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20 दिसंबर 2013

साई की लीला

भेदभाव मिट गए और वह साई बाबा का भक्त हो गया



अहमदनगर में दादा साहब नामक एक डॉक्टर था. वह भगवान श्रीराम का परम भक्त था. एक बार वह डॉक्टर अपने किसी मामलतदार मित्र के साथ शिरडी आया. मामलतदार साई बाबा का भक्त था. उसने डॉक्टर को साई बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद चलने को कहा. डॉक्टर बोला कि वह मुसलमान के सामने सिर नहीं झुकाएगा. दरअसल, उसने सुन रखा था कि साई बाबा मुसलमान हैं. मामलतदार ने उससे मस्जिद चलने का आग्रह यह कहते हुए किया कि साई बाबा को प्रणाम करने के लिए उस पर कोई दबाव नहीं डालेगा. अंतत: डॉक्टर मस्जिद जाने के लिए तैयार हो गया. मामलतदार और डॉक्टर दोनों ही साई बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद गए. वहां पहुंचने पर डॉक्टर सबसे आगे चला और साई बाबा के पास पहुंच कर उसने उन्हें साष्टांग प्रणाम भी किया. यह देखकर सबको आश्‍चर्य हुआ. लोगों ने उस राम भक्त डॉक्टर से पूछा कि अपने विचार और निश्‍चय के विरुद्ध आपने ऐसा क्यों किया, तो उसने बताया कि आसन पर स्वयं भगवान श्रीराम पीत वस्त्र पहने, मुकुट धारण किए और हाथों में धनुष-बाण लिए बैठे थे. उसने साई बाबा को बार-बार देखा, तो उसे एक बार श्रीराम और दूसरी बार साई बाबा दिखाई देते थे. दोनों के दर्शन उसे एक के बाद एक, लगातार होते रहे. वह हैरान हो गया. उसके मन से सब भेदभाव मिट गए और वह साई बाबा का भक्त हो गया. उसने कहा, यह मुसलमान नहीं हो सकता, यह तो परब्रह्म का योगावतार है. 


ऐसे ही एक बार साई बाबा के एक भक्त बाला गनपत शिंपी को मलेरिया हो गया. उन्होंने तरह-तरह की दवाएं लीं और उपचार कराए, पर उनका ज्वर हटता ही नहीं था. बीमारी असाध्य हो गई. उनकी पत्नी और वह चिंतित रहने लगे. बाला जी गनपत शिंपी और उनकी पत्नी ने साई बाबा की शरण में जाने का निश्‍चय किया. दोनों शिरडी गए और साई बाबा के दर्शन कर उन्हें अपना कष्ट बताया. बाबा ने रोग से छुटकारा पाने का विचित्र उपाय बताया. उन्होंने तात्या कोते पाटिल को दही और भात लाने को कहा. वह ले आया. साई बाबा ने बाला गनपत शिंपी से कहा, दही और भात को मिला दो, बाहर लक्ष्मी मंदिर के पास जाओ और वहां एक काले कुत्ते को यह दही-भात खिला दो. काला कुत्ता तुम्हें मंदिर के पास मिलेगा. दही-भात लेकर पति-पत्नी लक्ष्मी मंदिर के पास गए. वहां उन्हें एक काला कुत्ता दिखाई दिया, जो उन दोनों को देखकर पूंछ हिलाने लगा. बाला जी गनपत शिंपी ने उस कुत्ते के सामने दही-भात रख दिया. कुत्ते ने खाया और खाते ही मुंह फेरकर जंगल में भाग गया. आश्‍चर्य है कि इसके बाद बाला जी गनपत शिंपी का मलेरिया ज्वर ख़त्म हो गया. 

आटा, धूनी और बवंडर

साई बाबा की दया और चमत्कारों के जो अनुभव एक साथ अनेक व्यक्तियों को हुए, उनकी परिगणना सामूहिक अनुभव में की जा सकती है. शिरडी में प्राय: सभी लोग साई बाबा के भक्त थे. बाबा अपने भक्तों का बड़ा ध्यान रखते थे और उनकी रक्षा करने के लिए सदा तत्पर भी रहते थे. 1910 के आसपास शिरडी के चारों ओर विसूचिका का भयंकर प्रकोप हुआ. लोग बड़ी संख्या में मरने लगे. सैकड़ों मील तक हैज़े का आतंक छा गया. गांव के गांव श्मशान जैसे बन गए. शिरडी के लोग भी घबरा गए, किंतु उनकी रक्षा के लिए साई बाबा ने उपाय सोच लिया था. एक दिन सुबह साई बाबा ने मुंह-हाथ धोया और चक्की से गेहूं पीसने की तैयारी की. उन्होंने फ़र्श पर बोरा बिछाया और उस पर चक्की रखी. चक्की के मुंह में गेहूं डालकर वह खूंटी पकड़ कर पिसाई करने लगे. बोरे पर चक्की के चारों ओर आटा निकलने लगा. पर्याप्त मात्रा में आटा हो जाने पर बाबा ने भक्तों से कहा कि वे उस आटे को शिरडी की सीमा के चारों तरफ़ डाल दें. भक्तों ने वैसा ही किया और आटे की रेखा ह़ैजा रूपी रावण के लिए लक्ष्मण रेखा बन गई. शिरडी में कहीं पर भी किसी को धीरे-धीरे विसूचिका नहीं हुई. आटे द्वारा ह़ैजे को रोक देने के चमत्कार की बात चारों तरफ़ फैल गई. आटा अथवा विसूचिका निरोधक पाउडर लेने के लिए दूसरे गांवों से हज़ारों लोग शिरडी आने लगे. साई बाबा चक्की चलाते रहे, आटा बांटते रहे और ह़ैजे का नामोनिशान मिटाते रहे. जहां-जहां और जिस-जिस घर में वह आटा गया, वहां से ह़ैजा छू मंतर हो गया. तत्कालीन अंग्रेज सरकार भी साई बाबा का यह चमत्कार देखकर दंग रह गई. साई बाबा तो मायापति परब्रह्म परमात्मा थे. प्रकृति पर उनका पूरा नियंत्रण था. अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश उनके आधिन में थे. उनकी द्वारका माई मस्जिद में रात-दिन धूनी जलती रहती थी. 

एक दिन दोपहर के समय साई बाबा के साथ लोग धूनी के पास बैठे थे. अचानक धूनी में आग की प्रचंड लपटें निकलीं और वह छत के आड़े खंभे (राफ्टर) को छूने लगी. यह देखकर लोग भयभीत हो गए, पर किसी में साहस नहीं था कि वह बाबा से धूनी में पानी डालकर ज्वाला को शांत करने का अनुरोध करे. अंतर्यामी साई बाबा जल्दी ही जान गए कि क्या हो रहा है. उन्होंने अपने डंडा (सटका) उठाया और सामने के खंभे को यह कहते हुए मारना शुरू किया कि नीचे उतरो, शांत हो जाओ. सटके के प्रत्येक आघात पर ज्वाला नीचे उतरती गई और कुछ ही क्षणों में धूनी की आग सामान्य हो गई. 

एक बार शिरडी में शाम के समय भयानक झंझावात उठा. आकाश में काले-काले बादल उमड़-घुमड़ कर छा गए. तेज आंधी चलने लगी, बादल गरजने लगे, रह-रहकर बिजली कौंधने लगी और मूसलाधार बारिश होने लगी. थोड़ी ही देर में चारों तरफ़ बाढ़ आ गई. लोग त्राहि-त्राहि करने लगे. शिरडी के सभी लोग, पशु-पक्षी आदि डर कर मस्जिद में आ गए. लोगों ने साई बाबा से रक्षा करने की प्रार्थना की. बाबा को दया आई. वह बाहर आए और मस्जिद के दरवाजे पर खड़े होकर आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने गरज कर कहा, बंद करो और अपने क्रोध को शांत करो. कुछ ही क्षणों में वर्षा बंद हो गई और आंधी रुक गई. बादल छंट गए और चंद्रमा निकल आया. लोग साई बाबा की जय-जयकार करते हुए अपने-अपने घर चले गए. यहां यह बताना ज़रूरी है कि द्वापर में परब्रह्म साई बाबा ने ही इंद्र के कोप से ब्रज की रक्षा की थी. इन कथाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि बाबा का अपने भक्तों के प्रति स्नेह कुछ ऐसा था कि वह उनके लिए प्रकृति से भी टकरा सकते थे. बाबा की महिमा अपरंपार है.

शिरडी के साई बाबा

कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए


साई बाबा का जन्म 28 सितंबर, 1836 को हुआ था. हालांकि उनके जन्म स्थान, जन्म दिवस या उनके असली नाम के बारे में सटीक तौर पर कोई नहीं जानता है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक, साई का जीवन काल 1838-1918 के बीच है. साई एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जो धर्म की सीमाओं में नहीं बंधे थे. सच तो यह है कि उनके अनुयायियों में हिंदू और मुसलमानों की संख्या बराबर थी. श्रद्धा और सबूरी, यानी संयम उनके विचार-दर्शन का सार है.


जब हम पैदा होते हैं, तो हमारी न कोई जात होती है और न ही कोई धर्म. मानव को जात-पात में बांटने का काम हम ही करते हैं. सामाजिक वर्गीकरण की इस दिवार में सबसे ज्यादा नुकसान समाज के उपेक्षित वर्ग को होता है. हमारे साधु-संतों और समाज सुधारकों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि समाज में एकता आए. समाज में इसी एकता के भाव को सदृढ़ करने की राह में उल्लेखनीय कार्य के लिए हम शिरडी के साई बाबा को याद करते हैं. शिरडी के साई बाबा को कोई चमत्कारी, तो कोई दैवीय अवतार मानता है, लेकिन कोई भी उन पर यह सवाल नहीं उठाता कि वह हिंदू थे या मुसलमान. श्री साई बाबा जात-पात तथा धर्म की सीमाओं से ऊपर उठ कर एक विशुद्ध संत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो सभी जीवात्माओं की पुकार सुनने व उनके कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए. 

सबका मालिक एक है के उद्घोषक शिरडी के साई बाबा ने संपूर्ण जगत को सर्वशक्तिमान ईश्‍वर के स्वरूप का साक्षात्कार कराया. उन्होंने मानवता को सबसे बड़ा धर्म बताया और कई ऐसे चमत्कार किए, जिनसे लोग उन्हें भगवान की उपाधि देने लगे. आज साई बाबा के भक्तों की संख्या को लाखों-करोड़ों में नहीं आंका जा सकता. उन्होंने 1918 में अपना देह त्याग किया था. साई बाबा का जन्म 28 सितंबर, 1836 को हुआ था. हालांकि उनके जन्म स्थान, जन्म दिवस या उनके असली नाम के बारे में सही-सही कोई नहीं जानता है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक, साई का जीवन काल 1838-1918 के बीच है. 

साई एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जो धर्म की सीमाओं में नहीं बंधे थे. सच तो यह है कि उनके अनुयायियों में हिंदू और मुसलमानों की संख्या बराबर थी. श्रद्धा और सबूरी, यानी संयम उनके विचार-दर्शन का सार है. उनके अनुसार, कोई भी इंसान अपार धैर्य और सच्ची श्रद्धा की भावना रखकर ही ईश्‍वर की प्राप्ति कर सकता है. कहा जाता है कि सोलह वर्ष की अवस्था में साईं महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गांव पहुंचे और जीवन पर्यन्त उसी स्थान पर निवास किया. कुछ लोग मानते थे कि साई के पास अद्भुत दैवीय शक्तियां थीं, जिनके सहारे वे लोगों की मदद किया करते थे, लेकिन खुद कभी साई ने इस बात को नहीं स्वीकारा. वह कहा करते थे कि मैं लोगों की प्रेम भावना का गुलाम हूं. सभी लोगों की मदद करना मेरी मजबूरी है. 


सच तो यह है कि साई हमेशा फकीर की साधारण वेश-भूषा में ही रहते थे. वे जमीन पर सोते थे और भीख मांग कर अपना गुजारा करते थे. कहते हैं कि उनकी आंखों में एक दिव्य चमक थी, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती थी. साई बाबा का एक ही मिशन था-लोगों में ईश्‍वर के प्रति विश्‍वास पैदा करना. 1918 में विजयादशमी के कुछ दिन पूर्व साईनाथ ने अपने परमप्रिय भक्त रामचंद्र पाटिल से विजयादशमी के दिन तात्या के मृत्यु की भविष्यवाणी की. यहां यह जानना जरूरी है कि साई बाबा शिरडी की निवासी वायजाबाई को मां कहकर संबोधित करते थे और उनके एकमात्र पुत्र तात्या को अपना छोटा भाई मानते थे. साईनाथ ने तात्या की मृत्यु को टालने के लिए उसे जीवन-दान देने का निर्णय ले लिया. 

27 सितम्बर, 1918 से साई बाबा के शरीर का तापमान ब़ढने लगा और उन्होंने अन्न भी त्याग दिया. हालांकि उनकी देह क्षीण हो रही थी, लेकिन उनके चेहरे का तेज यथावत था. 15 अक्टूबर, 1918 को विजयादशमी के दिन तात्या की तबियत इतनी बिगड़ी कि सबको लगा कि वह अब नहीं बचेगा, लेकिन दोपहर 2.30 बजे तात्या के स्थान पर बाबा नश्‍वर देह को त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए और उनकी कृपा से तात्या बच गए. साई बाबा अपनी घोषणा के अनुरूप 15 अक्टूबर, 1918 को विजयादशमी के विजय-मुहूर्त में शारीरिक सीमा का उल्लंघन कर निज धाम प्रस्थान कर गए. इस प्रकार विजयादशमी बन गया, उनका महासमाधि पर्व. कहते हैं कि आज भी सच्चे साईं-भक्तों को बाबा की उपस्थिति का अनुभव होता है.

साई की महिमा


जब हम इस धरती पर पैदा होते हैं तो मानव की न कोई जाति होती है और न ही उसका कोई धर्म. मानव को बांटने का काम हम लोग ही करते हैं. हमारे साधु-संतों और समाज सुधारकों ने हमेशा समाज में एकता कायम करने के लिए लोगों को जागरूक किया. समाज में इसी वर्गीकरण की दीवार को और एकता भाव को मजबूत करने के लिए शिरडी के साई बाबा को हम याद करते हैं.
शिरडी के साई बाबा को कुछ लोग दैवीय अवतार तो कुछ लोग चमत्कारी मानते हैं, लेकिन समाज में उन पर कोई सवाल नहीं उठाता कि वह हिंदू थे या मुसलमान. साई बाबा कहते थे कि सबका मालिक एक है. साई बाबा धर्म और जात-पात की बेड़ियों को तोड़कर एक विशुद्ध संत की तस्वीर समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं. साई सभी जीवात्माओं की पुकार सुनने व उनके कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए. शिरडी के साई बाबा ने सबका मालिक एक है, के उद्घोष के साथ सम्पूर्ण जगत को सर्वशक्तिमान ईश्‍वर के स्वरूप का साक्षात्कार कराया. उन्होंने समाज को बताया कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है. साई कई ऐसे चमत्कार किए, जिससे लोग उन्हें भगवान मानने लगे. साई बाबा के भक्तों की संख्या को लाखों-करोड़ो में नहीं आंका जा सकता. साई एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जो धर्म की सीमाओं में बंधे नहीं थे. 
सच तो यह है कि हिंदू और मुसलमान दोनों उनके अनुयायी हैं. साई के अनुसार, कोई भी इंसान धैर्य और सच्ची श्रद्धा की भावना रखकर ही ईश्‍वर की प्राप्ति कर सकता है. श्रद्धा और सबूरी यानी संयम उनके विचार दर्शन के सार हैं. 
ऐसा माना जाता है कि साई 16 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गांव पहुंचे और उसी स्थान पर निवास किया. कुछ लोग कहते हैं कि साई के पास अद्भुत शक्तियां थीं, जिनसे वह लोगों की मदद करते थे. साई ने इस बात को कभी नहीं स्वीकारा. वे कहा करते थे कि मैं लोगों का गुलाम हूं और समाज में सभी लोगों की मदद करना मेरी जिम्मेदारी है. साई हमेशा फकीर की तरह साधारण वेशभूषा में रहते थे. वह जमीन पर सोते थे और लोगों से भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे. उनके आखों में चमक थी, जो लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती थी. साई बाबा का एक ही काम था, लोगों में ईश्‍वर के प्रति विश्‍वास पैदा करना. साई ने समाज में लोगों के कष्टों का निवारण किया. जो भी उनके पास आया, वह निराश होकर कभी वापस नहीं गया. वह समाज के प्रत्येक लोगों के प्रति सद्भाव रखते थे. साई के यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जात-पात, धर्म-मजहब का कोई भेदभाव नहीं था. समाज के सभी जाति के लोग उनके पास आते थे. साई ने एक हिंदू द्वारा बनवाई गई मस्जिद को अपना बसेरा बनाया और उसे द्वारकामाई का नाम दिया. भक्तों को साई में सभी देवताओं के दर्शन होते थे. साई सत्य, प्रेम, दया, करुणा के प्रतिमूर्ति थे. साई अपने अपमान की कभी चिंता नहीं करते थे और वह सबके साथ मिलकर रहते थे. वे सभी मनुष्यों के साथ बैठकर कव्वाली, नृत्य, गजल देखते और अपना सिर हिलाकर प्रशंसा भी करते थे. इन सबके बावजूद भी साई की समाधि भंग नहीं होती थी. साई एक जगह निवास करते थे, लेकिन उन्हें विश्‍व के समस्त व्यवहारों का पूर्ण ज्ञान था. साई हमेशा जन कल्याण के लिए काम करते थे. 
साई हिंदू और मुसलमान दोनों थे. इस तरह से वे सद्भाव की सच्ची मिसाल पेश करते थे. वह मलिन वेशभूषा में रहते थे और सदा अल्लाह मालिक है, जपते रहते थे. द्वारिका माई नामक स्थान पर मुसलमानों का उर्स महोत्सव होता था और वहीं पर रामनवमी का कार्यक्रम भी होता था. नि:संदेह सर्वज्ञाता (साई) कृष्ण की द्वारिका के महत्व से अच्छी तरह से परिचित थे, जो स्कन्द पुराण में यों वर्णित है-
चतुर्वर्णामपि वर्गाणांयत्र द्वाराणि सर्वत:। 
अतो द्वारावतीत्युक्ता विद्वद्धिस्तत्व वादिभि:। 
साई बाबा की द्वारिका माई के द्वार सदा उद्घाटित थे-गरीब-अमीर-साधु-असाधु और हिंदू-मुसलमान सहित चारों वर्णों के लोगों के लिए जिसका द्वार हमेशा खुला रहता था, उसे ज्ञानी विद्वान द्वारिका कहते हैं. साई बाबा इस मस्जिद को नित्य दीपों से सजाते थे, जिसके लिए वह आस-पास के दुकानदारों से तेल मांग कर लाते थे. दुकानदारों ने एक दिन निश्‍चय किया कि अब मुफ्त में तेल नहीं देंगे. साई ने सभी दियों में तेल की जगह पानी भर दिया और दीप जल उठे और मस्जिद पूरी रात प्रकाश से जगमगाती रही. साई की अद्भुत लीला को देख कर दुकानदारों की आखें खुल गई. एक बार शिरडी में हैजे का घोर प्रकोप हो गया. साई बैठकर चक्की में गेहूं पीसने लगे और यह देखकर कई लोग वहां आ गए. साई को चक्की पीसते देखकर चार औरतों ने चक्की लेकर स्वयं पीसना शुरू कर दिया. पर्याप्त आटा हो गया तो साई ने उसे गांव की सीमाओं पर छिड़कवा दिया और हैजा गायब हो गया. लोग समझ गए कि बाबा ने गेहूं के रूप में हैजे को ही पीस डाला. ऐसे थे साई और ऐसी थी साई की महिमा, जिसका अनुकरण कर लोग धन्य हो जाते थे.

शिरडी के साई बाबा

साई बाबा / SAI BABA

आज विश्‍व का कोई ऐसा देश नहीं है, जहां के लोग श्री शिरडी के साई बाबा के नाम से परिचित न हों. वह भारत के ही नहीं अपितु पूरे विश्‍व के आध्यात्मिक विभूति थे. मानयता है कि उनका जन्म लगभग 1838 ई. में महाराष्ट्र के पथरी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन उन्हें कुछ वर्ष तक एक मुस्लिम फकीर परिवार ने पाला था. उसके बाद साई शेलू गांव के एक ब्राह्मण संत गुरु वेंकुशा के आश्रम में 12 वर्ष तक रहे थे. 1854 में साई अपने गुरु के आदेश और आशीर्वाद से शिरडी गांव में चले गए थे. वहां लगभग दो माह तक एक युवक संत के रूप में रहने के बाद साई अचानक वहां से चले गए थे. तीन वर्ष बीतने के बाद 1858 में एक बारात के साथ बैलगाड़ी में बैठकर शिरडी आए थे और फिर वहीं बस गए थे. वहां साई ने एक त्यागी हुई पुरानी वीरान पड़ी हुई मस्जिद को अपना स्थान बनाया और जो द्वारिका माई के नाम से प्रसिद्ध है. यह नाम साई के द्वारा ही दिया गया है. साई 60 वर्षों तक उसी मस्जिद में रहे थे और 80 वर्ष के आयु में साई ने शिरडी में ही अपना प्राण त्यागा था. साई ने किसी को भी अपने परिवार, जाति धर्म के बारे में नहीं बताया था, लेकिन कुछ प्रमाणों से माना जाता है कि वह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. वे शिरडी में फकीर का एक सीधा-सादा जीवन व्यतीत करते थे. वे हमेशा अल्लाह मालिक है, कहते रहते थे. 
साई मानवों व पशु-पक्षियों सभी को अपना प्रेम और सद्भाव देते थे. उनके पास संस्कृत, उर्दू, अरबी, मराठी, हिंदी, और तमिल भाषाओं की जानकारी थी. साई शिरडी गांव में केवल पांच परिवारों से ही रोज दिन में दो बार भिक्षा मांग कर लाते थे. जो भी भिक्षा में मिल जाता, उसे द्वारिका माई में लाते थे और सभी को मिट्टी के बर्तन (परात) में सभी को मिलाकर रख देते थे. कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया आकर उनका एक अंश आकर खा जाते थे, तब उसके बाद बचे भिक्षा को भक्तों के साथ मिल-बांट कर खाते थे. साई के द्वारा द्वारिका माई में स्थापित की गई धुनी आज भी लगातार प्रज्ज्वलित हो रही है. साई अपने भक्तों कों और वहां वाले आंगतुकों को धुनी की भस्म(ऊदी) को आशीर्वाद के साथ दिया करते थे और उनके सभी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्ट दूर हो जाते थे और वे त्रिकालदर्शी थे. लोगों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में जानते थे, पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के पूर्व जन्मों के बारे में उन्हें पूर्ण जानकारी होती थी. साई ने जिसको आशीर्वाद दे दिया, वह हमेशा ही प्रसन्न होकर रहता था. साई ने कई अत्यंत रोमांचकारी चमत्कार किए थे. उन्होंने केवल स्वाभाविक रूप से करुणावश चमत्कार किया था. दिखाने के लिए नहीं, जैसा कि आजकल कई संत करते हैं. साई के चमत्कारों तथा भक्तों पर अनुग्रह की ख्याति धीरे-धीरे भारत समेत पूरे विश्‍व में फैल गई. उन्हें विश्‍व गुरु स्वीकार किया गया है. 
साई के शिरडी में रहते समय साठ वर्षों के दौरान हजारों दुखी भक्त और याचक उनकी कृपा पाने के लिए आए थे और सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हुई थी. महाराष्ट्र के एक महान भक्त श्री दामोलक हेमाडयंत ने साई से प्राथना की थी कि वे उनके दिव्य जीवन, चमत्कारों और उपदेशों पर एक ग्रंथ लिखने की अनुमति दे दें. साई ने अपना आशीर्वाद देते हुए कहा था श्री साई सत् चरित्र लेखक के लिए मेरी पूर्ण अनुमति है, जो प्रेम पूर्वक मेरा नाम स्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा. उसकी भक्ति में दिनों-दिन वृद्धि होगी. जो मेरे चरित्र और कार्यो का श्रद्धापूर्वक गायन करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सहायता करूंगा. साई कहते हैं, जो भक्त उनको हृदय और प्राणों से चाहेगा, उससे वे सदैव प्रसन्न रहेंगे. साई की लीलाओं का जो कीर्तन करेगा, उसे परमानंद और चिर-संतोेष की प्राप्ति हो जाएगी. 
साई कहते हैं यह मेरा वैशिष्ठय है कि जो कोई अनन्य भाव से ही मेरी शरण आता है, जो श्रद्धापूर्वक मेरा निरन्तर पूजन, स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूं. साई कहते हैं कि मेरी कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनो, मनन करो. सुख और शांति प्राप्ति का सरल मार्ग यही है. केवल साई के उच्चारण मात्र से उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे.

साई के ग्यारह वचन 

जो शिरडी आएगा, आपद दूर भगाएगा. 
च़ढे समाधि की सीढ़ी पर, पैर तले दु:ख की पीढ़ी पर. 
त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौड़ा आऊंगा. 
मन में रखना दृढ़ विश्‍वास, करे समाधि पूरी आस. 
मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो. 
मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए. 
जैसा भाव रहा जिस मन का, वैसै रूप हैं मेरे मन का. 
भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा. 
आ सहायता लो भरपूर, जो मांगा वह नहीं है दूर. 
मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया. 
धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

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