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14 अगस्त 2013

द्वादश ज्योतिर्लिंग

परिचय और  इतिहास


सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
shivji
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारं परमेश्वरम् ।।केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम् ।वाराणस्यां च विश्येशं त्र्यम्बकं गौ तमीतटे ।।बैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने । सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ।।द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।।यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमा: । तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशय: ।।एतेषां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति ।कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वर ।।
शिवपुराण में आया है कि भूतभाव भगवान शंकर प्राणियों के कल्याणार्थ तीर्थों में लिंग रूप में वास करते हैं। जिस-जिस पुण्य स्थान में भक्तजनों ने उनकी अर्चना की, उसी स्थान में वे आविर्भूत हुए और ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए अवस्थित हो गये। यों तो शिवलिंग असंख्य हैं, फिर भी इनमें द्वादश ज्योतिर्लिंग सर्वप्रधान हैं। अकेले शिवपुराण में ही नहीं, बल्कि रामायण, महाभारत तथा अन्य अनेक प्राचीन धर्मग्रन्थों में भी ज्योतिर्लिंग संबंधी वर्णन भरा पड़ा है। सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल (आंध्र) में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, विन्ध्य में ओंकारेश्वर, देवघर में वैद्यनाथ, डाकिनी में (पुणे के पास) भीमशंकर, सेतुबंध (तमिलनाडु) में रामेश्वरम, दारुक वन में नागेश्वर, वाराणसी में विश्वेश (विश्वनाथ), गोमती के तट पर (नासिक के पास) त्र्यंबकेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, शिवालय (औरंगाबाद) में घृष्णेश्वर। सागर तट पर दो, हिमालय एवं अन्य पर्वतों पर चार, नदी किनारे तीन एवं मैदानी क्षेत्रों में तीन मिलाकर बारह हुए। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के ये बारह अवतार हैं। यहां हम द्वादश ज्योतिर्लिंगों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।
सोमनाथ
सोमनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ है। प्राचीनकाल में यह हिंदुओं का मुख्य तीर्थ रहा है। यहां भगवान सोमनाथ का somnathविश्वविख्यात मंदिर है। सोम चंद्रमा को कहते हैं और चंद्रमा के स्वामी भगवान सदाशिव हैं। सोमनाथ को प्रभास क्षेत्र, प्रभास पाटण या पाटण नाम से भी जाना जाता है। सोमनाथ और द्वारिका दोनों गुजरात में पड़ते हैं। सोमनाथ दक्षिण-प श्चिम तथा द्वारिका उत्तर-पश्चिम में स्थित है। प्राचीन समय में यह मंदिर बहुत समृद्ध था। इसे लूटने के लिए महमूद गजनवी ने कई बार आक्रमण कर अंततोगत्वा 1024 ई. में इसे लूट कर ध्वस्त कर दिया। इसमें 20 मन सोने का घंटा तथा 20 मन सोने की जंजीरें थीं। नीलम के 56 स्तंभ थे, जिनमें अमूल्य रत्न जड़े थे। हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी के कई तहखाने भरे पड़े थे, जिन्हें महमूद गजनवी लूटकर गजनी ले गया। बाद में गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया, लेकिन उसके बाद भी कई बार इस पर हमले होते रहे और कई अन्य मुगल शासकों ने इसे लूटकर तहस-नहस किया।
1947 में देश आजाद होने के बाद देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया। उनके अथक प्रयासों से इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों इस मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।
सोमनाथ मंदिर 155 फीट ऊंचा है। चारों ओर विशाल प्रांगण है। कहते हैं कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
एक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं का विवाह चंद्रमा के साथ हुआ था। उनमें रोहिणी सबसे सुंदर थी। इसलिए चंद्रमा रोहिणी से ही सबसे अधिक प्यार करता था। अपनी उपेक्षा देखकर शेष 26 कन्याओं ने अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत की। दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को श्राप दिया कि तुम्हें क्षय रोग हो जाये। श्राप के प्रभाव से चंद्रमा घटने लगा। इस पर सभी देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर दक्ष प्रजापति के पास गये और उनसे श्राप वापस लेने की प्रार्थना की।
दक्ष प्रजापति ने देवताओं की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए कहा कि प्रभास तीर्थ में जहां हिरणियां, सरस्वती और कपिला नदियां समुद्र में मिलती हैं, वहां जाकर चंद्रमा शिव की आराधना करें। प्रभास तीर्थ में त्रिवेणी में स्नान कर चंद्रमा ने चार हजार वर्ष तक तपस्या की तब शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम कृष्ण पक्ष में 15 दिन तक प्रतिदिन घटते जाओगे, लेकिन शुक्ल पक्ष में 15 दिन तक क्रमश: बढ़ते हुए पूर्णिमा को पूर्ण हो जाओगे। इस प्रकार चंद्रमा ने वरदान पाकर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की।
सोमनाथ मंदिर के बाहर दक्षिण में इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने शिव मंदिर बनवाया। इसलिए इसे अहिल्याबाई मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसमें शिवलिंग कुछ सीढ़ियां नीचे स्थापित है। हिरणियां, सरस्वती और कपिला नदियां जहां समुद्र में मिलती हैं, उसे प्राची त्रिवेणी कहा जाता है। जो तीर्थ यात्री यहां आते हैं, वे यहां स्नान करके ही मंदिर में प्रवेश करते हैं। सोमनाथ से तीन किलोमीटर दूर भालुका तीर्थ पड़ता है। धार्मिक दृष्टि से इस स्थान का बहुत महत्व है। कहते हैं यह वही स्थान है, जहां एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे भगवान श्रीकृष्ण बैठे थे। कहते हैं कि उनके पांव के तलुवे में हरिण का एक निशान था। वहां एक भील शिकारी एक हरिण का पीछा करते हुए वहां पहुंचा। हरिण न जाने अचानक कहां जा छिपा था। जब भगवान श्रीकृष्ण के तलुवे में बने हरिण की परछाइंर् जल में पड़ी, तो भील को लगा शायद वही वह हरिण है, जिसका वह पीछा कर रहा है। उसने उसी हरिण को निशाना बनाकर अपना वार किया। उसका तीर भगवान श्रीकृष्ण को लगा। श्रीकृष्ण जानते थे कि एक दिन इसी तरह उनकी मृत्यु होगी। श्रीकृष्ण ने सब कार्य पूर्ण कर शरीर त्याग के लिए प्रभास क्षेत्र चुना था।
बेरावल और पाटण के बीच में प्रभास क्षेत्र है। यहीं चंद्रमा को भगवान शिव ने शुक्ल पक्ष में पुन: प्रकाशित होने का वरदान दिया था। प्राची त्रिवेणी के निकट समुद्र के तट को अग्नि कुंड कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार यहीं किया गया था। सोमनाथ में ही जूनागढ़, गिरनार, दामोदर कुंड, वीरपुर आदि और भी कई धार्मिक महत्व के स्थान हैं।
जूनागढ़ में नृसिंह भक्त का चौरा है। नृसिंह भक्त यहीं पर बैठकर भजन-कीर्तन करते थे। गिरनार पर्वत पर अंबा भवानी का मंदिर है। मान्यता है कि यहां पर 33 करोड़ देवता वास करते हैं। पार्वती के भाई गिरि ने पार्वती और भगवान शिव के विवाह में अतिथियों का बहुत सत्कार किया था। इस सेवा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने गिरि को पर्वतों में नारायण स्वरूप होने का वरदान दिया और उसका नाम गिरि नारायण रखा। बाद में वह गिरिनार के नाम से कहलाने लगा। गिरनार के पास ही दामोदर कुंड है। इसमें सभी नदियां, तीर्थ तथा देवता दामोदर स्वरूप निवास करते हैं। इसमें स्नान करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं।
जलाराम बापा बड़े चमत्कारी संत थे। उनकी पत्नी का नाम वीरबाई था। एक बार भगवान ने परीक्षा लेने के लिए साधु का वेश धारण कर जलाराम से उसकी पत्नी वीरबाई को सेवा के लिए मांगा। जलाराम ने वीरबाई को उन्हें सहर्ष दे दिया। भगवान उसे जंगल में छोड़कर अदृश्य हो गये और निशानी के रूप में अपनी झोली और डंडा वहीं छोड़ गये, जो आज भी वीरपुर के मंदिर में सुरक्षित है।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : सबसे करीबी हवाई अड्डा सोमनाथ से 55 किमी की दूरी पर केशोड में है और यह मुंबई से जुड़ा हुआ है।
रेलवे मार्ग से : सबसे करीबी स्टेशन 7 किमी की दूरी पर वेरावल में है, जो अहमदाबाद स्टेशन से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग से : राज्य परिवहन निगम की बसें सोमनाथ के लिए जाती हैं। साथ ही साथ निजी टैक्सियां और ऑटो रिक्शा भी चलते हैं।
मल्लिकार्जुन
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती असमंजस में पड़ गये कि उनके दो पुत्रों कार्तिकेय और गणेश में से किसका विवाह पहले milakrjunकिया जाये। समाधान यह निकाला गया कि जो पुत्र पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले वापस कैलाश लौटेगा, उसका विवाह पहले किया जायेगा। माता-पिता का आदेश सुन कार्तिकेय परिक्रमा करने कैलाश पर्वत से निकल पड़े, परंतु गणेशजी ने माता पार्वती की परिक्रमा करके कहा कि पृथ्वी माता का ही रूप होती है इसलिए मेरी पृथ्वी परिक्रमा पूरी हुई। गणेश के तर्क से माता-पिता सहमत हो गये और गणेश का विवाह पहले कर दिया गया।
कई वर्ष बीत जाने के बाद जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा कर वापस पहुंचे तो उन्हें पता चला कि गणेशजी का तो विवाह हो गया है। इस पर उनको बहुत क्रोध आया और रूठकर क्रौंच पर्वत पर चले गये। भगवान शिव और माता पार्वती दोनों पुत्र कार्तिकेय को मनाने क्रौंच पर्वत पहुंचे, लेकिन माता-पिता का आगमन सुन कार्तिकेय दूसरे पर्वत पर चले गये। कहा जाता है कि भगवान शिव क्रौंच पर्वत पर ही ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो म ल्लिकार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मल्लिकार्जुन द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है और दक्षिण के कैलाश नाम से विख्यात है। श्री शैल पर्वतमाला पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु प्रांत में कृष्णा नदी के निकट स्थित है।
मल्लिकार्जुन जाने के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन करनूल पड़ता है। करनूल से आत्माकूट और आत्माकूट से पेचखू तक सड़क है। पेचखू के बाद श्री शैल पर्वत की चढ़ाई प्रारंभ होती है। श्री शैल पर्वत पर लगभग साढ़े पांच मील की चढ़ाई के बाद भीम तोला कुंड पड़ता है। उसके बाद करीब चार मील आगे मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पड़ता है। इसमें तीन मील की चढ़ाई हर किसी के बस की बात नहीं है। मल्लिकार्जुन मंदिर के अंदर एक कुंड है। पास में ही पार्वतीजी का मंदिर है। पार्वतीजी को यहां भमरावा कहा जाता है।
मल्लिकार्जुन की यात्रा ट्रेकिंग की दृष्टि से भी बेहद अच्छी है। इस यात्रा में ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के साथ-साथ प्रकृति की शांति तथा सौंदर्य का भी भरपूर आनंद लिया जा सकता है।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : सबसे करीब हवाई अड्डा दाबोलिन है, जिसकी दूरी 67 किलोमीटर है।
रेल मार्ग से : यह मार्ग कोंकण रेलवे से जुड़ा हुआ है। इसका करीबी रेलवे स्टेशन मार्गो है, जिसकी दूरी 42 किलोमीटर है।
सड़क मार्ग से : मार्गो से राज्य परिवहन निगम द्वारा मल्लिकार्जुन पहुंचने के लिए समय-समय पर बस उपलब्ध हैं।
श्रीमहाकालेश्वर
मध्य प्रदेश में शिप्रा नदी के तट पर बसा उज्जैन बहुत प्राचीन नगर है। इस स्थान को पृथ्वी का नाभि देश कहा गया है। पहले mahakaleshwarइसको उज्जयिनी या अवंतिका कहा जाता था। उज्जैन हिंदू धर्म की 7 पवित्र पुरियों में से एक है, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, 51 शक्तिपीठों और चार कुंभ क्षेत्रों में से भी एक है। यहां हर 12 साल में पूर्ण कुंभ मेला तथा हर 6 साल में अर्द्धकुंभ मेला लगता है।
महाराजा विक्रमादित्य की राजधानी, प्रसिद्ध कवि कालिदास की साधनास्थली तथा कृष्ण, बलराम और सुदामा की शिक्षास्थली ऋषि सांदीपनि गुरु का आश्रम भी यहीं रहा है। इतिहास प्रसिद्ध राजाओं, योगी-महात्माओं, साधुओं तथा प्रसिद्ध तांत्रिकों की साधनास्थली उज्जैन में बारह ज्योतिर्लिंगों में एक भगवान महाकालेश्वर का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे उज्जैन के क्षेत्राधिपति के रूप में माना गया है। मंदिर में स्थित महाकाल की दक्षिणमुखी प्रतिमा पर प्रा त: जले हुए मुर्दे की भस्म का लेप किया जाता है। इसे भस्म आरती कहते हैं। हरिसिद्ध देवी के मंदिर में 51 शक्तिपीठों में एक पीठ भी है जहां माता सती की कोहनी गिरी थी। भारतीय ज्योतिष में देशांतर की शून्य रेखा उज्जैन से ही आरंभ होती है।
उज्जैन से 3 मील दूर भैरवगढ़ नामक स्थान पर सम्राट अशोक ने कारागार बनवाया था। इस स्थान के प्रमुख देव काल भैरव हैं। काल भैरव के इस प्राचीन विशाल मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने करवाया था। काल भैरव को पूजा-अर्चना में शराब पिलायी जाती है।
उज्जैन प्राचीनकाल से ही कापालिक समुदाय का प्रमुख आकर्षण-केंद्र रहा है। यहां का विक्रांत भैरव मंदिर तंत्र साधना तथा मंत्र साधना के लिए चमत्कार स्थान है।
यह मंदिर विक्रमादित्य के समय का बताया जाता है। प्राचीन काल में यह अक्लेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध था। जैन धर्म में इसे अन्यमुक्तक तीर्थ की संज्ञा मिली है।
नौवीं और दसवीं शताब्दी में परमार राजाओं के शासनकाल में उज्जैन ने बहुत उन्नति की। 1235 ई. में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के आक्रमण के बाद लगातार 500 साल तक उज्जैन में मुस्लिम आधिपत्य रहा। इसी आक्रमण में महाकालेश्वर मंदिर ध्वस्त हो गया था। बाद में 1750 ई. में उज्जैन मराठों के हाथ में आया। मराठा शासकों ने महाकालेश्वर मंदिर का नवनिर्माण करवाया।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : इंदौर सबसे करीबी हवाई अड्डा है जो 55 किमी की दूरी पर है। यह मुंबई से जुड़ा हुआ है।
रेलवे मार्ग से : उज्जैन यहां के लिए सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है। मंुंबई से उज्जैन के लिए सीधी रेल सेवा है।
सड़क मार्ग से : मुंबई से उज्जैन के लिए अच्छी सड़कें है।
ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर नर्मदा नदी में मांधाता द्वीप पर स्थित एक मनोरम स्थान है। नर्मदा नदी को रेवा भी कहते हैं। नर्मदा को भक्तजन onkareshwarशंकरी नदी भी कहते हैं। मध्य प्रदेश में जिला खंडवा से 60 कि.मी. दूर ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन पड़ता है। यहां से सड़क मार्ग से मात्र 11 किमी पर ओंकारेश्वर है। द्वीप का आकार ॐ अक्षर की तरह है, इसलिए इसका नाम ओंकारेश्वर पड़ा। यहां ओंकारेश्वर और अमलेश्वर दो ज्योतिर्लिंग हैं, लेकिन दोनों को मिलाकर एक ज्योतिर्लिंग माना जाता है, जो ओंकारेश्वर के नाम से ही प्रसिद्ध है और 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
एक कथा के अनुसार एक बार महाराज विंध्याचल पर्वत ने पार्थिव पूजन सहित ओंकारनाथ शिव की लगातार छह महीने तक घोर आराधना की। भगवान शिव अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने विंध्याचल पर्वत को दर्शन दिये। उचित अवसर देखकर देवता और ऋषिगण भी आ गये, जिनकी प्रार्थना पर ओंकार नामक लिंग के दो भाग किये गये, जिनमें से पहले में भगवान शिव ओम् रूप में विराजे और वह ओंकारेश्वर कहलाया तथा दूसरा उस पार्थिव लिंग से प्रकट होने के कारण अमलेश्वर या अमरेश्वर कहलाया।
ओंकारेश्वर मंदिर में ओंकार शिव लिंग एक तरफ है तथा दूसरी तरफ पार्वती जी तथा गणेश जी की मूर्तियां हैं। ओंकार ज्योतिर्लिंग के अरघे में से नर्मदा का जल पहाड़ के नीचे से आकर अदृश्य रूप से आगे बहता है। ओंकारेश्वर की लिंग मूर्ति के आस-पास अरघे के गहरे स्थान से होकर नर्मदा का जल हमेशा बहता रहता है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, तो इस जल के पृष्ठ भाग पर बुलबुले बनने लगते हैं। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर कालभेद से ब्रह्मा, विष्णु ने निवास किया था तथा अगस्त्य मुनि ने घोर तप कर ओंकारेश्वर अमलेश्वर को प्रसन्न किया था। प्रांगण में शुकदेव की प्रतिमा, लिंग स्वरूप मांधाता तथा नदी की बड़ी प्रतिमा है। मंदिर दो मंजिला है। दूसरी मंजिल पर महाकालेश्वर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में चने का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
मांधाता द्वीप के दक्षिण में दूसरा ज्योतिर्लिंग अमरेश्वर है। अमरेश्वर मंदिर होल्कर राज्य की अहिल्याबाई की ओर से बनवाया गया था। इसे पूना के पेशवा बाजीराव द्वितीय ने बनवाया था। ओंकारेश्वर जानेवाली बसें विष्णुपुरी जाती हैं। यह नर्मदा नदी के किनारे है। वहां से नावें यात्रियों को मांधाता द्वीप ले जाती हैं। पहाड़ी के नीचे नहाने के लिए घाट बनाये गये हैंं, जहां यात्री नहा-धोकर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए जाते हैं। रास्ते में मुक्तेश्वर, ज्वालेश्वर, केदारेश्वर, गणेशजी, कालिका माता आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।
यहां कोटिलिंगार्चना का भी विधान है। इस पूजा में 22 ब्राह्मण हाथ में 1300 छेदवाला एक बड़ा लकड़ी का तख्ता लेते हैं। उन छिद्रों में मिट्टी के शिवलिंग स्थापित किये जाते हैं, फिर उनकी पूजा कर उन लिंगों को नर्मदा नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : इंदौर यहां से 77 किमी की दूरी पर है। मुंबई से इंदौर के लिए सीधी हवाई सेवा उपलब्ध है।
रेलवे मार्ग से : ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन यह रतलाम-इंदौर-खंडवा लाइन पर स्थित है, जहां से मंदिर की दूरी मात्र 12 किमी की है।
सड़क : राज्य परिवहन निगम की बसें यहां तक जाती हैं।
भीमशंकर
भीमशंकर ज्योतिर्लिंग मुंबई से 400 किमी दक्षिण-पूर्व सह्याद्रि पर्वत शिखर पर स्थित है। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पुणे शहर से इसकी bhimasankarदूरी करीब 25 किमी है। एकांत और निर्जन क्षेत्र में होने के कारण यहां का रास्ता सुगम नहीं है। शिवरात्रि के दिन यहां काफी बड़ा मेला लगता है। यहां का मंदिर बहुत ही पुराना है। मंदिर के निकट ही भीमा नदी का उद्गम है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के बहे पसीने से भीमा नदी प्रकट हुई। चंद्रभागा नदी पंढरपुर तक भीमा नदी कहलाती है। पंढरपुर के पास भीमा नदी चंद्रकोट की तरह मोड़ लेती है, इसलिए यहां यह चंद्रभागा के नाम से पहचानी जाती है। एक कथा के अनुसार त्रिपरासुर को मारकर भगवान शंकर ने इस स्थान पर विश्राम किया था। उस समय यहां भीमक नामक नरेश तपस्या कर रहे थे। भगवान शंकर ने राजा भीमक की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये और उनकी प्रार्थना पर यहां लिंग रूप में स्थित होकर भीमशंकर कहलाये।
श्री भीमशंकर का मंदिर हेमाडपंथी पद्धति से बांधा गया है। मंदिर दशावतार की मूर्तियों से अलंकृत किया गया है।
1721 में वहां 2 टन वजनी घंटा लगाया गया था, जिसकी ध्वनि से मंदिर ही नहीं आस-पास का पूरा इलाका गूंज उठता था। भीमाशंकर की पहाड़ियों में स्थित घने जंगलों में औषधियों का भंडार भरा पड़ा है। यहां अक्सर शेर इत्यादि हिंसक जानवर भी दिखायी दे जाते हैं।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : पुणे सबसे करीब का हवाई अड्डा है। भीमाशंकर यहां से 95 किमी की दूरी पर है। मुंबई और दिल्ली से यहां के लिए सीधी सेवा है।
रेलवे मार्ग से : पुणे रेलवे स्टेशन सबसे करीब का स्टेशन है, जो भीमशंकर से 95 किमी की दूरी पर है।
सड़क मार्ग से : मुंबई से भीमशंकर 260 किमी की दूरी पर है। दिल्ली से पुणे के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग से होकर जाया जा सकता है।
काशी विश्वनाथ
भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा नदी के तट पर विद्यमान है। काशी (वाराणसी) विश्व kasi-vishwanathके प्राचीनतम नगरों में से एक है, जिसका 3,500 वर्षों का लिखित इतिहास है। मंदिर का 15.5 मीटर ऊंचा गुंबद होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है। शैव दर्शन के अनुसार यहां विद्यमान विग्रह को विश्व का नाथ माना जाता है। यह मंदिर हिंदू मंदिरों में अत्यंत प्राचीन है। बार-बार के हमलों में उजाड़े जाने और पुन: निर्मित किये जाने के बाद मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। 1983 से मंदिर की व्यवस्था को उत्तर प्रदेश शासन ने अपने हाथों में ले लिया । शिवरात्रि के दिन केवल काशी नरेश ही गर्भ ग्रह में प्रवेश करते हैं और को अनुमति नहीं होती। उनकी पूजा-अर्चना के बाद ही शेष श्रद्धालु को प्रवेश की अनुमति दी जाती है।
गर्भ ग्रह में मध्य में शिवलिंग ईश्वर के विग्रह के रूप में स्थित है। इसकी ऊंचाई 60 से.मी. तथा गोलाई 90 से.मी. है। मंदिर परिसर में अन्य देवताओं का उप मंदिर है, जिनमें महाकाल, दण्डपाणी, मुक्तेश्वर, विष्णु, विनायक, शनिश्वर, वि रूपक्ष तथा वीरू पाक्ष गौरी के विग्रह हैं। मंदिर में एक कुंआ है, जिसे ज्ञान वापी कहते हैं। बताया जाता है कि विधर्मियों के आक्रमण के समय पुजारियों ने ज्योर्तिलिंग को इसी कुंए में छुपा दिया था। हिंदू आस्था के मुताबिक बाबा विश्वनाथ के दर्शन, पूजा और गंगा स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए पूरे संसार तथा भारत में रहने वाले हिंदू अपने जीवन में कम से कम एक बार यहां आना अपना सौभाग्य मानते हैं।
मान्यता यह भी है कि विश्वनाथ के दर्शन करने वाले श्रद्धालू को कम से कम एक इच्छा का परित्याग करना होता है। इस यात्रा के बाद दक्षिण में रामेश्वरम की यात्रा का माहात्म्य माना गया है। भक्तजन यहां से गंगा जल ले जाकर वहां चढ़ाते हैं और रामेश्वरम के पास की रेत वापस लाते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर की पावनता और लोकप्रियता के कारण देश में जगह-जगह इसी प्रकार के कई और मंदिर बनाये जा चुके हैं।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : मुंबई-दिल्ली से सीधी हवाई सेवाएं हैं।
रेलवे मार्ग से : मुंबई-दिल्ली से सीधी रेल सेवाएं हैं।
सड़क मार्ग से : राष्ट्रीय राजमार्ग से आप वहां पहुंच सकते हैं।
त्र्यंबकेश्वर
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग नासिक से लगभग 30 किमी दूर है। महर्षि गौतम ने यहीं पर तपस्या की थी तथा भगवान शिव को प्रसन्न कर गोदावरी को प्रकट किया था। त्र्यंबकेश्वर के मुख्य मंदिर में तीन छोटे-छोटे शिवलिंग हैं, जो क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। ये तीनों लिंग एक छोटे से गड्ढे में हैं तथा मिट्टी से कुछ ही अंगुल ऊपर हैं। अंधेरा होने की वजह से इनके दर्शन ठीक reneshwarढंग से नहीं हो पाते। इन तीनों में से जो महादेवजी का लिंग है, उस पर सतत अदृश्य रूप से जल प्रवाहित होता रहता है। इस लिंग से कभी-कभी सिंह की दहाड़ सुनायी देती है, तो कभी-कभी आग की दिव्य लपटें निकलती हुई दिखायी देती हैं। इस समय शिव के क्रोध से निजात पाने के लिए भांग मिश्रित दूध के घड़ों से रुद्राभिषेक कर जयघोष किया जाता है। पूरा दूध उस गड्ढे में समा जाता है। जब दूध का समाना (रिसना) बंद हो जाता है, तो ऐसा माना जाता है कि शिवजी का क्रोध शांत हो गया। यहां का कुशावर्त सरोवर बहुत ही पवित्र माना जाता है। सरोवर के पास में ही गंगा और श्रीकृष्ण के मंदिर हैं।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के समीप ही तीन पर्वत शृंखलाएं - ब्रह्मगिरि, नीलगिरि और गंगाद्वार हैं। यहां सिंहस्थ पर्व में प्रति 12 वर्ष बाद कुंभ मेला भी लगता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों लोग भाग लेते हैं। प्रत्येक सोमवार को त्र्यंबकेश्वर भगवान की पालकी बड़ी धूमधाम के साथ कुशावर्त तीर्थ आती है। यह कुशावर्त 27 मीटर वर्गाकार क्षेत्र में स्थित है।
कैसे पहुंचें :
वायु मार्ग से : नासिक सबसे करीब का हवाई अड्डा है, जो यहां से 39 किमी की दूरी पर है। मुंबई और दिल्ली से वायुमार्ग से जाया जा सकता है।
रेलवे मार्ग से : नासिक रोड सबसे करीब का रेलवे स्टेशन है, जो 44 किमी की दूरी पर है।
सड़क मार्ग से : मुंबई से त्र्यंबकेश्वर की दूरी 18 किमी है। दिल्ली से सड़क मार्ग से जाया जा सकता है।
केदारनाथ
बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारनाथ भारत के उत्तर में नगाधिराज हिमालय की सुरम्य उपत्यका में स्थित है। यह केदारक्षेत्र प्राचीन काल से ही मानव मात्र के लिए पावन एवं मोक्षदायक रहा है। इसकी प्राचीनता एवं पौराणिक माहात्म्य के सम्ब न्ध में kedarnathस्वयं भगवान शंकर ने स्कन्द पुराण में माता पार्वती के प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया है -
हे प्राणेश्वरी! यह क्षेत्र उतना ही प्राचीन है, जितना कि मैं हूं। मैंने इसी स्थान पर सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा के रूप में परब्रह्मत्व प्राप्त किया, तभी से यह स्थान मेरा चिरप्रिय आवास है। यह केदारखण्ड मेरा चिरनिवास होने के कारण भूस्वर्ग के समान है। शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की कथा विस्तार से कही गयी है। उत्तराखण्ड हिमालय में स्थित होने के कारण श्री केदारनाथजी उनमें सर्वोपरि हैं। कालान्तर द्वापर युग में महाभारत युद्ध के उपरान्त गोत्र हत्या के पाप से पाण्डव अत्यन्त दु:खी हुए और वेदव्यासजी की आज्ञा से केदारक्षेत्र में भगवान शंकर के दर्शनार्थ आये। शिव गोत्रघाती पाण्डवों को प्रत्यक्ष दर्शन नहीं देना चाहते थे। अतएव वे मायामय महिष का रूप धारण कर केदार अंचल में विचरण करने लगे। बुद्धि योग से पाण्डवों ने जाना कि यही शिव हैं। वे शिव का पीछा करने लगे। महिष रूपी शिव भूमिगत होने लगे, तो पाण्डवों ने दौड़कर महिष की पूंछ पकड़ ली और अति आर्तवाणी से भगवान शिव की स्तुति करने लगे। उसी महिष के पृष्ठ भाग के रूप में भगवान शंकर वहां स्थित हुए। तदनंतर पाण्डवों ने इसी स्वरूप की विधिवत पूजा की तथा गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हुए और भगवान केदारनाथजी के विशाल एवं भव्य मन्दिर का निर्माण किया, तबसे भगवान आशुतोष केदारनाथ में दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में आसीन हो गये। वर्तमान में भी उनका केदारक्षेत्र में वास है। पूजा का समय-प्रात: एवं सायंकाल है। सुबह की पूजा निर्वाण दर्शन कहलाती है। समुद्र तल से 3584 मी. ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर की दूरी गौरीकुंड से 14 किमी (पैदल मार्ग) है। मंदिर के कपाट 17 मई, 2010 को खुले और कार्तिक प्रथम दिवस (अक्टूबर - नवंबर) बंद होंगे। शीतकाल में पूजा उखीमठ मंदिर में होती है।
गौरी कुण्ड : यहां पर पार्वती जी ने ऋतु स्नान किया था। गणेशजी की उत्पति यहीं पर हुई। यहां का उष्ण जल सिन्दूर वर्ण का है। भगवान शंकर का दिव्य गौरीशंकर लिंग यहां पर स्थित है। इस पावन तीर्थ में स्नान एवं इस तीर्थ की माटी को सिर में धारण करना शिव सामीप्य दायक है।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : देहरादून स्थित जॉली ग्रांट हवाई अड्डा केदारनाथ से 246 किमी की दूरी पर है। मुंबई से देहरादून से सीधी सेवा है।
रेलमार्ग से : ऋषिकेश (229 किमी) और कोटद्वारा (260 किमी) की दूरी पर है। इन स्टेशनों के लिए मुंबई से सीधी सेवा है।
सड़क मार्ग से : गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है, जो ऋषिकेश, कोटद्वारा, देहरादून से जुड़ी है।
वेद्यनाथ
बिहार के परगना क्षेत्र में दियोगढ़ पर स्थित वेद्यनाथ मंदिर को वैजनाथ और वैद्यनाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। vidnathतीर्थस्थल वैद्यनाथ को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। शिव भक्तों का मानना है कि वेदयनाथ की सच्ची भिक्त से भक्तगण सभी दुखों और चिंताओं से मुिक्त पा लेता है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि के अवसर पर शिवभक्त हरिद्वार से `कांवड़' को अपने कंधे पर उठाकर पैदल यात्राकर अपने गंतव्य तक पहुचंते हैं।
मंदिर की स्थापना को लेकर पुराणों में बताया गया है कि लंका के नृशंस राजा रावण ने एक बार अपनी राजधानी श्रीलंका को अजेय करने के लिए भगवान शिव की अराधना की थी। यह भी बताया जाता है कि रावण ने कैलाश पर्वत को अपनी राजधानी में ले लिया था। हालांकि भगवान शिव ने इसे तहस-नहस कर दिया था, तो रावण ने भगवान शिव से दया की प्रार्थना की। बाद में भगवान शिव ने रावण को 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग दे दिया और शर्त रखी कि जहां पर यह ज्योतिर्लिंग स्थापित होगा वहीं पर हमेशा रहेगा। इस ज्योतिर्लिंग की देखभाल के लिए स्वयं सेवक बने। रावण से पहले ही इस ज्योतिर्लिंग को एक धरती पर स्थापित कर दिया था। निराश रावण ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करते हुए अपने दस में से नौ सिरों को काट दिया। शिव ने एक वैद्य की तरह काम करते हुए रावण के सभी सिरों को पुनर्जीवित कर दिया, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को वैद्यनाथ नाम दिया गया। अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार वैद्यनाथ सती के 52 शिक्तपीठ तीर्थस्थलों में से एक है।
ऐसा माना जाता है कि सती को भगवान शिव के द्वारा आधे जले हुए शरीर के साथ यहां लाया गया था। कुछ लोग मानते हैं कि एक बैजू ने इस मंदिर की खोज की थी इसलिए इस मंदिर का नाम वैजनाथ हुआ।
वैद्यनाथ मंदिर पत्थरों की दीवारों से बने देवगढ़ हाउस पर स्थापित है। पूरे मंदिर परिसर में 22 अन्य मंदिर भी स्थापित है। वैद्यनाथ मंदिर पूर्व की ओर है। शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा हल्का सा टूटा हुआ है, जिसके बारे में बताया जाता है कि जब रावण इसे जड़ से उखाड़ने की कोशिश कर रहा था, तब यह टूट गया था। मंदिर के नजदीक शिवगंगा झील है।
कल्कि : सनातन हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के दस अवतारों में कल्कि दसवें और अंतिम महावतार माने जाते हैं और माना जाता है कि कलियुग के अंत में यह अवतरित होगा। कल्कि का अर्थ है `काल' का समय, जिसकी उत्पत्ति `कालका' शब्द से होती है। कल्कि अवतरण अत्याचार और अंधेरे के नाशक के रूप में होना माना गया है, किंतु अवतरण के समय के बारे में विभिन्न पुराणों में भिन्न व्याख्याएं इस अवतार के सृजन का समय निश्चित नहीं कर पाती हैं। कल्कि अवतार पंखमुक्त सफेद घोड़े पर सवार दाहिने हाथ में चमचमाती तलवार लिये आयेगा और कलियुग में व्याप्त गरीबी, भ्रष्टाचार और व्यसन जैसी बुराइयों को निर्मूल कर जड़ से खत्म करेगा। पुराणों में वर्णित कल्कि नामक यह अवतार कलि नामक दैत्य को पराजित करेगा और समाज और व्यिक्त में व्याप्त विरोधाभासों में सामंजस्य स्थापित करने के साथ-साथ धर्म और सृष्टि का नवोन्मेव करेगा और धरती पर धर्मपरायणता और सदाचार का दोबारा जन्म होगा।
कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि को परशुराम साथ प्रशिक्षित करेंगे। परशुराम ने हजारों वर्षों पूर्व घोर तप और भगवान शिव की आराधना की थी और तत्पश्चात भ्रष्ट और दुराचारी राजाओं का नाश करने की शिक्तयां प्राप्त की थीं। 21 बार दुराचारी राजाओं का नाश करने वाले परशुराम को अमरत्व प्राप्त होना माना जाता है। कल्कि की सबसे पहली भविष्यवाणी विष्णु पुराण में मिलती है कि यह अवतार ईसा के बाद 7वीं शताब्दी के आस पास गुप्त काल के बाद होगा। फिर अग्नि पुराण आदि अन्य पुराणों में कल्कि का जिक्र आता है।
धर्म में ब्रह्मा सर्जक हैं, तो भगवान विष्णु पालक हैं, जो सृष्टि की प्रक्रिया को संतुलित किये हुए हैं। कल्कि तिब्बती बौद्ध धर्म का अनुसरण करने वालों के कालचक्र तंत्र के अनुसार कल्कि अवतार का बडा माहात्म्य है। कालचक्र तंत्र में बताया गया है कि कल्किन शमला के गुप्त राज्यों के 25 राजाओं का नाम है। बताया गया है कि यह अवतार मौतकला में लिप्त संसार में एक आध्यात्मिक्त परिवर्तन लायेगा। इस दौर में सभी लोग धर्म में विश्वास करने वाले और सदृसंपन्न होंगे।
कुछ ब्रह्मवादी और अन्य विद्वानों ने कल्कि की भविष्यवाणी की है। कुछ व्याख्याओं में बताया गया है कि कल्कि दुधार धारण करता है और उसकी वाणी असत्य, फरेब और अंधकार को उसी प्रकार काटने में समर्थ है।
कल्कि अवतार की भविष्यवाणी को लेकर कुछ धर्मो के नेताओं ने खुद को कल्कि होने की घोषणाएं की थीं, लेकिन सब गलत साबित हुइंर्। वहीं र्हलेखिका सावित्री देवी मुखर्जी ने दावा किया कि नाजी नेता एडोल्फ हिटलर कल्कि थे, लेकिन हिटलर का जो हश्र हुआ, वह सर्वविदित है।
कैसे पहुंचें :
रेलवे मार्ग से : वैद्यनाथ धाम का सबसे करीबी स्टेशन वैद्यनाथ धाम (देवगढ़) है।
सड़क मार्ग से : मुंबई और दिल्ली से सड़क मार्ग से जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग से जाया जा सकता है।
नागेश्वर
अपने वनवास के दिनों में पांडव लोग यहां आये और उन्होंने अपने लिए एक कुटिया बनायी, उनकी गायें वहां बहनेवाली नदी में nageshwarपानी पीने के लिए जाती थीं। पानी पीने के उपरांत उनके थन का दूध पानी में अपने आप बह जाता था जैसे गायें स्वयं अपनी इच्छा से दूध दे रही हैं। भीम ने एक दिन यह चमत्कार देखा। इस बात को भीम ने धर्मराज को तुरंत बताया। तब धर्मराज ने कहा-अवश्य कोई भगवान इस नदी में हैं। उसके पश्चात सभी पांडव नदी का पा नी निकालने लगे। नदी का मध्य भाग काफी गर्म था और पानी उबल रहा था। भीम ने अपना गदा उठाया और नदी में तीन बार प्रहार किया। पानी तुरंत हट गया। उस जगह खून का फौवारा प्रकट हुआ। भगवान शंकर का लिंग ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुआ।
पश्चिम तट पर 16 योजन की दूरी पर दारुका और दारुक रहते थे। साधु संन्यासी लोग दारुक और अन्य लोगों से दुखी थे। वे सभी अर्व मुनि के पास गये। बदले में अर्व मुनि ने उन राक्षसों को श्राप दिया कि उनके वंश का नाश हो जायेगा। देवता लोगों ने राक्षसों पर आक्रमण का प्रयास किया। अब राक्षसों को चिंता हुई कि अब क्या किया जाये। दारुका को पार्वती से कुछ ऐसा वरदान मिला था कि उसने पूरे जंगल को उठा लिया और उसे आकाश और समुद्र के बीच में छोड़ दिया। इससे उन्हें कुछ शांति और राहत मिली। वे नाव से जाकर तपस्वियों को उठा लाते थे और उन्हें बंदी बना लेते थे। एक बार सुप्रिया नाम की एक शिव भक्त उनके बंदी गृह में पहुंची। वह भगवान शिव की पूजा किये बगैर अन्न और जल ग्रहण नहीं करती थी। वह बंदीगृह में भी पूजा और अर्चना करने लगी।
जब पहरेदारों ने यह बात अपने मुखिया को बतायी तो उसने उसे मारने का आदेश दे दिया। सुप्रिया ने भगवान शिव से अपनी जान के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव तुरंत प्रकट हुए और उन्होंने सभी राक्षसों का उनके परिवार समेत संहार कर दिया। पार्वती यहां पर पर दारुका को वरदान देती है जिसके कारण युग की समाप्ति पर केवल असुर लोग ही पैदा होंगे और दारुका उन पर शासन करेगा। भगवान शिव ने इसे स्वीकार कर लिया। तब शिव और पार्वती वहां रहने लगे। शिव ने एक बार फिर ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया और उनका नाम नागेश्वर और पार्वती का नाम नागेश्वरी के रूप में जाना जाने लगा। गुजरात में द्वारिका के निकट इस मंदिर की स्थापत्थ्य कला अप्रतिम सुंदर है। पांडव काल में पत्थरों का बना यह मंदिर बहुत मज़बूत है। मंदिर का प्रांगण आठ खंभेनुमा पत्थरों पर टिका है। यह अंडाकार है। नागेश लिंग मूर्ति एक आंतरिक गर्भगृह में उपस्थित है। यहां पर महादेव के सामने नंदी बैल की मूर्ति नहीं है। नंदीकेश्वरा मंदिर में नंदी बैल की मूर्ति अलग से है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ छोटे-छोटे कुल 12 मंदिर हैं जिनमें ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गयी है। इसके अलावा वेदव्यास लिंग, भंडारेश्वर, नीलकंठेश्वर, गणपति, दत्तात्रय, मुरलीमनोहर, दसावतार मंदिर और मूर्तियां आदि वहां पर हैं। वहां पर कुल 108 शिव मंदिर हैं। अंदर की बनावट काफी खूबसूरत है।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : सबसे करीबी हवाई अड्डा पुणे है। यह मंदिर पुणे से थोड़ी दूर पर स्थित है।
रेल मार्ग से : मुंबई से मध्य रेलवे द्वारा प्रत्येक दिन यहां के लिए रेल सेवा उपलब्ध है।
सड़क मार्ग से : राज्य परिवहन निगम द्वारा समय-समय पर बसें चलायी जाती हैं।
रामेश्वरम्
उत्तर में जितनी मान्यता काशी की है, उतनी ही मान्यता दक्षिण में रामेश्वरम् की है जो सनातन धर्म के चार धामों में से एक है। rameshwaramरामेश्वरम चेन्नई से करीब 425 मील दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। रामेश्वरम् एक सुंदर टापू है, जिसे हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी चारों तरफ से घेरे हुए हैं। यह टापू काफी हरा-भरा है। प्राचीन समय में यह भारत के साथ सीधे जुड़ा हुआ था। बाद में धीरे-धीरे सागर की तेज लहरों ने इसे काट दिया, जिससे यह टापू चारों ओर से पानी से घिर गया। अंगरेज़ों ने एक जर्मन इंजीनियर की मदद से रामेश्वरम् को जोड़ने के लिए एक रेलवे पुल का निर्माण किया। रामेश्वरम् शहर और प्रसिद्ध रामनाथ का मंदिर इस टापू के उत्तरी छोर पर है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि तीर्थ है। इसी को सेतुबंध कहा जाता है। यहीं पर हिंद महासागर से बंगाल की खाड़ी मिलती है। भगवान श्रीरामचंद्रजी ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए इसी स्थान पर पुल बांधा था, इसलिए इसका नाम सेतुबंध पड़ा। यही कारण है कि इसका बहुत अधिक धार्मिक महत्व है।
रामेश्वरम् शहर से उत्तर-पूर्व में करीब डेढ़ मील की दूरी पर गंधमादन नामक छोटी-सी पहाड़ी है। हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग लगायी थी। यहीं पर भगवान राम ने अपनी सेना संगठित की थी। यहां भगवान श्रीराम का मंदिर है, जहां उनके चरण चिह्नों की पूजा की जाती है। रामेश्वरम् भगवान श्रीराम के प्रसंगों से भरा पड़ा है। कहते हैं कि जब श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई कर रावण को मार डाला तो उन्होंने ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए एक शिवलिंग की स्थापना की योजना बनायी। उन्होंने हनुमान को आदेश दिया कि काशी जाकर एक शिवलिंग ले आओ, लेकिन शिवलिंग की स्थापना की निश्चित घड़ी पास आने तक भी हनुमान नहीं लौट सके। तब सीताजी ने समुद्र के किनारे की रेत को मुट्ठी में बांधकर एक शिवलिंग बना डाला। श्रीराम ने प्रसन्न होकर इसी रेत के शिवलिंग को प्रतिष्ठापित कर दिया। यही शिवलिंग रामनाथ कहलाता है। बाद में हनुमान के आने पर उनके द्वारा लाये गये शिवलिंग को उसके साथ ही स्थापित कर दिया गया।
रामेश्वरम् में शिव तथा पार्वती की अलग-अलग दो-दो मूर्तियां स्थापित की गयी हैं। पार्वती की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी तथा दूसरी विशालाक्षी कहलाती है। मंदिर के द्वार के बाहर हनुमानजी की मूर्ति है। रामेश्वरम् मुख्यत: शिवजी का मंदिर है, लेकिन उसके परिसर में अन्य भगवानों के मंदिर भी हैं। इसमें भगवान विष्णु का मंदिर मुख्य है। यहां अलग-अलग मीठे जल के 22 कुएं भी हैं। इनमें स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैंं। रामेश्वरम् से लगभग तीन मील दूर पूरब में तंगचिमडम नामक गांव है। यहां समुद्र में विल्लूरणि तीर्थ है। असल में यह समुद्र के खारे पानी के बीच मीठे जल का कुंड है। एक बार सीता जी को बहुत प्यास लगी तो श्री राम ने बाण की नोक से यह कुंड बनाया। रामेश्वरम् के दक्षिण में रामस्वामी का मंदिर है। विभीषण ने यहां पर राम की शरण ली थी। रावण वध के पश्चात् यहीं पर विभीषण का राजतिलक किया गया था। रामनाथजी के मंदिर के पूर्वी घाट के सामने सीताकुंड है। यहीं पर सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्ध किया था। जिस धधकते अग्नि कुंड में सीता जी ने प्रवेश किया, वह जल कुंड में बदल गया। इसीलिए इसे सीताकुंड कहते हैं।
रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। चालीस-चालीस फुट ऊंचे दो पत्थरों पर चालीस फुट लंबे एक पत्थर को इतने सलीके से लगाया गया है कि दर्शक आश्चर्यचकित हो जाते हैं। विशाल पत्थरों से मंदिर का निर्माण किया गया है। ये काले पत्थर दूर-दूर से नावों पर लाये गये हैं, क्योंकि रामेश्वरम् में ऐसी कोई पहाड़ी नहीं है जहां पत्थर निकल सकें। रामनाथजी के इस विशाल मंदिर को बनवाने में `रामनाथपुरम्' रियासत के राजाओं का योगदान प्रमुख रहा।
प्रचलित धारणा के अनुसार जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण वनवास को निकले तो जिस केवट ने उनको अपनी नाव में बैठाकर नदी पार करवायी थी, उसी के वंशज ये सेतुपति थे। रावण वध के बाद जब रामचंद्रजी ने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना की थी तब वही केवट वहां उपस्थित था। तब ये केवट सदा के लिए रामेश्वरम् में रहने लगे। रामनाथपुरम् के राज भवन में एक पुराना काला पत्थर आज भी पड़ा है। कहा जाता है कि इस पत्थर को राम ने केवटराज को राजतिलक के समय स्मृति चिह्न के रूप में दिया था।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : सबसे करीबी हवाई मार्ग मदुराई है। मदुराई से रामेश्वरम की दूरी 154 किमी है।
रेलवे मार्ग से : मुंबई से सीधी रेलगाड़ियां जाती हैं।
सड़क मार्ग से : राज्य परिवहन निगम की बसें सभी जगहों से यहां के लिए चलती हैं।
घृष्णेश्वर
एक बार शिवजी और पार्वतीजी कैलाश पर्वत पर खेल रहे थे। पार्वतीजी ने उन्हें हरा दिया। शिवजी नाराज होकर दक्षिण की ओर चल दिये। वे जाकर सहयाद्री पर्वत पर जाकर रहने लगे। इस जगह का नाम महेश मोली भैंसमल के नाम पर दिया गया था। reneshwarपार्वती शंकर को ढूंढ़ते हुए आयी। उन्होंने पहाड़ी आदिवासी लढ़की का रूप धरकर शिवजी का मन जीत लिया। उन लोगों ने कुछ समय वहां बिताया। यह जंगल `काम्य वन' के नाम से जाना जाने लगा। एक दिन पार्वतीजी को काफी प्यास लगी। शंकरजी ने अपना त्रिशूल जमीन में गाड़ा ही था कि पाताल से भोगवती का पानी निकला। यह शिवालय नदी है। शिवनंदी (शिवानंद) जहां पर शिवालय से मिलती है, वहां थोड़ी-बड़ी नदी हो जाती है। ऐलगंगा भी उसके करीब बहती है। जब शिव और पार्वती यहां प र सुख पूर्वक रह रहे थे तो वहां पर सुधन्वा नाम का शिकारी शिकार करने के लिए आया। एक चमत्कार घटित हुआ और सुधन्वा एक औरत में तब्दील हो गया और वहां शंकरजी की तपस्या करने लगा। शंकरजी खुश हुए और उसके सामने प्रकट हो गये। असल में अपने पिछले जन्म में सुधन्वा का जन्म एक औरत के रूप में हुआ था। शंकर ने उसे नारी रूप से ऐलगंगा नदी के रूप में बदल दिया। इस तरह से काम्य वन में पुण्य सरिता ऐल गंगा का जन्म हुआ। बाद में यहीं ऐल गंगा स्नानतीर्थ के रूप में धारा तीर्थ के रूप में सीता का स्नानगृह के रूप में मशहूर हुई। `वेरूल गांव' से होकर यह बहुत ऊंचाई से बहती है।
एक बार पार्वतीजी काम्य वन में अपनी मांग में सिंदूर डाल रही थीं। उन्होंने शिवालय का पानी डाला और उसे मिलाने लगी। उसी वक्त एक चमत्कार हुआ। सिंदूर एक शिवलिंग में बदल गया और उसमें से प्रकाश आने लगा। पार्वतीजी यह देखकर आश्चर्य चकित हो गयीं। तब शिवजी आये और उन्होंने बताया कि यह लिंग पाताल लोक में छुपा था। इसे मैंने त्रिशूल से निकाला। तब धरती से पानी का एक सोता निकला और काशीखंड कहलाया। पार्वतीजी ने उस प्रकाशित लिंग को वहां स्थापित कर दिया। यह पूर्ण ज्योतिर्लिंग कुंकुमेश्वर कहलाया। चूंकि यह लिंग पार्वती ने अपने हाथों से उत्पन्न किया था इस वजह से इसका नाम उन्होंने घृष्णेश्वर दिया।
कैसे पहुंचें :
हवाई मार्ग से : सबसे करीबी हवाई अड्डा औरंगाबाद है। यहां से 11 किलोमीटर की दूरी पर यह मंदिर स्थित है।
रेल मार्ग से : मुंबई से औरंगाबाद के लिए प्रत्येक दिन ट्रेनें चलायी जाती हैं।
सड़क मार्ग से : राज्य परिवहन निगम की बसें भी इस स्थान के लिए जाती हैं।

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