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22 अक्तूबर 2013

मोक्ष देती हैं ये सप्तपुरियां

ये सभी सप्तपुरियां भगवान शिव को बहुत प्रिय और भक्तों के लिए मोक्षदायिनी हैं। श्रावण मास के दौरान यक्ष, किन्नर, देव, मनुष्य और दानव भी इन सप्तपुरियों के भ्रमण तीर्थ और स्नान से पाप मुक्त हो जाते है ऐसा शिवपुराण में वर्णन है।

Kashi Vishwanath_ Varanasi

काशी:-श्रावण मास में किया जाने वाला यह उत्तर भारत का प्रधान तीर्थ है। इसका नाम बनारस या वाराणसी भी है। उत्तर रेलवे की मुगल सराय से अमृतसर तथा देहरादून जाने वाली मुख्य लाइन के मुगल सराय स्टेशन से 7 मील पर काशी और उससे 4 मील आगे बनारस छावनी स्टेशन है। इलाहाबाद के प्रयाग स्टेशन से भी जंघई होकर एक सीधी लाइन काशी होती हुई बनारस छावनी तक जाती है। पूर्वोत्तर रेलवे की एक लाइन भटनी से तथा दूसरी छपरा से इलाहाबाद सिटी तक जाती है। उनसे भी बनारस सिटी होते हुए बनारस छावनी जा सकते हैं। गंगा किनारे यह भगवान शंकर की प्रसिद्ध पुरी है।

Haridwar

मायापुरी (हरिद्वार):- श्रावण मास आरंभ होते ही सारे उत्तर और मध्य भारत के शिवभक्त इस शिव चतुर्दशी को अपने क्षेत्र के शिव मंदिर में हरिद्वार का पवि़त्र गंगाजल लेने के लिए कांवड़ धारण करके हरिद्वार पहुंचते हैं। पूरे एक पखवाड़े तक हरिद्वार में शिवभक्तों की भीड़ लगी रहती है और रंगविरंगे कांवड़ का बाजार सजा रहता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोले के भक्त इन कांवड़ों को खरीद हैं और फिर पैदल ही वापसी की लंबी यात्रा पर निकल जाते हैं। प्रतिदिन लाखों भक्त हरिद्वार पहुंचते हैं और वहां से वापसी कांवड़ लेकर निकलते रहते हैं। इस दौरान समाजसेवी और शिव के भक्त गण रास्ते में इन कांवड़ धारियों के लिए भोजन.स्नान और आराम आदि की भी भंडारे के तौर पर सेवा करते हैं और थोड़े-थोड़े अन्तरराल पर सड़कों के किनारे पंडाल सेवा तत्पर रहती है। उत्तर रेलवे की मुगल सराय से अमृतसर जाने वाली मुख्य लाइन पर लक्सर स्टेशन है। वहां से एक लाइन हरिद्वार तक गई है। गंगा जी यही पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर सममतल भूमि में प्रवेश करती हैं, इससे इसे गंगा द्वार भी कहते हैं। यहां पर प्रतिदिन होने वाली मां गंगा की सांयकालीन आरती के समय श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। नदी पर तैरती दीपमालिकाओं का दृश्य देखते ही बनता है ।
Kanchi Kamkoti
कांची कामकोटि पीठ:- दक्षिण रेलवे मद्रास से धनुष्कोटि जाने वाली मुख्य लाइन के मद्रास स्टेशन से 35 मील पर चेंगलपट स्टेशन है। वहां से एक लाइन अरकोनम तक जाती है। इस लाइन पर कांजीवरम स्टेशन है। कांची कामकोटि पीठ यही पर है। इसके निकटस्थ स्टेशन का नाम कांजीवरम है किन्तु नगर का नाम कांचीपुरम है। प्राचीन काल में पितामह ब्रह्मा जी ने यहां मां भगवती के दर्शन के लिए दुष्कर तपस्या की थी। महालक्ष्मी हाथ में कमल धारण किये उनके सामने प्रकट हुईं। इस पीठ के शंकराचार्च को वार धामों के आदि गुरुओं के समतुल्य माना जिनका विशाल मठ भी कांची में स्थित है।

Ayodhya Nagri

अयोध्यापुरी:- उत्तर रेलवे की मुगल सराय लखनऊ लाइन के मुगल सराय स्टेशन से 128 मील पर अयोध्या स्टेशन है। भगवान श्री राम की यह पवित्र अवतार भूमि सरयू तट पर है। अयोध्या ऐसा तीर्थ बताते हैं जहां रामलला का जन्म हुआ और रामराज्य की स्थापना के बाद सशरीर श्रीराम अयोध्या के घाट से स्वर्ग को आरोहण कर गए अयोध्या सभी देवी देवताओं के मंदिरों की नगरी है और साधु संतों के मठ अखाड़ों के अलावा त्रेता युगीन अवशेष आज भी यहां श्रद्धालुओ के विस्मय का केन्द्र है।

Mahakal

उज्जैन की महाकालपुरी:- मध्य रेलवे की मुंबई भोपाल दिल्ली लाइन के भोपाल स्टेशन से एक लाइन उज्जैन जाती है। पश्चिम रेलवे की मुंबई कोटा दिल्ली लाइन पर नागदा स्टेशन से एक बड़ी लाइन भी उज्जैन तक गई है। उक्त लाइन के महू स्टेशन से भी एक लाइन उज्जैन को गई है। शिप्रा नदी के तट पर बसी महाकाल की यह नगरी पतित पावनी है। कहते हैं महाकाल को नमस्कार कर लेने पर फिर मृत्यु की चिनता नहीं रहती। कीट या तपंग भी यहां करने पर भगवान शिव के अनुचर होते हैं।

Dwarkapuri

द्वारकापुरी:- यह चार धामों में एक धाम भी है। पश्चिम रेलवे की सुरेंद्रनगर ओखा पोर्ट लाइन पर यह नगर समुद्र किनारे का स्टेशन है। भगवान कृष्ण ने इसे समुद्र के बीच में विशेष रूप से बसाया था।
Vrindavan

मथुरापुरी और वृन्दावन विहारी का ब्रजधाम:- पूर्वोत्तर रेलवे की आगरा फोर्ट से गोरखपुर जाने वाली लाइन तथा पश्चिम रेलवे की मुंबई कोटा दिल्ली लाइन पर मथुरा स्टेशन है। यमुना तट पर भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की अवतार भूमि का यह पवित्र नगर स्थित है। और शिव की शक्ति के लिए श्रावण के पवित्र सोमवार को मथुरा में यमुना का स्नान और बांके विहारी के मन्दिर के दर्शन पूजन से सभी सांसारिक कष्ट दूर होते हैं।

Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan


Banke Bihari, Vrindavan


Banke Bihari Temple, Vrindavan

गोवर्धन पूजा – भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीला

Govardhandhari Krishnamurari


कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है । इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि उत्सव भी सम्पन्न होते है । यह ब्रजवासियो का मुख्य त्यौहार है । अन्नकुट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई । गाय बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है । गायो कामिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है । गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल,फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते है तथा परिक्रमा करते है ।
एक बार श्री कृष्ण गोप गोपियो के साथ गाये चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुचे । वहाँ उन्होने देखा कि हजारो गोपियाँ गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन प्रकार के भोजन रखकर बडें उत्साह से नाच गाकर उत्सव मना रही है । श्री कृष्ण के पूछने पर गोपियो ने बताया कि मेघो के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव हता है । कृष्ण बोले यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएँ तब तो इस उत्सव की कुछ किमत है । गोपियां बोलींतुम्हे इन्द्र की निन्दा नहीं करनी चाहीए ।

Annkut Mahotsav


श्री कृष्ण बोले वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है इसलिये हमें इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप ग्वाल अपने अपने घरों में पकवान ला लाकर श्रीकृष्ण की बताई विधी से गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे । इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न कर गोवर्धन की पूजा की जा रही है तो वह बहुत कुपित हुए और मेघ को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसाये कि वहाँ पर प्रलय आ जाये। मेघ इन्द्र की आज्ञा से मुसलाधार वर्षा करने लगे। श्रीकृष्ण ने सब गोप गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने अपने गाय बछडों को लेकर गोवर्धन की तराई में पहुंच जाएं। गोवर्धन ही मेघ से रक्षा करेंगे । सब गोप-गोपियां अपने अपने गाय बछडों, बैलों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचने लगे । श्री कृष्ण ने गोर्वधन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उँगली पर धारण कर छाता सा तान दिया । सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे । सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियो पर जल की एक बूँद भी नहीं पडी । ब्रह्याजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्री कृष्ण ने जन्म ले लिया है । उनसे तुम्हारा वैर लेना उचित नहीं है । श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव अपनी मुर्खता पर बहुत लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे । श्रीकृष्ण ने सातवेंदिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मानाया करो । तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित हो गया ।

अब यह घर-घर में प्रचलित है। इस दिन महिलाएं गोबर से आंगन में चौकोर पूरती हैं। चौकोर के मध्य साबुत अन्न रख कर लट्ठ से कूटती हैं। बहनें अपने भाईयों को केराव का दाना निगलने को देती है। साथ में मिठाईयां भी और यदि विवाहित हैं तो अपने घर में भोजन का आमंत्रण देती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह भाई-दूज कहलाता और बहन अपने भाई की मंगल कामना करती हैं। कहा जाता है कि इस दिन मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर भोजन किया था।

इस त्योहार के पीछे एक कथा प्रचलित है कहा जाता है कि यम और यमुना भाई-बहन थे। एक दिन यम ने यमुना के यहां खाना खाया और इसी दिन से ही यह त्योहार मनाया जाने लगा। गोधन कूटने के पीछे भी एक कारण है मथुरा में गोधन नाम का एक यदुवंशी रहता था। उसकी पत्नी गोपीयों के साथ कृष्ण के यहां जाती थी। जब भगवान बासुंरी की मीठी तान छोड़ते तो सारी गोपीयां नदी के किनारे चली आती जब गोधन को यह पता चला की उसकी पत्नी भी जाती है तो वह उसे देख्नने लगा तभी श्री कृष्ण ने उसे देखा और मार दिया। गोपीयों ने भी उसे लाठी- डंडे से पीटकर मार दिया। इस दिन स्त्रियां रेगनी के कांटे से अपने भाईयों को श्राप देती हैं और बाद में गोधन को कूट्कर वहां से पानी लाकर श्राप से मुक्ति दिलाने के लिये भगवान से प्रार्थना करती हैं।

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