आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

01 मार्च 2013

देवसर : राणी सती दादीजी का बलिदान स्थल


वैश्य समाज के अग्रवाल कुल की आराध्य सती नारायणी बाई (बहु प्रचलित नाम राणी सती) का मूल बलिदान (सती) स्थल ग्राम देवसर है न कि राजस्थान स्थित नगर झुन्झुनंू, जैसा कि बहुसंख्यक आराधक झुन्झुनंू स्थित भव्य एवं विशाल ‘राणी सती मंदिर’ को मानते हैं। देवसर ग्राम हरियाणा के जिला मुख्यालय भिवानी नगर से लोहारू मार्ग पर लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित है। ऐसी मान्यता एवं विश्वास है कि मार्ग शीर्ष नवमी मंगलवार संवत् 1352 तद्नुसार 6 दिसंबर सन् 1271 को नारायणी देवी ने यहीं सतीत्व ग्रहण किया था।
नारायणी देवी (प्रचलित नाम राणी सती) के पिता गुरु सामल माता गंगा देवी राजस्थान के महम नगर के ठोकला उपनगर के निवासी थे जो गोयल गौत्रीय अग्रवाल थे। इसी युगल दम्पति के यहां कन्या का जन्म हुआ जिसका नामकरण ‘नारायणी देवी’ किया गया। जन्म के समय बालिका नारायणी का चेहरा सुन्दर और तेजस्वी था। कहते हैं कि एक महात्मा ने कन्या को देखकर आशीर्वाद दिया की भावी जीवन में यह कन्या अमर सुहागिन होगी और लोग इसका श्रद्धापूर्वक स्मरण करेंगे। उस वक्त आशीर्वचन देकर महात्मा अंतध्र्यान हो गये।

बालिका नारायणी जब तेरह वर्ष की हो गयी तब माता-पिता को चिंता होने लगी। उन्होंने पुरोहित (ब्राह्मïण) को हरियाणा के हिसार में कन्या के लिये वर देखने को भेजा। ब्राह्मïण देवता विवाह का प्रस्ताव लेकर युवक तनधन दास के पिता सेठ जालान दास और माता यमुना देवी के पास पहुंचे जो नवाब हिसार के दीवान थे और अपनी न्यायप्रियता के लिये प्रसिद्ध थे। ऐसा माना जाता है कि विवाह के बाद विदाई के समय अपशकुन होने लगे थे। विवाह के अवसर पर दहेज में उपहार स्वरूप तनधन दास को अन्य सामानों के साथ श्याम वर्ण की एक सुन्दर घोड़ी भी मिली थी। नारायणी बाई के पति तनधन दास अपनी श्याम वर्ण घोड़ी पर सैर करने प्राय: भिवानी नगर तक व आगे देवसर ग्राम तक आया करते थे। जनमानस में व्याप्त विश्वास के अनुसार एक दिन नवाब के शहजादे ने तनधन दास की श्याम वर्ण घोड़ी देख ली और उसे वह काफी पसन्द आयी। शहजादे ने घोड़ी के स्वामी तनधन दास को कहा कि आपकी यह घोड़ी काफी सुन्दर है मुझे दे दो। तनधन दास ने घोड़ी का स्वामित्व छोड़ घोड़ी देने से स्पष्ट मना कर दिया। तनधन दास के अस्वीकारात्मक उत्तर से रुष्ट होकर प्रतिरोध स्वरूप नवाब के सैनिकों ने एक दिन घात लगा कर तनधन दास पर आक्रमण कर दिया। इस आकस्मिक आक्रमण से तनधन दास गंभीर रूप से घायल होकर दिवंगत हो गये। जब नारायणी देवी ने अपने दिवंगत पति का शव देखा तो वे स्वयं अपने पति का अस्त्र (भाला) तथा तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर रणचण्डी का रूप धारण कर प्रतिशोध लेने के लिये नवाब के सैनिकों से युद्ध किया। नारायणी देवी के तेज बल से सैनिक भागने लगे। तत्पश्चात नारायणी देवी ने अपने पति के शव को लाने के लिये अपने सेवक राणा से कहा और उन्होंने देवसर की पहाड़ी पर सती होने की इच्छा व्यक्त की।


जनश्रुति के अनुसार नारायणी देवी का जन्म, विवाह तथा सती होना तीनों ही दिन मंगलवार था। कहते हैं कि चिता में से दिवंगत (सती हुई) नारायणी देवी की मधुर वाणी में यह संदेश आया कि ‘मेरी चिता के तीन दिन में ठण्डी हो जाने के उपरांत भस्म को एकत्रित कर मेरी चुनरी में बांध कर रख देना। घोड़ी चलते-चलते जहां भी रुक जाये उसी स्थान पर मैं अपने पति के साथ निवास करती हुई जन कल्याण कार्य करती रहूंगी।’ उक्त कथन दिवंगत राणी सती के प्रति उनके असीम श्रद्धालु जनों के आत्म-विश्वास का प्रतीक है। घोड़ी राणी सती की चुनरी में एकत्रित भस्म को लेकर झुन्झुनूं नगर के मार्ग पर चलते-चलते एक स्थान पर रुक गयी और वहीं सेवक राणा ने सती नारायणी का स्मरण कर उसी स्थान पर भस्म को स्थापित कर उसका पूजन किया। वर्तमान में उसी स्थान पर उनकी स्मृति स्वरूप एक भव्य विशाल मंदिर का निर्माण किया गया जहां काफी संख्या में देश के विभिन्न स्थानों से उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले नर-नारी दर्शनार्थ तथा अपनी इच्छा पूर्ति की अभिलाषा लेकर उनका आशीर्वाद लेने आते हैं। प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को रानी सती का पूजन तथा आराधना दिवस मनाते हैं। झुन्झुनूं स्थित भव्य राणी सती मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार भी एक भिवानी निवासी (वर्तमान में सिंगापुर हांगकांग प्रवासी) परिवार द्वारा निर्मित है।
नारायणी देवी (राणी सती) के मूल सतीत्व स्थल ग्राम देवसर की पहाड़ी पर उनके एक अनन्य भक्त मुंबई निवासी परिवार ने उनकी स्मृति में एक सुन्दर मंदिर का निर्माण दो दशक पूर्व करा दिया। साथ में एक बहु मंजिली धर्मशाला तथा सामने एक आवासीय भवन भी बन चुका है। राणी सती मंदिर के साथ पहाड़ी पर देवी दुर्गा का एक अति भव्य नयनाभिराम मंदिर बना हुआ है जहां प्रतिवर्ष दो बार नवरात्रों का आयोजन होता है। नीचे भूमि पर आगत भक्तजन तथा दर्शनार्थियों के निवास हेतु अति सुन्दर सभी सुविधाओं से युक्त धर्मशालाएं बनी हुई हैं।

रानिसती दादीजी, देवसर : संकलन - राजेश मिश्रा

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    6 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook