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21 अप्रैल 2014

बद्रीनाथ

धरती पर बैकुंठ की यात्रा


श्री बद्रीनाथ धाम : Sri Badrinath Temple

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व भाग है जो पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह स्थल आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित गया था। देश की एकता और अखण्डता तथा हिन्दु धर्म के पुर्नस्थापना करने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल स्थापित किए गए-उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी।

भारत के उत्तर में स्थित यह मन्दिर भगवान विष्णु का दरबार माना जाता है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है।

जिसके दाहिने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है। आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा यहां एक मठ की भी स्थापना की गई थी। शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिएखुला रहता है। यहां पर 130 डिग्री सैल्सियस पर खौलता एक तप्त कुंड और सूर्य कुण्ड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

पंच बद्री या पांच बद्रियां

श्री बद्रीनाथ धाम में सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराध्य देव श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है।

श्री विशाल बद्री

श्री विशाल बद्री (श्री बद्रीनाथ में) विशाल बद्री के नाम से प्रसिद्घ मुख्य बद्रीनाथ मन्दिर, पंच बद्रियों में से एक है। इसकी देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात बद्रीनारायण नारद शिला के नीचे एक मूर्ति के रूप प्राप्त हुए। जिन्हें हम विशाल बद्री के नाम से जानते हैं।

श्री योगध्यान बद्री

श्री योगध्यान बद्री (पाण्डुकेश्वर में) 1500 वर्षो से भी प्राचीन योगध्यान बद्री का मन्दिर जोशीमठ तथा पीपलकोठी पर स्थित है। महाभारत काल के अंत में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के, कलियुग के� प्रभाव से बचने हेतु पाण्डव हिमालय की ओर आए और यही पर उन्होंने स्वर्गारोहण के पूर्व घोर तपस्या की थी।

श्री भविष्य बद्री

श्री भविष्य बद्री (जोशीमठ के पास) जोशीमठ के पूर्व में 17 कि.मी. की दूरी पर और तपोवल के सुबैन के पास भविष्य बद्री का मंदिर स्थित है। आदि ग्रंथों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

श्री वृद्घ बद्री

श्री वृद्घ बद्री (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) यह जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब कलियुग का आगमन हुआ तो भगवान विष्णु मंदिर में चले गये। यह मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। वृद्घ बद्री को आदि शंकराचार्य जी की मुख्य गद्दी माना जाता है।

श्री आदि बद्री

कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि.मी. दूर स्थित है। आदि बद्री को अन्य चार बद्रियों का पिता कहा जाता है। यहां 16 छोटे मंदिरों का समूह है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन मंदिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदि शंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शो के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत थे।

भौगोलिक स्थिति

चारों धामों में सर्वश्रेष्ठ हिन्दुओं का सबसे पावन तीर्थ बद्रीनाथ, नर और नारायण पर्वत श्रंखलाओं से घिरा, अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नीलकंठ पर्वत श्रंखला की पृष्ठभूमि पर स्थित है। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा चारों दिशाओं में से एक उत्तर में बद्रीनाथ धाम तीर्थस्थल की स्थापना की थी। 3,133 मी. की ऊंचाई पर स्थित 15 मी. ऊंचा बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 किमी, कोटद्वार से 327 किमी तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविधाजनक मार्गो से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रम्हकूप, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां के अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

पौराणिक मान्यताएं

बद्रीनाथ श्रद्घेय मंदिर पौराणिक गाथाओं, कथनों और घटनाओं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुर्खों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। गंगा की धारा बारह जल मार्गो में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। एक अन्य मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल बदरियाँ (जंगली बेरों) से भरा रहने के कारण इसको बद्री वन भी कहा जाता था। एक जनश्रुति के अनुसार पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉडर के अन्तिम गांव माण से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

ऐतिहासिक तथ्य

बद्रिनाथ मन्दिर का निर्माण 8 वीं सदी के बुद्घिजीवी संत आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा किया गया था। यह मन्दिर बर्फीले तुफानों के कारण कई बार क्षति ग्रस्त हुआ और पुनर् स्थापित किया गया है। सन् 1939 से पूर्व� श्री बदरीनाथ� मन्दिर के समस्त अधिकार इस मन्दिर के रावल के पास थे। परन्तु सन् 1939 में अंग्रेजी सरकार एवं तत्कालीन महाराजा टिहरी द्वारा श्री बद्रीनाथ मन्दिर समिति का गठन श्री बदरीनाथ एवं इनके अधीनस्थ मन्दिरों के रखरखाव तथा प्रबंधन के उद्देश्य से किया गया। अब इनका प्रबन्धन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति करती है।

कैसे पहुंचे

रेल परिवहन
बद्रीनाथ के सबसे समीपस्थ रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो यहां से मात्र 297 किमी. दूर स्थित है। ऋषिकेश भारत के प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली और लखनऊ आदि से सीधे तौर पर रेलवे से जुड़ा है। दिल्ली से रेल द्वारा बद्रीनाथ पहुंचने के लिए दो रूट का प्रयोग यात्रियों द्वारा किया जा सकता है। दिल्ली से ऋषिकेश-287 किमी., दिल्ली से कोटद्वार-300 किमी.

वायु मार्ग

बद्रीनाथ के लिए सबसे नजदीक स्थित जोली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून है जो वहां मात्र 314 किमी. की दूरी पर स्थित है। देहरादून से भारत के अन्य प्रमुख शहरों के लिए हवाई सेवा उपलब्ध है। बद्रीनाथ से सबसे समीप स्थित अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट इंदिरा गांधी एयरपोर्ट है।

सड़क परिवहन

उत्तरांचल स्टेट ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन दिल्ली-ऋषिकेश के लिए नियमित तौर पर बस सेवा उपलब्ध कराता है। इसके अलावा प्राइवेट ट्रांसपोर्ट भी बद्रीनाथ सहित अन्य समीपस्थ हिल स्टेशनों के लिए बस सेवा मुहैया कराता है। प्राइवेट टैक्सी और अन्य साधनों को किराए पर लेकर ऋषिकेश से बद्रीनाथ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
ऋषिकेश- 297 किमी.
देहरादून- 314 किमी.
कोटद्वार- 327 किमी.
दिल्ली- 395 किमी.

कहां रुके

बद्रीनाथ और जोशीमठ दोनों स्थानों पर तीर्थयात्रियों के रुकने हेतु विभिन्न प्रकार के होटल और धर्मशालाएं सस्ती दर पर उपलब्ध है।

होटल देवलोक, झुनझुनवाला कॉटेज, मोदी भवन, मित्तल कॉटेज, चंद कॉटेज, बद्रीश सदन, काली कमली धर्मशाला, जल निगम रेस्ट हाउस और फॉरेस्ट रेस्ट हाउस आदि यात्रियों के रूकने के लिए पर्याप्त स्थान उपल्ब्ध है।

उत्तरांचल सरकार अपने यात्रियों के लिए पर्यटन सूचना सुविधा भी उपलब्ध कराता है। इनके अलावा यहां विभिन्न रियायती दरों पर प्राइवेट होट्ल्स भी उपलब्ध है।

Rajesh Mishra tour on Badyanath Dham Deoghar

परशुराम जयंती | Parshuram Jayanti

भगवान परशुराम : Lord Parshuram

राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र,परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे. परशुराम भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. वह एक परम ज्ञानी तथा महान योद्धा थे इन्ही के जन्म दिवस को परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में बहुत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है.भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर देश भर में हवन, पूजन, भोग एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है तथा परशुराम जी शोभा यात्रा निकली जाती है. विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूर्व नाम तो राम था, परंतु को भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए.

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार के रूप में अवतरित हुए थे धर्म ग्रंथों के आधार पर परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्लतृतीया को हुआ था जिसे परशुराम जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन व्रत करने और पर्व मनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था. परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी.

भगवान परशुराम जयंती महत्व | Significance of Parshuram Jayanti


वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि त्रेतायुग आरम्भ की तिथि मानी जाती है और इसे अक्षय तृतीया भी कहते है इसी दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था. भागवत अनुसार हैहयवंश राजाओं के निग्रह के लिए अक्षय तृतीया के दिन जन्म परशुराम जी का जन्म हुआ. जमदग्नि व रेणुका की पांचवी सन्तान रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरीत होते हैं इनके चार बड़े भाई रूमण्वन्त, सुषेण, विश्व और विश्वावसु थे अक्षय तृतीया को भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था जिस कारण यह परशुराम जयंती के नाम से विख्यात है.

भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य रहा. परशुराम जी तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष रहे. परशुराम जी अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे उन्होंने दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की हर प्रकार से रक्षा व सहायता की. भगवान परशुराम जी की जयंती की अक्षततिथि तृतीया का भी अपना एक अलग महत्त्व है. इस तारीख को किया गया कोई भी शुभ कार्य फलदायक होता है. अक्षत तृतीया तिथि को शुभ तिथि माना जाता है इस तिथि में बिना योग निकाले भी कार्य होते हैं. भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. प्राचीन ग्रंथों में इनका चरित्र अलौकिक लगता है. महर्षि परशुराम उनका वास्तविक नाम तो राम ही था जिस वजह से यह भी कहा जाता है कि ‘राम से पहले भी राम हुए हैं’.

परशुराम जन्म कथा । Parshuram Katha


भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

पोराणिक काल में महिष्मती नगरी पर हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था. वह बहुत अत्याचारी शासक था. जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता, भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वह धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे इस प्रकार भगवान, परशुराम रूप में जन्म लेते हैं और पृथ्वी पर से पापियों का नाश कर देते हैं.

परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये थे. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका और तब परशुराम जी ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी का दान कर दिया और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगते हैं.

Rajasthan (Jaipur, Ringas, KhatuDham) Jate
samay Train men Shyam Baba ke Manohari
Sringar ke Samaksha Rajesh Mishra 

18 अप्रैल 2014

अक्षय तृतीया : कब और केसे मनाएं..

अक्षय तृतीया (आखा तीज) का महत्व और मान्यताएं….



अक्षय तृतीया पर्व को कई नामों से जाना जाता है. इसे आखातीज और वैशाख तीज भी कहा जाता है.इस पर्व को भारतवर्ष के खास त्यौहारों की श्रेणी में रखा जाता है.इस दिन रोहिणी नक्षत्र तथा मिथुन राशि का चन्द्रमा रहेगा..

भारतीय काल गणना के अनुसार चार स्वयंसिद्ध अभिजित् मुहूर्त है -
1. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा)।
2. आखातीज (अक्षय तृतीया)।
3. दशहरा।
4. दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।


वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को “अक्षय तृतीया” या “आखा तृतीया” अथवा “आखातीज” भी कहते हैं। “अक्षय” का शब्दिक अर्थ है – जिसका कभी नाश (क्षय) न हो अथवा जो स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि “ईश्वर तिथि” है। इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है।

परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है। अत: यह तिथि “चिरंजीवी तिथि” भी कहलाती है। चारों युगों – सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग का आरंभ इसी आखातीज से हुआ है जिससे इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि “युर्गाद तिथि” भी कहते हैं।

अंकों में विषम अंकों को विशेष रूप से ’3′ को अविभाज्य यानी ‘अक्षय’ माना जाता है। तिथियों में शुक्ल पक्ष की ‘तीज’ यानी तृतीया को विशेष महत्व दिया जाता है। लेकिन वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को समस्त तिथियों से इतर विशेष स्थान प्राप्त है।

‘अक्षय तृतीया’ के रूप में प्रख्यात वैशाख शुक्ल तीज को स्वयं सिद्ध मुहुर्तों में से एक माना जाता है।पौराणिक मान्यताएं इस तिथि में आरंभ किए गए कार्यों को कम से कम प्रयास में ज्यादा से ज्यादा सफलता प्राप्ति का संकेत देती है। सामन्यतया अक्षय तृतीया में 42 घरी और 21 पल होते हैं। पद्म पुराण अपराह्म काल को व्यापक फल देने वाला मानता है। भौतिकता के अनुयायी इस काल को स्वर्ण खरीदने का श्रेष्ठ काल मानते हैं। इसके पीछे शायद इस तिथि की ‘अक्षय’ प्रकृति ही मुख्य कारण है। यानी सोच यह है कि यदि इस काल में हम यदि घर में स्वर्ण लाएंगे तो अक्षय रूप से स्वर्ण आता रहेगा। अध्ययन या अध्ययन का आरंभ करने के लिए यह काल सर्वश्रेष्ठ है।अक्षय तृतीया कुंभ स्नान व दान पुण्य के साथ पितरों की आत्मा की शांति के लिए अराधना का दिन भी माना गया है।

स्वयंसिद्ध मुहूर्त—–

भारतीय ज्योतिषशास्त्र में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त घोषित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है।अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं..
तिथि का उन लोगों के लिए विशेष महत्व होता है। जिनके विवाह के लिए गृह-नक्षत्र मेल नहीं खाते। शुभ तिथि पर सैकड़ों लोग दांपत्य जीवन में बंधेगे। साथ ही अन्य शुभ कार्य भी होंगे।
हिंदू रीति-रिवाज में गृह नक्षत्रों का विशेष महत्व होता है। सदियों से हर काम शुभ मुहुर्त में किए जाने का प्रावधान रहा है। चाहे वह गृह प्रवेश हो, बच्चे का नाम करण संस्कार हो, शादी हो या अन्य चीजें। जिसके पीछे व्यक्ति का मुख्य उदेश्य होता है कि किए गए काम में कोई बाधा न आए। शुभ मुहुर्त की तलाश में कई बार लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ जाता है। जिसका कारण है कि कभी शनि, कभी मंगल को कभी गुरू सही दिशा में नहीं होता। कई लोगों का गृह-नक्षत्र ऐसा होता है कि काफी तलाश करने के बाद भी उन्हें कोई शुभ मुहुर्त नहीं मिलता।

ऐसे लोगों को इंतजार होता है अक्षय तृतिया के शुभ मुहुर्त का। जिस दिन किया गया हर काम शुभ होता है। इस दिन गृह नक्षत्रों का दोष नहीं होता। महीनों से शुभ मुहुर्त का इंतजार करने वालों के लिए घड़ी नजदीक आ गई है।
इस तिथि पर गृह नक्षत्रों के मिलान का अर्थ नहीं होता। अक्षय का मतलब होता है कभी क्षय न होने वाला। मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है वह हमेशा बना रहता है। इस तिथि का इंतजार उन लोगों को ज्यादा होता है जिनके गृह नक्षत्र किसी भी तिथि पर मेल नहीं खाते। जिन्हें दांपत्य जीवन में बंधना होता है या अन्य कोई शुभ कार्य करना होता है उनके लिए यह तिथि शुभ होती है। इस दिन किसी प्रकार का दोष नहीं होता। बच्चे की शादी के लिए शुभ मुहुर्त की तलाश, गृह-नक्षत्रों के मेल न खाने के कारण लंबे समय तक कोई शुभ मुहुर्त नहीं मिलना। एसे में अक्षय तृतिया की शुभ तिथि का इंतजार रहता है।कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।

पूरे भारत वर्ष में अक्षय तृतीया की खासी धूम रहती है. हए कोई इस शुभ मुहुर्त के इंतजार में रहता है ताकी इस समय किया गया कार्य उसके लिए अच्छे फल लेकर आए. मान्यता है कि इस दिन होने वाले काम का कभी क्षय नहीं होता अर्थात इस दिन किया जाने वाला कार्य कभी अशुभ फल देने वाला नहीं होता. इसलिए किसी भी नए कार्य की शुरुआत से लेकर महत्वपूर्ण चीजों की खरीदारी व विवाह जैसे कार्य भी इस दिन बेहिचक किए जाते हैं.

नया वाहन लेना या गृह प्रेवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं. मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है. इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं.

अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।

बताते हैं कि धरती पर देवताओं ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था। इस दिन भगवान विष्णु के चरणों से धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है।

शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है।

“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गङग्या समम्।।”


वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें प़डने वाली अक्षय तृतीय के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। भारतवर्ष संस्कृति प्रधान देश है। हिन्दू संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं संस्कृति का सवंहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा सरंक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-पर्वो का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथभ्रष्ट होने से बचाया है।वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण तथा भविष्य पुराण आदि में मिलता है।

यह समय अपनी योग्यता को निखारने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए उत्तम है। यह मुहूर्त अपने कर्मों को सही दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। शायद यही मुख्य कारण है कि इस काल को ‘दान’ इत्यादि के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।

‘वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथी को आखातीज के रुप मेँ मनाया जाता है भारतीय जनमानस मेँ यह तिथी अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्ध है
पुराणोँ के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान,दान,जप,स्वाध्याय आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है इस तिथी में किये गए शुभ कर्मोँ का कभी क्षय नँही होता है इसको सतयुग के आरम्भ की तिथी भी माना जाता है इसलिए इसे’कृतयुगादि’ तिथी भी कहते है
यदि इसी दिन बुधवार और रोहिणी नक्षत्र हो तो वह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है
मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा सँतान भी अक्षय बनी रहती है इस दिन दीन दुःखीयोँ की सेवा करना,वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्मोँ की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन ओर अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए|ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म मेँ समृद्धि ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है
भविष्य पुराण मेँ दिये गये एक प्रसँग के अनुसार शाकल नगर रहने वाले एक वणिक नामक धर्मात्मा अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान ध्यान ओर दान कर्म किया करता था जबकि उसकी भार्या उसको मना करती थी,मृत्यू के बाद किये गये दान पुण्य के प्रभाव से वणिक द्वारकानगरी मेँ सर्वसुख सम्पन्न राजा के रुप मेँ अवतरित हुआ|
अक्षय तृतीया को पवित्र तिथी माना गया है इस दिन गँगा यमुना आदि पवित्र नदियोँ मेँ स्नान करके श्रद्धा भाव से अपने सामर्थ्य के अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पँखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है

दान को वैज्ञानिक तर्कों में उर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है। दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है। यदि अक्षय तृतीया सोमवार या रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है, ऐसी मान्यता है। इस दिन प्राप्त आशीर्वाद बेहद तीव्र फलदायक माने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। सतयुग, त्रेता और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ और इसी तिथि को द्वापर युग समाप्त हुआ था।

रेणुका के पुत्र परशुराम और ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। इस दिन श्वेत पुष्पों से पूजन कल्यामकारी माना जाता है। धन और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। धन प्राप्ति के मंत्र, अनुष्ठान व उपासना बेहद प्रभावी होते हैं। स्वर्ण, रजत, आभूषण, वस्त्र, वाहन और संपत्ति के क्रय के लिए मान्यताओं ने इस दिन को विशेष बताया और बनाया है। बिना पंचांग देखे इस दिन को श्रेष्ठ मुहुर्तों में शुमार किया जाता है।
दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है।

मृत्यु के बाद जब अन्य लोक में जाना पड़ता है तब उस धन से दिया गया दान विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। पुनर्जन्म लेकर जब धरती पर आते हैं तब भी उस कोष में जमा धन के कारण धरती पर भौतिक सुख एवं वैभव प्राप्त होता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन स्वर्ण, भूमि, पंखा, जल, सत्तू, जौ, छाता, वस्त्र कुछ भी दान कर सकते हैं। जौ दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है।

भारतीय परिवेश में अक्षय तृतीया का महत्व:—-

1. बद्रीनारायण – दर्शन तिथि :— इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। दर्शनार्थियों एवं भक्तों की अपार भी़ड रहती है। भक्तों के द्वारा इस दिन किए हुए पुण्य कर्म, त्याग, दान, दक्षिणा, जप-तप, होम-हवन, गंगा-स्नान आदि कार्य अक्षय की गिनती में आ जाते हैं। भगवान भक्तों का प्रसाद प्रेम से ग्रहण करते हैं।
2. वृंदावन में श्रीबिहारी जी के दर्शन :—– अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं। देश के कौने-कौन से श्रद्धालु भक्त जन चरण दर्शन के लिए वृंदावन पधारते हैं।
3. आत्म-विश्लेषण तथा आत्म निरीक्षण तिथि:—- यह दिन हमें स्वयं को टटोलने के लिए आत्मान्वेषण, आत्मविवेचन और अवलोकन की प्रेरणा देने वाला है। यह दिन “निज मनु मुकुरू सुधारि” का दिन है। क्षय के कार्यो के स्थान पर अक्षय कार्य करने का दिन है। इस दिन हमें देखना-समझना होगा कि भौतिक रूप से दिखाई देने वाला यह स्थूल शरीर, संसार और संसार की समस्त वस्तुएं क्षय धर्मा है, अक्षय धर्मा नहीं है। क्षय धर्मा वस्तुएं – असद्भावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती है जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में आसुरीवृत्ति कहा है जबकि अक्षय धर्मा सकारात्मक चिंतन-मनन हमें दैवी संपदा की ओर ले जाता है। इससे हमें त्याग, परोपरकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं अर्थात् व्यक्ति को दिव्य गुणों की प्राçप्त होती है। इस दृष्टि से यह तिथि हमें जीवन मूल्यों का वरण करने का संदेश देती है – “सत्यमेव जयते” की ओर अग्रसर करती है।
4. नवान्न का पर्व :—- वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत बहुश्रुत और बहुमान्य है। बुन्देलखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक ब़डी धूमधाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्याएं अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बांटती है औरा गीत गाती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।
5. परशुराम जयंती :—-इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। श्री परशुरामजी प्रदोष काल में प्रकट हुए थे इसलिए यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाए तो उस दिन “अक्षय तृतीया”, “नर-नारायण जयंती”, “हयग्रीव जयंती” सभी संपन्न की जाती है। इसे “परशुराम तीज” भी कहते हैं। अक्षय तृतीया ब़डी पवित्र और सुख सौभाग्य देने वाली तिथि है।
6. सामाजिक पर्व के रूप में अक्षय तृतीया :— आखा तीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं।
7. कृषि उत्पादन के संबंध में अक्षय तृतीया :—- किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। इस संबंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित है।



दान के पर्व के रूप में :—-
अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है। इस दिन अपनी सामथ्र्य के अनुसार अधिक से अधिक दान-पुण्य करना चाहिए। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है। अक्षय ग्रंथ गीता : गीता स्वयं एक अक्षय अमरनिधि ग्रंथ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्व और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिए। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है।



पर्व के विविध रूप—-
अक्षय तृतीया का पर्व देश के विभिन्न प्रांतों में विविध प्रकार से मनाया जाता है। मालवा (उज्जैन-इंदौर) में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपल्लव रखकर लोग अपने कुल देवता या इष्टदेव का पूजन करते हैं।

भारतीय कृषक इसी दिन से अपने नए कृषि-वर्ष का शुभारंभ मानकर इसे ‘नवान्न पर्व’ के रूप में मनाते हैं। इस दिन दूध से बने व्यंजन, गुड़, चीनी, दही, चावल, खरबूजे, तरबूज और लड्डुओं का दान भी दिया जाता है।

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से पूर्णिमा तक युवतियां एक विशेष पर्व मनाती है, जिसे सतन्जा कहा जाता है। इस दिन लड़कियां सात तरह के अनाजों से देवी पार्वती की पूजा करती हैं।

राजस्थान में अक्षय तृतीया के दिन वर्षा ज्ञान के लिए शकुन निकाला जाता है तथा अछी वर्षा के लिए लड़कियां शकुन गीत गाती है। दक्षिण भारत में यह धारणा है कि अक्षय तृतीया के दिन सोना या इसके आभूषण खरीदने से घर में सदा सुख-समृद्धि रहती है।

क्यों पूजनीय है पीपल का वृक्ष?

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है- ‘वृक्षों में मैं पीपल हूं।’ इसीलिए इसे ऐसा दिव्य वृक्ष माना गया है, जिसकी जड़ से लेकर पलियों तक तैंतीस करोड़ देवताओं का वास होता है। शनिवार को पीपल की जड़ के नीचे जल चढ़ाने, दीप जलाने और उसकी सात बार परिक्रमा करने से शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर हो जाते हैं। गौतम बुद्ध को इस वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह एकमात्र ऐसा वृक्ष है, जो वायुमंडल में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन छोड़ता है। आयुर्वेद की दृष्टि से भी पीपल अनेक औषधीय गुणों से भरपूर है। इन्हीं गुणों के कारण पीपल का वृक्ष पूजनीय माना जाता है।

सावधान–एक गलत विचार-मानसिकता/धारणा—

यह मान्यता है कि रजस्वला होने के पूर्व ही कन्या (पुत्री) का कन्यादान कर दिया जाए तो उस से बड़ा दान कुछ नहीं होता। नतीजा यह है कि इन धारणाओं ने आखा तीज को विवाह के लिए अबूझ सावा (विवाह मुहूर्त) बना दिया है। इस दिन थोक में बाल विवाह होते हैं। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात मध्य प्रदेश और कुछ अन्य प्रांतों में बहुत बड़ी संख्या में बालविवाह होते रहे हैं। ऐसा करना अभिशाप हें.

बाल विवाहों का अनिवार्य परिणाम यह सामने आया कि विवाह संबंधी विवादों में भारी वृद्धि हुई। कुछ भी होता है कि लड़की को पिता के घर रोक लिया जाता है, और फिर धारा 125 दं.प्र.सं. में भरणपोषण के मुकदमे से विवाद का अदालत में आरंभ हो जाता है। अब तो अनेक माध्यम हैं जिन के जरिए अदालत जाया जा सकता है।
सब से बड़ा अंतर्विरोध है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में किसी भी बाल विवाह को अवैध नहीं माना जाता। एक बार संपन्न हो जाने के उपरांत विवाह वैध हो जाता है और उसे बाल विवाह होने के कारण अवैध, अकृत, या शून्य घोषित नहीं किया जा सकता है।

एक और तो यह स्थिति है, दूसरी और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ने बाल विवाह को अपराधिक कृत्य बनाया हुआ है और सजाओं का प्रावधान किया है, इसे विधि की विडम्बना कहा जाए या फिर विधायिका द्वारा निर्मित विधियों से विधिशास्त्र में उत्पन्न किया गया अंतर्विरोध।

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में 18 से कम आयु की स्त्री और 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष के विवाह को वर्जित घोषित किया गया है और ऐसा विवाह करने वाले 18 से अधिक और 21 वर्ष से कम आयु के और उस से अधिक आयु के लड़के को अलग अलग दंडों का भागी घोषित किया गया है। इसी विवाह को कराने वाले पुरोहित और माता-पिता के लिए भी दंडों का विधान किया गया है। इस तरह एक ऐसा कृत्य जिस को करने और कराने वाले वयस्क व्यक्तियों को अपराधी कहा गया है उसी कृत्य के परिणाम विवाह को वैध करार दिया गया है।

हिन्दू विवाह और अन्य किसी भी व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत संपन्न बाल विवाह को हर स्थिति में वैध माना गया है। ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों को वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि अन्य विवाहों से उत्पन्न संतानों को प्राप्त हैं।

08 अप्रैल 2014

राम जी का भजन एवं हनुमान जी का भजन (वीडीओ)

Ramji Ka Bhajan Evam Hanman ji ka Bhajan (VDO)

आज रामनवमी है और कुछ ही दिन बाद हनुमान जयंती भी है... आज सुबह-सुबह मन मंदिर में ख्याल आया फेसबुक पर लाइक और कमेंट कि बजाय क्यों न अपने सदस्यों और पाठको को रामजी और हनुमानजी के अच्छे भजन दिखाया जाये.. बस मैं भगवान् श्रीराम जी और हनुमान जी का नाम लेकर हाजिर हो गया अच्छे भजनों के साथ... जय श्री राम... जय श्री हनुमान... 

राजेश मिश्रा 


BHAYE PRAGAT KRIPALA DINDYALA.... 

SRI RAM CHANDRA KRIPALU BHAJMAN....

TERA RAMJI KARENGE BERA PAR....



SITA RAM SITA RAM KAHIYE JAHI BIDHI RAKHE RAM.....

RAM RAM SITA RAM (RAM DHUN)....

HANUMAN BHAJAN

Aaj Hanuman Jayanti hai...
Aana pawan kumar hamare har kirtan men...


Pawan Tanay Kalyan karo....


Hey Hanuman Tera kya kahna...



Ram Bhi Milenge Tujhe Shyam bhi milenge...


Ram Na Milenge Hanuman ke Bina.....


Ant men Hanuman Chalisa, Hanumashtak, Bajrang Baan






प्रभु श्री राम एवं हनुमान जी का फ़िलहाल इतना ही भजन का आनंद उठायें....
राजेश मिश्रा

05 अप्रैल 2014

!!!जनेऊ पहनने से क्या लाभ ?



पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है। 
शौचविधि करनेसे पूर्व, जनेऊ दाहिने कानपर क्‍यों लपेटें ?
अपनी अशुद्ध अवस्था सूचित करनेके लिए यह कृति उपयोगी प्रमाणित होती है । हाथ-पैर धोकर, कुल्ला करनेके उपरांत जनेऊ कानसे हटाएं । इसका आधारभूत शास्त्रीय कारण यह है कि, शरीरके नाभिप्रदेशसे ऊपरका भाग धार्मिक क्रियाओंके लिए पवित्र है, जबकि उससे नीचेका भाग अपवित्र माना गया है ।

सारणी -
१. मलमूत्र-त्याग कहां न करें ? उसका आधारभूत शास्त्र क्या है ?
१.१ सडकपर मलमूत्र-त्याग क्‍यों न करें ?
१.२ जोती हुई भूमिपर मलमूत्र-त्याग क्‍यों न करें ?
१.३ बमीठेके आस-पास मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.४ गौशालामें मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.५ जलमें मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.६ जलाशयसे दस हाथ दूरतक मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.७ जीर्ण देवालयमें मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.८ यज्ञवेदी व भस्मके स्थानपर मलमूत्र-त्याग न करें ।
१.९ अग्नि, सूर्य, चंद्र, जल, ब्राह्मण व गायके समक्ष मलमूत्र-त्याग न करें ।
२. मलमूत्र-त्याग कैसे करें ? उसका आधारभूत शास्त्र क्या है ?
२.१ शरीरपर वस्त्र धारण किए हुए व मस्तकपर वस्त्र लपेटे हुए मलमूत्रका त्याग करें ।
२.२ लघुशंका व शौचविधि करनेसे पूर्व, जनेऊ दाहिने कानपर लपेटें ।
२.३ काल, दिशा व मलमूत्र-त्याग
२.४ उकडूं बैठकर मलमूत्र-त्याग करें ।
२.५ लघुशंका व शौचविधिके समय मौन-पालन करें ।
३. मल-मूत्रत्यागके उपरांत इंद्रिय जलसे धोएं ।
४. फ्रांसीसी वैज्ञानिकके शोधका निष्कर्ष - मूत्रत्यागकी हिंदुओंकी पद्धति उत्तम व स्वास्थ्यप्रद.
१. मलमूत्र-त्याग कहां न करें ? उसका आधारभूत शास्त्र क्या है ?
१.१ सडकपर मलमूत्र-त्याग क्‍यों न करें ?
शास्त्र : सडकपर मलमूत्र-त्याग करनेसे क्षेत्र रज-तमात्मक वायु-मंडलसे आवेशित होना तथा अनिष्ट शक्तियोंका संचार बढना : ‘सडकसे अनेक पथिक मार्गक्रमण करते हैं । मार्गपर मलमूत्र-त्याग जैसी रज-तमजन्य कृति करनेपर पथिक रज-तमात्मक वायुमंडलसे आवेशित होते हैं । ऐसेमें ये पथिक जिस क्षेत्रमें जाते हैं, उसे भी अपने संसर्गसे रज-तमसे प्रभावित करते हैं । इस प्रकार अनेक क्षेत्र दूषित हो जाते हैं; इसलिए सडकपर मलमूत्र-त्याग न करें । यह कृति समष्टि पापका मूल कारण है । ऐसे रज-तमात्मक क्षेत्रमें अनिष्ट शक्तियोंका संचार भी बढ जाता है, इससे सभीको कम-अधिक मात्रामें कष्ट भोगना पडता है ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ७.१२.२००७, दोपहर १२.५०)
सडकपर पडे मलमूत्रको न लांघनेका उपदेश भी क्या इसी कारणसे दिया जाता है ?
एक विद्वान : ‘लांघनेकी प्रक्रिया स्वयं वायुधारणात्मक (वायुधारणात्मक अर्थात् वायुतत्त्वसंबधी) क्रियासे संबंधित है, इसलिए इस वायुके सूक्ष्म-नादके प्रवाहकी ओर मूत्रके रज-तमात्मक स्पंदन तत्काल आकृष्ट होते हुए, वायुजन्य रिक्त स्थानमें समा जाते हैं । इसलिए मूत्र लांघनेवाले जीवके आस-पास रज-तमात्मक तरंगोंसे युक्त वायु-आवेशित क्षेत्र तैयार होता है । अनिष्ट शक्तियां भी वायुरूप होती हैं, इसलिए उनके निवासके लिए यह क्षेत्र पूरक है; अतएव सडकपर पडे मल-मूत्रको न लांघें ।’ (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २५.१२.२००७, सायं. ७.४५)
१.२ जोती हुई भूमिपर मलमूत्र-त्याग क्‍यों न करें ?
शास्त्र : जोती हुई भूमिपर मलमूत्र-त्याग करनेसे भूमिके शक्तिरूपी चेतनातत्त्वका हरण होते हुए भूमि अनुपजाऊ बनती है : ‘जोती हुई भूमिमें सुप्त शक्तिरूपी भूगर्भ तरंगें कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंके उत्सर्जनसे वह विशिष्ट वायुमंडल भूगर्भतरंगोंसे आवेशित होता है । ये भूगर्भतरंगें बीजमेंसे निकलनेवाले अंकुररूपी पोषणके लिए पूरक होती हैं (अर्थात् अंकुरके लिए पोषक होती हैं ) । भूगर्भतरंगोंसे आवेशित क्षेत्रको ही ‘उपजाऊ भूमि’ की संज्ञा दी जाती है । ऐसी भूमिमें मलमूत्र-त्याग जैसी अपवित्र कृति न करें । इस कृतिके कारण भूमिसे संलग्न रज-तमात्मक तरंगोंका वायुमंडल निर्माण हो जाता है, जिससे भूमिकी सात्त्विकता घटते हुए वह बंजर बनती है व अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणसे प्रभावित हो सकती है । जोती हुई भूमिपर मलमूत्र-त्याग करनेसे भूमिके शक्तिरूपी चेतनातत्त्वका ही क्षय हो जाता है ।
१.३ बमीठेके आस-पास मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : बमीठेपर मलमूत्र-त्याग करनेसे बमीठेकी ‘भूमितरंगें उत्सर्जन’ की क्षमता कम होना : बमीठेमें विद्यमान नागदेव, शिवरूपी कनिष्ठ गणदेवताओंसे संबंधित होते हैं । बमीठेके छिद्ररूपी वायुविजन (वायुसंचार) से भूमितत्त्वसे संबंधित तरंगें फुवारेके समान वायुमंडलमें प्रक्षेपित होती रहती हैं । इन तरंगोंसे उस विशिष्ट वायुमंडलसे जानेवाले जीवके प्राणदेहकी शुद्धि होती है । बमीठेके स्थानपर मलमूत्र-त्यागने जैसी अपवित्र कृति करनेसे, बमीठेकी ‘भूमितरंगें उत्सर्जन’ की क्षमता कम होती है; क्योंकि किसी भी स्थानपर रज-तमका संक्रमण जडत्वनिर्मितिका मूल कारण होता है । इसलिए विशिष्ट घटकमें विशिष्ट स्तरपर शक्तिस्वरूप तरंगें प्रक्षेपित करनेकी क्षमता अपने-आप कम हो जाती है । अतएव, यथासंभव ऐसी पापजन्य कृतिसे बचना ही उचित है ।
१.४ गौशालामें मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : गौशालामें मलमूत्र-त्याग करनेसे सत्त्वगुणवर्धक तरंगोंके प्रक्षेपणसे, वायुमंडल शुद्ध रखनेवाला पवित्र क्षेत्र अपवित्र बनना : गौशालामें विद्यमान गोमूत्र, गोबर व गायकी वायुरूपी हुंकार तथा उसका प्रत्यक्ष देवताजन्य अस्तित्व, इन घटकोंके कारण, वह स्थान सत्त्वगुणवर्धक तरंगोंके प्रक्षेपणसे वायुमंडल निरंतर शुद्ध रखनेमें कारणभूत होता है । गोमूत्र व गोबरसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-वायु, देहकी प्राणवायुके गतिमान संचार हेतु पूरक होती है । अतएव, जिस स्थानपर गौशाला होती है, वहांके जीवोंका स्वास्थ्य तथा मन सदैव ही उत्तम स्थितिमें रहता है और जीवन भी आनंदमय बनता है । इसलिए ऐसे पवित्र क्षेत्रमें रज-तमको आमंत्रण देनेवाली मलमूत्र-त्याग जैसी कृति निषिद्ध मानी गई है ।
१.५ जलमें मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : जलमें मलमूत्रके त्यागसे जलका संग्रह अशुद्ध बनना और जलकी ओर ब्रह्मांडकी रज-तमात्मक तरंगें आकृष्ट होनेसे संपूर्ण वायुमंडल अशुद्ध होना : जल सर्वसमावेशक है । जलके स्रोतको शुद्ध व पवित्र रखनेसे उसकी ओर ब्रह्मांडमंडलसे आकृष्ट देवताओंकी सात्त्विक पंचतत्त्वात्मक तरंगोंका लाभ उस परिसरमें रहनेवाले अनेक जीवोंको प्राप्त होता है । इससे उनके देह तथा वायुमंडलकी भी शुद्धि होती है ।
जलमें मलमूत्र-त्याग करनेसे, जलका संग्रह अशुद्ध बनता है । इससे उसकी ओर ब्रह्मांडकी रज-तमात्मक तरंगोंका आकर्षण आरंभ होते हुए, संपूर्ण वायुमंडल अशुद्ध बनता है । ऐसी कृति समष्टि जीवनमें अनेक विघातक रोगोंको आमंत्रित करती है । वह जल पीनेसे जलके साथ देहमें अनिष्ट शक्तियोंके प्रवेशकी भी आशंका रहती है ।
१.६ जलाशयसे दस हाथ दूरतक मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : जलाशयसे दस हाथ दूरतक मलमूत्र-त्याग करनेसे वायुमंडल दूषित होकर संपूर्ण परिसर अशुद्ध बनना व इससे अनेक अनिष्ट शक्तियोंका इस परिसरमें आकर जलस्रोतको काली शक्तिसे युक्त बनाना : जलाशयसे दस हाथ दूरतकका परिसर अधिक आर्द्रतायुक्त होता है । इसलिए वह सूक्ष्मदृष्टिसे वायुमंडलमें होनेवाले सभी प्रकारके पंचतत्त्वात्मक तरंगोंके उत्सर्जनके लिए पोषक होता है । इस आर्द्रतायुक्त वायुमंडलके आधारपर अनेक दिव्यात्मा उस विशिष्ट नदीके तटपर साधना करते हैं, इसके साथ ही कुछ पितर भी इस परिसरमें रहकर साधना करते हैं । इसलिए यथासंभव नदीके तटपर अथवा किसी भी सरोवरके तटपर मलमूत्रादिका त्याग न करें; क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित बनता है और रज-तमात्मक तरंगोंका प्रक्षेपण सर्वत्र तीव्र गतिसे होता है । इससे संपूर्ण परिसर अशुद्ध बनता है । अतएव अनेक अनिष्ट शक्तियां इस परिसरमें आकर जलके इस स्रोतको ही काली शक्तिसे युक्त बनाती हैं । ऐसे दूषित जलसे सभीको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होनेकी आशंका रहती है ।
१.७ जीर्ण देवालयमें मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : जीर्ण देवालयमें मलमूत्र-त्याग करनेसे रज-तमात्मक तरंगों व वायुका उत्सर्जन होना तथा इससे पवित्र वायुमंडल अपवित्र बनना : जीर्ण’ अर्थात् अतिशय पुरातन । ऐसे देवालयमें कालांतरसे उस विशिष्ट देवताका शक्तिरूपी वायुमंडल, भूमंडलसे ही घनीभूत हो जाता है । जीर्ण देवालयके भग्न अवशेषोंसे, ऊर्ध्व वायुमंडलसे बाहर उत्सर्जित देवताजन्य चेतना यद्यपि कम हो जाती है, तब भी उस विशिष्ट देवताके कनिष्ठरूपी पृथ्वी व आप तत्त्वोंसे संबंधित अस्तित्वरूपी शक्तिस्वरूप वायुमंडल, भूमंडलसे घनीभूतताके स्तरपर सुप्तरूपमें विद्यमान रहते हैं । इसलिए वह एक पवित्र वायुमंडल ही होता है । ऐसे पवित्र स्थानपर रज-तमात्मक तरंगें व वायुके उत्सर्जन हेतु कारणभूत मलमूत्र-त्याग जैसी कृति करनेसे वहां विद्यमान पवित्र वायुमंडल अपवित्र बनता है तथा यह एक पापजन्य कर्म होता है ।
१.८ यज्ञवेदी व भस्मके स्थानपर मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : यज्ञवेदी व भस्मके निकट मलमूत्र-त्याग करनेसे उस विशिष्ट स्थानमें विद्यमान पवित्र वायुमंडल अशुद्ध होना : भस्म व यज्ञवेदीके स्थानपर तेजरूपी सुप्त शक्तिस्वरूपी वायुमंडल, विशिष्ट रिक्त स्थानमें घनीभूत रहता है । इस स्थानपर रज-तमात्मक तरंगों तथा वायुके उत्सर्जन हेतु कारणभूत मलमूत्र-त्याग जैसी कृति करनेसे उस विशिष्ट स्थानमें विद्यमान पवित्र वायुमंडल अशुद्ध हो सकता है । यह एक पापजन्य कर्म बनता है ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ७.१२.२००७, दोपहर १२.५०)
१.९ अग्नि, सूर्य, चंद्र, जल, ब्राह्मण व गायके समक्ष मलमूत्र-त्याग न करें ।
शास्त्र : अग्नि, सूर्य, चंद्र, जल, ब्राह्मण व गाय जैसे मांगलिक तथा तेजवर्धक घटकोंके समक्ष मलमूत्र-त्याग जैसी कृति करना महापातक माना जाना : ‘अग्नि दिव्य तेजका, सूर्य प्रत्यक्ष अथवा प्रकट तेजका, चंद्र शीतल तेजका, जल सर्वसमावेशक पवित्र कार्यरूपी पंचतत्त्वात्मक तेजका, ब्राह्मण ब्रह्मतेजका तथा गाय तेजतत्त्वदर्शक देवत्वरूपी प्रवाहका प्रतीक है । अतएव ऐसे मांगलिक व तेजवर्धक घटकोंके समक्ष मलमूत्र-त्याग जैसी कृति करना महापातक माना गया है । मलमूत्रादि विसर्जनसे प्रक्षेपित सूक्ष्म रज-तमयुक्त तरंगों तथा वायुके कारण, इन तेजदायी घटकोंसे युक्त परिसर दूषित बनानेका पातक लगनेकी संभावना अधिक होती है । इसलिए ऐसी पापजन्य कृति न करें ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ७.१२.२००७, दोपहर ३.०३ व ३.११)
(यात्रा, आपत्काल इत्यादि कारणोंसे सडक इत्यादि स्थानोंपर मलमूत्र-त्याग करना ही पडे, तो उस समय देवतासे क्षमा मांगकर उनसे प्रार्थना कर, नामजप करते हुए वह कर्म करें । - संकलनकर्ता)
२. मलमूत्र-त्याग कैसे करें ? उसका आधारभूत शास्त्र क्या है ?
२.१ शरीरपर वस्त्र धारण किए हुए व मस्तकपर वस्त्र लपेटे हुए मलमूत्रका त्याग करें ।
शास्त्र : मलमूत्र विसर्जनकी रज-तमात्मक तरंगोंका शरीरसे सीधा संपर्क न हो, इस हेतु मस्तक व शरीर वस्त्रसे ढकना आवश्यक : ‘मलमूत्र-त्याग रज-तमदर्शक प्रक्रिया है । उससे रज-तमात्मक तरंगोंका सीधे शरीरसे संपर्क न हो, इस हेतु मस्तक व शरीर वस्त्रसे ढकना उचित होता है । मस्तकपर वस्त्र धारण करना, ब्रह्मरंध्रको कुछ मात्रामें सुरक्षित रखनेमें सहायक है । वस्त्रके माध्यमसे दिनभरमें होनेवाले रज-तमात्मकरूपी आक्रमणोंसे जीवकी थोडी-बहुत रक्षा हो सकती है ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोपहर १.४३)
२.२ लघुशंका व शौचविधि करनेसे पूर्व, जनेऊ दाहिने कानपर लपेटें ।
शास्त्र :

अपनी अशुद्ध अवस्था सूचित करनेके लिए यह कृति उपयोगी प्रमाणित होती है । हाथ-पैर धोकर, कुल्ला करनेके उपरांत जनेऊ कानसे हटाएं । इसका आधारभूत शास्त्रीय कारण यह है कि, शरीरके नाभिप्रदेशसे ऊपरका भाग धार्मिक क्रियाओंके लिए पवित्र है, जबकि उससे नीचेका भाग अपवित्र माना गया है ।

आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम, अनिल इत्यादि सभी देवताओंका वास दाहिने कानमें होता है । इसलिए दाहिने कानको दाहिने हाथसे केवल स्पर्श करनेसे आचमनका फल (आचमनसे अंतर्शुद्धि होती है ।) मिलता है । ऐसे पवित्र दाहिने कानपर यज्ञोपवीत रखनेसे अशुचिता नहीं होती ।

‘दाहिने कानसे जनेऊ लपेटनेके कारण जनेऊके ब्रह्मतेजका स्पर्श कानकी रिक्तिसे होता है । इससे जीवकी दाहिनी नाडी कार्यरत होती है तथा अल्पावधिमें जीवके चारों ओर तेजोमय तरंगोंका संरक्षणात्मक वायुमंडल बनता है । लघुशंका व शौचविधि जैसी रज-तमात्मक कृति करते समय अल्पावधिमें संरक्षणात्मक स्तरपर कार्य करनेवाली सूर्य नाडीको जागृत करने हेतु जनेऊ दाहिने कानपर लपेटते हैं ।

जनेऊ कमरके मंडलको स्पर्श करता है । लघुशंका व शौचविधि जैसी क्रियाओंमें देहमें रज-तमात्मक तरंगोंके रूपांतरणात्मक (रूपांतरस्वरूप) परिवर्तनके कारण कमरमंडल अशुद्ध बनता है । इस अशुद्धताके संसर्गसे जनेऊकी पवित्रता कम होती है । इसपर उपायस्वरूप, लघुशंका व शौचविधिके समय जनेऊ दाहिने कानपर लपेटनेका विधान है ।’
- एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोपहर २.१९)
२.३ काल, दिशा व मलमूत्र-त्याग
पहली विचारधारा : मलमूत्र-त्याग करते समय दिन व संध्या समयमें उत्तरकी ओर तथा रात्रिमें दक्षिणकी ओर मुख करें ।

उत्तर दिशाकी सर्वसमावेशक घनीभूतकारी शक्तिधारणामें मलमूत्र-त्याग कर्मकी रज-तमात्मक तरंगोंका विलीनीकरण संभव : ‘उत्तरकी ओर गुरुधारणा वास करती है । यह धारणा सर्वसमावेशक है, इसलिए किसी भी प्रकारकी पापयुक्त धारणाको स्वाभाविकरूपसे स्वयंमें समाविष्ट करती है । इसी धारणाको ‘जनकधारणा’ अथवा ‘पितृधारणा’ भी कहते हैं । प्रातःकालसे संध्याकालतक धीरे-धीरे रज-तमकी अधिकता बढती जाती है । घटनाकी विशिष्ट क्रियाका उत्थापन कर, उससे विशिष्ट घटककी रज-तमात्मक धारणाको विसर्जन प्रक्रियाकी ओर ले जानेवाली तरंगें, इस कालावधिमें उत्तर दिशामें उत्तेजित स्थितिमें रहती हैं । अतएव इस कालमें इस विसर्जनात्मक प्रवाही जनकधारणामेंं अपने मलमूत्रादि-त्यागरूपी रज-तमात्मक कर्मको पापमुक्त करने हेतु, उत्तर दिशाकी ओर मुख कर विशिष्ट धारणाको साक्षि मानकर किया जाता है । इन प्रहरोंमें सभी दिशाओंमेंसे उत्तरधारणा अधिक मात्रामें घनीभूतकारी शक्तिधारणा दर्शाती है । इसलिए इस कर्मकी सभी रज-तमात्मक तरंगोंका इस धारणामें विलीनीकरण संभव होता है ।

वायुमंडलमें विद्यमान अधिकतम यमतरंगोंद्वारा रज-तमात्मक तरंगोंको घनीभूत कर स्वयंमें समाविष्ट किया जाना : रात्रि-प्रहरमें वायुमंडलमें यमतरंगोंकी अधिकता होती है । इस प्रहरमें यमदिशा रज-तमात्मक तरंगोंको अधिक मात्रामें घनीभूत कर, अपने-आपमें समाविष्ट कर सकती है । इसीलिए कहा गया है कि, ‘रात्रिके समय मलमूत्र-त्यागका कर्म दक्षिण दिशाको साक्षि मानकर करें ।’
रात्रि-प्रहरमें पूर्व, पश्चिम व उत्तर दिशाओंके माध्यमसे कुछ दिव्यात्मा विशिष्ट सत्त्व-रजात्मक कार्यकारी तरंगोंके माध्यमसे दिशामंडलोंकी रक्षा करते हैं । इसलिए उन दिशाओंमें मलमूत्र-त्याग जैसी कृति करना पापयुक्त धारणाका लक्षण बनता है।’
- एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ७.१२.२००७, सायं. ६.५९)
दूसरी विचारधारा : दक्षिणकी ओर मुख कर मलका व उत्तरकी ओर मुख कर मूत्रका त्याग करें ।

प्राङ्‍मुखोऽन्‍नानि भुञ्‍ञीत्तोच्‍चरेद्दक्षिणामुख: |
उदङ्‍मुखो मूत्रं कुर्यात्‍प्रत्‍यक्‍पादावनेजनमिति ||
- आपस्तम्बधर्मसूत्र, १.११.३१.१
अर्थ : पूर्वकी ओर मुख कर अन्न ग्रहण करें । दक्षिणकी ओर मुख कर मलका व उत्तरकी ओर मुख कर मूत्रका त्याग करें तथा पश्चिमकी ओर मुख कर पैर धोएं ।
मल-त्याग : दक्षिण दिशा अशुभ कर्मको समाविष्ट करती है । मल जडत्वदर्शक अशुभ धारणासे संबंधित है, इसलिए वह यमतरंगोंसे युक्त व जडत्वधारणासे संलग्न वायुमंडलमें विशिष्ट स्थानपर ही त्यागनेसे वायुमंडलकी विशिष्ट स्तरकी शक्तितरंगोंका भ्रमणात्मक संतुलन नहीं बिगडता ।

मूत्र-त्याग : उत्तर दिशा अशुभ कर्मका लय करती है । रज-तमात्मक तरंगोंके संक्रमणमें मलकी तुलनामें मूत्र अधिक सूक्ष्म व संवेदनशील है, इसलिए वह अपना प्रभाव वायुमंडलमें अल्पावधिमें अधिक परिणामकारकरूपसे अंकित कर सकता है । अतएव गुरुधारणाके लिए पूरक, अर्थात् सभीको ‘अपना’ कहकर स्वयंमें उस विशिष्ट पदार्थका लय साधनेवाली उत्तर दिशाकी ओर मुख कर मूत्रका त्याग करते हैं ।
विशिष्ट दिशाकी ओर मुख कर, विशिष्ट तरंगोंके स्पर्शके स्तरपर (स्पर्शके माध्यमसे) विशिष्ट कर्म करनेसे पापमार्जन व पुण्य-प्राप्तिमें सहायता मिलती है ।’
- एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २.६.२००७, दोपहर १.५९)
२.४ उकडूं बैठकर मलमूत्र-त्याग करें ।
शास्त्र :

‘उकडूं बैठनेसे बननेवाली मुद्राके कारण अधोगामी दिशामें प्रवाहित कटिबंधकी उत्सर्जक वायु कार्यरत होती है तथा देहके अधोगामी प्रवाहके बलपर देहके मलमूत्रादि उत्सर्जित घटकोंको तत्काल बाहरकी दिशामें ढकेलकर कटिबंधका रिक्त स्थान स्वच्छ हो पाता है ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

शौचक्रियाके समय देहकी विशिष्ट मुद्राके कारण उपपंचप्राणोंको आधार मिलनेसे कष्टदायक वायु मलमूत्रद्वारा बाहर निकलकर देहमें विद्यमान काली शक्ति (कष्टदायक शक्ति) नष्ट होना : ‘भारतीय संस्कृतिमें बताई गई शौचपद्धतिके कारण देहमें निर्माण हुए कष्टदायक घटकोंका ३० प्रतिशत विघटन होता है । शौचक्रियाके समय देहकी विशिष्ट मुद्राके कारण उपपंचप्राणोंको आधार प्राप्त होता है । इससे कष्टदायक वायु मलमूत्रद्वारा बाहर निकलती है । इसी प्रकार देहके सूक्ष्म-शुद्धिचक्र भी चक्राकार दिशामें घूमना आरंभ करता है । इससे जीवके देहमें विद्यमान काली शक्ति नष्ट होती है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १९.६.२००७, दोपहर ३.५१)
पुरुषोंद्वारा खडे होकर मूत्रत्याग न करनेका आधारभूत शास्त्र :

‘खडे रहनेकी मुद्राके कारण देहकी रज-तमात्मक ऊर्जाका संचय धीरे-धीरे पैरोंकी दिशामें होता है और यह ऊर्जा उसी स्थानपर घनीभूत होना आरंभ होती है । इससे पातालसे प्रक्षेपित कष्टदायक स्पंदन पैरोंसे तत्काल देहमें प्रवेश कर सकते हैं ।

खडे रहकर मूत्रत्याग करनेकी प्रक्रियासे भूमिपर मूत्रकी धाराके आघातसे भूमिसे संलग्न काली शक्तिका प्रवाह जागृत स्थितिमें आता है । इससे जीवका संपूर्ण देह ही रज-तमसे आवेशित हो जाता है ।’
- एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)
२.५ लघुशंका व शौचविधिके समय मौन-पालन करें ।
शास्त्र : ‘मौनके माध्यमसे जीवकी मध्यमा वाणी जागृत स्थितिमें आती है, जिससे अंतर्मुखतामें वृद्धि होती है । इससे जीवके शरीरके चारों ओर संरक्षणात्मक कवच बने रहनेकी कालावधि बढ जाती है । इस प्रक्रियाके कारण लघुशंका व शौचविधि जैसी रज-तमात्मक कृति करते हुए, वायुमंडलसे अनिष्ट शक्तियोंके संभावित आक्रमणोंसे जीवकी रक्षा होती है ।’ - एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ११.१२.२००७, दोपहर २.१९)
३. मल-मूत्रत्यागके उपरांत इंद्रिय जलसे धोएं ।
शास्त्र : शौचके उपरांत जलका प्रयोग करनेसे शौचके पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित रज-तमयुक्त कण शीघ्र नष्ट होना : ‘शौचद्वारा निकलनेवाले त्याज्य पदार्थ पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित व रज-तमयुक्त होते हैं । टिश्यू पेपरमें सात्त्विकता नहीं रहती तथा वह पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित है । इसलिए टिश्यू पेपरके उपयोगसे शौचके पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित रज-तमयुक्त कण नष्ट नहीं होते । जल सात्त्विक है तथा उसमें आपतत्त्वयुक्त सात्त्विकता और चैतन्य रहता है । शौचके उपरांत जलका उपयोग करनेसे शौचके पृथ्वीतत्त्वसे संबंधित रज-तमयुक्त कण शीघ्र नष्ट होनेमें सहायता मिलती है ।’ - ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, २८.११.२००७, रात्रि ११.१५)
(कहां शौच स्वच्छ करने हेतु ‘टिश्यू पेपर’ का उपयोग करना सिखानेवाली निकृष्ट पश्चिमी संस्कृति और कहां आध्यात्मिक दृष्टिसे उचित पदार्थ ‘जल’ का उपयोग करनेकीr पद्धति सिखानेवाली महान हिंदु संस्कृति ! - संकलनकर्ता)
४. फ्रांसीसी वैज्ञानिकके शोधका निष्कर्ष - मूत्रत्यागकी हिंदुओंकी पद्धति उत्तम व स्वास्थ्यप्रद
'फ्रांसीसी वैज्ञानिक कहते हैं, ‘खडे होकर लघुशंका करनेपर मूत्रकी बूंदें पैरोंपर गिरती हैं और नीचेके भागमें बिखरती हैं । बैठकरलघुशंकाकरनेकी हिंदुओंकी प्रथा अत्यंत उत्तम व स्वास्थ्यप्रद है । लघुशंकाके उपरांत इंद्रिय धोनी चाहिए । उसे न धोनेपर मूत्र सूखनेके उपरांत वहां मूत्रके सूक्ष्म-कण निर्माण होते हैं तथा वे रोगका कारण बनते हैं ।’
लघुशंकाकी हमारी पारंपरिक पद्धतिका यूरोपियन वैज्ञानिक पूर्ण समर्थन करते हैं । तब भी वे खडे होकर ही लघुशंका करते हैं । उनकी देखादेखी हिंदु भी खडे होकर ही लघुशंका करते हैं । गोरोंका अंधानुकरण करनेमें हम अपने-आपको धन्य समझते हैं । कल यदि गोरे लोग नीचे बैठकर लघुशंका करने लगे, तो हम भी वैसा ही करेंगे और उसे प्रगति कहेंगे !’ - गुरुदेव डॉ. काटेस्वामी जी द्वारा रचित 

यह भी पढ़े -----यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है. इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है. यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है. शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है. यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है. यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है. इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है. यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता.

अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है। यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है. इसीलिए सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है. सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है. यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव एसका सदैव धारण करना चाहिए. शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है. आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है. यदि इसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता.

यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत.

अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है. अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के लिए भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है. हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान पर से उतारें.

इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का हिस्सा अपवित्र माना गया है. दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है. मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है. दाएं कान को ब्रह्मसूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है. यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है. यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दाएं कान ब्रह्मसूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है. बिस्तर में पेशाब करने वाले लड़कों को दाएं कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है.

किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान पकडऩे से वह उसी क्षण नरम हो जाता है. अंडवृद्धि के सात कारण हैं.

मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है. दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है. इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है.

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