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24 जून 2014

आस्था और विश्‍वास का केंद्र

तिरुपति बालाजी महाराज 
गोविन्द-गोविंदा- गोविंदा


तिरुपति बाला जी का रोम-रोम कर्ज में डूबा है! अपनी शादी के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। देवताओं के कहने पर कुबेर ने उनके लिए धन का इंतजाम किया और बालाजी श्रीनिवास वेंकटेश्‍वर ने उन्‍हें वचन दिया कि वह अपने भक्‍तों से प्राप्‍त दान से ही उनका कर्ज उतारेंगे। कहा जाता है, बालाजी को शादी के लिए कुबेर ने उस जमाने अर्थात चोल शासन काल के समय करीब 75 करोड़ रुपए की राशि दी थी! श्रीनिवास ने उनसे कहा, कलियुग का अंत होते ही वह उनका पूरा मूलधन वापस कर देंगे, लेकिन तब तक उन्‍हें ब्‍याज यानी सूद देते रहेंगे। बालाजी भक्‍तों से प्राप्‍त धन को अभी तक कुबेर को सूद के रूप में ही चुका रहे हैं। ब्रह्मा और शिव श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए इस लेने-देन के साक्षी बने। लेकिन सच पूछिए तो भगवान और भक्‍त के इस 'लेन-देने संबंध' में समाज को समृद्ध बनाने का दर्शन छिपा है!

चलिए बालाजी की शादी की रोचक कथा से इसकी शुरुआत करता हूं

पदमावती का जन्‍म: चोल राज आकाशराजा को कोई संतान नहीं था। उन्‍होंने श्रीशुक मुनि की आज्ञा से संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। यज्ञ के अंत में यज्ञशाला में राजा द्वारा हल जोतने की परंपरा थी। हल जोतते समय हल का फल किसी कठोर वस्‍तु से टकराई। राजा ने जमीन खोदकर जब उसे निकाला तो वह एक छोटी पेटी यानी बक्‍सा था। पेटी को खोलने पर सहस्रदलवाले कमल में एक शिशु कन्‍या बिलखती हुई मिली। चोल राजा अति प्रसन्‍न हुए। चूंकि शिशु कन्‍या कमल के फूल में मिली थी इसलिए राजा ने उसका नाम पदमावती रखा।

श्रीनिवास और पदमावती की पहली मुलाकात: समय व्‍यतीत होता रहा और पदवावती कमल के फूल के समान खिलती हुई यौवन की दहलीज पर पहुंच गई। एक दिन पदमावती उद्यान में फूल चुन रही थी। उस वन में श्रीनिवास(बालाजी) आखेट के लिए गए थे। उन्‍होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और वह डर कर भाग रही है। श्रीनिवास जी ने वाण चलाकर हाथी के वेग को रोका और उस युवती यानी पदमावती की जान बचाई। श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन एक-दूसरे की सुंदरता पर रीझ गए। दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अनुराग यानी प्रेम उत्‍पन्‍न हो गया, लेकिन दोनों बिना कुछ कहे चुपचाप अपने-अपने घरों को लौट गए।
श्रीनिवास का विरह: 
श्रीनिवास अपने घर तो लौट आए, लेकिन उनका मन पदमावती में ही बस गया। वह रात-दिन उस युवती के बारे में ही सोचते रहते थे। अपनी बेचैनी को कम करने के लिए उन्‍होंने उस युवती का पता लगाने की तरकीब सोची और एक ज्‍योतिष का रूप धारण किया और लोगों का भविष्‍य बताने वाले के रूप में उस युवती को ढूंढने निकल पड़े। धीरे-धीरे एक अच्‍छे भविष्‍यवक्‍ता के रूप में श्रीनिवास की ख्‍याति चोल राज में फैल लगी।
पदमावती का विरह: दूसरी तरफ पदमावती को भी चैन नहीं था। उसकी आंखों के सामने भी उसी युवक का चेहरा घूमता रहता था। उसने खाना-पीना कम कर दिया था। वह सो नहीं पाती थी। धीरे-धीरे प्रेम विरह के कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया। अपनी पुत्री की यह दशा राजा से देखी नहीं जा रही थी। ज्‍योतिष श्रीनिवास की प्रसिद्धि उनके कानों तक भी पहुंची। उन्‍होंने श्रीनिवास को अपने दरबार में बुलवा भेजा।
राजा ने कहा, 'मान्‍यवर मेरी पुत्री न कुछ खाती है न पीती है। वह किसी शोक के कारण व्‍यथित है। मुझसे उसका दुख देखा नहीं जाता, लेकिन क्‍या करूं वह किसी को कुछ बताती भी नहीं है।' श्रीनिवास ने कहा, ' हे राजन आप अपनी पुत्री को बुलाइए, जरा दूखूं तो आखिर उनके शोक का कारण क्‍या है।' मन ही मन श्रीनिवास को आभास हो गया कि कहीं यह उसकी मंजिल ही तो नहीं है।
राजा ने पदमावती को बुलवाया। श्रीनिवास की नजर ज्‍यों ही पदमावीत पर पड़ी वह मन ही मन बेहद खुश हुआ और सोचा कि चलो मेरी इस युवती की खोज के लिए की गई मेहनत सफल रही। उसने पदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया, उसे कुछ देर पढने का उपक्रम करता रहा और बोला, '' हे राजन अपनी पुत्री प्रेम विरह में जल रही है।' पदमावती ने उसकी आवाज सुनी तो उसने नजरें ऊपर उठाई। श्रीनिवास को देखते ही उसने उसे पहचान लिया और प्रसन्‍न हो गई। अरसे बाद अपनी पुत्री की प्रसन्‍नता देख राजा को लगा कि ज्‍योतिष ने सही मर्ज पकड़ लिया है।
राजा ने कहा, ' आखिर मेरी पुत्री को किससे प्रेम है?'
'आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी। तभी वहां एक हाथी पहुंचा और उन पर हमला कर दिया। आपके सैनिक और इनकी दासियां भाग खड़ी हुई। राजकुमारी घबरा गई थी, लेकिन तभी एक युवक धनुष वाण के साथ आया और उसने आपकी पुत्री को हाथी से बचा लिया''-श्रीनिवास ने कहा।
' हां ऐसी घटना मेरे सैनिकों ने बताई थी, लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्‍या तात्‍पर्य!'
' है राजन, उस घटना से ही इसका तात्‍पर्य है। आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है।'
पदमावती शरमा कर अंदर चली गई।
राजा ने कहा, 'क्‍या आप उस युवक के बारे में कुछ बता सकते हैं?'
'हां, क्‍यों नहीं। वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख-चक्र धारी स्‍वयं भगवान विष्‍णु हैं तो इस समय बैकुंठ को छोड़कर मानव रूप में श्रीनिवास जी के नाम से पृथ्‍वी पर वास कर रहे हैं। आप निश्चिंत होकर अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें। मैं इसकी व्‍यवस्‍था कर दूंगा।'
इस तरह श्रीनिवास और पदमावती की शादी तय हो गई।

शादी में कुबेर से लिया कर्ज उतारने के लिए ही भक्‍तों से धन लेते हैं बालाजी

(तिरुपति बालाजी दोनों हाथों से देते हैं धन, बस थोड़ा उनके लिए भी रख दीजिए! )
देवताओं को निमंत्रण: श्रीनिवास ने अपनी शादी की बात सभी देवी-देवताओं को बताने के लिए शुक मुनि (परम ज्ञानी तोता) को स्‍वर्ग लोग में भेज दिया। स्‍वर्ग लोक में श्रीनिवास जी की शादी का पता चलते ही देवी-देवता अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए। देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने पृथ्‍वी पर पहुंचे और उन्‍हें बधाई दी। लेकिन श्रीनिवास जी खुशी की जगह चिंता में मग्‍न बैठे थे।
देवताओं ने पूछा, '' हे भगवन इस खुशी के मौके पर आप इतने चिंतातुर क्‍यों है।''
श्रीनिवास जी ने कहा, '' बंधुओं चिंता की तो बात ही है। पदमावती कहां राजा की पुत्री है और मैं कहां एक साधारण मानव के रूप में जीवन व्‍यतीत कर रहा हूं। राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की जरूरत है, वह मैं कहां से लाऊं।''
' बस इतनी-सी बात'- देवताओं ने कहा। 
' हम कुबेर से कह कर आपके लिए धन की व्‍यवस्‍था कर देंगे। इससे आपकी शादी भी हो जाएगी और ऐश्‍वर्य व वैभव भी आपके दास रहेंगे।'
ब्रहमा और शिव सहित सभी देवताओं ने कुबरे की स्‍तुति की, जिसके बाद कुबेर प्रकट हुए।
कुबेर ने ऋण देना स्‍वीकार किया: देवताओं ने श्रीनिवास जी की शादी की बात कुबरे को बताई और धन से सहायता करने की मांग की। कुबेर ने कहा, 'यह तो मेरा परम सौभाग्‍य होगा कि मैं भगवान विष्‍णु के काम आ सका। भगवन आप जितना स्‍वर्ण और धन चाहें, ले लें। कुबेर का खजाना आप ही का है! ''
'नहीं, कुबेर जी। मैं जरूरत के हिसाब से ही स्‍वर्ण और धन लूंगा और मेरी एक शर्त भी होगी!' 
' शर्त कैसी भगवन!'
' भगवान ब्रहमा और शिव साक्षी हैं। आप मुझ पर अहसान नहीं करेंगे, बल्कि मुझे ऋण के रूप में धन देंगे, जिसका पाई-पाई मैं ब्‍याज सहित चुकाऊंगा।'
' भगवन आप कैसी बात कर रहे हैं!'
मानव की कठिनाई को मैं महसूस करना चाहता हूं: ' नहीं मानव रूप में मैं कठिनाईयों का सामना करूंगा, जो कठिनाई मानव के जीवन में आता है। उन कठिनाईयो में धन की कमी और कर्ज का बोझ सबसे बड़ा है।'
' बुरा न मानें प्रभु, लेकिन जब आप ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको यह भी बताना होगा कि आप यह धन चुकाएंगे कैसे। ऋणदाता को इसकी गारंटी भी तो चाहिए।'
भक्‍त और भगवान के बीच विश्‍वास से अधिक पारस्‍परिकता का है रिश्‍ता: श्रीनिवास ने कहा, '' यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्‍त चुकाएंगे, लेकिन वह भी मुझ पर कोई अहसान नहीं करेंगे बल्कि मैं उन्‍हें धनवान बनाऊंगा। ''
'कैसे?'- कुबेर जी ने आश्‍चर्य से पूछा।
' कलयुग के आखिरी तक पृथ्‍वी पर मेरी पहचान एक ऐसे देवता के रूप में होगी, जो धन, ऐश्‍वर्य और वैभव से परिपूर्ण है। मेरे भक्‍त मुझसे धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की मांग करने आएंगे और मैं उन्‍हें यह अवश्‍य दूंगा। बदले में मेरे भक्‍त जो चढ़ावा चढ़ाएंगे वह मैं आपको ऋण के रूप में चुकाता रहूंगा।'
' परंतु भगवन आप मानव जाति पर विश्‍वास कर रहे हैं। यदि आपके भक्‍त आपके आशीर्वाद से धनवान होने के बाद चढ़ावा चढ़ाने आए ही न तो आप मेरा ऋण फिर कैसे चुका पाएंगे।'
' कुबेर जी ऐसा नहीं होगा। मेरे भक्‍तों की मुझमें अटूट श्रद्धा होगी। वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्‍त धन में मेरा हिस्‍सा रखेंगे। शरीर त्‍यागने के बाद तिरुपति के तिरुपला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे। मेरी मूर्ति उन्‍हें इसका अहसास कराती रहेगी कि मैं एक हाथ से धन देता हूं तो दूसरे हाथ से उनसे धन देने को भी कहता भी हूं। यह एक भक्‍त और भगवान की एक-दूसरे पर विश्‍वास से अधिक साझेदारी का रिश्‍ता है। इस रिश्‍ते में न कोई दाता है और न कोई याचक, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और सही मायने में एक भगवान और भक्‍त का रिश्‍ता भी ऐसा ही होना चाहिए। ''
ईश्‍वर के रहते यदि गरीबी है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नही होगा: ''भक्‍त की भक्ति और अराधना उस पर भगवान के कृपा और प्रेम की वर्षा करता है। कम से कम कलियुग में भगवान बालाजी के रूप में एक ऐसे अराध्‍य होंगे जो कृपा और प्रेम के साथ वैभव का दाता भी होगा। वह धन को त्‍यागने की नहीं, बल्कि धन से ऐश्‍वर्य पाने के लिए प्रेरित करेगा ताकि पूरे समाज में वैभव आए, दरिद्रता मिटे और गरीबी दूर हो।''
' वाह भगवन!'
'' हां, कुबेर जी यदि ईश्‍वर के रहते गरीबी, दुख और दरिद्रता है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नहीं होगा। एक गरीब व्‍यक्ति पहले अपनी रोटी की चिंता करेगा या धर्म की। अध्‍यात्‍म की ओर मन भी तभी जाता है जब पेट भरा हो। इसलिए हे कुबेर, कलियुग के आखिरी तक भगवान बालाजी धन, ऐश्‍वर्य और वैभव के दाता के देवता बने रहेंगे। मैं अपने भक्‍तों को धन से परिपूर्ण बनाऊंगा और मेरे भक्‍त दान देकर न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे। यह एक भक्‍त और भगवान के परस्‍पर आश्रितता और विश्‍वास का रिश्‍ता है। कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा।''
'' भगवन आप धन्‍य हैं। भक्‍त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्‍ते की कल्‍पना कभी न देखा और न सुना। यह तो एक ऐसा रिश्‍ता है, जोऊपर से तो केवल एक भक्‍त और भगवान के बीच भक्ति और विश्‍वास का रिश्‍ता दिखता है, लेकिन वास्‍तव में यह एक परस्‍पर साझेदारी से विकसित होने वाले समृद्ध समाज की रचना की सीख देता है। ''
'यही मेरा उद्देश्‍य भी है कुबेर जी! इस बार मानव रूप में पृथ्‍वी पर आने के पीछे का कारण भी यही है कि मैं कभी वैभव से परिपूर्ण रहे इस समाज को फिर से समृद्धि और ऐश्‍वर्य का दर्शन करा सकूं '- भगवान श्रीनिवास ने कहा।
भगवान श्रीनिवास और कुबरे के बीच हुई वार्ता के साथी स्‍वयं ब्रहृमा और शिव हैं। आज भी पुष्‍करिणी के किनारे ब्रह्मा और शिव बरगद के पेड़ के रूप में खड़े हैं। ऐसा कहा जाता है कि विकास के दौरान इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी। लोगों ने पेड़ काटना बंद किया। बाद में उसे देवता की तरह पूजा जाने लगा। आज भी बालाजी का दर्शन करने के लिए जाने वाले लोग इन दो बरगद के पेड़ों का दर्शन करते हैं।
बाद में बड़ी धूमधाम से श्रीनिवास और पदमावती की शादी हुइ्र, जिसमें ब्रहमा और शिव के अलावा सभी देवगण और मुनिगण शामिल हुए।

कलयुग में बालाजी एकमात्र भगवान हैं जो खुलकर कहते हैं कि '' हे भक्‍त तुम मुझसे घुमा-फिरा कर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे घन, वैभव और ऐश्‍वर्य मांगो। मैं तुम्‍हें वह सब दूंगा, बस शर्त है कि तुम उसमें से मेरा एक भाग रख दो।'' बालाजी की मूर्ति आप देखेंगे तो उनका एक हाथ धन दे रहा है और दूसरा हाथ धन मांग रहा है।
वास्‍तव में भगवान बालाजी सही अर्थो में समाजवाद को चरितार्थ कर रहे हैं। स्‍पष्‍ट है यदि समाज में धन होगा ही नहीं जो उसका बंटवारा कैसे होगा? एक दरिद्र समाज दरिद्रता ही बांट सकता है! यही कारण है कि साम्‍यवाद और उसका परिष्‍कृत रूप समाजवाद सैद्धांतिक रूप से सभी को लुभाता जरूर है, लेकिन व्‍यावहारिक धरातल पर वह दुनिया में दम तोड़ता नजर आता है।
बाला जी की दूसरी शिक्षा भी बड़ी महत्‍वपूर्ण है। इस कलियुग में आप किसी पर न अहसान कीजिए और न अहसान लीजिए, बल्कि लोगों के बीच पारस्‍परिकता का संबंध विकसित कीजिए। पारस्‍परिकता के आधार पर विकसित संबंध कभी आपको चोट नहीं पहुंचाएगा, लेकिन जिस संबंध में अहसान होगा, सिद्धांत होगा और आदर्शवाद का धरातल होगा वह संबंध कभी भी एक फूल की भांति विकसित नहीं हो सकेगा।

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