आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

10 जुलाई 2013

साम्य और एकता की प्रतीक पुरी रथयात्रा


श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथपुरी) का महत्व वर्णनातीत है। वेद, उपनिषद् तथा पुराणों में पुरुषोत्तम की प्रशस्ति वर्णित है। श्री जगन्नाथ जी का दूसरा नाम पुरुषोत्तम और धाम का नाम भी पुरुषोत्तम है। यह परम रहस्यमय देवता हैं। वे शैवों के लिए शिव, वेदान्तियों के लिए ब्रह्म, जैनियों के लिए ऋषभनाथ और गाणपत्यों के लिए गणेश हैं। अत: जो जिस रूप से दर्शन करना चाहे, उसके लिए उसी रूप में श्री जगन्नाथ जी विद्यमान हैं। पुरी धाम कलियुग का पवित्र धाम है। श्री जगन्नाथ जी के प्राकट्य की रहस्यमय कथा ब्रह्म पुराण तथा स्कंद पुराण में वर्णित है। जगन्नाथ जी अजन्मा और सर्वव्यापक होने पर भी दारुब्रह्म के रूप में अपनी अद्भुत लीला दर्शाते आ रहे हैं। जगन्नाथ क्षेत्र में जगन्मैत्री की श्रेष्ठ भावना सन्निहित है। उसका प्रमाण श्री जगदीश रथयात्रा है। इस स्थान पर सर्वप्रथम नीलांचल-संज्ञक पर्वत ही था तथा सर्वदेवाराधनीय भगवान नीलमाधव जी का विग्रह उक्त पर्वत पर ही था। कालक्रम से यह पर्वत पाताल में चला गया। देवता लोग भगवद्विग्रह को स्र्वगलोक ले गये। इस क्षेत्र को उन्हीं की पावन स्मृति में आज भी श्रद्धा से ‘नीलांचल’ कहा जाता है। श्री जगन्नाथ मंदिर शिखर पर संलग्नचक्र ‘नीलच्छत्र’ के दर्शन जहां तक होते रहते हैं, वह संपूर्ण क्षेत्र ही श्री जगन्नाथ पुरी है। श्री जगन्नाथ जी की द्वादश यात्राओं में गुण्डिचा यात्रा मुख्य है। यहीं मंदिर में विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा उनकी बहिन सुभद्रा जी की दारु प्रतिमाएं बनाई थीं। महाराज इंद्रद्युम्र तथा उनकी पत्नी विमला की भक्ति व श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें इन मूर्तियों को प्रतिष्ठित करने का आदेश दिया था। प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथयात्रा संपन्न होती है जिसमें न केवल भारत अपितु विदेशों से भी श्रद्धालु भाग लेते हैं। रथ को खींचने तथा उसके दर्शन करने की होड़ लगी रहती है। करोड़ों लोगों का लक्ष्य एक ही होता है। इसीलिए यह रथयात्रा साम्य तथा एकता की प्रतीक मानी जाती है।
श्री जगन्ननाथ पुरी रथयात्रा के महत्व व परिणामों का विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है। उस समय रथ पर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्री जगन्नाथ जी का लोग भक्ति पूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान के धाम में निवास होता है। जो श्रेष्ठ पुरुष रथ के आगे नृत्य करके गाते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य रथ के आगे खड़े होकर चंवर, व्यंजन, फूल के गुच्छों अथवा वस्त्रों से भगवान पुरुषोत्तम को हवा करते हैं, वह ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस समय दिया-दान भी अक्षय फल प्रदान करता है। जो अज्ञानी और अविश्वासी हैं, उनके मन में विश्वास उत्पन्न करने के लिए भगवान विष्णु प्रतिवर्ष यात्रा आरंभ करते हैं। इसकी पृष्ठभूमि माता रोहिणी द्वारा व्रज-लीला सुनाने, कृष्ण, बलराम व सुभद्रा का द्वार पर बैठने, माता की परम पावन वार्ता से उनका प्रेमानंद में विह्वल होना, उनके अंगों का संकुचित होकर निश्चल स्थावर प्रतिमूर्ति स्वरूप परिलक्षित होना, नारद का वहां आना, भगवान से उसी रूप में वहां विराजमान रहने का आग्रह करना तथा भगवान के इस आग्रह को स्वीकार करना, आदि का प्रसंग है। स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्रद्युम्र को स्वयं भगवान ने कहा कि उनका जन्म स्थान उन्हें अत्यंत प्रिय है, अत: वे वर्ष में एक बार वहां अवश्य आएंगे।
रथयात्रा में तीनों रथों के विभिन्न नाम परम्परागत हैं। बलभद्र जी के रथ का नाम तालध्वज, सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन और जगन्नाथ जी के रथ का नाम नन्दीघोष है। पुरी के महाराजा प्रथम सेवक होने के नाते रथों को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं तथा उसके बाद रथों को खींचा जाता है। ये रथ प्रतिवर्ष लकड़ी के बनाये जाते हैं और इनमें तीनों विग्रह भी काष्ठ के होते हैं। काष्ठ के विग्रहावतार धारण करने के विषय में एक प्रसंग है कि एक बार भक्तों के अधीन होकर और भक्तों की श्रेष्ठता दिखाते हुए भगवान ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो मेरा कलियुग में काष्ठ का विग्रह हो। उस ऋषि के अपराध करने वाले गन्धर्व को अर्जुन और सुभद्रा ने अभयदान दिया था। भगवान ने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठ विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। रथयात्रा में विभिन्न स्थानीय पारंपरिक रीति-रिवाजों को बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाया जाता है। रथयात्रा उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। वैष्णवों की यह मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं जगन्नाथ जी हैं क्योंकि वे ही पूर्ण परब्रह्म हैं।
इस प्रकार पुरी की रथयात्रा पारंपरिक प्राचीन प्रथा का निर्वहन है जो जन-जन को भगवान का सामीप्य प्रदान कराने हेतु है। रथारूढ़ भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से मनुष्य को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

श्री जगन्नाथ : जगत पसारे हाथ



भारत की सात पुरियों तथा चार धामों में से एक शंख क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र, श्री क्षेत्र, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथपुरी आदि अनेक विशेषणों से प्रख्यात पुरी ओडिसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर, नीलसागर के किनारे (बंगाल की खाड़ी के पास) बसी है। समुद्र तट  के लगभग डेढ़ किलोमीटर उत्तर में नीलगिरि पर्वत पर वहां के प्रधान देवता जगन्नाथ जी का प्रख्यात ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। यह मंदिर कलिंग वास्तुशैली में  कृष्णवर्णी पत्थरों को तराशकर सन् 1198 में नरेश चीडग़ंग ने निर्मित कराया था, किंतु मूल मंदिर का निर्माण कब किसने कराया यह ज्ञात नहीं है, जबकि पौराणिक आख्यानानुसार इसे राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कराया था। मंदिर के सिंह द्वार के सम्मुख 11 मीटर ऊंचा गरुड़ स्तंभ है जिसे लगभग सात शताब्दी पूर्व महाराज दिव्य सिंह देव ने कोणार्क के सूर्य मंदिर से लाकर यहां स्थापित कराया था। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि पुरी के इस जगन्नाथ मंदिर की छवि ऐसी है जो बुद्ध, बौद्ध संघ तथा बौद्ध दर्शन-धर्म का प्रतिनिधित्व करती है। जनश्रुति है कि यहीं गौतम बुद्ध के दांत भी रखे थे जिन्हें  बाद में श्रीलंका भेज दिया गया। किंवदंती है कि इस मंदिर में जगन्नाथ जी की प्रतिमा में चैतन्य महाप्रभु विलीन हो गये थे।

श्री जगन्नाथ जी श्रीकृष्ण रूप में विष्णु जी के अवतार हैं। वैष्णव मतानुसार  जगन्नाथ जी राधाकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक हैं। उन्हीं से  संपूर्ण सृष्टिï प्रोद्भूत है। जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर ब्रह्मï तथा श्रीकृष्ण की कला के एक रूप हैं। इसी से वहां होने वाले समस्त अनुष्ठïान श्रीकृष्ण जी की  जीवन की घटनाओं से संबंधित होते हैं तथा पुरी की रथयात्रा श्रीकृष्ण के गोकुल  से मथुरा यात्रा की प्रतीक। रथयात्रा का आयोजन सहस्राब्दियों से एक महोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होता है। उल्लेख्य है कि पहले यह देव-उत्सव मात्र पुरी तक सीमित था किंतु आज यह विश्वव्यापी उत्सव बन गया है। दस दिवसीय यह उत्सव आषाढ़  शुक्ल एकादशी को श्री जगन्नाथ जी, बलभद्र जी, सुभद्रा जी की प्रतिमाओं को रत्नवेदिका पर स्थापित करने के पश्चात संपूर्ण होता है। द्वितीया को सुदर्शन चक्र सहित तीनों मूर्तियों को मुख्य मंदिर से ढोल -नगारे,  शंख-ध्वनि के साथ हाथों में उठाकर बाहर लाया जाता है तथा वहां खड़े तीन 50-60 फुट ऊंचे नये बने काष्ठï  रथों पर विराजमान कराया जाता है। वहां  से हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन रस्सी के सहारे  पांच किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर तक ले जाते हैं जहां भगवान दशमी तक विश्राम करके पुन: लौटते हैं। लौटते हुए भी रथ खींचकर मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है।
द्वितीया के दिन बाहर खड़े सज्जित रथों पर पूरी श्रद्धा सहित मूर्तियां रखी जाती हैं। सबसे आगे रहता है लाल-हरे रंग से सजा तालध्वज रथ जिस पर बलभद्र जी का विग्रह, बीच में नीले लाल रंग से सजा तर्पदलन या पद्म-ध्वज रथ जिस पर सुभद्रा जी तथा सुदर्शन चक्र, सबसे पीछे लाल-पीले रंग से सज्जित गरुड़ ध्वज रथ पर जगन्नाथ जी की प्रतिमा रखी जाती है। पुरी राजवंश के राजा इन रथों पर पवित्र जल का स्राव करते हैं तथा सोने के झाड़ू से बुहारते हैं। तब हजारों श्रद्धालु रस्सी के सहारे रथों को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।  इस दस दिवसीय महोत्सव में रथ संचालन, पूजन, दर्शन, भोग आदि की संपूर्ण व्यवस्था पुजारी नहीं बल्कि कोल, भील, किरात जाति वाले करते हैं। दशमी को रथ गुंडीचा मंदिर में घुमाया जाता है। फिर वापसी यात्रा भी उसी प्रकार  प्रारंभ होती है जैसे द्वितीया को रवानगी यात्रा हुई थी। रथयात्रा का यह महोत्सव विश्व में अनूठा, विलक्षण महापर्व है जिसमें जीव का ब्रह्मï से साक्षात् मिलन होता है, जीवात्मा-परमात्मा से जुड़ता है और स्कंदपुराणानुसार उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं  तथा उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिलती है।
हिन्दू पंचांग में प्रति तीन वर्ष के अंतराल पर पुरुषोत्तम मास आता है। जिस साल आषाढ़ पुरुषोत्तम मास होता है  उस साल रथयात्रा नवकलेवर महापर्व के रूप में मनाते हैं। भगवान की पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर परिसर में कोयनी बैकुंठ में महासमाधि दे दी जाती है एवं दारु वृक्ष के काष्ठ से नयी प्रतिमाएं बनाकर (नया कलेवर धारण कर) रथयात्रा पर उन्हीं को विराजित कराया जाता है। प्रतिवर्ष रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ हो जाता है जिसके लिए काष्ठï  आदि का संचयन वसंत पंचमी से किया जाने लगता है। रथ निर्माण में लौह सामग्री, कील,कांटे का प्रयोग वर्जित होता है। रथयात्रा, स्वयं भगवान तथा मंदिर अनेक विलक्षणताएं समेटे हुए हैं। कहीं भी काष्ठï  की प्रतिमा या खंडित प्रतिमा की पूजा नहीं होती परंतु पुरी में इसका अपवाद है क्योंकि प्रतिमाएं काष्ठï की तथा खंडित होती हैं। सर्वत्र कृष्ण के साथ राधा पूजी जाती हैं। जगन्नाथ धाम में कृष्ण के साथ में सुभद्रा की पूजा होती है, राधा की नहीं।
भगवान के भक्त  भोग खिचड़ी प्रसाद एक साथ एक पंक्ति में बैठकर ग्रहण करते हैं जो वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है।

रथयात्रा महोत्सव

काष्ठ विग्रहावतार का रहस्य


पुरी मंदिर में काष्ठ विग्रहों के होने के आख्यान पुराणों में उपलब्ध हैं। भगवान ने काष्ठï का विग्रहावतार क्यों धारण किया? इस संबंध में सर्वप्रथम भगवान द्वारा कहे वचन हैं कि एक बार चित्ररथ नामक गन्धर्व ने एक ऋषि से अनाचार किया तो उसने भगवान के सामने उसका अपराध बताया। श्रीहरि ने उस समय प्रतिज्ञा की कि यदि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो कलियुग में मेरा काष्ठï का विग्रह हो। किंतु उस गन्धर्व को अर्जुन व सुभद्रा ने अभयदान दे दिया। भगवान ने अपने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठï विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की एक अन्य कथा ब्रह्मï पुराण में वर्णित है कि सत्युग में एक प्रजावत्सल, धर्म में निष्ठïा रखने वाले राजा इंद्रद्युम्न हुए। उनके मन में विचार आया कि मैं किस प्रकार भगवान की आराधना करके उनके दर्शन करूं। इसके लिए उन्होंने पुरुषोत्तम क्षेत्र को चुना तथा सैन्य बल व अन्य सेवकों सहित दक्षिण समुद्र के तट पर विश्राम किया। उस मानस तीर्थ क्षेत्र में पहले इंद्रनील मणि से निर्मित भगवान की एक प्रतिमा थी जिसके दर्शन करके कोई भी बैकुंठ धाम चला जाता था। इस पर यमराज ने प्रभु से कहा कि इससे मेरी आपके द्वारा निर्धारित धर्म-मर्यादा नष्टï हो रही है। कृपया आप उस प्रतिमा को वहां से हटा लें। भगवान ने उसे बालुका में छिपा दिया। राजा ने वहां यज्ञ, दान-पुण्य करके मंदिर निर्माण आरंभ किया। एक दिन वह रात में धरती पर आसन बिछाकर सो गए। उन्हें स्वप्न में भगवान ने चतुर्भुजी रूप का दर्शन कराया तथा अपनी छिपी सनातनी प्रतिमा की प्राप्ति का उपाय बताया कि ‘प्रात: समुद्र तट पर जाना जहां एक विशाल वृक्ष सुशोभित है। तुम अकेले ही उसे काटना। वहां एक अद्भुत वस्तु दिखाई देगी। तुम उस काटे हुए वृक्ष की लकड़ी से उस दिव्य प्रतिमा का निर्माण करना।Ó राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने दो ब्राह्मïण वेशधारी दिव्य पुरुष देखे। उनके द्वारा वृक्ष काटने का कारण पूछने पर राजा ने सब कुछ बता दिया। तब उनमें से एक ने कहा, ‘ये मेरे साथी शिल्पी विश्वकर्मा हैं जो प्रतिमा निर्माण करेंगे।Ó फिर राजा ने उनसे पूछा कि ‘गुप्त रूप से आप कौन हैं।Ó तब भगवान ने अपना परिचय दिया तथा अन्तध्र्यान हो गये। फिर प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। पहली मूर्ति बलराम, दूसरी श्री जगन्नाथ, तीसरी उनकी बहन सुभद्रा जी की थी। फिर राजा ने उन काष्ठï मूर्तियों को धूमधाम से पुण्य स्थान में प्रवेश कराया तथा प्रतिष्ठïा कराई और परम पद को प्राप्त किया।
भगवान के काष्ठ विग्रहावतार की ऐसी ही एक कथा स्कंद पुराण में भी है जिसके अनुसार यहां पहले नीलाचल पर्वत था जहां नीलमाधव जी का श्री विग्रह था। फिर कालक्रम से वह पर्वत पाताल में चला गया। देवता लोग विग्रह को स्वर्ग लोक ले गए। अत: इस क्षेत्र को उनकी पावन स्मृति में आज भी नीलाचल कहा जाता है तथा तभी से काष्ठï विग्रहावतार की उपासना होती आ रही है। इस कथा के अनुसार एक बार सत्यवादी व धर्मात्मा राजा इंद्रद्युम्न ने अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को ऐसे क्षेत्र को ढूंढऩे का आदेश दिया जहां उन्हें साक्षात् जगन्नाथ अवतार के दर्शन हो सकें। विद्यापति शबर दीपकाश्रम गए जहां उन्हें शबर विश्वावसु मिले। विद्यापति ने वहां विश्राम किया और अपने वहां आने का उद्देश्य बताया। शबर उसे रौहिण कुंड तथा कल्पवट के बीच में ले गया जहां भगवान जगन्नाथ विराजमान थे। उसने विद्यापति को कुछ दिव्य वस्तुएं भी उपहार में दीं जो देवता वहां आकर चढ़ाया करते थे। विद्यापति ने प्रसन्न होकर कहा कि उनके राजा वहां आएंगे और एक मंदिर का निर्माण करेंगे। शबर ने बताया कि राजा जगन्नाथ अवतार स्वरूप का दर्शन न कर पाएंगे क्योंकि भगवान स्वर्णमयी बालुका में अदृश्य हो जाएंगे। किंतु भगवान गदाधर-स्वरूप में उन्हें दर्शन देंगे और उनके आदेशानुसार राजा भगवान की काष्ठï की मूर्तियों को ब्रह्मïा जी द्वारा स्थापित कराके पूजा करेंगे। विद्यापति ने ये सभी बातें आकर राजा को बतायीं। तत्पश्चात् राजा श्री क्षेत्र आए, उपासना करके यज्ञ किया तथा सभी तीर्थों के दर्शन किए। वहां नारद जी भी आए और उनसे कहा , ‘तुम्हारा भाग्योदय शुरू होने वाला है। यहां भगवान के शरीर का एक रोम गिरने से वह वृक्षभाव को प्राप्त हो जाएगा। इस धरती पर स्थावर रूप में वह भगवान का अंशावतार होगा। वृक्षरूप में प्रकटित यज्ञेश्वर को तुम महावेदी पर स्थापित करना।Ó तत्पश्चात् राजा ने स्वप्न में सभी कुछ साक्षात् देखा, भगवान के दर्शन किए तथा उनके आदेशानुसार ब्राह्मïणों द्वारा उस वृक्ष को वहां मंगवाया। तब आकाशवाणी हुई, ‘सभी प्रकार से गुप्त रखी हुई महावेदी पर भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। जो वृद्ध शिल्पी यहां उपस्थित हैं उन्हें भीतर प्रवेश कराके दरवा•ाा बंद कर देना। शिल्पकार को कोई न देखे, जो देखेगा वह अंधा हो जाएगा।Ó इंद्रद्युम्न की रानी विमला ने शिल्पकार की भूख-प्यास की चिंता करते हुए दरवाजा खोल दिया किंतु वहां शिल्पकार न था। वहां बलदेव, सुभद्रा, सुदर्शन चक्र तथा भगवान की काष्ठ की अद्र्धनिर्मित प्रतिमाएं थीं। राजा ने उन्हें प्रतिष्ठिïत कराके पूजा-अर्चना की।

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    6 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook