येक गुरुवार को मेला लगता है।

7. सालासर बालाजी-

राजस्थान के चुरू जिले के सालासर में स्थित हनुमानजी का मंदिर है। यह बालाजी का मंदिर बीकानेर सड़क मार्ग पर जयपुर से 130 किमी व सीकर से 57 किमी की दूरी पर है। यहाँ हर दिन हजारों की संख्या में देशी-विदेशी भक्त मत्था टेकने आते हैं। इस मंदिर में हनुमानजी की वयस्क मूर्ति स्थापित है अतः भक्तगण इसे बड़े हनुमानजी भी पुकारते हैं। चैत्र पूर्णिमा व आश्विन पूर्णिमा के दिन सालासर में विशाल मेला लगता है।

8. चौहानों की कुल देवी जीणमाता-

जीणमाता का मंदिर सीकर से 29 किमी दक्षिण में अरावली की पहाड़ियों के मध्य स्थित है। इसमें लगे शिलालेखों में सबसे प्राचीन विक्रम संवत 1029 (972 A.D.) का शिलालेख है। इससे पता चलता है कि यह मंदिर इससे भी प्राचीन है। जीण माता चौहानों की कुल देवी है। इस मंदिर में जीणमाता की अष्टभुजी प्रतिमा है। यहाँ चैत्र व आसोज के नवरात्रि में शुक्ल पक्ष की एकम से नवमी तक लक्खी मेला भरता है। राजस्थानी लोक साहित्य में जीणमाता का गीत सबसे लम्बा माना जाता है। इस गीत को कनफ़टे जोगी केसरिया कपड़े पहन कर, माथे पर सिन्दूर लगाकर, डमरू व सारंगी पर गाते हैं। इस मंदिर के पश्चिम में महात्मा का तप स्थान है जो धूणा के नाम से प्रसिद्ध है। जीण माता मंदिर के पहाड़ की श्रंखला में ही रेवासा पीठ व प्रसिद्ध हर्षनाथ पर्वत है।

9. मेवाड़ अधिपति एकलिंग महादेव-

उदयपुर से 25 किमी उत्तर में महादेव शिवजी का एक प्राचीन व अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर है जिसे एकलिंग जी का मंदिर कहते है। यह अरावली की पहाड़ियों के मध्य स्थित है। इस गाँव का नाम कैलाशपुरी है। एकलिंग जी मेवाड़ के महाराणा के इष्टदेव हैं। महाराणा "मेवाड़-राज्य" के मालिक के रुप में एकलिंग जी को ही मानते हैं तथा वे स्वयं को उनका दीवान ही कहते हैं । इसके निर्माण के काल के बारे में तो ऐसा कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन एक जनश्रुति के अनुसार सर्वप्रथम इसे गुहिल वंश के बापा रावल ने बनवाया था। फिर महाराणा मोकल ने उसका जीर्णोद्धार कराया। महाराणा रायमल ने नये सिरे से वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर के अहाते में कई और भी छोटे बड़े मंदिर बने हुए हैं, जिनमें से एक महाराणा कुम्भा का बनवाया हुआ विष्णु का मंदिर है। लोग इसे मीराबाई का मंदिर के रुप में भी जानते हैं।

कुछ अन्य मंदिरों की सूचि :-

karni-mataकरनी माता का मंदिर अपने आप में एक आश्चर्य है। राजस्थान में बीकानेर के निकट स्थित मंदिर अद्भुत है। करनी माता को दुर्गा का अवतार माना जाता है। यहां सफेद चूहा, जिसे काबास कहते हैं, को देखना अच्छा माना जाता है।
kela-deviकेला देवी का मंदिर करौली ज़िला में स्थित है। हर साल नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का आकर्षण बढ़ जाता है। 1600 ई. में निर्मित इस मंदिर में दुर्गा मां की पूजा होती है।
birla-mandir
जयपुर में स्थित बिरला मंदिर राजस्थान के प्रसिद्ध मंदिरों में से है।1988 में एक व्यवसायी की ओर से निर्मित मंदिर लक्ष्मी नारायण जी को समर्पित है।
dwarkadhishकनक्रोली राजसमंद में स्थित द्वारिकाधीश मंदिर कृष्ण जी के सात रूपों में से एक रूप है। 1676 में मूर्ति को मथुरा से महाराजा राज सिंह के जरिये लाया गया था।
shiv-mandirउदयपुर के उत्तर में स्थित एकलिंगजी का शिव मंदिर शिव भगवान को समर्पित है। एकलिंगजी मंदिर 108 मंदिरों का समूह है। यहां हमेशा धूप सामग्री से खुशबू फैली रहती है।
rankapur-jain-mandirरणकपुर जैन मंदिर पाली ज़िले के पर्वत शृंखला में स्थित है। 15वीं सदी में राणा कुंभा की ओर से निर्मित यह मंदिर भगवान ऋषभदेव जी को समर्पित है।
nathdwara-mandirनाथद्वारा मंदिर उदयपुर के उत्तर में स्थित है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति काले संगमरमर के एक टुकड़े से बनायी गयी है।
durga-mahakali-mandirदुर्गा महाकाली मंदिर अजमेर के तारागढ़ की तलहटी में बना है। पं. जगमोहन जी की ओर से स्थापित यह मंदिर भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करता है तथा कष्टों का निवारण होता है।
balaji-mandirराजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर मेंहंदीपुर बालाजी मंदिर स्थित है, जहां पर बजरंगबली की स्वयंभू 1000 वर्ष प्राचीन मूर्ति है। भूत-प्रेतों और ऊपरी बाधाओं से परेशान लोगों का यहां तांता लगा रहता है।
puskarअजमेर के पास पुष्कर नगरी में स्थित पुष्कर मंदिर में साधु-संतोंका जमावड़ा देखा जा सकता है। ब्रह्मा की इस धरती को ब्रह्म सरोवर कहा जाता है। ब्रह्मा मंदिर पुष्कर घाटी के नागा पर्वत और अन्नासागर के आगे स्थित है। दुनिया में एक ही मंदिर है, जहां ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा को पूजा जाता है।
pitalhar-mandirमाउंट आबू में स्थित पीतलहार मंदिर में ऋषभदेवजी की मुख्य धातु पीतल से बनी एक विशाल मूर्ति है। यह गुढ मंडप और नवचौकी से मिलकर बना है।
nasiyan-jain-mandirराजस्थान के अजमेर ज़िले में स्थित दिगंबर नसियान जैन मंदिर का निर्माण 1865 में हुआ था। इसे लाल मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
suryanarayan-mandirरणकपुर में स्थित सूर्यनारायण स्टोन मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में हुआ था। यह सात घोड़ों के शानदार रथ पर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।
chisti-ki-darghaअजमेर में ग़रीब नवाज के नाम से मशहूर मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है,जहां प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी नयी दुनिया में प्रवेश कर लिया हो।
dilwada-maindirमाउंट आबू में स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर जैन तीर्थंकरों का महत्वपूर्णतीर्थाटन है। 13वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर संगमरमर के प्रभावशाली उपयोग के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
galta-mandirजयपुर में स्थित गलता मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित है। यह मंदिर अपने प्राकृतिक पानी के कुंड के लिए प्रसिद्ध है, जिससे लगातार पानी बहता है।
gaytri-mandirपुष्कर के दूसरी ओर गायत्री मंदिर स्थित है। ब्रह्मा के औपचारिकबलिदान के दौरान सावित्री की अनुपस्थिति में ब्रह्मा के साथ बैठी गायत्री के सम्मान में इस मंदिर का निर्माण हुआ।
kiradu-mandirकिराडू प्राचीन मंदिर बाड़मेर शहर से 39 किमी.. दूर हथमा गांव में स्थित है। पांच मंदिरों के समूह से यह मंदिर बना है।
osiyan-mandir10वीं सदी में निर्मित जोधपुर का ओसियान मंदिर जोधपुर से 65 किमी. दूर उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
parsvnath-mandirपार्श्वनाथ मंदिर जैन तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ को समर्पित है। 1458-59 ई. में मांडलिक परिवार के जरिये इसका निर्माण हुआ।
saas-bahu-mandirसास बहू मंदिर उदयपुर में स्थित है। 10वीं सदी में यशोमति की ओर से निर्मित यह मंदिर सास बहू को समर्पित है।
sitla-mata-mandirशीतला माता मंदिर भीलवाड़ा के पास धानोपा गांव में स्थित है। इस मंदिर को बहुत ही जाग्रत माना जाता है।
ramdev-mandirश्री रामदेव मंदिर जैसलमेर ज़िले के पोकराम से 13 किमी. दूर रामदेवड़ा में स्थित है। सभी धर्म के लोग यहां श्रद्धांजलि देते हैं।
varah-mandirवराह मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में हुआ था। इस मंदिर में वराह की विशाल मूर्ति है।



1. हवामहल – जयपुर
2. जंतर मंतर – जयपुर
3. गलता जी – जयपुर
4. आमेर किला – आमेर, जयपुर
5. बिड़ला तारामंडल – जयपुर
6. सरगासूली (ईसर लाट) – जयपुर (RPSC Exam)
7. गेटोर की छतरियां – जयपुर
8. नाहरगढ़ – जयपुर
9. गोविन्दजी का मंदिर – जयपुर
10. मुबारक महल – जयपुर (RPSC Exam)
11. आभानेरी मंदिर – दौसा

12. सोनीजी की नसियाँ – अजमेर
13. ढाई दिन का झोंपड़ा – अजमेर
14. दौलत बाग – अजमेर
15. अकबर का किला – अजमेर
16. दरगाह शरीफ्  – अजमेर
17. ब्रह्मा मंदिर – पुष्कर
18. नव ग्रह मंदिर – किशन गढ़

19. सास-बहू के मंदिर ( प्राचीन नागदा के मंदिर) – कैलाशपुरी, उदयपुर
20. सहेलियों की बाड़ी – उदयपुर
21. सज्जनगढ़ – उदयपुर
22. आहड़ संग्रहालय – उदयपुर
23. जगत के प्राचीन मंदिर – जगत गाँव उदयपुर
24. कुम्भा श्याम मंदिर – उदयपुर
25. द्वारकाधीश मंदिर – कांकरोली राजसमंद
26. कुंभलगढ़ – केलवाड़ा राजसमंद
27. श्रीनाथजी मंदिर – नाथद्वारा, राजसमंद

 28. विजय स्तम्भ – चित्तौड़
29. कीर्ति स्तम्भ – चित्तौड़
30. रानी पद्मनी महल – चित्तौड़गढ़
31. सांवलिया जी मंदिर – मंडफिया, चित्तौड़गढ़
32. विनय निवास महल – चित्तौड़गढ़

33. जसवंत थड़ा – जोधपुर
34. उम्मेद भवन – जोधपुर
35. मंडोर – जोधपुर
36. सच्चिया माता मंदिर – ओसियां ( जोधपुर)

 48. श्री गणेश जी का मंदिर – रणथम्भौर
49. उषा मंदिर – बयाना
50. लक्ष्मण जी का मंदिर – भरतपुर
51. केलादेवी मंदिर – करौली

52. नक्की झील – माउंट आबू
53. दिलवाड़ा जैन मंदिर – माउंट आबू
54. अचल गढ़ दुर्ग - माउंट आबू, सिरोही

55. पटवों की हवेली – जैसलमेर
56. सालिम सिंह की हवेली – जैसलमेर
57. रामगढ़ की हवेलियां – जैसलमेर
58. नथमल की हवेली – जैसलमेर
59. बाबा रामदेव मंदिर – रामदेवरा, जैसलमेर
60. बादल महल – जैसलमेर

61. करनी माता मंदिर – देशनोक ( बीकानेर )
62. कपिल देव जी का मंदिर – कोलायत ( बीकानेर )
63. भांडासर जैन मंदिर – बीकानेर
64. अरथूना के प्राचीन मंदिर – बाँसवाड़ा
65. नाकोड़ा पार्श्वनाथ मंदिर – बालोतरा (बाड़मेर)
66. कोलवी की गुफाएँ – झालावाड़
67. सूर्य मंदिर – झालावाड़
68. गैप सागर – डूंगरपुर
69. फखरुद्दीन की दरगाह – गलियाकोट, डूंगरपुर
70. देव सोमनाथ मंदिर – डूंगरपुर
71. रणकपुर जैन मंदिर – सादड़ी, पाली
72. जल महल – जयपुर, डीग व उदयपुर

जीण माता का मंदिर, राजस्थान


शेखावाटी क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला के निम्न भाग में सीकर से लगभग 30 कि.मी. दूर दक्षिण में सीकर जयपुर राजमार्ग पर गोरियां रेलवे स्टेशन से 15 कि.मी. पश्चिम व दक्षिण के मध्य स्थित है | यह मंदिर तीन पहाडों के संगम में 20-25 फुट की ऊंचाई पर स्थित है | माता का निज मंदिर दक्षिण मुखी है परन्तु मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है | मंदिर से एक फर्लांग दूर ही सड़क के एक छोर पर जीणमाता बस स्टैंड है | सड़क के दोनों और मंदिर से लेकर बस स्टैंड तक श्रद्धालुओं के रुकने व आराम करने के लिए भारी तादात में तिबारे (बरामदे) व धर्मशालाएं बनी हुई है ,जिनमे ठहरने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता | कुछ और भी पूर्ण सुविधाओं युक्त धर्मशालाएं है जिनमे उचित शुल्क देकर ठहरा जा सकता है | बस स्टैंड के आगे ओरण (अरण्य ) शुरू हो जाता है इसी अरण्य के मध्य से ही आवागमन होता है | जीण माँ भगवती की यह बहुत प्राचीन शक्ति पीठ है ,जिसका निर्माणकार्य बड़ा सुंदर और सुद्रढ़ है | मंदिर की दीवारों पर तांत्रिको व वाममार्गियों की मूर्तियाँ लगी है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि उक्त सिद्धांत के मतावलंबियों का इस मंदिर पर कभी अधिकार रहा है या उनकी यह साधना स्थली रही है | मंदिर के देवायतन का द्वार सभा मंडप में पश्चिम की और है और यहाँ जीण माँ भगवती की अष्ट भुजा आदमकद मूर्ति प्रतिष्ठापित है | सभा मंडप पहाड़ के नीचे मंदिर में ही एक और मंदिर है जिसे गुफा कहा जाता है जहाँ जगदेव पंवार का पीतल का सिर और कंकाली माता की मूर्ति है | मंदिर के पश्चिम में महात्मा का तप स्थान है जो धुणा के नाम से प्रसिद्ध है | जीण माता मंदिर के पहाड़ की श्रंखला में ही रेवासा व प्रसिद्ध हर्षनाथ पर्वत है | हर्षनाथ पर्वत पर आजकल हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले बड़े-बड़े पंखे लगे है | जीण माता मंदिर से कुछ ही दूर रलावता ग्राम के नजदीक ठिकाना खूड के गांव मोहनपुरा की सीमा में शेखावत वंश और शेखावाटी के प्रवर्तक महाराव शेखा जी का स्मारक स्वरुप छतरी बनी हुई है | महाराव शेखा जी ने गौड़ क्षत्रियों के साथ युद्ध करते हुए यही शरीर त्याग वीरगति प्राप्त की थी | मंदिर के पश्चिम में जीण वास नामक गांव है जहाँ इस मंदिर के पुजारी व बुनकर रहते है | 
जीण माता मंदिर में चेत्र सुदी एकम् से नवमी (नवरात्रा में ) व आसोज सुदी एकम् से नवमी में दो विशाल मेले लगते है जिनमे देश भर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है | मंदिर में देवी शराब चढाई जा सकती है लेकिन पशु बलि वर्जित है | 



मंदिर की प्राचीनता :

मंदिर का निर्माण काल कई इतिहासकार आठवीं सदी में मानते है | मंदिर में अलग-अलग आठ शिलालेख लगे है जो मंदिर की प्राचीनता के सबल प्रमाण है |
1- संवत 1029 यह महाराजा खेमराज की मृत्यु का सूचक है |
2- संवत 1132 जिसमे मोहिल के पुत्र हन्ड द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है |
3- 4. - संवत 1196 महाराजा आर्णोराज के समय के दो शिलालेख |
5- संवत 1230 इसमें उदयराज के पुत्र अल्हण द्वारा सभा मंडप बनाने का उल्लेख है |
6- संवत 1382 जिसमे ठाकुर देयती के पुत्र श्री विच्छा द्वारा मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है |
7- संवत 1520 में ठाकुर ईसर दास का उल्लेख है |
8- संवत 1535 को मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है |
उपरोक्त शिलालेखों में सबसे पुराना शिलालेख 1029 का है पर उसमे मंदिर के निर्माण का समय नहीं लिखा गया अतः यह मंदिर उससे भी अधिक प्राचीन है | चौहान चन्द्रिका नामक पुस्तक में इस मंदिर का 9वीं शताब्दी से पूर्व के आधार मिलते है |

जीण का परिचय : 

लोक काव्यों व गीतों व कथाओं में जीण का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है |
राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में एक चौहान वंश के राजपूत के घर जीण का जन्म हुआ | उसके एक बड़े भाई का नाम हर्ष था | और दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था | एक दिन जीण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई जहाँ दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई | उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी | अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रही कि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है जिसका मटका हर्ष पहले उतरेगा उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जायेगा | हर्ष इस विवाद से अनभिग्य था | पानी लेकर जब घर आई तो हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया | इससे जीण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी | भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घर से निकल पड़ी| जब भाई हर्ष को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा | जीण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे "काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई | हर्ष भी जीण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया जिसे जीण ने स्वीकार नहीं किया | जीण के दृढ निश्चय से प्रेरित हो हर्ष भी घर नहीं लौटा और दुसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव की साधना में तल्लीन हो गया पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्ष नाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई | वहीँ जीण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर दुर्गा बन गई | हर्ष भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया | इस प्रकार जीण और हर्ष अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगो की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए | इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते है|

औरंगजेब को पर्चा :

एक जनश्रुति के अनुसार देवी जीण माता ने सबसे बड़ा चमत्कार मुग़ल बादशाह औरंगजेब को दिखाया था | औरंगजेब ने शेखावाटी के मंदिरों को तोड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी थी | यह सेना हर्ष पर्वत पर शिव व हर्षनाथ भैरव का मंदिर खंडित कर जीण मंदिर को खंडित करने आगे बढ़ी कहते है पुजारियों के आर्त स्वर में माँ से विनय करने पर माँ जीण ने भँवरे (बड़ी मधुमखियाँ ) छोड़ दिए जिनके आक्रमण से औरंगजेब की शाही सेना लहूलुहान हो भाग खड़ी हुई | कहते है स्वयं बादशाह की हालत बहुत गंभीर हो गई तब बादशाह ने हाथ जोड़ कर माँ जीण से क्षमा याचना कर माँ के मंदिर में अखंड दीप के लिए सवामण तेल प्रतिमाह दिल्ली से भेजने का वचन दिया | वह तेल कई वर्षो तक दिल्ली से आता रहा फिर दिल्ली के बजाय जयपुर से आने लगा | बाद में जयपुर महाराजा ने इस तेल को मासिक के बजाय वर्ष में दो बार नवरात्रों के समय भिजवाना आरम्भ कर दिया | और महाराजा मान सिंह जी के समय उनके गृह मंत्री राजा हरी सिंह अचरोल ने बाद में तेल के स्थान पर नगद 20 रु. 3 आने प्रतिमाह कर दिए | जो निरंतर प्राप्त होते रहे | औरंगजेब को चमत्कार दिखाने के बाद जीण माता " भौरों की देवी " भी कही जाने लगी | एक अन्य जनश्रुति के अनुसार औरंगजेब को कुष्ठ रोग हो गया था अतः उसने कुष्ठ निवारण हो जाने पर माँ जीण के मंदिर में एक स्वर्ण छत्र चढाना बोला था | जो आज भी मंदिर में विद्यमान है |
शेखावाटी के मंदिरों को खंडित करने के लिए मुग़ल सेनाएं कई बार आई जिसने खाटू श्याम ,हर्षनाथ ,खंडेला के मंदिर आदि खंडित किए | एक कवि ने इस पर यह दोहा रचा -

देवी सजगी डूंगरा , भैरव भाखर माय |
खाटू हालो श्यामजी , पड्यो दडा-दड खाय ||

खंडेला के मंदिरों पर भी जब मुग़ल सेना ने आक्रमण किया तब खंडेला का राजा पहाडो में जा छिपा लेकिन मंदिरों की रक्षार्थ सुजाण सिंह शेखावत जो उस समय अपनी शादी में व्यस्त था समाचार मिलते ही बीच फेरों से अपनी नव वधु को लेकर अपने साथियों सहित खंडेला पहुँच शाही सेना से भीड़ गया और शौर्यपूर्वक लड़ता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ | इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार है :-
झिर मिर- झिर मिर मेवा बरसे ,मौरां छतरी छाई जी |
जग में है आव सुजाणा , फौज देवरे आई जी ||

हर्षनाथ पहाड़ पर हर्षनाथ भैरव व सीकर के राव राजा शिव सिंह द्वारा बनाया गया शिव मंदिर की मुग़ल सेना द्वारा खंडित मुर्तिया आज भी वहां पड़ी है जो पुरातत्व विभाग के अधीन है जिसे मैंने भी कई बार देखा है इनमे से कुछ खंडित मुर्तिया मैंने सीकर के जानना महल में भी सीकर अपनी पढाई के दौरान देखि है | 

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