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09 जनवरी 2014

हनुमत कवच का पाठ



दुर्गा कवच की तरह हनुमत कवच भी प्रतिदिन जपने से मनुष्य सुखी व निर्भय बना रहता है। स्वयं भगवान राम के रावण से युद्ध करते समय हनुमत कवच का पाठ किया था। यह कवच एक मुखी और पांच मुखी हनुमान से प्रार्थना के रुप में हैं। भगवान राम द्वारा पढ़े गए हनुमत कवच का भावार्थ इस प्रकार है। मनुष्य को सुवह शाम इस कवच का पाठ करना चाहिए जिससे वह भयमुक्त बना रहें। आजकल जिस संख्या में दुर्घटनाएं हो रही हैं। उसको देखते हुए हर मनुष्य को हनुमत कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह कवच भगवान राम द्वारा रचा गया है जो इस प्रकार है :

हनुमत कवच


हनुमान पूर्वत: पातु दक्षिणे पवनात्मज:।
पातु प्रतीच्यां रक्षोघ्न: पातु सागरपारग:॥1॥

उदीच्यामर्ूध्वत: पातु केसरीप्रियनन्दन:।
अधस्ताद् विष्णुभक्तस्तु पातु मध्यं च पावनि:॥2॥

लङ्काविदाहक: पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम्।
सुग्रीवसचिव: पातु मस्तकं वायुनन्दन:॥3॥

भालं पातु महावीरो भु्रवोर्मध्ये निरन्तरम्।
नेत्रे छायापहारी च पातु न: प्लवगेश्वर:॥4॥

कपोलौ कर्णमूले तु पातु श्रीरामकिङ्कर:।
नासाग्रमञ्जनीसूनु पातु वक्त्रं हरीश्वर:।
वाचं रुद्रप्रिय: पातु जिह्वां पिङ्गललोचन:॥5॥

पातु देव: फालगुनेष्टश्चिबुकं दैत्यदर्पहा।
पातु कण्ठं च दैत्यारि: स्कन्धौ पातु सुरार्चित:॥6॥

भुजौ पातु महातेजा: करौ च चरणायुध:।
नखान्नखायुध: पातु कुक्षिं पातु कपीश्वर:॥7॥

वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुध:।
लङ्काविभञ्जन: पातु पृष्ठदेशं निरन्तरम्॥8॥

नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मज:।
गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रिय:॥9॥

ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जन:।
जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबल:।
अचलोद्धारक: पातु पादौ भास्करसन्निभ:॥10॥

अङ्गानयमितसत्त्वाढय: पातु पादाङ्गुलीस्तािा।
सव्रङ्गानि महाशूर: पातु रोमाणि चात्मवित्॥11॥

हनुमत्कवचं यस्तु पठेद् विद्वान् विचक्षण:।
स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं च विन्दति॥12॥

त्रिकालमेककालं वा पठेन्मासत्रयं नर:।
सर्वानृरिपून् क्षणााित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥13॥

मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि।
क्षयाऽपस्मार-कुष्ठादितापत्रय-निवारणम्॥14॥

अश्वत्थमूलेऽर्क वारे स्थित्वा पठति य: पुमान्।
अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयं तथा॥15॥

बुद्धिर्बलं यशो धैर्य निर्भयत्वमरोगताम्।
सुदाढणर्यं वाक्स्फुरत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥16॥

मारणं वैरिणां सद्य: शरणं सर्वसम्पदाम्।
शोकस्य हरणे दक्षं वंदे तं रणदारुणम्॥17॥

लिखित्वा पूजयेद्यस्तु सर्वत्र विजयी भवेत्।
य: करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥18॥

स्थित्वा तु बन्धने यस्तु जपं कारयति द्विजै:।
तत्क्षणान्मुक्तिमाप्नोति निगडात्तु तथेव च॥19॥ 

‘‘ हे हनुमान जी पूर्व दिशा में पवनात्मज, दक्षिण दिशा में राक्षसों के विनाशक तथा समुद्र लांघनेवाला रक्षा करें। उत्तर दिशा में उध्र्व गमनशील केसरी प्रिय नंदन तथा नीचे विष्णु भक्त तथा मध्य में पावनि पवन पुत्र जी रक्षा करें। सीता शोक विनाशक अवांतर दिशाओं में तथा लंका विदारक समस्त आपत्तियों से निरंतर रक्षा करें। सुग्रीव सचिव मस्तक, वायु नंदन भाल तथा दोनों भौवों के मध्य भाग की महावीर जी रक्षा करें। दोनों नेत्रों की छाया पहारी तथा कपोलों की रक्षा प्लवगेश्वर तथा कर्ण मूल की श्री राम किंकरजी रक्षा करें। नासिका के अग्रभाग की रक्षा अंजनी सुत तथा वाणी की रुद्रप्रिय और जिह्ना की रक्षा पिंगल लोचन करें। दांतों की रक्षा फाल्गुणेष्ठ एवं दाढी के नीचे भाग की रक्षा दैत्य प्राणहर्ता तथा कंठ की दैत्यारि वे दोनों स्कंधों की श्री सुरपुजित रक्षा करें। महातेजस्वी दोनों भुजाओं व दोनों हाथों की रक्षा चरणायुध एवं नखों की रक्षा श्री नखायुध तथा कोख की रक्षा श्री कपीश्वर जी करें। मुद्रापहारी वक्षस्थल की तथा वक्षस्थल के आसपास भुजायुध जी रक्षा करें। लंका विनाश करने वाले श्री हनुमान जी सर्वदा पृष्ठ देश की रक्षा करें। श्री रामदूत नाभि की एवं अनिलात्मज कटि की माहाप्राज्ञ गुहयांगों की जंघाओं की रक्षा शिव प्रिय करें। जांघों के नीचे वाने भाग की रक्षा लंका प्रसाद भंजन करें। महाबाहु जंघाओं एवं घुटनों की रक्षा महाबली करें। चरणों की रक्षा भी पहाड उठाने वाले सूर्य के समान तेजस्वी करें तथा समस्त उंगलियों की रक्षा सर्व सत्वादय करें। समस्त अंगों की रक्षा महावीर जी करें।

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