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22 जनवरी 2014

बिहार के पवित्र धार्मिक स्थल

जैन धर्म के 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर या महावीर का जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य (बिहार) में हुआ था। बिहार की राजधानी पटना सिख धर्म के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की जन्म स्थली रही है। मनेर शरीफ एक प्रसिद्ध मुस्लिम धार्मिक स्थान है, जो भारत के बिहार राज्य में स्थित है।

वर्धमान महावीर या महावीर

जैन धर्म के अनुयायिओं के लिए भी बिहार एक पवित्र धार्मिक स्थल है। जैन धर्म के 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर या महावीर का जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य (बिहार) में हुआ था। जैन धर्म के अनुयायिओं के लिए यहां का पावापुरी एक पवित्र स्थल है। यहां भगवान महावीर को परिनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी।

अगर आप वैशाली जा रहे हैं तो जल मंदिर जाना मत भूलें। यह मंदिर एक तालाब के बीचों-बीच बना हुआ है। इस मंदिर में मुख्यि पूज्यनीय वस्तु भगवान महावीर की चरण पादुका है। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान महावीर का अंतिम संस्काणर किया गया था। वैशाली के अलावा जैनियों के लिए राजगीर और नालंदा दोनों ही महत्वपूर्ण स्थल है। वर्धमान महावीर ने अपने जीवन के 14 साल इन दोनों जगह पर बिताए थे।

सिख स्थल-

सिख धर्म के दृष्टिकोण से भी बिहार राज्य का खास महत्व है। बिहार की राजधानी पटना सिख धर्म के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की जन्म स्थली रही है। यह स्थान सिख धर्मावलंबियों के लिए बहुत पवित्र है। प्रसिद्ध तख्त श्री पटना साहिब बिहार राज्य के पटना शहर में स्थित एक गुरुद्वारा है। सिखों के लिए हरमंदिर साहब पांच प्रमुख तख्तों में से एक है। यहां गुरु गोविंद सिंह से संबंधित अनेक प्रामाणिक वस्तु्एं रखी हुई हैं।

सूफी स्थल-

हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख के अलावा इस्लाम धर्म में भी बिहार राज्य का विशेष स्थान है। प्राचीन काल में मुगल शासकों के लिए बिहार सत्ता का केंद्र रहा है। बहुत से सूफी संतों के लिए बिहार एक अलग ही अहमियत रखता है। मनेर शरीफ एक प्रसिद्ध मुस्लिम धार्मिक स्थान है, जो भारत के बिहार राज्य में स्थित है। यह पटना के पश्चिम में तीस किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित है। माना जाता है कि मनेर शरीफ स्थान पर ही सूफी संत मखदूम दौलत ने वर्ष 1608 में अंतिम सांस ली थी। दूसरे पवित्र स्थलों में जहानाबाद का हजरत बीबी कमाल (भारत की पहली महिला सूफी संत) का कब्र, औरंगाबाद में अजमेर शरीफ का कब्र आदि हैं।

सोनपुर मेला

हाजीपुर के सामने सोनपुर में प्रत्येक वर्ष लगने वाला पशु मेला विश्व प्रसिद्ध है। सोनपुर एक नगर पंचायत और पूर्व मध्य रेलवे का मंडल है। इसकी प्रसिद्धि लंबे रेलवे प्लेटफार्म के कारण भी है। भागवत पुराण में वर्णित इस हरिहरक्षेत्र में गज-ग्राह की लडाई हुई थी जिसमें भगवान विष्णु ने ग्राह (घरियाल) को मुक्ति देकर गज (हाथी) को जीवनदान दिया था। उस घटना की याद में प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को गंडक स्नान तथा एक पक्ष तक चलनेवाला मेला लगता है। यहाँ बाबा हरिहरनाथ (शिव मंदिर) तथा काली मंदिर के अलावे अन्य मंदिर भी हैं। मेला के दिनों में सोनपुर एक सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बन जाता है।

चिरांद: 

छपरा से 11 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में डोरीगंज बाजार के निकट स्थित यह गाँव एक सारन जिले का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। घाघरा नदी के किनारे बने स्तूपनुमा भराव को हिंदू, बौद्ध तथा मुस्लिम प्रभाव एवं उतार-चढाव से जोड़कर देखा जाता है। भारत में यह नव पाषाण काल का पहला ज्ञात स्थल है। यहाँ हुए खुदाई से यह पता चला है कि यह स्थान नव-पाषाण काल (2500-1345 ईसा पूर्व) तथा ताम्र युग में आबाद था। खुदाई में यहाँ से हडडियाँ, गेंहूँ की बालियाँ तथा पत्थर के औजार मिले हैं जिससे यह पता चलता है कि यहाँ बसे लोग कृषि, पशुपालन एवं आखेट में संलग्न थे। स्थानीय लोग चिरांद टीले को द्वापर युग में ईश्वर के परम भक्त तथा यहाँ के राजा मौर्यध्वज (मयूरध्वज) के किले का अवशेष एवं च्यवन ऋषि का आश्रम मानते हैं। 1960 के दशक में हुए खुदाई में यहाँ से बुद्ध की मूर्तियाँ एवं धम्म से जुड़ी कई चीजें मिली है जिससे चिरांद के बौद्ध धर्म से लगाव में कोई सन्देह नहीं।

मांझी : 

छपरा शहर से 20 किलोमीटर पश्चिम गंगा के उत्तरी किनारे पर 1400' x 1050' के दायरे में प्राचीन किले का अवशेष है। 30 फीट ऊँचे खंडहर में लगी ईंटे 18" x 10" x 3” की है। यहाँ से प्राप्त दो मूर्तियों को स्थानीय मधेश्वर मंदिर में रखी गई है। इनमें एक मूर्ति भूमि स्पर्श मुद्रा मे भगवान बुद्ध की है जो मध्य काल में बनी मालूम पड़ती है। टीले के पूर्व बने कम ऊँचाई वाले खंडहर को स्थानीय लोग राजा की कचहरी बुलाते हैं। अबुल फजल लिखित आईना-ए-अकबरी में मांझी को एक प्राचीन शहर बताया गया है। ऐसी धारणा भी है कि इस जगह का नाम चेरों राजा माँझी मकेर के नाम पर पड़ा है।

अंबा स्थान, आमी:

छपरा से 37 किलोमीटर पूर्व तथा दिघवारा से 4 किलोमीटर दूर आमी में प्राचीन अंबा स्थान है। दिघवारा का नाम यहाँ स्थित एक दीर्घ (बड़ा) द्वार के चलते पड़ा है। आमी मंदिर के पास एक बगीचे में कुँआ बना है जिसमें पानी कभी नहीं सूखता। इस कुएँ को राजा दक्ष का यज्ञ कुंड माना जाता है और नवरात्र (अप्रैल और अक्टुबर) के दिनों में दूर-दूर से लोग जल अर्पण करने आते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि माता भगवती ने यही पर आहुति दी थी जिसके बाद भोलेनाथ ने सती के जले शारीर को लेकर तांडव किया था।

दधेश्वरनाथ मंदिर: 

पारसगढ से उत्तर धोर आश्रम में पुरातात्विक महत्व के कई वस्तुएं दिखाई पड़ती है। गंडक के किनारे भगवान दधेश्वरनाथ मंदिर है जहाँ पत्थर का विशाल शिवलिंग स्थापित है।
गौतम स्थान: छपड़ा से ५ किलोमीटर पश्चिम में घाघरा के किनारे स्थित रिवीलगंज (पुराना नाम-गोदना) में गौतम स्थान है। यहाँ दर्शन शास्त्र की न्याय शाखा के प्रवर्तक गौतम ऋषि का आश्रम था। हिंदू लोगों में ऐसी आस्था है कि रामायण काल में भगवान राम ने गौतम ऋषि की शापग्रस्त पत्नी अहिल्या का उद्धार किया था। ऐसी ही मान्यता मधुबनी जिले में स्थित अहिल्यास्थान के बारे भी है।
बाबा शिलानाथ मंदिर: मढौरा से 28 किलोमीटर दूर सिल्हौरी के बारे में ऐसी मान्यता है कि शिव पुराण के बाल खंड में वर्णित नारद का मोहभंग इस स्थान पर हुआ था। प्रत्येक शिवरात्रि को बाबा शिलानाथ के मंदिर में जलार्पण करनेवाले भक्त यहाँ जमा होते हैं।

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