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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

30 जनवरी 2014

आप हनुमानजी के भक्त हैं तो जरूर करें इन सात में से कोई एक उपाय

यदि आप हनुमानजी के भक्त हैं तो आपके लिए मंगलवार और शनिवार बहुत खास दिन हैं। इन दो दिनों मे की गई हनुमान पूजा विशेष फल देने वाली होती है।



बजरंग बली को प्रसन्न करने के लिए यहां चमत्कारी उपाय बताए जा रहे हैं, जो कि मंगलवार और शनिवार को किए जाने चाहिए। 
सुबह-सुबह पीपल के कुछ पत्ते तोड़ लें और उन पत्तों पर चंदन या कुमकुम से श्रीराम नाम लिखें। इसके बाद इन पत्तों की एक माला बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें।
किसी पीपल पेड़ को जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा करें। इसके बाद पीपल के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। 
अगर आपको कड़ी मेहनत के बाद भी किसी महत्वपूर्ण कार्य में सफलता नहीं मिल पा रही है तो किसी हनुमान मंदिर जाएं और नींबू का ये उपाय करें। उपाय के अनुसार अपने साथ एक नींबू और 4 लौंग लेकर जाएं। इसके बाद मंदिर में हनुमानजी के सामने नींबू के ऊपर चारों लौंग लगा दें। फिर हनुमान चालीसा का पाठ करें या हनुमानजी के मंत्रों का जप करें। मंत्र जप के बाद हनुमानजी से सफलता दिलवाने की प्रार्थना करें और वह नींबू अपने साथ रखकर कार्य करें। मेहनत के साथ ही कार्य में सफलता मिलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। 
यदि आपके कार्यों में बार-बार बाधाएं आ रही हैं या धन प्राप्त करने में देरी हो रही है या किसी की बुरी नजर बार-बार लगती है तो नारियल का यह उपाय करें। उपाय के अनुसार किसी सिद्ध हनुमान मंदिर में जाएं और अपने साथ एक नारियल लेकर जाएं। मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा के सामने नारियल को अपने सिर पर सात बार वार लें। इसके साथ हनुमान चालीसा का जप करते रहें। सिर पर वारने के बाद नारियल हनुमानजी के सामने फोड़ दें। इस उपाय से आपकी सभी बाधाएं दूर हो जाएंगी.
यदि आप मालामाल होना चाहते हैं तो रात के समय दीपक का यह उपाय करें। रात में किसी हनुमान मंदिर जाएं और वहां प्रतिमा के सामने में चौमुखा दीपक लगाएं। चौमुखा दीपक यानी दीपक चार ओर से जलाना है। इसके साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करें। ऐसा प्रतिदिन करेंगे तो बहुत ही जल्द बड़ी-बड़ी परेशानियां भी आसानी से दूर हो जाएंगी। 
यदि आपके कार्यों में परेशानियां अधिक आ रही हैं और बनते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं तो शनिवार को यह उपाय करें। उपाय के अनुसार आप सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें। स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद घर से एक नींबू अपने साथ लें और किसी चौराहे पर जाएं। अब वहां नींबू के दो बराबर टुकड़ें करें। एक टुकड़े को अपने से आगे की ओर फेंकें और दूसरे टुकड़े को पीछे की ओर। इस समय आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। नींबू के टुकड़े फेंकने के बाद आप अपने काम पर जा सकते हैं या पुन: घर लौटकर आ सकते हैं। 
हनुमानजी को सिंदूर और तेल अर्पित करें। जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां अपने पति या स्वामी की लंबी उम्र के लिए मांग में सिंदूर लगाती हैं, ठीक उसी प्रकार हनुमानजी भी अपने स्वामी श्रीराम के लिए पूरे शरीर पर सिंदूर लगाते हैं। जो भी व्यक्ति हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करता है उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। 
हनुमानजी के मंदिर में 1 नारियल पर स्वस्तिक बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। 
अपनी श्रद्धा के अनुसार किसी हनुमान मंदिर में बजरंग बली की प्रतिमा पर चोला चढ़वाएं। ऐसा करने पर आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएंगी।

28 जनवरी 2014

श्री कृष्ण से जुड़ी रोचक बातें


कृष्ण को हिंदू धर्म में पूर्णावतार के रूप मे पूजा जाता है। इस धरती पर ईश्वर के समान दूसरा बड़ा ओर कोई नही है, इसीलिए श्री कृष्ण को पूर्ण अवतार माना जाता है। श्री कृष्ण को समझना और उन्हीं की भक्ति करने से सारे सुख प्राप्त होते है।

आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी और कलयुग का आरंभ हुआ था।

कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ज्योतिषियों के अनुसार कृष्ण की आयु 119-33 वर्ष रही होगी। उनकी मृत्यु एक बहेलिए के तीर के लगने से हुई थी। कृष्ण जब जंगल मे विश्राम कर रहे थे, तभी बहेलिए ने उनके पैर को देखकर हिरण समझा और तीर मार दिया।

कृष्ण जन्म-

पुराणों के अनुसार आठवें अवतार के रूप में विष्णु ने श्रीकृष्ण का अवतार देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रूप में मथुरा के कारागार में लिया। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त के बाद आठवें मुहूर्त में हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

कृष्ण जन्म के दौरान आठ का जो संयोग बना, वो बड़ा ही शुभ है। कृष्ण की आठ ही पत्नियां थी। आठ अंक का उनके जीवन में बहुत महत्व रहा है।

महाभारत, गीता और कृष्ण के समय के संबंध में मेक्समूलर, बेबेर, लुडविग, हो-ज्मान, विंटरनिट्स फॉन श्राडर आदि सभी विदेशी विद्वानों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का कुछ भारतीय विद्वानों ने भी अनुसरण कर भ्रम के जाल को और बढ़ावा दिया है।

दयानंद सरस्वती ने विदेशी विद्वानों की बातों का खंडन कर अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में एक लेख लिखा था जिसमें युधिष्ठिर से लेकर अंतिम हिंदू राजा यशपाल तक के नाम दिए हैं। यशपाल को शाहबुद्दीन ने पराजित कर दिल्ली पर अपना आधिपत्य कायम किया था।

कृष्ण की पत्नियाँ-

कृष्ण ने आठ महिलाओं से विवाह किया। जिनके नाम ये है- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।

कृष्ण की प्रेमिकाएं-

राधा, ललिता आदि श्री कृष्ण की प्रेमिकाएं थीं, उनकी प्रेमिकाएं सखियों के नाम से भी जानी जाती थी। राधा की कुछ सखियां भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी।

ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की प्रेमिकाएं ये है- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा और भद्रा।

शूरसेन की पीढ़ी में ही वासुदेव और कुंती का जन्म हुआ। कुंती तो पांडु की पत्नी बनी जबकि वासुदेव से कृष्ण का जन्म हुआ। कृष्ण से प्रद्युम्न का और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध का जन्म हुआ।

प्रद्युम्न के पुत्र तथा कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी के रूप में उषा की ख्याति है। अनिरुद्ध की पत्नी उषा शोणितपुर के राजा वाणासुर की कन्या थी। अनिरुद्ध और उषा की प्रेम कहानी जगप्रसिद्ध है। भारतीय साहित्य में कदाचित यह एक अनोखी प्रेमकथा है जिसमें एक प्रेमिका स्त्री द्वारा पुरुष का हरण वर्णित है।

कृष्ण निवास-

मथुरा को हिंदुओं के लिए मदीना की तरह माना जाता है। कृष्ण ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पल गोकुल, वृंदावन, गिरिराज और द्वारिका गुज़ारे है। मथुरा श्री कृष्ण की जन्मभूमि है और हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है।

कृष्ण को ढूंढने वाले अक्सर गोकुल, मथुरा, वृंदावन, गिरिराज जाते हैं, लेकिन जानकार मानते हैं कि द्वारिका में कृष्ण आराम करते हैं और मथुरा में काम और वैकुंठ में ध्यान।

कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने गुजरात के समुद्र के तट पर द्वारिका का निर्माण कराया और वहां एक नए राज्य की स्थापना की। हिंदुओं को चार धामों में से एक द्वारिका धाम को द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ कहा जाता है। स्कंदपुराण में श्रीद्वारिका महात्म्य का वर्णन मिलता है।

कृष्ण महायोगी थे। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर हासिल की थी। कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र था जिसे युद्ध में सबसे घातक हथियार माना जाता था।

कृष्ण ने एक ओर जहां अपनी माया द्वारा माता यशोदा को अपने मुंह के भीतर ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए थे वहीं उन्होंने युद्ध के मैदान में उन्होंने अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराकर उसका भ्रम दूर किया था। दूसरी ओर उन्होंने द्रौपदी के चीरहरण के समय उसकी लाज बचाई थी।

वे योग में पारगत थे तथा योग द्वारा जो भी सिद्धियां होती हैं वे स्वत: ही उन्हें प्राप्त थीं। सिद्धियों से पार भी जगत है वे उस जगत की चर्चा गीता में करते हैं।

कृष्ण लीलाएं-

कृष्ण ने अपने जीवन में बहुत सी लीलाएँ की है। कंस ने बालक कृष्ण की हत्या करने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा था। कृष्ण की माया के आगे पूतना बेबस रही। पूतना के अलावा कृष्ण ने शकटासुर, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय-दमन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ट आदि राक्षसों का वध किया।

मथुरा में कंस का वध कर प्रजा को अत्याचारी राजा कंस से मुक्त करने के उपरांत कृष्ण ने अपने माता-पिता को भी कारागार से मुक्त कराया। जरासंध ने कालयवन के साथ मिलकर आक्रमण किया तब कृष्ण को मथुरा छोड़कर भागना पड़ा।

महाभारत का युद्ध-

कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर की गद्दी के लिए कुरुक्षेत्र में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध हुआ था। कुरुक्षेत्र हरियाणा प्रांत का एक जिला है। मान्यता है कि यहीं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। कृष्ण इस युद्ध में पांडवों के साथ थे। महाभारत का यह युद्ध 18 दिन तक चला था।

गीता प्रवचन-

कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो उपदेश दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों के सार को गीता कहा गया है। ऋषि वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। गीता महाभारत के भीष्मपर्व का हिस्सा है।

जैन धर्म-

जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे, कृष्ण इनके पास बैठकर इनके प्रवचन सुना करते थे। कृष्ण को जैन धर्म ने उनके त्रैषठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है।

22 जनवरी 2014

बिहार के पवित्र धार्मिक स्थल

जैन धर्म के 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर या महावीर का जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य (बिहार) में हुआ था। बिहार की राजधानी पटना सिख धर्म के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की जन्म स्थली रही है। मनेर शरीफ एक प्रसिद्ध मुस्लिम धार्मिक स्थान है, जो भारत के बिहार राज्य में स्थित है।

वर्धमान महावीर या महावीर

जैन धर्म के अनुयायिओं के लिए भी बिहार एक पवित्र धार्मिक स्थल है। जैन धर्म के 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर या महावीर का जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य (बिहार) में हुआ था। जैन धर्म के अनुयायिओं के लिए यहां का पावापुरी एक पवित्र स्थल है। यहां भगवान महावीर को परिनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी।

अगर आप वैशाली जा रहे हैं तो जल मंदिर जाना मत भूलें। यह मंदिर एक तालाब के बीचों-बीच बना हुआ है। इस मंदिर में मुख्यि पूज्यनीय वस्तु भगवान महावीर की चरण पादुका है। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान महावीर का अंतिम संस्काणर किया गया था। वैशाली के अलावा जैनियों के लिए राजगीर और नालंदा दोनों ही महत्वपूर्ण स्थल है। वर्धमान महावीर ने अपने जीवन के 14 साल इन दोनों जगह पर बिताए थे।

सिख स्थल-

सिख धर्म के दृष्टिकोण से भी बिहार राज्य का खास महत्व है। बिहार की राजधानी पटना सिख धर्म के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की जन्म स्थली रही है। यह स्थान सिख धर्मावलंबियों के लिए बहुत पवित्र है। प्रसिद्ध तख्त श्री पटना साहिब बिहार राज्य के पटना शहर में स्थित एक गुरुद्वारा है। सिखों के लिए हरमंदिर साहब पांच प्रमुख तख्तों में से एक है। यहां गुरु गोविंद सिंह से संबंधित अनेक प्रामाणिक वस्तु्एं रखी हुई हैं।

सूफी स्थल-

हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख के अलावा इस्लाम धर्म में भी बिहार राज्य का विशेष स्थान है। प्राचीन काल में मुगल शासकों के लिए बिहार सत्ता का केंद्र रहा है। बहुत से सूफी संतों के लिए बिहार एक अलग ही अहमियत रखता है। मनेर शरीफ एक प्रसिद्ध मुस्लिम धार्मिक स्थान है, जो भारत के बिहार राज्य में स्थित है। यह पटना के पश्चिम में तीस किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित है। माना जाता है कि मनेर शरीफ स्थान पर ही सूफी संत मखदूम दौलत ने वर्ष 1608 में अंतिम सांस ली थी। दूसरे पवित्र स्थलों में जहानाबाद का हजरत बीबी कमाल (भारत की पहली महिला सूफी संत) का कब्र, औरंगाबाद में अजमेर शरीफ का कब्र आदि हैं।

सोनपुर मेला

हाजीपुर के सामने सोनपुर में प्रत्येक वर्ष लगने वाला पशु मेला विश्व प्रसिद्ध है। सोनपुर एक नगर पंचायत और पूर्व मध्य रेलवे का मंडल है। इसकी प्रसिद्धि लंबे रेलवे प्लेटफार्म के कारण भी है। भागवत पुराण में वर्णित इस हरिहरक्षेत्र में गज-ग्राह की लडाई हुई थी जिसमें भगवान विष्णु ने ग्राह (घरियाल) को मुक्ति देकर गज (हाथी) को जीवनदान दिया था। उस घटना की याद में प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को गंडक स्नान तथा एक पक्ष तक चलनेवाला मेला लगता है। यहाँ बाबा हरिहरनाथ (शिव मंदिर) तथा काली मंदिर के अलावे अन्य मंदिर भी हैं। मेला के दिनों में सोनपुर एक सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बन जाता है।

चिरांद: 

छपरा से 11 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में डोरीगंज बाजार के निकट स्थित यह गाँव एक सारन जिले का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। घाघरा नदी के किनारे बने स्तूपनुमा भराव को हिंदू, बौद्ध तथा मुस्लिम प्रभाव एवं उतार-चढाव से जोड़कर देखा जाता है। भारत में यह नव पाषाण काल का पहला ज्ञात स्थल है। यहाँ हुए खुदाई से यह पता चला है कि यह स्थान नव-पाषाण काल (2500-1345 ईसा पूर्व) तथा ताम्र युग में आबाद था। खुदाई में यहाँ से हडडियाँ, गेंहूँ की बालियाँ तथा पत्थर के औजार मिले हैं जिससे यह पता चलता है कि यहाँ बसे लोग कृषि, पशुपालन एवं आखेट में संलग्न थे। स्थानीय लोग चिरांद टीले को द्वापर युग में ईश्वर के परम भक्त तथा यहाँ के राजा मौर्यध्वज (मयूरध्वज) के किले का अवशेष एवं च्यवन ऋषि का आश्रम मानते हैं। 1960 के दशक में हुए खुदाई में यहाँ से बुद्ध की मूर्तियाँ एवं धम्म से जुड़ी कई चीजें मिली है जिससे चिरांद के बौद्ध धर्म से लगाव में कोई सन्देह नहीं।

मांझी : 

छपरा शहर से 20 किलोमीटर पश्चिम गंगा के उत्तरी किनारे पर 1400' x 1050' के दायरे में प्राचीन किले का अवशेष है। 30 फीट ऊँचे खंडहर में लगी ईंटे 18" x 10" x 3” की है। यहाँ से प्राप्त दो मूर्तियों को स्थानीय मधेश्वर मंदिर में रखी गई है। इनमें एक मूर्ति भूमि स्पर्श मुद्रा मे भगवान बुद्ध की है जो मध्य काल में बनी मालूम पड़ती है। टीले के पूर्व बने कम ऊँचाई वाले खंडहर को स्थानीय लोग राजा की कचहरी बुलाते हैं। अबुल फजल लिखित आईना-ए-अकबरी में मांझी को एक प्राचीन शहर बताया गया है। ऐसी धारणा भी है कि इस जगह का नाम चेरों राजा माँझी मकेर के नाम पर पड़ा है।

अंबा स्थान, आमी:

छपरा से 37 किलोमीटर पूर्व तथा दिघवारा से 4 किलोमीटर दूर आमी में प्राचीन अंबा स्थान है। दिघवारा का नाम यहाँ स्थित एक दीर्घ (बड़ा) द्वार के चलते पड़ा है। आमी मंदिर के पास एक बगीचे में कुँआ बना है जिसमें पानी कभी नहीं सूखता। इस कुएँ को राजा दक्ष का यज्ञ कुंड माना जाता है और नवरात्र (अप्रैल और अक्टुबर) के दिनों में दूर-दूर से लोग जल अर्पण करने आते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि माता भगवती ने यही पर आहुति दी थी जिसके बाद भोलेनाथ ने सती के जले शारीर को लेकर तांडव किया था।

दधेश्वरनाथ मंदिर: 

पारसगढ से उत्तर धोर आश्रम में पुरातात्विक महत्व के कई वस्तुएं दिखाई पड़ती है। गंडक के किनारे भगवान दधेश्वरनाथ मंदिर है जहाँ पत्थर का विशाल शिवलिंग स्थापित है।
गौतम स्थान: छपड़ा से ५ किलोमीटर पश्चिम में घाघरा के किनारे स्थित रिवीलगंज (पुराना नाम-गोदना) में गौतम स्थान है। यहाँ दर्शन शास्त्र की न्याय शाखा के प्रवर्तक गौतम ऋषि का आश्रम था। हिंदू लोगों में ऐसी आस्था है कि रामायण काल में भगवान राम ने गौतम ऋषि की शापग्रस्त पत्नी अहिल्या का उद्धार किया था। ऐसी ही मान्यता मधुबनी जिले में स्थित अहिल्यास्थान के बारे भी है।
बाबा शिलानाथ मंदिर: मढौरा से 28 किलोमीटर दूर सिल्हौरी के बारे में ऐसी मान्यता है कि शिव पुराण के बाल खंड में वर्णित नारद का मोहभंग इस स्थान पर हुआ था। प्रत्येक शिवरात्रि को बाबा शिलानाथ के मंदिर में जलार्पण करनेवाले भक्त यहाँ जमा होते हैं।

14 जनवरी 2014

धर्ममार्ग 2,00,000 से अधिक बार पढ़ा गया

110  देशों में लोकप्रियता के साथ सदस्यों कि संख्या पहुंची 164


आज मकर संक्रांति के पुण्य अवसर पर धर्ममार्ग का अब तक पाठकों कि संख्या 2,00,000  से ऊपर पहुँच चुकी है.. साथ ही इतने कम दिनों में सदस्यों कि संख्या 164  हो गई है जो बड़ी उपलब्धि है... धर्ममार्ग के सदस्यों और पाठको को मकर संक्रांति और इस उपलब्धि कि हार्दिक बधाई.. जय श्री राम, जय श्री कृष्णा, राधे राधे... जय माता दी... साथ ही सभी देवी देवताओं और भारत माता के चरणों में शत शत नमन.

राजेश मिश्रा

संचालक एवं सम्पूर्ण अधिकारी

सान्निध्य - तारकेश्वर मिश्रा (संपादक-प्रभात खबर, कोलकाता), शकुन त्रिवेदी (संपादक- द वेक), संजय अग्रवाल (संपादक- जगकल्याण)

11 जनवरी 2014

वसंत पंचमी : क्यों इतना खास है

वसंत पंचमी क्‍यों है खास...

वसंत पंचमी को लेकर देश के हर भाग में रौनक देखी जा रही है. ज्‍यादातर जगह के स्‍कूलों व कॉलेजों के अलावा घरों में भी विद्या की देवी की आराधना की तैयारी जोर-शोर से की जा रही है.

वसंत पंचमी क्‍यों है खास...
माना जाता है कि इसी दिन शब्दों की शक्ति मनुष्य की झोली में आई थी. इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है. इस दिन पितृ-तर्पण किया जाता है और कामदेव की पूजा की जाती है. सबसे महत्वपूर्ण विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. इस दिन पहनावा भी परंपरागत होता है. मसलन पुरुष लोग कुर्ता-पाजामा पहनते हैं, तो महिलाएं पीले रंग के कपड़े पहनती हैं. इस दिन गायन-वादन सहित अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं, जो कि देवी सरस्वती को अर्पित किए जाते हैं.

विद्या की देवी हैं सरस्‍वती
सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है. सरस्वती की वीणा संगीत की, पुस्तक विचार की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है. आम भाषा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है. पशु को मनुष्य बनाने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है. मान्यता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने के बाद मनुष्य की रचना की. मनुष्य की रचना के बाद उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य की रचना मात्र से ही सृष्टि की गति को संचालित नहीं किया जा सकता. उन्होंने अनुभव किया कि नि:शब्द सृष्टि का औचित्य नहीं है, क्योंकि शब्दहीनता के कारण विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था और अभिव्यक्ति के माध्यम के नहीं होने के कारण ज्ञान का प्रसार नहीं हो पा रहा था. इसके बाद उन्‍होंने विष्णु से अनुमति लेकर एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना की, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी.

माधुर्य व रस के कारण नाम पड़ा सरस्‍वती
शब्द के माधुर्य और रस से युक्त होने के कारण इनका नाम सरस्वती पड़ा. सरस्वती ने जब अपनी वीणा को झंकृत किया, तो समस्त सृष्टि में नाद की पहली अनुगूंज हुई. चूंकि सरस्वती का अवतरण माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ था, अत: इस दिन को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है.

जानिए सरस्वती पूजन की विधि...
सरस्वती पूजा के दिन लोग अपने-अपने घरों में माता की प्रतिमा की पूजा करते हैं. विभिन्न पूजा समितियों द्वारा भी सरस्वती पूजा के अवसर पर पूजा का भव्य आयोजन किया जाता है.

सरस्वती पूजा करते समय सबसे पहले सरस्वती माता की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखना चाहिए. इसके बाद कलश स्थापित करके गणेश जी तथा नवग्रह की विधिवत पूजा करनी चाहिए. इसके बाद माता सरस्वती की पूजा करनी चाहिए.

सरस्वती माता की पूजा करते समय उन्हें सबसे पहले आचमन और स्नान कराएं. इसके बाद माता को फूल, माला चढ़ाएं. सरस्वती माता को सिन्दुर, अन्य श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करनी चाहिए. बसंत पंचमी के दिन सरस्वती माता के चरणों पर गुलाल भी अर्पित किया जाता है. देवी सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं अत: उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं. सरस्वती पूजन के अवसर पर माता सरस्वती को पीले रंग का फल चढ़ाएं. प्रसाद के रूप में मौसमी फलों के अलावा बूंदिया अर्पित करना चाहिए. इस दिन सरस्वती माता को मालपुए और खीर का भी भोग लगाया जाता है.

सरस्वती पूजा में हवन
सरस्वती पूजा करने बाद सरस्वती माता के नाम से हवन करना चाहिए. हवन के लिए हवन कुण्ड अथवा भूमि पर सवा हाथ चारों तरफ नापकर एक निशान बना लेना चाहिए. अब इस भूमि को कुशा से साफ करके गंगा जल छिड़क कर पवित्र करें और यहां पर हवन करें. हवन करते समय गणेश जी, नवग्रह के नाम से हवन करें. इसके बाद सरस्वती माता के नाम से 'ओम श्री सरस्वतयै नम: स्वहा' इस मंत्र से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए. हवन के बाद सरस्वती माता की आरती करें और हवन का भभूत लगाएं.

सरस्वती की प्रतिमा का विसर्जन
माघ शुक्ल पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा के बाद षष्टी तिथि को सुबह माता सरस्वती की पूजा करने के बाद उनका विसर्जन कर देना चाहिए. संध्या काल में मूर्ति को प्रणाम करके जल में प्रवाहित कर देना चाहिए.

अक्षराभ्यास का दिन है वसंत पंचमी
वसंत पंचमी के दिन बच्चों को अक्षराभ्यास कराया जाता है. अक्षराभ्यास से तात्पर्य यह है कि विद्या अध्ययन प्रारम्भ करने से पहले बच्चों के हाथ से अक्षर लिखना प्रारम्भ कराना. इसके लिए माता-पिता अपने बच्चे को गोद में लेकर बैठें. बच्चे के हाथ से गणेश जी को पुष्प समर्पित कराएं और स्वस्तिवचन इत्यादि का पाठ करके बच्चे को अक्षराभ्यास करवाएं. मान्यता है कि इस प्रक्रिया को करने से बच्चे की बुद्धि तीव्र होगी.

वसंत पंचमी एक नजर में...
यह दिन वसंत ऋतु के आरंभ का दिन होता है. इस दिन देवी सरस्वती और ग्रंथों का पूजन किया जाता है. छोटे बालक-बालिका इस दिन से विद्या का आरंभ करते हैं. संगीतकार अपने वाद्ययंत्रों का पूजन करते हैं. स्कूलों और गुरुकुलों में सरस्वती और वेद पूजन किया जाता है. हिन्दू मान्यता के अनुसार वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है. इस दिन बिना मुहूर्त जाने शुभ और मांगलिक कार्य किए जाते हैं.

09 जनवरी 2014

संकटमोचन हनुमानाष्टक

Panchmukhi Sankatmochan

।। सियावर राम चन्द्र की जय, पवनपुत्र हनुमान की जय ।।

बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहुं लोक भयो अँधियारो
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो
देवन आनि करी विनती तब, छांड़ि दियो रवि कष्ट निहारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥1॥
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो
चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिये कौन विचार विचारो
कै द्घिज रुप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥2॥
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो
जीवत न बचिहों हम सों जु, बिना सुधि लाए इहां पगु धारो
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥3॥
रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो
चाहत सीय अशोक सों आगि सु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥4॥
बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो
लै गृह वैघ सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो
आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥5॥
रावण युद्घ अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिरडारो
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥6॥
बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो
देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो
जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समैत संहारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥7॥
काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥8॥


पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप ।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।

लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर
  बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर
 बोलो पवनसुत हनुमान कि जय ।

बजरंग - बाण

Bajrang Baan


निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करें सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ॥
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान॥
।। सियावर राम चन्द्र की जय, पवनपुत्र हनुमान की जय ।।
मंगल भवन अमंगलहारी द्रवउँ दशरथ अजर बिहारी ।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ सम संकट भारी ।।

हनुमत कवच का पाठ



दुर्गा कवच की तरह हनुमत कवच भी प्रतिदिन जपने से मनुष्य सुखी व निर्भय बना रहता है। स्वयं भगवान राम के रावण से युद्ध करते समय हनुमत कवच का पाठ किया था। यह कवच एक मुखी और पांच मुखी हनुमान से प्रार्थना के रुप में हैं। भगवान राम द्वारा पढ़े गए हनुमत कवच का भावार्थ इस प्रकार है। मनुष्य को सुवह शाम इस कवच का पाठ करना चाहिए जिससे वह भयमुक्त बना रहें। आजकल जिस संख्या में दुर्घटनाएं हो रही हैं। उसको देखते हुए हर मनुष्य को हनुमत कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह कवच भगवान राम द्वारा रचा गया है जो इस प्रकार है :

हनुमत कवच


हनुमान पूर्वत: पातु दक्षिणे पवनात्मज:।
पातु प्रतीच्यां रक्षोघ्न: पातु सागरपारग:॥1॥

उदीच्यामर्ूध्वत: पातु केसरीप्रियनन्दन:।
अधस्ताद् विष्णुभक्तस्तु पातु मध्यं च पावनि:॥2॥

लङ्काविदाहक: पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम्।
सुग्रीवसचिव: पातु मस्तकं वायुनन्दन:॥3॥

भालं पातु महावीरो भु्रवोर्मध्ये निरन्तरम्।
नेत्रे छायापहारी च पातु न: प्लवगेश्वर:॥4॥

कपोलौ कर्णमूले तु पातु श्रीरामकिङ्कर:।
नासाग्रमञ्जनीसूनु पातु वक्त्रं हरीश्वर:।
वाचं रुद्रप्रिय: पातु जिह्वां पिङ्गललोचन:॥5॥

पातु देव: फालगुनेष्टश्चिबुकं दैत्यदर्पहा।
पातु कण्ठं च दैत्यारि: स्कन्धौ पातु सुरार्चित:॥6॥

भुजौ पातु महातेजा: करौ च चरणायुध:।
नखान्नखायुध: पातु कुक्षिं पातु कपीश्वर:॥7॥

वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुध:।
लङ्काविभञ्जन: पातु पृष्ठदेशं निरन्तरम्॥8॥

नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मज:।
गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रिय:॥9॥

ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जन:।
जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबल:।
अचलोद्धारक: पातु पादौ भास्करसन्निभ:॥10॥

अङ्गानयमितसत्त्वाढय: पातु पादाङ्गुलीस्तािा।
सव्रङ्गानि महाशूर: पातु रोमाणि चात्मवित्॥11॥

हनुमत्कवचं यस्तु पठेद् विद्वान् विचक्षण:।
स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं च विन्दति॥12॥

त्रिकालमेककालं वा पठेन्मासत्रयं नर:।
सर्वानृरिपून् क्षणााित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥13॥

मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि।
क्षयाऽपस्मार-कुष्ठादितापत्रय-निवारणम्॥14॥

अश्वत्थमूलेऽर्क वारे स्थित्वा पठति य: पुमान्।
अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयं तथा॥15॥

बुद्धिर्बलं यशो धैर्य निर्भयत्वमरोगताम्।
सुदाढणर्यं वाक्स्फुरत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥16॥

मारणं वैरिणां सद्य: शरणं सर्वसम्पदाम्।
शोकस्य हरणे दक्षं वंदे तं रणदारुणम्॥17॥

लिखित्वा पूजयेद्यस्तु सर्वत्र विजयी भवेत्।
य: करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥18॥

स्थित्वा तु बन्धने यस्तु जपं कारयति द्विजै:।
तत्क्षणान्मुक्तिमाप्नोति निगडात्तु तथेव च॥19॥ 

‘‘ हे हनुमान जी पूर्व दिशा में पवनात्मज, दक्षिण दिशा में राक्षसों के विनाशक तथा समुद्र लांघनेवाला रक्षा करें। उत्तर दिशा में उध्र्व गमनशील केसरी प्रिय नंदन तथा नीचे विष्णु भक्त तथा मध्य में पावनि पवन पुत्र जी रक्षा करें। सीता शोक विनाशक अवांतर दिशाओं में तथा लंका विदारक समस्त आपत्तियों से निरंतर रक्षा करें। सुग्रीव सचिव मस्तक, वायु नंदन भाल तथा दोनों भौवों के मध्य भाग की महावीर जी रक्षा करें। दोनों नेत्रों की छाया पहारी तथा कपोलों की रक्षा प्लवगेश्वर तथा कर्ण मूल की श्री राम किंकरजी रक्षा करें। नासिका के अग्रभाग की रक्षा अंजनी सुत तथा वाणी की रुद्रप्रिय और जिह्ना की रक्षा पिंगल लोचन करें। दांतों की रक्षा फाल्गुणेष्ठ एवं दाढी के नीचे भाग की रक्षा दैत्य प्राणहर्ता तथा कंठ की दैत्यारि वे दोनों स्कंधों की श्री सुरपुजित रक्षा करें। महातेजस्वी दोनों भुजाओं व दोनों हाथों की रक्षा चरणायुध एवं नखों की रक्षा श्री नखायुध तथा कोख की रक्षा श्री कपीश्वर जी करें। मुद्रापहारी वक्षस्थल की तथा वक्षस्थल के आसपास भुजायुध जी रक्षा करें। लंका विनाश करने वाले श्री हनुमान जी सर्वदा पृष्ठ देश की रक्षा करें। श्री रामदूत नाभि की एवं अनिलात्मज कटि की माहाप्राज्ञ गुहयांगों की जंघाओं की रक्षा शिव प्रिय करें। जांघों के नीचे वाने भाग की रक्षा लंका प्रसाद भंजन करें। महाबाहु जंघाओं एवं घुटनों की रक्षा महाबली करें। चरणों की रक्षा भी पहाड उठाने वाले सूर्य के समान तेजस्वी करें तथा समस्त उंगलियों की रक्षा सर्व सत्वादय करें। समस्त अंगों की रक्षा महावीर जी करें।

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