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07 जून 2014

भगवान श्री हनुमानजी

हनुमानजी की बाल्यावस्था


कल्पभेद से कोई भक्त चैत्र सुद 1 मघा नक्षत्र को मानते है । कोई कारतक वद 14, कोई कारतक सुद 15, कोई मंगलवार तो कोई शनिवार मानते हैं । लेकिन भावुक भक्तों के लिए अपने आराध्यदेव के लिए सभी तिथीयाँ शुभ और श्रेष्ठ मानी जाती हैं ।

भगवान शिव, श्री हनुमानजी के आराध्य देव और श्रीराम की लीला के दर्शन हेतु और मुख्यतया उनकी श्रीराम के शुभ कार्यों में सहायता प्रदान हेतु अपने अंश ग्यारहवें रुद्र से शुभतिथी अनु शुभ मूर्हुत में माता श्री अंजनी के गर्भ से श्री पवनपुत्र महावीर हनुमानजी के रुप में धरती पर उनका प्रागट्य हुआ । मूल ग्यारहवें रुद्र भगवान शिव के अंशज, भगवान श्री विष्णु (श्रीराम) की सहायता हेतु प्रगट हुए ।

श्री अंजनीमाता के पति श्री केसरी होने के कारण श्री हनुमानजी केसरी नंदन भी कहे जाते हैं ।
श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था एवं उसकी कथाएं

माता श्री अंजनी और कपिराज श्री केसरी हनुमानजी को अतिशय प्रेम करते थे । श्री हनुमानजी को सुलाकर वो फल-फूल लेने गये थे इसी समय बाल हनुमान भूख एवं अपनी माता की अनुपस्थिति में भूख के कारण आक्रन्द करने लगे । इसी दौरान उनकी नजर क्षितिज पर पड़ी । सूर्योदय हो रहा था । बाल हनुमान को लगा की यह कोई लाल फल है । (तेज और पराक्रम के लिए कोई अवस्था नहीं होती । यहां पर तो श्री हनुमान जी के रुप में माताश्री अंजनी के गर्भ से प्रत्यक्ष शिवशंकर अपने ग्यारहवें रुद्र में लीला कर रहे थे और श्री पवनदेव ने उनके उड़ने की शक्ति भी प्रदान की थी ।

उस लाल फल को लेने के लिए हनुमानजी वायुवेग से आकाश में उड़ने लगे । उनको देखकर देव, दानव सभी विस्मयतापूर्वक कहने लगे कि बाल्यावस्था में एसे पराक्रम दिखाने वाला यौवनकाल में क्या नहीं करेगा ?



श्री वायुदेव ने अपने पुत्र को सूर्य के समीप जाते हुए देख चिन्ता होने लगी के कहीं मेरे पुत्र को सूर्य किरणें जला न दें, वो जल न जाये । इसी कारण श्री पवनदेव बर्फ की तरह शीतल होकर बहने लगे । वैसे भी इस अलौकिक बालक श्री हनुमान को अपनी ओर आता हुआ देखकर भगवान श्री सूर्यदेव को भी पहचानने में देर नहीं लगी की यह तो पवनपुत्र है, जो अपने पिता की तरह वायु वेग से मेरी ओर आ रहे हैं और साथ में श्री पवनदेव भी उनके पुत्र की रक्षा हेतु उड़ रहे हैं ।

सूर्यदेव ने अपना सौभाग्य समझा के स्वयं भगवान शिवशंकर, हनुमान के रुप में मुझे कृतार्थ करने आ रहे हैं । तो श्री हनुमानजी को सूर्यदेव की तरफ से आवकार मिलने पर बालक श्री हनुमानजी सूर्यदेव के रथ के साथ खेलने लगे । संयोग एसा था की उस दिन अमावस थी और संहिक्ष का पुत्र राहु सूर्यदेव को ग्रसने के लिए आया । राहु ने देखा कि श्री सूर्यदेव के रथ पर कोई बालक है । राहु उस बालक की परवा न कर सूर्य को ग्रसने के लिए आगे बढ़ा ही था की श्री हनुमानजी ने राहु को पकड़ लिया । हनुमानजी की मुठ्ठी में राहु छिटपिटाने लगा और अपने प्राण बचाकर भागकर इन्द्रदेव के पास पहुंचा और उनकी फरियाद कि के सूर्य मेरा जो ग्रास है उस अधिकार को आपने किसी और को क्यों दिया । एसा कहकर रुदन करने लगा । इन्द्रदेव चिंतित हुए की वो कौन होगा जो राहु जैसे पराक्रमी को मात कर सके ।

श्री इन्द्रदेव स्वयं ऐरावत हाथी को लेकर घटनास्थल पर पहुंचे । वहां राहु को देखकर फिर से श्री हनुमानजी ने उसको पक़ड़ लिया । राहु फिर से उनको देखकर भागने लगा और इन्द्रदेव के पास पहुंचा । तभी राहु के पीछे श्री हनुमानजी उसके पीछे भागे वहां श्री हनुमानजी इन्द्रदेव के वाहन ऐरावत को देखकर उसको कोई खाद्यपदार्थ समझ कर ऐरावत पर तूट पडे । इन्द्रदेव भी बालक की ताकत को देखकर ड़रने लगे और तभी अपनी रक्षा हेतु हनुमानजी पर अपने हथियार वज्र से प्रहार किया जो हनुमानजी की दाढ़ी पर लगा (जिसको संस्कृत में हनु (दाढ़ी) कहा जाता है और उसी वजह से हनुमानजी का नाम “हनुमान” पड़ा ।) और हनुमानजी मूर्छित हुए । अपने प्राणप्रिय पुत्र को वज्र के आघात से छटपटाते हुए देखकर वायुदेव ने अपना वेग रोक दिया और अपने पुत्र को लेकर गुफा में चले गये ।

एसा होने के कारण तीनो लोक में वायु का संसार बंध हो गया । समस्त प्राणीओ में श्वाससंचार बंद हो गया । सभी कर्म रुक गए, प्राण संकट में पड़ गये । इन्द्र आदि देवों, गन्धर्व, नाग यह सभी जीवनरक्षा हेतु ब्रह्माजी के पास गये । ब्रह्माजी सभी को अपने साथ लेकर गिरीगुफा पहुंचे और वहां जाकर बालक श्री हनुमानजी को श्री पवनदेव के हाथ से लेकर अपनी गोद में लिए तब हनुमानजी की मूर्छा दूर हुई और वे फिर से खेलने-कूदने लगे । अपने पुत्र को जीवंत देखकर प्राणस्वरुप श्री पवनदेव पहले की तरह सरलता से बहने लगे और तीनो लोक फिर से जीवंत हो उठे ।

तभी श्री ब्रह्माजी ने श्री हनुमानजी को वरदान दिया कि इस बालक को कभी ब्रह्मशाप नहीं लगेगा, कभी भी उनका एक भी अंग शस्तर नहि होगा, ब्रह्माजीने अन्य देवताओं से भी कहा कि आप इस बालक को आप भी वरदान दो तब देवराज इन्द्रदेव ने हनुमानजी के गले में कमल की माला पहनाते हुए कहा की मेरे वज्रप्रहार के कारण इस बालक का हु(दाढ़ी) तूट गई है इसी लिए यह कपिश्रेष्ठ का नाम आज से हनुमान रहेगा और मेरा वज्र भी इस बालक को नुकसान न पहुंचा सके एसा वज्र से कठोर होगा । श्री सूर्यदेव ने भी कहा कि इस बालक को में अपना तेज प्रदान करता हूं और मैं इसको शस्त्र-समर्थ मर्मज्ञ बनाता हुं । यह बालक एक अद्वितिय विद्वान वक्ता बनेगा । श्री वरुणदेव ने कहा की यह बालक जल से सदा सुरक्षित रहेगा । श्री यमदेव ने कहा कि यह बालक सदा निरोगी एवं मेरे दण्ड से मुक्त रहेगा । श्री कुबेर ने कहा कि युद्ध में विषादित नहीं होगा एवं राक्षसो से भी पराजित नहीं होगा । खुद भोलेनाथ शिवशंकर ने भी अभय वरदान प्रदान किया । श्री विश्वकर्माने भी कहा कि मेरे द्वारा निर्मित शस्त्र एवं वस्तुएं सभी से सुरक्षित रहेगा । श्री ब्रह्माजी ने पुनः वरदान दिया की पवनदेव, आपका ये पुत्र शत्रुओं के लिए भयंकर और मित्रो के लिए अभयदाता बनेगा और इच्छानुसार स्वरुप पा सकेगा । जहां जाना हो वहां जा सकेगा । उसको कोई पराजित नहीं कर सकता एसा असिम यशस्वी होगा और अदभुत कार्य करेगा ।


इस तरह बाल्यावस्था में श्री हनुमानजी चंचल और नटखट स्वभाव के थे । हाथी की शक्ति प्रमाण करने के लिए हाथी को पकड़कर उसको उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते । बड़े-बड़े वृक्षों को भी जडमूल से उखाडकर फेंकते एसी अतूट शक्ति उनमें थी । एसा कोई पर्वतीय शिखर नहीं था जहाँसे श्री हनुमानजीने छलांग न लगाई हो ।

कई बार ऋषिमुनियों के आश्रम में पहुंच जाते और नादान हरकतें करते कि जिससे ऋषिमुनीओं की तपस्या एवं व्रत भंग होते । ऋषिमुनियों के कमडंल, आसन इत्यादी वृक्ष पर टाँग देते और एसी अनेक अडचने पैदा करते । आयु बढ़ने के साथ-साथ श्री हनुमानजी की नटखटता भी बढ़ती चली गई इस वजह से उनके माता-पिता भी चिंतित हुए और ऋषि के पास पहुंचे और ऋषियों को हनुमानजी की गाथा सुनाई । तभी वानरराज केसरीने कहा की हमें यह बालक कठोर तप के प्रभाव से प्राप्त हुआ है । आप उस पर अनुग्रह करो एसी कृपा करो की जिससे उसकी नटखटता में परिवर्तन हो । ऋषियों ने सोचा कि जो श्री हनुमानजी अपनी शक्तियों को भूल जाएं तो एसी हरकतें बंद हो जायेगी और उनका हित भी उसी में समाया हुआ है । ऋषि जानते थे के यह बालक का श्री राम के कार्य हेतु जन्म हुआ है । यह सोचकर भृगु और अंगिरा के वंश में उत्पन्न हुए ऋषिमुनीयों ने श्री हनुमानजी को शाप दिया की वानरवीर आपको अपने बल और तेज का ध्यान नहीं रहेगा । जब कोई आपकी कीर्ति और बल का स्मरण करायेगा तभी आप का बल बढ़ेगा । एसे शाप के कारण श्री हनुमानजी का बल एवं तेज कम हो गया और वह सौम्य स्वभाव के हो गये । इस तरह ऋषिभी प्रसन्न हुए ।

उसके बाद श्री हनुमानजी के उपनयन संस्कार हुए । भगवान श्री सूर्यनारायण को गुरु बनाया । समस्त वेदशास्त्र, उपशास्त्र सविधि प्राप्त कर श्री सूर्यनारायण के पास से शिक्षा प्राप्त करते हुए श्री हनुमानजी हर हंमेश श्री रामनाम एवं उनका स्मरण करते गये । श्री राम के स्मरण में जैसे श्री हनुमानजी भक्तिमय हो गये ।

इस तरह श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था बहुत ही विशिष्ट एवं अदभूत रही ।

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