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11 जून 2013

वाल्मीकि आश्रम

यही पर लव-कुश ने बंदी बनाया था लक्ष्मण एवं हनुमानजी को

वाल्मीकि की आश्रम स्थली बिठूर को देखकर पर्यटकों का मस्तिष्क आदिकवि वाल्मीकि के जीवन वृत्तांत में खोने लगता है और मस्तिष्क पटल पर रामायण का उत्तर राग गूंजने लगता है। जब भगवान श्री राम ने सीता का परित्याग कर दिया था तो सीता को वाल्मीकि बिठूर के इस आश्रम में ले आए थे। वाल्मीकि के इस आश्रम में तीन मंदिर हैं। मुख्य मंदिर वाल्मीकि का है। इस आश्रम में तीन बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं, जिनमें पहली मूर्ति वाल्मीकि की है। वाल्मीकि की मूर्ति पद्ïमासन मुद्रा में है और वाल्मीकि दाएं हाथ में मोर पंख की लेखनी (कलम) लिए हुए हैं।
आश्रम का मुख्य द्वार बहुत ऊंचा है। उसकी ऊंचाई बस देखते ही बनती है। मुख्य द्वार पर बनी कलाकृतियां भी बहुत आकर्षित करती हैं। सबसे पहले इस आश्रम का निर्माण राजा जयचंद ने करवाया था लेकिन औरंगजेब ने अपने शासनकाल में आश्रम को नष्ट कर दिया था। सन्ï 1820 में बाजीराव पेशवा (द्वितीय) ने इस आश्रम का पुन: निर्माण करवाया था।
आश्रम में वाल्मीकि की मुख्य मूर्ति के समीप शंख, चक्र, गदा और पद्ïमधारण किए भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है। भगवान विष्णु की मूर्ति वाल्मीकि के दस्यु जीवन की कहानी कहती है। रामायण की रचना करके वाल्मीकि युग-युग के लिए अमर हो गए।
बिठूर में सीता की एक पर्ण कुटी को देखकर परित्यकता सीता के जीवन की कल्पना में मस्तिष्क में चलचित्र का दृश्य उभरने लगता है। दूसरे मंदिर को सीता मंदिर कहते हैं। इस मंदिर में कुश को गोद में लिए और लव की उंगली पकड़े हुए सीता जी की मूर्ति स्थापित है। इन तीनों मूर्तियों का निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।
इन मूर्तियों का निर्माण गुप्त काल में चाणक्य ने कसौटी के पत्थर से करवाया था। काले पत्थर से निर्मित इन मूर्तियों को औरंगजेब ने तुड़वा दिया था। पेशवा ने बाद में इन मूर्तियों को व्रज लेप से पूरा करवाया था। इस आश्रम में वाल्मीकि रामायण का पाठ प्रतिदिन किया जाता है।
ब्रह्मïावर्त घाट पवित्र पावनी गंगा के प्रमुख घाटों में से एक है। ब्रह्ïमावर्त घाट अपनी पौराणिकता के कारण देश के धार्मिक स्थलों में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। देश के दूर-दूर नगर, गांवों से कार्तिक मास में तीर्थयात्री यहां एकत्र होते हैं। वे इस घाट पर स्नान करना बहुत पुण्य मानते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार परमपिता ब्रह्मïा जी ने उत्पलारण्य में यज्ञ किया था। ब्रह्ïमा जी ने जिस स्थान पर यज्ञ किया था, उस स्थान को ब्रह्ïमावर्त कहा जाता है। जहां उस समय यज्ञ वेदी बनाई गई थी, उस स्थान पर एक खूंटी बनी हुई है जिसे ब्रह्ïमा जी की खूंटी कहा जाता है।

ब्रह्ïमा जी की खूंटी एक छोटे से मंदिर में स्थित है। इस खूंटी के संबंध में एक किंवदंती प्रचलित है कि गंगा जी में कितनी ही भयंकर बाढ़ आ जाए लेकिन मंदिर में स्थित ब्रह्ïमा जी की खूंटी कभी डूबती नहीं। ब्रह्ïमावर्त घाट पर अनेक मंदिर स्थापित हैं। इन सबमें ‘ब्रहमेश्वर’ मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर के सामने भगवान श्रीराम का मंदिर है। इस मंदिर में कुछ प्राचीन बाण रखे हुए हैं। इन बाणों के संबंध में कहा जाता है कि वे लव-कुश के बाण हैं। आश्रम में पले-बढ़े लव-कुश इन बाणों से खेला करते थे।
ब्रह्ïमावर्त घाट से एक किलोमीटर की दूरी पर वाल्मीकि आश्रम स्थित है। वाल्मीकि आश्रम के पास एक कुंड बना हुआ है। इस कुंड को ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। इस कुंड के संबंध में यह कहा जाता है कि लव-कुश से श्रीराम के सैनिकों के हारने पर शत्रुघ्न, लक्ष्मण और हनुमान बंदी बना लिये जाने पर जब श्रीराम लव-कुश से युद्ध करने उनके सामने पहुंचे थे तो सीता जी उनके युद्ध को रोकने यहां पहुंची थीं और इस कुंड के स्थान पर सीता की प्रार्थना पर जमीन फट गयी थी और सीता जी पाताल में समा गई थीं।

पास में ही एक विशाल घंटा लटका हुआ है। अष्ट धातु से निर्मित यह घंटा साढ़े सात मन वजन का है। बाजीराव पेशवा ने इस विशाल घंटे को बनवाया था। इसी घंटे के पास स्वर्ग सीढ़ी बनी हुई है। स्वर्ग सीढ़ी को ‘सरग सेनी’ कहा जाता है। कहते हैं कि यह स्वर्ग जाने का रास्ता है। बिठूर का ब्रह्ïमावर्त घाट धार्मिक दृष्टि से महत्व रखता है, वहीं ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। बिठूर में नाना साहब के महलों के अवशेष भी उस युग की वैभवता की कहानी कहते दिखाई देते हैं।


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