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10 दिसंबर 2013

वृंदावन के बांके बिहारी जी का विग्रह का रहस्य


वृंदावन में बांके बिहारी जी का एक भव्य मंदिर है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है।

इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है इसलिए हर साल मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है।

बांके बिहारी के प्रकट होने की कथा


संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे।


भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।

इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-


'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। 
प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। 
अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। 
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'

श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।

बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों दूर कर देते हैं।

गाय के गोबर को पवित्र क्यों माना जाता है?

आपने देखा होगा कि किसी भी धार्मिक कार्यों में गाय के गोबर से स्थान को पवित्र किया जाता है। गाय के गोबर से बने उपले से हवन कुण्ड की अग्नि जलाई जाती है। आज भी गांवों में महिलाएं सुबह उठकर गाय गोबर से घर के मुख्य द्वार को लिपती हैं। माना जाता है कि इससे लक्ष्मी का वास बना रहता है। प्राचीन काल में मिट्टी और गाय का गोबर शरीर पर मलकर साधु संत स्नान भी किया करते थे।




इसके पीछे धार्मिक कारण यह है कि गाय के गोबर में लक्ष्मी का वास माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार गोमूत्र में गांगा मैया का वास है। इसलिए आयुर्वेद में चिकित्सा के लिए गोमूत्र पीने की भी सलाह दी जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी गोबर को चर्म रोग एवं गोमूत्र को कई रोगों में फायदेमंद बताया गया है।

गाय का दूध उत्तम आहार माना गया है। माना जाता है कि मां के दूध के समान गाय का दूध पौष्टि होता है। इसलिए गाय को माता भी कहा गया है। शास्त्रों में कहा गया है ''गावो विश्वस्य मातरः''। यानी गाय विश्व की माता है।

नवग्रहों सूर्य, चंद्रमा, मंगल, राहु, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, केतु के साथ साथ वरूण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी हुई प्रत्येक आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है, जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है। यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है, और वर्षा से ही अन्न, पेड़-पौधों आदि को जीवन प्राप्त होता है।

गाय के अंगों में सभी देवताओं का निवास माना जाता है। गाय की छाया भी बेहद शुभप्रद मानी गयी है। गाय के दर्शन मात्र से ही यात्रा की सफलता स्वतः सिद्ध हो जाती है। दूध पिलाती गाय का दर्शन हो जाए तो यह बेहद शुभ माना जाता है।

श्रीराम और सीता जी विवाह से पहले मिल चुके थे

सीता की तलाश में जा रहे थे हनुमान, राम ने बताई राज की बात


मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान राम का विवाह इसी तिथि को हुआ था। राम विवाह का जो प्रसंग तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है उसके अनुसार भगवान श्रीराम और सीता जी विवाह से पहले जनकपुर के पुष्प वाटिका में मिल चुके थे। जनकपुर वर्तमान में नेपाल में स्थित है।

भगवान श्री राम और गुरू विशिष्ठ की आज्ञा से पूजा हेतु वाटिका से फूल लाने गये थे। माता सीता भी उस समय वाटिका में मौजूद थीं। जब राम और सीता ने एक दूसरे को देखा तो एक दूसरे के प्रति मोहित हो गये। सीता ने उसी क्षण राम को पति रूप में स्वीकार कर लिया। सीता इस बात से चिंतित थीं कि पिता द्वारा रखी गयी शिव धनुष भंग की शर्त को किसी और ने पूरा कर दिया तो राम उन्हें पति रूप में नहीं प्राप्त होंगे। अपने मन की चिंता को दूर करने के लिए सीता अपनी अराध्य देवी मां पार्वती की शरण में गयी।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि सीता की मनोदशा को समझकर माता पार्वती उन्हें समझाती हैं कि राम साक्षत परमेश्वर हैं। यह सब की मनोदशा को समझते हैं। भगवान श्री राम ने ही शिव को मुझ से विवाह के लिए प्रेरित कर मेरी तपस्या को सफल किया इसलिए तुम भी मन से चिंता निकाल दो। राम ही तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। तुलसीदास जी ने इस संदर्भ को इस प्रकार दोहे में स्पष्ट किया है।

'करूणानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।' पार्वती ने सीता को समझाया कि श्रीराम करूणानिधान और शीलवान और सर्वज्ञ हैं। वह सब जानते हैं। ऊपर से मेरा आशीर्वाद है कि 'पूजहि मन कामना तुम्हारी' 'सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा'। पार्वती जी कहती हैं कि तुमने मन में जिसे बिठाकर पूजा की है वही सहज, सुन्दर, सांवरा वर तुम्हें प्राप्त होगा।

पार्वती जी द्वारा कहे गये शब्दों को ध्यान में रखकर सीता ने तय किया कि वह श्री राम को करूणानिधान के नाम से ही पुकारेंगी। मां सीता प्रभु श्री राम को इसी नाम से बुलाती थीं। कथा है कि सीता की ख़बर लेने के लिए जब हनुमान जी लंका जाने लगे तब श्री राम ने हनुमान को अपने पास बुलाकर कहा कि मेरी मुद्रिका सीता को देना इससे वह तुम्हें मेरा दूत मान लेगी।

तब हनुमान ने शंका जताई कि अगर इससे भी न मानी सीता माता तो क्या करूं। इस पर श्री राम ने हनुमान जी से कहा कि सीता मुझे करूणानिधान के नाम से बुलाती है, यह बात सिर्फ मुझे मालूम हैं। यह बात तुम सीता को कहना की आपके करूणानिधान ने यह मुद्रिका दी है तो सीता पूर्ण विश्वास कर लेगी और तुम्हें मेरा दूत मान लेगी।

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