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31 मई 2014

SAINTS OF INDIA,

इस फोटो को ध्यान से देखें, इस फोटो में हमारे गुजरे ज़माने के ऋषि-मुनि हैं जो इंडिया को भारत बनाया और हमें संस्कारों से परिपूर्ण किया.. अपने बच्चों को भी दिखाएँ.. उन्हें जनरल नॉलेज में सहायक सिद्ध होगी...सभी संतों के नाम सीरियल से निचे लिखा हुआ है..  राजेश मिश्रा
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Bahut hi Viral Photo hai..... Dhyan lagakar dekhen...

SAINT OF INDIA

25 मई 2014

भगवान शंकर महाशक्ति हैं !

जब माता पार्वती जी का भ्रम टूटा 



एक बार भगवान शंकर व माता पार्वती विचरण करते हुए एक पर्वत पर बैठे थे ! इधर-उधर की बातें होने लगीं! संसार के बारे में चर्चा हो रही थी ! तभी माता पार्वती के पैर पर पानी की एक बून्द गिरी ! माता ने आश्चर्य से उपर देखा ! आसमान साफ था ! उपर कोई पक्षी भी दिखाई नहीं दिया ! फिर यह पानी की बूंद कहां से आई ! माता ने बहुत सोचा परंतु पानी की बून्द का रहस्य समझ में न आया ! उन्होंने अपनी शंका भगवान शंकर से कही ! भगवन ने देखा तो उन्हें भी कुछ समझ में न आया ! माता ने जिद की तथा बूंद के रहस्य का पता लगाने के लिए कहा ! शंकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए !

जब शंकर जी ने अपने नेत्र खोले तो माता पार्वती ने फिर अपनी जिज्ञासा जाहिर की तथा पूछा कि यह पानी की बूंद कहां से आई !

शंकर भगवान ने कहा – “अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया और आपके पैर पर पानी की बूंद पड गई !”
“यह कैसे हो सकता है ?” मां पार्वती ने शंका जाहिर की ! “क्या मगरमच्छ इतना बलशाली है कि उसकी छलांग लगाने से पानी इतना उपर उछल कर आ गया ? समुद्र तो यहां से बहुत दूर है !”

“हां पार्वती, ऐसा ही हुआ है !” भगवान ने शांत भाव से उत्तर दिया !
“परंतु यह बात मेरे गले नहीं उतर रही ! मैं इस की जांच करना चाहती हूं ! मैं स्वंय जाकर देखना चाहती हूं !” पार्वती ने आज्ञा मांगने के आशय से कहा !
“हां पार्वती, मैं ठीक कह रहा हूं ! ऐसा ही है !’ भगवान ने पार्वती को फिर समझाया !
“परंतु मुझे विश्वास नहीं हो रहा ! मैं अपनी शंका का समाधान करना चाहती हूं !” पार्वती ने कहा “मैं स्वयं जाकर सच्चाई जानना चाहती हूं !”
भगवान शंकर “जैसी आपकी इच्छा !” कहकर फिर अंतर्ध्यान हो गए !
माता पार्वती नीचे समुद्र तट पर पहुंच गईं ! उन्होंने देखा कि एक मगरमच्छ किनारे पर ही तैर रहा है ! उन्होंने झट उस मगरमच्छ को बुला कर उससे पूछा -“क्या तुमने अभी कुछ देर पहले पानी में छलांग लगाई थी ?”

“हां माता श्री, क्या मुझसे कोई भूल हो गई है ? कृप्या मुझे क्षमा कर दें !” मगरमच्छ ने हाथ जोड दिये !

“नहीं वत्स, तुमसे कोई भूल नहीं हुई ! मैं अपनी एक शंका का निवारण करने आई थी !” पार्वती ने कहा !

“कैसी शंका माता श्री ?” मगरमच्छ ने प्रश्न किया !
“मैं उपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! आसमान भी साफ था तथा ऊपर कोई पक्षी भी नही उड रहा था ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने ही यह सब बताया !” पार्वती आश्चर्य से मगरमच्छ को देख रहीं थीं ! “लेकिन यदि तुम्हारे पानी में कूदने से जल इतना ऊपर आया है तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम बहुत बलशाली हो !” माता ने फिर कहा !
“नहीं मां, मैं कहां बलशाली हूं ! मेरे जैसे और मेरे से भी अधिक बलशाली कई मगरमच्छ इस समुद्र में रहते हैं ! समुद्र हम सबको समेटे हुए है ! तो बलशाली तो समुद्र हुआ न !” मगरमच्छ दीनता से बोला !
“तुम ठीक कहते हो !” यह कहकर पार्वती मां समुद्र के पास जाकर बोलीं – “समुद्र-समुद्र, तुम बहुत बलशाली हो !”

समुद्र हाथ जोडकर खडा हो गया ! “क्या बात है माता, आप ऐसा क्यों कह रहीं हैं ?”

“मैं उपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! आसमान भी साफ था तथा कोई पक्षी भी नही उड रहा था ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया यह उसी पानी की बूंद है !” माता पार्वती ने आगे कहा – “सोचो वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छों को तुम समेटे हुए हो ! अतः तुम बहुत बलशाली हो !”

“माता आप ऐसा कहकर सिर्फ मेरा मान बढाना चाहती हैं ! यह आपका बडप्पन है ! मैं तो कुछ भी नही ! अब देखिए न, यह सामने पर्वत खडा है ! समुद्र में इतनी ऊंची-ऊंची लहरें ऊठती हैं पानी के थपेडे दिन-रात इसको टक्कर मारते रहते हैं ! फिर भी यह कई वर्षों से इसी प्रकार निश्चल खडा है ! इस पर मेरी लहरों और थपेडों का कोई असर नहीं होता ! मुझ से तो बलशाली यह पर्वत है !” समुद्र ने कहा !

‘ओह, मैंने तो यह सोचा ही नहीं था ! वाकई, पर्वत बहुत बलशाली है !” यह कहकर पार्वती जी पर्वत के पास जाकर बोली –“पर्वत बेटा, मैने सुना है कि तुम बहुत बलशाली हो !”
“यह आप कैसे कह सकती हैं माता जी !” पर्वत ने नम्रतापूर्वक प्रश्न किया
“मैं शंकर भगवान के साथ वहां ऊपर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में अठखेलियां करते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों का भी तुम पर कोई असर नहीं होता ! तब तो तुम ही बलशाली हुए न !” पार्वती मां ने सारी कहानी सुनाते हुए पर्वत से पूछा !

“नही-नही माता जी ! सच्चाई तो यह है कि मेरे जैसे कई छोटे-बडे पर्वत इस पृथ्वी पर कई वर्षों से खडे हैं ! और पृथ्वी हम सब का भार अपने ऊपर लिए निश्चल खडी है ! तो पृथ्वी हमसे भी अधिक बलशाली हुई !” पर्वत ने अपना तर्क दिया !
जब माता पार्वती जी का भ्रम टूटा

पार्वती सोच मे पड गईं ! वो सोचने लग गई मैं भी कहां भूली हुई थी ! बलशाली तो पृथ्वी है चलो पृथ्वी के पास चलते हैं ! मां पृथ्वी के पास जाकर कहने लगीं – “अरे पृथ्वी रानी ! मैं तो भूली पडी थी ! मुझे पहले ख्याल ही नहीं आया ! तुम तो बहुत बलशाली हो !”
“वो कैसे मां !” पृथ्वी ने प्रश्न किया !

“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में विचरण करते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं ! इन जैसे कई पर्वतों का और हम सब का भार तुमने अपने ऊपर लिया हुआ है ! इसलिए इसमें शक की कोई गुंजाईश ही नही है ! तुम ही सबसे बलशाली हो !” पार्वती मां ने पृथ्वी को समझाया !

पृथ्वी पार्वती की बात सुनकर नत-मस्तक होकर बोली –“ मैं कहां बलशाली हूं मां ? मैं तो स्वयं ही शेषनाग पर टिकी हुई हूं ! जब शेषनाग ज़रा सा भी अपना सिर हिलाते हैं तो मैं डोल जाती हूं ! बलशाली तो शेषनाग जी हैं !”
पार्वती जी का माथा ठनका ! व सोचने लगीं ! अरे वाकई, पृथ्वी सही कह रही है ! इतनी बडी पृथ्वी का सारा का सारा भार शेषनाग ने अपने शीश पर ऊठा रखा है ! तो बलशाली और महाशक्ति तो वही हुआ !

पार्वती जी झट से शेषनाग के पास पहुंचीं और उससे कहने लगी ! – “शेषनाग जी मुझे तो आज पता चला कि आप बहुत शक्तिशाली हो !”

“वह कैसे ?” शेषनाग ने जिज्ञासा प्रकट की !

“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में रहते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं ! ऐसे कई पर्वत पृथ्वी पर आसन जमाए बैठे हैं ! वही पृथ्वी केवल तुम्हारे शीश पर टिकी हुई है ! तुम ही सबसे बलशाली हो ! तुम महान हो ! तुम महाशक्ति हो” पार्वती ने सारी कहानी दोहरा दी !

शेषनाग हाथ जोड कर दंडवत प्रणाम करके पार्वती माता के चरणों मे लोट गया और बोला –
“हे मां, आप ऐसा कहकर मुझे पाप का भागी बना रही हैं ! मैं तो एक अदना सा प्राणी हूं ! मेरी ऐसी बिसात कहां ! असल महाशक्ति तो आपके पति शंकर भगवान हैं !”
“शंकर भगवान ? वो कैसे ?” मां ने प्रश्न किया !
“मेरे जैसे कई सर्प, कई नाग उनके गले में लिपटे रहते हैं, उनके शरीर पर रेंगते रहते हैं ! आप कहां भटक गईं माता ! महाशक्ति तो शंकर भगवान हैं !” शेषनाग का उत्तर सुनकर ऐसा लगा जैसे पार्वती के सोचने की शक्ति समाप्त हो गई थी ! वे वापिस आकर शंकर भगवान के चरणों में गिर पडीं ! * राजेश मिश्रा 

जब शंकर भगवान ने शुक्राचार्य को निगल लिया था


दानव गुरु शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत जैसे ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं। शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की।

गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया कि बेटे इस समस्त जगत के गुरु केवल ईश्वर ही हैं। इसलिए तुम उनकी आराधना करो। तुम्हें समस्त प्रकार की विद्याएं और गुण खुद ही प्राप्त होंगे। गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया। शिव जी ने प्रत्यक्ष होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का उपदेश दिया। शुक्र ने मृत संजीवनी विद्या के बल पर समस्त मृत राक्षसों को जीवित करना आरंभ किया।

परिणाम स्वरूप दानव अहंकार के वशीभूत हो देवताओं को यातनाएं देने लगे क्योंकि देवता और दानवों में सहज ही जाति-वैर था। इसके बाद देवता और दानवों में निरंतर युद्ध होने लगे। मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती ही गई। देवता असहाय हो गए। वे युद्ध में दानवों को पराजित नहीं कर पाए। देवता हताश हो गए। कोई उपाय ने पाकर वे शिव जी की शरण में गए क्योंकि शिव जी ने शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या प्रदान की थी।

देवताओं ने शिव जी से शिकायत कि महादेव आपकी विद्या का दानव लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। आप तो समदर्शी हैं। शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से मृत दानवों को जिलाकर हम पर भड़का रहे हैं। यही हालत रही तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे। कृपया आप हमारा उद्धार कीजिए। शुक्राचार्य द्वारा मृत संजीवनी विद्या का इस प्रकार अनुचित कार्य में उपयोग करना शिव जी को अच्छा न लगा।

शिव जी क्रोध में आ गए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला। इसके बाद शुक्राचार्य शिव जी की देह से शुक्ल कांति के रूप में बाहर आए और अपने निज रूप को प्राप्त किया। शुक्राचार्य के संबंध में एक और कथा इस प्रकार है। शुक्राचार्य ने किसी प्रकार छल-कपट से एक बार कुबेर की सारी संपत्ति का अपहरण किया। कुबेर को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने शिव जी से शुक्राचार्य की करनी की शिकायत की।

शुक्राचार्य को जब मालूम हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई तो वे डर गए और शिव जी के क्रोध से बचने के लिए झाड़ियों में जा छिपे। आखिर वे इस तरह शिव जी की आंख बचाकर कितने दिन छिप सकते थे। एक बार शिव जी के सामने पड़ गए। शिव स्वभाव से ही रौद्र हैं। शुक्राचार्य को देखते ही शिव जी ने उनको पकड़कर निगल डाला। शिव जी की देह में शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि उनको शिव जी की देह से बाहर कर दें।

शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद किए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए। इस कारण शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए। शुक्राचार्य को बाहर निकले देख शिव जी का क्रोध फिर से भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें इस बीच पार्वती ने परमेश्वर से निवेदन किया कि यह तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है।

पार्वती की अभ्यर्थना पर शिव जी ने शुक्राचार्य को अधिक तेजस्वी बनाया। अब शुक्राचार्य भय से निरापद हो गए थे। उन्होंने प्रियव्रत की पुत्री ऊर्जस्वती के साथ विवाह किया। उनके चार पुत्र हुए-चंड, अमर्क, त्वाष्ट्र और धरात्र। एक कथा शुक्राचार्य के संबंध में इस प्रकार है। एक बार वामन ने राजा बलि के पास जाकर तीन कदम रखने की पृथ्वी मांगी।

जब यह समाचार शुक्राचार्य को मिला। उन्होंने राजा बलि को समझाया कि राजन सुनो आपसे तीन कदम जमीन मांगने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे नर भी नहीं। भूल से भी सही उनको एक कदम रखने की जमीन तक मत देना। नीति शास्त्र बताता है कि वारिजाक्ष, विवाह, प्राण, मान तथा वित्त के संदर्भ में झूठ बोला जा सकता है इसलिए मेरी सलाह मानकर याचक को जमीन का दान देने से अस्वीकार करो।

शुक्राचार्य ने राजा बलि को इस तरह अनेक प्रकार से समझाया परंतु राजा बलि अपने वचन के पक्के थे और साथ ही ज्ञानी भी। इसलिए उन्होंने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया कि यदि याचक नर न होकर नारायण ही हों तो और अधिक उत्तम। यदि उनके हाथों में मेरा कुछ अहित भी होता है तो वह मेरा भाग्य ही माना जाएगा। इसलिए ऐसे सुअवसर से मैं वंचित होना नहीं चाहता। मैं अपने वचन का पालन हर हालत में करना चाहूंगा। यह कहकर राजा बलि ने प्रसन्नतापूर्वक वामन को तीन कदम रखने की भूमि दान कर दी।

इससे दानवार्च शुक्र चिंता में पड़ गए। उन्होंने संकल्प किया कि किसी प्रकार से राजा बलि का उपकार करना चाहिए। चह विचार करके वे मक्खी का रूप धरकर कमंडल की टोंटी से जलधारा के गिरने से अटक गए। टोंटी से जल के न गिरते देख राजा बलि ने तीली लकेर कमंडल की टोंटी में घुसेड़ दिया। तीली मक्खी की आंख में चुभ गई और आंख छितर गई। परिणामस्वरूप दानवाचार्य शुक्र काना बन गए। तब से दानवाचार्य काना शुक्राचार्य कहलाए।

23 मई 2014

BABA VISHWANATH : Sabse Uncha Shiv Mandir (Varanashi Hindu Vishwavidyalay)

सबसे ऊँचा शिव मंदिर 
(बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर)



भारत का सबसे ऊँचा (करीब 252 फुट) शिव मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मध्य में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर है। मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के तंजावुर स्थित वृहदेश्वर मंदिर की ऊँचाई से ज्यादा है। इसमें मुख्य शिखर के अलावा दो अन्य शिखर भी हैं। मंदिर की अंदर की दीवारों पर श्रीमद्भगवतगीता के श्लोक अंकित हैं।

इसके अलावा दीवारों पर संतों के अनमोल वचन भी संगमरमर पर उकेरे गए हैं। मंदिर के दोनों तरफ खूबसूरत मूर्तियाँ बनी हैं। मंदिर तथा आस-पास का परिसर इतना सुंदर है कि फिल्म बनाने वाले भी यहाँ आकर्षित होते हैं। हरे-भरे आमों के पेड़ मंदिर की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। कई फिल्मों की यहाँ पर शूटिंग भी हो चुकी है। मंदिर की साफ-सफाई इतनी अच्छी है कि कहीं पर एक तिनका नजर नहीं आता। इस मंदिर को अगर हिंदू विश्वविद्यालय का आध्यात्मिक केंद्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

यहाँ बाबा भोलेनाथ की आरती में इलेक्ट्रॉनिक घंटा-घड़ियाल लयबद्ध ताल में गूँजते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की कल्पना की परिणति है यह भव्य और अलौकिक सौंदर्य से भरा मंदिर। मंदिर के चढ़ावे से विश्वविद्यालय के 22 छात्रों को 'अन्न सुख' भी मिलता है।

मदनमोहन मालवीय की मंशा के अनुरूप इसे आकार देने का श्रेय उद्योगपति युगल किशोर बिरला को जाता है। मंदिर का शिलान्यास 11 मार्च 1931 को हुआ और 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि पर मंदिर के गर्भगृह में भगवान विश्वनाथ प्रतिष्ठित हुए। जीवन के अंतिम समय में बिस्तर पर पड़े मदनमोहन मालवीय की आँखें नम देख जाने-माने उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने मंदिर के बारे में पूछा तो वे मौन रहे।


मदनमोहन मालवीय को मौन देख बिरला बोले, आप मंदिर के बारे में चिंता न करें, मैं वचन देता हूँ कि पूरी तत्परता के साथ मंदिर के निर्माण कार्य में लगूँगा। तब मदनमोहन मालवीय निश्चिंत हुए और कुछ दिन बाद ही उनका देहाँत हो गया। मंदिर की अन्नदान योजना के तहत अभी 22 छात्रों और कुलपति के विवेकाधीन कोष से 16 छात्रों को भोजन कराया जाता है। मंदिर के कोष से इसका रख-रखाव होता है। विश्वविद्यालय की ओर से यहाँ छह पुजारी, तीन चौकीदार, दो गायक, एक तबला वादक, एक अधिकारी समेत अन्य कर्मचारी मंदिर की देखरेख एवं सेवा में तैनात हैं।
वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहाँ अपने को कृतार्थ करते हैं वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की 'पीकों' की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं।
पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ भक्तिभाव से जुटते हैं। मंदिर के मानद व्यवस्थापक ज्योतिषाचार्य पंडित चंद्रमौलि उपाध्याय के अनुसार इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहाँ का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनिया भर के आस्थावान श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जहाँ उनके जीवन में सात्विक मूल्यों का बीजारोपण होता है।

Basukinath Dham (Dumka)

बासुकीनाथ धाम (दुमका)




बासुकीनाथ दुमका-देवघर राजमार्ग पर दुमका जिला से उत्तर पश्चिम में लगभग 25 कि0मी0 की दूरी पर अवस्थित है। यह हिन्दुओं का बड़ा ही पवित्र तीर्थस्थल है जो बासुकीनाथ प्रखंड में पड़ता है। प्रतिवर्ष श्रावण मास में देश के विभिन्न प्रदेशों से लाखों श्रद्धालु आकर भगवान शिव को जल अर्पित कर पूजा करते हैं। यह तीर्थस्थल जसीडीह जंक्शन एवं जामताड़ा स्टेशन से रेल मार्ग से जुड़ा है। वायुमार्ग द्वारा राँची या कोलकाता हवाईअड्डा से भी यहाँ पहुँचा जा सकता है।

आकर्षण का केन्द्र मसानजोर

मयुराक्षी नदी पर निर्मित मसानजोर डैम और यहां आस पास का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। झारखंड, बिहार और प.बंगाल सहित कई राज्यों से सैलानी यहां भ्रमण करने एवं पिकनिक के उद्देश्य से आते हैं। दुमका जिला मुख्यालय से 30 कि.मी. की दूरी पर मसानजोर, दुमका-कोलकता सड़क मार्ग पर पड़ता हैं। क्षेत्र में पनबिजली एवं सिंचाई के उद्देश्य से 1951 में कनाडा सरकार द्वारा निर्मित इस डैम का शिलान्यास भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों किया गया था। डैम बनने के बाद इस क्षेत्र के लोगों को बिजली एवं सिंचाई की सुविधा मिलती हैं।

बासुकीनाथ


हरे भरे जंगलों, अनगिनत छोटी-बड़ी पहाड़ियों से भरे झारखंड प्रांत के उप राजधानी दुमका से सटे जरमुंडी प्रखंड अंतर्गत बासुकीनाथ धाम भक्तों के बीच फौजदारी दरबार के रुप में प्रसिद्ध हैं। आम तौर पर सालों भर इस अदालत में विभिन्न प्रकार के कष्टों के निवारण एवं मंगल कामना के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता हैं। लेकिन प्रत्येक वर्ष सावन माह में यह नगरी केसरीया चोलाधारी लाखों काँवरियों से केसरीया मय रहती हैं। यहां भारत के विभिन्न प्रांतों के अलावे पड़ोसी हिन्दू धर्मावलंबी देशों नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मारीशस के अलावे पश्चिम देशों से अप्रवासी भारतीय एवं अन्य धर्मों के भी लोग पहुंचते हैं। सावन मास में तो वसुधैव कुटुम्बकम, राष्ट्रीय एकता, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग, सदभाव की चरम स्थिति यहां दिखती हैं।

सुम्मेश्वरनाथ मंदिर में हैं दुर्लभ शिवलिंग

दुमका जिले के सरैयाहाट प्रखंड मुख्यालय से 11 किमी दूर धौनी गांव स्थित बाबा सुम्मेश्वर नाथ मंदिर हैं। ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्वों को संजोये इस मंदिर में शिवलिंग की पूजा होती हैं। इस मंदिर की पौराणिक कहानी महाभारत काल से संबंधित है। यह स्थल अपने प्राकृतिक खूबसूरती में बसे होने के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। घने जंगल में बसे इस मंदिर से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हैं। अति प्राचीन काल में यहां घनघोर जंगल में शुम्भ व निशुम्भ दो राक्षस भाईयों का वर्चस्व कायम था। दोनों ही शिवभक्त थे। दोनों भाईयों द्वारा ही यहां अलग- अलग शिवलिंग की स्थापना की गयी है। यह शिवलिंग आज भी जुड़वा शिवलिंग से जाना जाता है। यह पूरे देश में दुर्लभ शिवलिंग के नाम से प्रसिद्ध है।

शिव पहाड़ का नाग मंदिर

दुमका के शिव मंदिरों में शिवपहाड़ का एक विशेष ही महत्व हैं। शिवपहाड़ यहां के मनोरम स्थलों में भी एक विशेष स्थान रखता हैं। शहर के बीचो बीच स्थित पहाड़ के उपरी हिस्से में भगवान शिव का यह मंदिर लगभग सौ साल पुराना बताया जाता हैं। यहां सालों भर शिवभक्तों को बड़ी श्रद्धा के साश भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते देखा जाता है। भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए सावन महीने में खासकर सोमवार के दिन तो यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती हैं।

दुमका जिले के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल

सिरसानाथ
सिरसानाथ दुमका से महज 15 किमी की दूरी पर बारापलासी के निकट मयूराक्षी नदी के किनीरे बसा है। यहां शिव-पार्वदी जी का मंदिर है। इस मंदिर का शिवलिंग जमीन के भीतर से सर्प के रुप में बनकर बाहर निकला हैं। यहां दुमका एवं आसपास क्षेत्रों से सैकड़ो श्रद्धालु पहुंचते है।
पंचवाहिनी
यह स्थान शिकारीपाड़ा प्रखंड़ मुख्यालय के निकट ब्राह्मणी नदी से सटे जंगल में स्थित है। यहां की विशेषता यह है कि यहां एक अति प्राचीन शिव मंदिर का अवशेष मिला है, जो देखने लायक है। मंदिर अर्धनिर्मित है। पुरातत्व के दृष्टिकोण से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है।

13 मई 2014

Vaishno Devi : Chalo Bulava aaya hai...

श्री माता वैष्णो देवी

वैष्णो माता भवन 

वैष्णो माता भवन 

वैष्णो माता भवन 
मै आराध्य और इष्ट देवी माता वैष्णो देवी के बारे में आपको विस्तार से बताता हूं ...मैं अपने पुरे परिवार के साथ जगकल्याण सहित मातारानी का दर्शन करने गया था।  माता वैष्णो देवी के दर्शन करना सबके भाग्य में नही होता । कहते हैं कि जब तक पहाडो वाली का बुलावा ना आ जाये तब तक दर्शन नही होते। आपने अवतार फिल्म का वो गाना देखा होगा तूने मुझे बुलाया शेरावालिये ..मै आया मै आया शेरावालिये...इन्हें कई नामों से सम्बोधित किये जाते है… पहाडावली , ज्योताँवाली , शेरांवाली। .... प्रेम से बोलो- जय माता  दी ....राजेश मिश्रा 

मैं और मेरा पूरा  परिवार 

सुषमा, श्रेया एवम राजेश मिश्रा 

माता के तीन रूप माता रानी के तीन रूप हैं जो कि पिंडी के रूप में हैं । पहली महासरस्वती जो ज्ञान की देवी है , दूसरी महालक्ष्मी जो धन वैभव की देवी और तीसरी महाकाली जो कि शक्ति स्वरूपा मानी जाती है । माता के ये तीन रूप सात्विक , राजसी और तामसिक गुणो को प्रकट करते हैं।


स्थिति माता का मंदिर जम्मू में कटरा में त्रिकुटा पर्वत में एक गुफा में स्थित है यहां जाने के लिये जम्मू तक हवाई जहाज या ट्रेन से जाना पडता है और उसके बाद 50 किमी0 की दूरी बस या टैक्सी से तय करके कटरा कस्बे तक जाना होता है जो कि माता के मंदिर तक पहुंचने का बेस है । यहां रूकने आदि की सब सुविधाये हैं और यहां से माता के मंदिर की 14 किलोमीटर की चढाई शुरू होती है माता का ये मंदिर तिरूमला के बाद सबसे ज्यादा दर्शनार्थियो का केन्द्र है और पिछले वर्षो में यहां दर्शन करने वालेा की संख्या 1 करोड को पार कर गयी है। 


दर्शन करने का तरीका , माता के दर्शन करने के लिये भक्तो को पहले कटरा स्थित पंजीकरण कक्ष से अपना और अपने साथ के लोगो का एक ग्रुप के रूप में पंजीकरण कराना होता है । जो कि कम्पयूटराइज कक्ष से होता है और पंजीकरण के बाद आपको एक पर्ची मिलती है जिसे लेकर आपको चार घंटे के भीतर पहली चौकी बाणगंगा पार करनी होती है । यानि यात्रा जब शुरू करने का मन हो तभी पर्ची कटाये । इस पर्ची की अहमियत ये है कि इस पर्ची को रास्ते में कई बार चैक किया जाता है और उपर माता के भवन पर जाकर इस पर्ची से ही आपको दर्शनो के लिये ग्रुप नम्बर मिलता है जिससे आप सुविधाजनक तरीक से दर्शन कर पाते हैं। 


माता का यात्रा पथ पर्ची कटाने के बाद आप यात्रा शुरू करते हो तेा सबसे पहली चौकी बाणगंगा की आती है जहां तक आप अगर पैदल ना भी जाना चाहेा तो आटो से जा सकते हो । बाणगंगा यहीं पर माता ने अपने भक्त हनुमान को प्यास लगने पर बाण मारकर धरती से पानी निकाला और उनकी प्यास बुझायी थी यहां पर्ची दिखाकर और सामान चैकिंग कराकर आपको आगे जाने दिया जाता है और चढाई शुरू हो जाती है । यहीं से आपको घोडे ,खच्चर , पालकी और सामान और बच्चो को ले जाने के लिये पोर्टर भी मिलते हैं यहां से दो तीन किलोमीटर की चढाई तक दोनो ओर प्रसाद और खाने पीने की दुकाने हैं जिनसे गुजरते हुए रास्ते का पता ही नही चलता है । यहीं पर उपर चढने वाले यात्रियेा को छडी और डंडे मिलते हैं जो कि 10 रू का होता है और अगर वापसी में आप इसे वापिस करो तो आधे पैसे में ले लेते हैं । बाण गंगा से आगे बढने पर चरण पादुका मंदिर आता है ।


चरण पादुका

बाणगंगा से आगे चलकर चरण पादुका नामक जगह आती है जहां पर माता के चरणो के निशान हैं । भैरो से हाथ छुडाकर माता ने इस शिला पर खडे होकर पीछे मुडकर भैरो को देखा था आदि कुमारी या अर्धकंवारी भैरो से बचने के लिये माता ने इस गुफा में नौ महीने तक छिपकर विश्राम किया था 14 किमी0 की चढाई में आधे रास्ते में आदि कुवारी माता का मंदिर आता है और गर्भजून गुफा । यह एक संकरी गुफा है पर माता के कमाल से आज तक कोई भी मोटे से मोटा आदमी भी नही फंसा यहां पर । इसमें जाने और आने का एक ही रास्ता है इसलिये काफी देर में नम्बर आता है दर्शनो का । यहां पर भी दर्शनो की पर्ची कटती है और नम्बर से दर्शन होते हैं । जब तक आपका नम्बर नही आता तब तक आप आराम कर सकते हैं । ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त इस गुफा में प्रवेश करता है उसे दोबारा गर्भ में नही आना पडता । वैसे मै माता के दरबार में आठ नौ बार जा चुका हूं पर आज तक इस गुफा के दर्शन नही कर पाया । शायद माता ने अभी तक नही चाहा है यहां से माता के भवन के लिये दो रास्ते जाते हैं एक रास्ता है हाथी मत्था और दूसरा नया रास्ता। 



हाथी माथा आदि कुमारी से आगे हाथी माथा वाले रास्ते पर तीन चार किलोमीटर की खडी चढार्इ् है । इस जगह पहाड की आकृति हाथी के सिर जैसी है और ये सबसे उंची जगह है । इसके बाद देा किलोमीटर की उतराई आती है इस रास्ते को जाना नही चाहिये जब तक मजबूरी ना हो क्योंकि अब जो नया रास्ता बना है वो इतना आसान है कि उस पर वृद्ध और विकलांगो के लिये बैट्री चालित स्कूटर चलते हैं जो कि 100 रू प्रति सवारी लेते हैं।  


सांझी छत हाथी माथा पर चढते चढते जब ढालान आ जाता है तो सांझी छत नाम की जगह आती है जहां पर हैलीकाप्टर की सेवाये उतरती हैं । हैलीकाप्टर जिसका किराया यहां एक ओर से 1200 रू प्रति व्यक्ति के करीब है यहां पर उतारते हैं और यहां से घोडे से करीब 1 किमी0 का सफर करके भवन तक पहुंचते हैं । उनकी लाइन भी बराबर में चलती रहती है । हैलीकाप्टर सेवा कटरा से शुरू होती है और लगभग 15 मिनट में भवन पर पहुंचा देते हैं। 


माता का भवन 

माता के भवन पर पहुंचकर सबसे पहले भक्त को मंदिर के नीचे बह रहे प्राकृतिक श्रोत में नहाकर और नये कपडे पहनकर अपनी पर्ची से ग्रुप नम्बर लेकर अपने दर्शनो के समय का आराम से बैठकर इंतजार करना चाहिये । यहां नये कपडो से आशय आप अपनी आत्मा को निर्मल करने से भी लगा सकते हैं क्योंकि नये कपडे पहनना अनिवार्य नही है बल्कि श्रद्धा पर निर्भर है । दर्शनो के लिये लाइन ज्यादा लम्बी नही होती और ना ही कोई धक्का मुक्की होती है। 



सुविधाये माता वैष्णो देवी का ये मंदिर श्राइन बोर्ड के अधीन है जो कि सरकारी है और उन्होने इस मंदिर का ऐसा नक्शा पलट दिया है कि भले ही दर्शनार्थियो की संख्या के मामले में ये दूसरे नंबर पर हो पर सुविधाओ के मामले में ये पहले नम्बर पर है जिनमें से कुछ मै आपको बता देता हूं एक — आपको प्रसाद सिवाय उपर भवन के अतिरिक्त कहीं से लेने की जरूरत नही क्योंकि वहां सरकारी दुकान से 11—21—51 तीन रेट में प्रसाद मिलता है बस इसके अलावा कुछ नही वो भी जूट के बने थैले मे जिसमें नारियल , चुनरी और प्रसाद सब होता है दो — आपको लाइन में धक्का मुक्की की कोई जरूरत नही आप अपनी पंजीकरण पर्ची को दिखाईये और अपना ग्रुप नम्बर ले लिजिये इसके बाद कहीं भी आसपास बैठकर आराम से टीवी स्क्रीन पर नंबर देखते रहिये और अपना नम्बर आने पर लाइन मे लगिये तीन — बाणगंगा से दो तीन किलोमीटर तक बाजार है पर उसके बाद जाने के आठ नौ और दूसरे रास्तो पर कोई दुकान प्राइवेट नही है पर यात्रियो की सुविधा के लिये चाय , काफी और आइसक्रीम की सरकारी रेट पर दुकाने है चार — जगह जगह यात्रियेा की सुविधा के लिये शेड बने हैं पांच — हर किलोमीटर पर जनसुविधायें जैसे कि टायलेट और पीने का पानी उपलब्ध है छह — गुफा में यानि भवन में आप प्रसाद ना ले जा सकते हैं ना चढा सकते हैं आपका प्रसाद पहले ही जमा कर लिया जाता है और बदले में एक टोकन मिलता है जिसे देकर दर्शन करने के बाद आप अपना प्रसाद वापस ले सकते हो और साथ में माता के मंदिर का प्रसाद जिसमे एक चांदी के सिक्के का बहुत ही हल्का सा रूप आपको मिलता है इसलिये आपको कहीं भी प्रसाद पैरो में बिखरा हुआ नही मिलता है जो कि हमारे यहां अन्य मंदिरो में अमूमन होता है। 



सात —भवन में पुजारी लोग ना तो आपसे प्रसाद लेते हैं ना देते हैं ना कोई चढावा चढा सकते हो । आपको प्यार से दर्शन करने के बाद आप दान पात्र में चढाओ या रसीद कटा लो । यदि आप 51 रू की भी रसीद काउंटर से बनवाते हो तो आपको माता के स्वर्ण श्रंगार का एक फोटो और साथ में एक प्रसाद की थैली और मिलती है आठ — यहां बिजली की निर्बाध आपूर्ति चौबीस घंटे रहती है जिससे कि पूरी पहाडी रात भर जगमगाती रहती है और चौबीसो घंटे यात्रा चलती है नौ —भक्तो की सुविधा के लिये पुरानी गुफा जिससे कि आजकल कम ही दर्शन होते हैं के अलावा दो नयी गुफाये बन गयी है जिनमें खडे खडे ही दर्शन हो जाते हैं और चौबीसेा घ्ंटे दर्शन चलते रहते हैं दस — भक्तो को कोई परेशानी ना हों इसलिये हजारो लाकर की यहां सुविधा है वो भी निशुल्क । बस अपनी पर्ची दिखाईये और एक से लेकर अपने सामान के अनुसार लाकर्स की चाबी लीजिये । अपने जूतो से लेकर बैग तक हर सामान उसमें रखिये और चाबी अपने गले में लटका लीजिये । वापसी में अपना सामान वापिस ले लीजिये ग्यारह — अगर आप उपर माता के भवन में रूकना चाहें तो निशुल्क रूकने की सुविधा है बस आपको अगर कम्बल लेने हो तो प्रति कम्बल 100 रू जमा कीजिये और सुबह कम्बल देकर अपने पैसे पूरे वापस यानि की कम्बल का कोई शुल्क नही है । 

काश ऐसे सुंदर और शांत तीर्थ हमारे यहां सभी हो जायें तेा कुछ लोगो को धर्म के प्रति आस्था खत्म ना हो और लोग अंधविश्वास मानकर मजाक ना बनायें। 


माता की कथा श्रीधर पंडित वर्तमान कटरा से 2 किमी0 की दूरी पर हंसली नाम के गांव में रहते थे वे माता वैष्णो देवी के परम भक्त थे पर उनके कोई संतान नही थी और संतान की इच्छा से एक बार उन्होने कन्या भोजन करवाने का मन बनाया । माता ने उनकी इच्छा को देखते हुए स्वयं कन्या रूप धारण किया और उनके घर आयी । जब सबने भोजन कर लिया और सब कन्याऐं भोजन कर अपने घर चली गयी तो कन्या रूपी माता ने पंडित को कहा कि आप सारे गांव को भोजन करवाओ और इस भोज में भैरोनाथ को भी आमंत्रित करेा । पंडित जी ने कहा कि सारे गांव को भोजन कराना मेरे बस में नही है इस पर कन्या ने उन्हे कोई चिंता ना करने की सलाह दी । कन्या की बात मानकर पंडित जी ने सारे गांव को आमंत्रित किया । तय समय पर सब लोग आ गये । कन्या रूपी माता भी आ गयी और सबको भोजन कराने लगी अपने हाथ से । वहीं बैठे हुए भैरोनाथ को शक हो गया कि ये कन्या नही माता है तो उसने माता से मांस एवं मदिरा की मांग की । इस पर माता ने कहा कि ये वैष्णव भक्त का घर है और यहां केवल शाकाहारी भोजन ही मिलेगा । भैरोनाथ ने क्रोध में आकर माता का हाथ पकड लिया माता ने अपना हाथ छुडाया और वायु मार्ग से अपनी गुफा में जाने लगी । भैरोनाथ् भी अपनी तप शक्ति से माता का पीछा करने लगा । माता के साथ हनुमान जी आ गये । रास्ते में हनुमान जी को प्यास लगने पर माता ने बाण मारकर धरती से पानी निकालकर उनकी प्यास बुझाई इस जगह को बाण गंगा कहते हैं आदि कुमारी के पास जाकर माता जी ने हनुमान जी से कहा कि तुम द्धार पर पहरा देना मै कुछ समय विश्राम करना चाहती हूं । माता ने यहां नौ महीने तक विश्राम किया । इधर माता का पीछा करते करते भैरोनाथ यहीं पहुंच गया और उसका हनुमान के साथ घमासान युद्ध होने लगा । जब हनुमान जी युद्ध करते करते थक गये तो माता माता गुफा से बाहर निकली और भैरोनाथ से युद्ध करने लगी । क्रोध में आकर माता ने अपने त्रिशूल से भैरोनाथ का सिर काट दिया जो उस स्थान पर गिरा जहां भैरोनाथ का मंदिर है । इस जगह को भैरोघाटी के नाम से भी जाना जाता है और भैरोनाथ का धड वो जगह है जहां पुरानी गुफा से होकर जाते हैं । भैरोनाथ को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह कटे हुए सिर से माता माता पुकारने लगा और विनती करने लगा कि माता संसार मुझे पापी मानकर मेरा अपमान करेगा , लोग मुझसे घृणा करेंगे आप मेरा उद्धार करो । यह सुनकर जगतजननी माता का मन पिघल गया और माता ने भैरो से कहा कि जो भी मेरे दर्शन को आयेगा वो जब तक तुम्हारे दर्शन नही कर लेगा तब तक उसकी यात्रा पूरी नही होगी । इसलिये भक्त दो किलोमीटर और चढकर भैरो मंदिर पर जाते हैं माता के दर्शनो के बाद दूसरी तरफ श्रीधर पंडित इस बात से दुखी था कि माता उसके घर आयी और वो पहचान ना सका तो माता ने श्रीधर को सपने में दर्शन दिये और अपनी गुफा का रास्ता बतलाया । उसी मार्ग पर चलकर श्रीधर वैष्णो माता के मंदिर पर पहुंचा जहां उसे माता के पिंडी रूप में दर्शन हु्ए



इस यात्रा में हमारा आखिरी पडाव था माता वैष्णो देवी का भवन । हम सुबह सुबह कटरा पहुंचे और सीधे चढना शुरू कर दिया आपको बताये गये तरीके से हमने सबने दर्शन किये और रात के ग्यारह बजे तक वापिस नीचे कटरा में अपनी गाडी तक पहुंच गये । हमारा ड्राइवर अपनी नींद पूरी कर चुका था सो उसके बाद हम सोये और उसने गाडी चलायी । पर सुबह कुरूक्षेत्र आने तक उसे भी नींद आने लगी थी । कहीं उसे झपकी ना लग जाये इसलिये मैने गाडी उससे ले ली और घर तक खुद चलाई क्योंकि तब तक मै सोकर तरोताजा हो चुका था । एक काम की बात और कि जम्मू की सीमा में प्रवेश करने के बाद पूरे देश के सभी कंपनियेा के प्रीपेड नंबर बंद हो जाते हैं और केवल पोस्टपेड कनैक्शन वो भी जिनकी नेशनल रोमिंग एक्टीवेट हो वो ही चल पाते हैं । इसलिये एक बार अपने कनेकशन को चैक कर लें यहां दर्शन करने के बाद अपने घर पर जाकर कन्या भोजन कराने की परंपरा है माता की इस यात्रा और इसके महात्मय के बारे में मै इसलिये इतनी अच्छी तरीके से लिख पाया क्योंकि चार धामेा से भी ज्यादा श्रद्धा मेरे मन में माता वैष्णो देवी के लिये है मैने कोशिश की पर चूंकि मुझे पता नही था कि मै लिखू्ंगा इसलिये ये फोटोज जो कि आप देख रहे हैं कई अलग अलग यात्राओ के हैं माता ने चाहा तो अबकी बार जैसे ही मां बुलायेगी आपको और बढिया जानकारी और फोटोज के साथ मिलू्ंगा अगर मुझसे कुछ छूट गया हेा तेा क्षमा करें और अगर अच्छा लगे तो एक बार यहां की यात्रा जरूर करें- बोल मेरी माई सचियां जोता वाली माता तेरी सदा ही जय.…… । 


 प्रसून पाल के साथ   



Vaishno Devi Mandir (Hindi: वैष्णोदेवी मन्दिर) is one of the holy Hindu temples dedicated to Shakti, located in the hills of Vaishno Devi, Jammu and Kashmir, India. In Hinduism,Vaishno Devi, also known as Mata Rani and Vaishnavi, is a manifestation of the Mother Goddess.

The temple is near the town of Katra, in the Reasi district in the state of Jammu and Kashmir. It is one of the most revered places of worship in India. The shrine is at an altitude of 5200 feet and a distance of approximately 14 kilometres (8.7 mi) from Katra. Approximately 8 million pilgrims (yatris) visit the temple every year and it is the second most visited religious shrine in India, after Tirumala Venkateswara Temple. The Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board maintains the shrine. A rail link from Udhampur toKatra is being built to facilitate pilgrimage. The nearest airport is Jammu Airport which has very high flight frequency. All leading domestic airlines have their services to Jammu Airport.



Significance


According to a Hindu epic,[which?] Maa Vaishno Devi was born in the south of India in the home of Ratnakar Sagar. Her worldly parents had remained childless for a long time. Ratnakar had promised, the night before the birth of the Divine child, that he would not interfere with whatever his child desired. Ma Vaishno Devi was called Trikuta as a child. Later She was called Vaishnavi because of Her taking birth from Lord Vishnu's lineage. When Trikuta was 9 years old, She sought her father's permission for doing penance on the seashore. Trikuta prayed to Lord Vishnu in the form of Rama. During Shree Rama's search for Sita, He reached the seashore along with His army. His eyes fell on this Divine Girl in deep meditation. Trikuta told Shree Rama that She had accepted Him as Her husband. Shree Rama told Her that during this Incarnation He had vowed to be faithful to only Sita. However pleased with her devotion , Lord Rama gave her name vaishnavi (devotee of lord rama (Maha Vishnu)and assured Her that in Kaliyuga He would manifest as Kalki and would marry Her.

In the meantime Shree Rama asked Trikuta to meditate in the cave found in the Trikuta Range of Manik Mountains, situated in Northern India.Lord Ram gave her a bow and arrows, army of monkeys and a lion for her protection, Ma decided to observe the 'Navratra' for the Victory of Shree Rama against Ravana. Hence one reads the Ramayanaduring the 9 days of Navratra, in remembrance of the above connection. Shree Ramapromised that the whole world would sing Ma Vaishno Devi's praise. Lord Rama also said Trikuta was to become famous as Vaishno Devi and would become immortal forever.The abode of Maa Vaishno devi is attaining huge pilgrimage attraction due to Lord Rama's blessings to the goddess.

With the passage of time many more stories about the Mother Goddess emerged. One such story is about Shree-Dhar.

Shree-Dhar was an ardent devotee of Ma Vaishno Devi. He resided in a village called Hansali, 2 km away from the present Katra town. Once Ma appeared to him in the form of a young bewitching girl. The young girl asked the humble Pandit to hold a 'Bhandara'. (A feast to feed the mendicants and devotees) The Pandit set out to invite people from the village and near-by places. He also invited 'Bhairav Nath' a selfish tantrik. Bhairav Nath asked Shri-Dhar how he was planning to fulfil the requirements. He reminded him of the bad consequences in case of failure. As Panditji was lost in worry, the Divine girl appeared and told Him not to be despondent as everything had been arranged. She asked that over 360 devotees be seated in the small hut. True to Her word the Bhandara went smoothly with food and place to spare. Bhairav Nath admitted that the girl had supernatural powers and decided to test Her further. He followed the Divine girl to Trikuta Hills. For 9 months Bhairav Nath was searching for the mystic girl in the mountains, whom he believed was anincarnation of the Mother Goddess. While running away from Bhairav, Devi shot an arrow into the Earth from which water gushed out. The resultant river is known as Baanganga. It is believed that by taking a bath in Baanganga (Baan: Arrow), a believer of the Mother Goddess can wash away all his sins. The banks of the river, known as Charan Paduka, are marked by Devi's foot imprints, which remains intact till date. Vaishno Devi then took shelter in a cave known as Garbh Joon near Adhkawari where she meditated for 9 months attaining spiritual wisdom and powers. Her meditation was cut short when Bhairav located her. Vaishno Devi was then compelled to take the form of Maha Kali when Bhairav tried to kill her. The manifestation of the Mother Goddess took place at the mouth of the Holy cave at Darbar. The Goddess then beheaded Bhairav with such sheer force, that his skull fell at a place known as Bhairav Ghati, 2.5 km from the Holy Cave.

In his dying moments, Bhairav pleaded for forgiveness. The Goddess knew that Bhairav's main intention in attacking her was to achieve salvation. She not only granted Bhairav liberation from the cycle of reincarnation, but also granted him a boon, whereby every devotee, in order to ensure completion of the pilgrimage, had to visit Bhairav Nath's temple near the Holy cave after the darshan of the Goddess.Meanwhile Vaishno Devi assumed the shape of a rock with three pindis (heads) and immersed herself into meditation forever.

Meanwhile, Pandit Shree-Dhar became impatient. He started to march towards Trikuta Mountain on the same path that he had witnessed in a dream. He ultimately reached the cave mouth. He made a daily routine of worshipping the 'Pindis' in several ways. His worship pleased the Goddess. She appeared in front of him and blessed him. Since that day, Shree-Dhar and his descendants have been worshipping the Goddess Mother Vaishno Devi.






07 मई 2014

जगकल्याण का मई 2014 अंक

जगकल्याण का मई  2014
अंक प्रकाशित हो चुका है. - समाचार संपादक - राजेश मिश्रा| 


इसमें ..... गर्मी से बचाव ..., हरिद्वार में श्री हरिनिवास, सुहागिनों का त्यौहार है "वट सावित्री', चन्दन यात्रा पर विशेष आलेख : चंदन का लेप कृष्ण को बचाता है गर्मी से, जब यमराज हार गये सावित्री से, पंचमुखी हनुमान मंदिर, राजाकटरा, गंगा दशहरा-गंगा अवतरण, गंगा दशहरा पर इस तरह करें गंगा पूजन, मायापुर में भी विराजमान हैं भगवान नृसिंह, सीता जनक की नहीं तो किसकी बेटी थीं?, पापों से मुक्ति दिलाता है मोहिनी एकादशी, बुद्ध पूर्णिमा या बुद्धि जयंती, सन्नी अग्रवाल अभिनीत "कहीं है मेरा प्यार' शीघ्र होगी रिलीज, व्रत-त्यौहार, राशिफल- हंसना मना है, श्री बॉंकेबिहारी जी के चमत्कार, भगवद्‌गीता (नाट्‌यरूप), संस्था समाचार , ज्योतिष समस्या व समाधान, बाल कहानी : चटोरे टीकू को सबक, परवरिश एवं तेनाली राम के किस्से, महिला कल्याण शामिल है.


समाचार संपादक - राजेश मिश्रा| 

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