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31 जुलाई 2014

Jab Hanuman ne Tino ka Ghmand Chur kiya.

जब हनुमान ने तीनों का घमण्ड चूर किया

संसार में किसी का कुछ नहीं। ख्वाहमख्वाह अपना समझना मूर्खता है, क्योंकि अपना होता हुआ भी, कुछ भी अपना नहीं होता। इसलिए हैरानी होती है, घमण्ड क्यों? किसलिए? किसका? कुछ रुपये दान करने वाला यदि यह कहे कि उसने ऐसा किया है, तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं और ऐसे भी हैं, जो हर महीने लाखों का दान करने हैं, लेकिन उसका जिक्र तक नहीं करते, न करने देते हैं। वास्तव में जरूरतमंद और पीड़ित की सहायता ही दान है, पुण्य है। ऐसे व्यक्ति पर सरस्वती की सदा कृपा होती है।

पर क्या किया जाए, देवताओं तक को अभिमान हो जाता है और उनके अभिमान को दूर करने के लिए परमात्मा को ही कोई उपाय करना पड़ता है। गरुड़, सुदर्शन चक्र तथा सत्यभामा को भी अभिमान हो गया था और भगवान श्रीकृष्ण ने उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी।

श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था और वह इसीलिए अपने आपको श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिया और अति सुंदरी मानने लगी थी। सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। वह लोकालोक के अंधकार को दूर कर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण अतंत उसकी ही सहायता लेते हैं। गरुड़ भगवान कृष्ण का वाहन था, वह समझता था, भगवान मेरे बिना कहीं जा ही नहीं सकते। इसलिए कि मेरी गति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

भगवान अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं। इसलिए उन्होंने हनुमान जी का स्मरण किया। तत्काल हनुमान जी द्वारिका आ गए। जान गए कि श्रीकृष्ण ने क्यों बुलाया है। श्रीकृष्ण और श्रीराम दोनों एक ही हैं, वह यह भी जानते थे। इसीलिए सीधे राजदरबार नहीं गए कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए| वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ तो तोड़ डाला... बाग वीरान बना दिया। फल तोड़ना और फेंक देना, हनुमान जी का मकसद नहीं था... वह तो श्रीकृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे... बात श्रीकृष्ण तक पहुंची, किसी वानर ने राजोद्यान को उजाड़ दिया है... कुछ किया जाए। श्रीकृष्ण ने गरुड़ को बुलाया। "कहा, "जाओ, सेना ले जाओ। उस वानर को पकड़कर लाओ।"

गरुड़ ने कहा, "प्रभु, एक मामूली वानर को पकड़ने के लिए सेना की क्या जरूरत है? मैं अकेला ही उसे मजा चखा दूंगा।" कृष्ण मन ही मन मुस्करा दिए... "जैसा तुम चाहो, लेकिन उसे रोको।" जाकर... वैनतेय गए। हनुमान जी को ललकारा, "बाग क्यों उजाड़ रहे हो? फल क्यों तोड़ रहे हो? चलो, तुम्हें श्रीकृष्ण बुला रहे हैं।"

हनुमान जी ने कहा, "मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता। मैं तो श्रीराम का सेवक हूं। जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊंगा।"

गरुड़ क्रोधित होकर बोला, "तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा।" हनुमान जी ने कोई उत्तर नहीं दिया... गरुड़ की अनदेखी कर वह फल तोड़ने रहे। गरुड़ को समझाया भी, "वानर का काम फल तोड़ना और फेंकना है, मैं अपने स्वभाव के अनुसार ही कर रहा हूं। मेरे काम में दखल न दो। क्यों झगड़ा मोल लेते हो, जाओ... मुझे आराम से फल खाने दो।"

गरुड़ नहीं माना... तब हनुमान जी ने अपनी पूंछ बढ़ाई और गरुड़ को दबोच लिया। उसका घमंड दूर करने के लिए कभी पूंछ को ढीला कर देते, गरुड़ कुछ सांस लेता, और जब कसते तो गरुड़ के मानो प्राण ही निकल रहे हो... हनुमान जी ने सोचा... भगवान का वाहन है, प्रहार भी नहीं कर सकता। लेकिन इसे सबक तो सिखाना ही होगा। पूंछ को एक झटका दिया और गरुड़ को दूर समुद्र में फेंक दिया। बड़ी मुश्किल से वह गरुड़ दरबार में पहुंचा... भगवान को बताया, वह कोई साधारण वानर नहीं है... मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता। भगवान मुस्करा दिए - सोचा गरुड़ का घमंड तो दूर हो गया... लेकिन अभी इसके वेग के घमंड को चूर करना है।

श्रीकृष्ण ने कहा, "गरुड़, हनुमान श्रीराम जी का भक्त है, इसीलिए नहीं आया। यदि तुम कहते कि श्रीराम ने बुलाया है, तो फौरन भागे चले आते। हनुमान अब मलय पर्वत पर चले गए हैं। तुम तेजी से जाओ और उससे कहना, श्रीराम ने उन्हें बुलाया है। तुम तेज उड़ सकते हो... तुम्हारी गति बहुत है, उसे साथ ही ले आना।"

गरुड़ वेग से उड़े, मलय पर्वत पर पहुंचे। हनुमान जी से क्षमा मांगी। कहा भी... श्रीराम ने आपको याद किया है, अभी आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर मिनटों में द्वारिका ले जाऊंगा। तुम खुद चलोगे तो देर हो जाएगी। मेरी गति बहुत तेज है... तुम मुकाबला नहीं कर सकते। हनुमान जी मुस्कराए... भगवान की लीला समझ गए। कहा, "तुम जाओ, मैं तुम्हारे पीछे ही आ रहा हूं ।"

द्वारिका में श्रीकृष्ण राम रूप धारण कर सत्यभामा को सीता बना सिंहासन पर बैठ गए... सुदर्शन चक्र को आदेश दिया... द्वार पर रहना... कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए... श्रीकृष्ण समझते थे कि श्रीराम का संदेश सुनकर तो हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते... अभी आते ही होंगे । गरुड़ को तो हुनमान जी ने विदा कर दिया और स्वयं उससे भी तीव्र गति से उड़कर गरुड़ से पहले ही द्वारका पहुंच गए । दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, "बिना आज्ञा अंदर जाने की मनाही है ।" जब श्रीराम बुला रहे हों तो हनुमान जी विलंब सहन नहीं कर सकते... सुदर्शन को पकड़ा और मुंह में दबा लिया । अंदर गए, सिंहासन पर श्रीराम और सीता जी बैठे थे... हुनमान जी समझ गए... श्रीराम को प्रणाम किया और कहा, "प्रभु, आने में देर तो नहीं हुई?" साथ ही कहा, "प्रभु मां कहां है? आपके पास आज यह कौन दासी बैठी है? सत्यभामा ने सुना तो लज्जित हुई, क्योंकि वह समझती थी कि कृष्ण द्वारा पारिजात लाकर दिए जाने से वह सबसे सुंदर स्त्री बन गई है... सत्यभामा का घमंड चूर हो गया ।

उसी समय गरुड़ तेज गति से उड़ने के कारण हांफते हुए दरबार में पहुंचा... सांस फूल रही थी, थके हुए से लग रहे थे... और हनुमान जी को दरबार में देखकर तो वह चकित हो गए । मेरी गति से भी तेज गति से हनुमान जी दरबार में पहुंच गए? लज्जा से पानी-पानी हो गए । गरुड़ के बल का और तेज गति से उड़ने का घमंड चूर हो गया... श्रीराम ने पूछा, "हनुमान ! तुम अंदर कैसे आ गए? किसी ने रोका नहीं?"

"रोका था भगवन, सुदर्शन ने... मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलंब होगा... इसलिए उनसे उलझा नहीं, उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया था।" और यह कहकर हनुमान जी ने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया ।

तीनों के घमंड चूर हो गए| श्रीकृष्ण यही चाहते थे । श्रीकृष्ण ने हनुमान जी को गले लगाया, हृदय से हृदय की बात हुई... और उन्हें विदा कर दिया ।

परमात्मा अपने भक्तों में अपने निकटस्थों में अभिमान रहने नहीं देते । श्रीकृष्ण सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन चक्र का घमंड दूर न करते तो परमात्मा के निकट रह नहीं सकते थे... और परमात्मा के निकट रह ही वह सकता है जो 'मैं' और 'मेरी' से रहित है| श्रीराम से जुड़े व्यक्ति में कभी अभिमान हो ही नहीं सकता... न श्रीराम में अभिमान था, न उनके भक्त हनुमान में, न श्रीराम ने कहा कि मैंने किया है और न हनुमान जी ने ही कहा कि मैंने किया है... इसलिए दोनों एक हो गए... न अलग थे, न अलग रहे। 

22 जुलाई 2014

Download & play free Indian hindi mp3 songs

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हर किसी की इच्छा होती है पर्व-त्यौहार या किसी ख़ास मौके पर उसी से सम्बंधित गाने सुनने कि पर खोजने से न घर में मिलता है न किसी दोस्त-बधु के पास कल रहा हूँ, मेरी हार्दिक इच्छा थी कल सावन माह की दूसरी सोमवार थी और मुझे भोले बाबा की कुछ पसंदीदा गाने सुनने को दिल उतावला गया. पर किसी के पास मिला तब मैंने नेट पर सर्च करके इसका निराकरण निकाला और आप सबके सुविधा के लिए यहाँ डाल दिया। ताकि आप भी भक्ति, भजन, रहीम-कबीर के दोहे के साथ-साथ पुराने और नए गाने डाऊनलोड कर सकते हैं. मैंने नेट में सर्च किया तो मुझे दो साइट्स ऐसे मिले जहाँ पर कि नये-पुराने गानों का जैसे भंडार भरा हो। मैंने वहाँ से अपनी पसंद के गाने अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर लिए और उन्हें अपने मोबाइल में भी ले आया। नीचे दोनों ही साइट्स के लिंक दे रहा हूँ ताकि आप लोगों को भी इसका फायदा मिल पायेः

http://hinduism.about.com/od/audiomusic/

http://www.freebhajans.com/category/ringtone/

गाने डाउनलोड करने के लिए उपरोक्त साइट्स में अपना पसंदीदा गाना ढूँढ लें और उसके लिंक पर राइटक्लिक करके यदि आप इंटरनेट एक्प्लोरर इस्तेमाल कर रहे हैं तो "सेव्ह टारगेट ऐज" को और यदि फायरफॉक्स इस्तेमाल कर रहे हैं तो "सेव्ह लिंक ऐज" को क्लिक कर के गाना डाउनलोड कर लें।
राजेश मिश्रा श्याम बाबा के शरण में. 
और हाँ यदि आपका पसंदीदा गाना उपरोक्त साइट्स में भी न मिलें किन्तु यूट्यूब में उस गाने का व्हीडियो उपलब्ध हो तो उस व्हीडियो को या तो व्हीडियो के रूप में या फिर mp3 में बदल कर भी डाउनलोड किया जा सकता है।

21 जुलाई 2014

कलियुग में भगवान श्री हनुमानजी

यहाँ साक्षात दर्शन कर पुण्य के भागी बनें 


हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।

गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन :

गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं।

वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? :

इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है।
पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।

कैसे पहुंचे गंधमादन :

पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे।

मंदिर में घंटी क्यों लगाते हैं ?

घंटी बजाने के चमत्कार

हिंदू धर्म में देवालयों व मंदिरों के बाहर घंटियां या घडिय़ाल पुरातन काल से लगाए जाते हैं। जैन और हिन्दू मंदिर में घंटी लगाने की परंपरा की शुरुआत प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने शुरू की थी। इस परंपरा को ही बाद में बौद्ध धर्म और फिर ईसाई धर्म ने अपनाया। बौद्ध जहां स्तूपों में घंटी, घंटा, समयचक्र आदि लगाते हैं तो वहीं चर्च में भी घंटी और घंटा लगाया जाता है।

देवालयों में घंटी और घड़ियाल संध्यावंदन के समय बजाएं जाते हैं। संध्यावंदन 8 प्रहर की होती है जिसमें से मुख्‍य पांच और उसमें से भी प्रात: और संध्या यह दो प्रमुख है। घंटी और घड़ियाल ताल और गति से बजाया जाता है।


स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) था, घंटी या घडिय़ाल की ध्वनि से वही नाद निकलता है। यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है। घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है। धर्म शास्त्रियों के अनुसार जब प्रलय काल आएगा तब भी इसी प्रकार का नाद प्रकट होगा।

मंदिर में घंटी लगाए जाने के पीछे न सिर्फ धार्मिक कारण है बल्कि वैज्ञानिक कारण भी इनकी आवाज को आधार देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।

अत: जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां हटती हैं। नकारात्मकता हटने से समृद्धि के द्वार खुलते हैं।

पहला कारण घंटी बजाने से देवताओं के समक्ष आपकी हाजिरी लग जाती है। मान्यता अनुसार घंटी बजाने से मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना जागृत होती है जिसके बाद उनकी पूजा और आराधना अधिक फलदायक और प्रभावशाली बन जाती है।

दूसरा कारण यह कि घंटी की मनमोहक एवं कर्णप्रिय ध्वनि मन-मस्तिष्क को अध्यात्म भाव की ओर ले जाने का सामर्थ्य रखती है। मन घंटी की लय से जुड़कर शांति का अनुभव करता है। मंदिर में घंटी बजाने से मानव के कई जन्मों के पाप तक नष्ट हो जाते हैं। सुबह और शाम जब भी मंदिर में पूजा या आरती होती है तो एक लय और विशेष धुन के साथ घंटियां बजाई जाती हैं जिससे वहां मौजूद लोगों को शांति और दैवीय उपस्थिति की अनुभूति होती है।

सिर पर चोटी क्यों रखी जाती है ?

What is the purpose of a shikhã (choti)?

वैदिक संस्कृति में चोटी को 'शिखा' कहते हैं। स्त्रियां भी चोटी रखती हैं। उसका भी कारण है। मुंडन और उपनयन संस्कार के समय यह किया जाता है। प्रत्येक हिन्दू को यह करना होता है। इस संस्कार के बाद ही बच्चा द्विज कहलाता है। 'द्विज' का अर्थ होता है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, अब बच्चे को पढ़ाई करने के लिए गुरुकुल भेजा जा सकता है। पहले यह संस्कार करते समय यह तय किया जाता था कि बच्चों को ब्राह्मणत्व ग्रहण करना है, क्षत्रियत्व या वैश्यत्व। जब यह तय हो जाता था ‍तभी उसके अनुसार शिक्षा दी जाती थी। पहले सभी शूद्र कहलाते थे।

बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है जिसे मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। उपनयन संस्कार बच्चे के 6 से 8 वर्ष की आयु के बीच में किया जाता है। इसमें यज्ञ करके बच्चे को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं। बालक को जनेऊ पहनाकर गुरु के पास शिक्षा अध्ययन के लिए ले जाया जाता था। वैदिक काल में 7 वर्ष की आयु में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता था। आजकल तो 3 वर्ष की आयु में ही स्कूल में दाखिला लेना होता है।

सिर में सहस्रार के स्थान पर चोटी रखी जाती है अर्थात सिर के सभी बालों को काटकर बीचोबीच के स्थान के बाल को छोड़ दिया जाता है। इस स्थान के ठीक 2 से 3 इंच नीचे आत्मा का स्थान है। भौतिक विज्ञान के अनुसार यह मस्तिष्क का केंद्र है। विज्ञान के अनुसार यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। हमारे ऋषियों ने सोच-समझकर चोटी रखने की प्रथा को शुरू किया था।

इस स्थान पर चोटी रखने से मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। शिखा रखने से इस सहस्रार चक्र को जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सहस्रार चक्र का आकार गाय के खुर के समान होता है इसीलिए चोटी का आकार भी गाय के खुर के बराबर ही रखा जाता है।

मिशन विचार क्रांति शान्तिकुंज हरिद्वार के अनुसार असल में जिस स्थान पर शिखा यानी कि चोटी रखने की परंपरा है, वहां पर सिर के बीचोबीच सुषुम्ना नाड़ी का स्थान होता है तथा शरीर विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि सुषुम्ना नाड़ी इंसान के हर तरह के विकास में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चोटी सुषुम्ना नाड़ी को हानिकारक प्रभावों से तो बचाती ही है, साथ में ब्रह्मांड से आने वाले सकारात्मक तथा आध्यात्मिक विचारों को कैच यानी कि ग्रहण भी करती है।
Chotiwala Hotel, Rishikesh, Haridwar, UK

चोटी को रखने के ज्योतिषीय लाभ : जिस किसी की भी कुंडली में राहु नीच का हो या राहु खराब असर दे रहा है तो उसे माथे पर तिलक और सिर पर चोटी रखने की सलाह दी जाती है।

मुंडन का महत्व : हालांकि मुंडन संस्कार स्वास्थ्य से जुड़ा है। जन्म के बाद बच्चे का मुंडन किया जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तो उसके सिर के बालों में बहुत से कीटाणु, बैक्टीरिया और जीवाणु लगे होते हैं, जो साधारण तरह से धोने से नहीं निकल सकते इसलिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है। अत: जन्म के 1 साल के भीतर बच्चे का मुंडन कराया जाता है।

कुछ ऐसा ही कारण मृत्यु के समय मुंडन का भी होता है। जब पार्थिव देह को जलाया जाता है तो उसमें से भी कुछ ऐसे ही जीवाणु हमारे शरीर पर चिपक जाते हैं। नदी में स्नान और धूप में बैठने का भी इसीलिए महत्व है। सिर में चिपके इन जीवाणुओं को पूरी तरह निकालने के लिए ही मुंडन कराया जाता है।

13 जुलाई 2014

Lord Shiva 19 Avtar

भगवान शिव के 19 अवतार

शिव महापुराण में भगवान शिव के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है.....राजेश मिश्रा ( धर्ममार्ग सर्वेसर्वा)


1- पिप्पलाद अवतार :-

मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।

पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधी:।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61

अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा। 

2- नंदी अवतार :-

भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। 

3- वीरभद्र अवतार :- 

यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। 
शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-
क्रुद्ध: सुदष्टïोष्ठïपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिï
सटोग्ररोचिषम्। उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो 
हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥ 
ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं। 
श्रीमद् भागवत -4/5/1

शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया।

4- भैरव अवतार :-

शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है। 

5- अश्वत्थामा :-

महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। 
इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है। 

6- शरभावतार :-

भगवान शंकर का छठे अवतार हैं शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था।इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की। 

7- गृहपति अवतार :-

भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था। 

8- ऋषि दुर्वासा :-

भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। 
शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥ 
-भागवत 4/1/15
अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। 
ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे। 

9- हनुमान :-

भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए। 

10- वृषभ अवतार :-

भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया। 

11- यतिनाथ अवतार :-

भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया। 

12- कृष्णदर्शन अवतार :-

भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे। तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।

13- अवधूत अवतार :-

भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा। इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया। 

14- भिक्षुवर्य अवतार:-

भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची। तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया। 

15- सुरेश्वर अवतार :-

भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जाप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया। 

16- किरात अवतार :-

किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया। 

17- सुनटनर्तक अवतार :-

पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए। जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया। 

18- ब्रह्मचारी अवतार :-

दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की। जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं। 

19- यक्ष अवतार :-

यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं। देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।
साभार : स्वर्णिम हिंद का स्वर्णिम स्वप्न

05 जुलाई 2014

हिंदू विवाह प्रणाली में

सात फेरों का महत्व


भारत में पति-पत्नी के रिश्ते को बहुत अनमोल माना जाता है और इसी रिश्ते को जोड़ते हैं शादी के सात फेरे. हिंदू विवाह प्रणाली में सात फेरों का अधिक महत्व है. शास्त्रों में इन सभी फेरों की अपनी महत्ता व अर्थ है. यह फेरे वर-वधू को जीवन भर साथ रहने व एक-दूसरे का साथ देने का ज्ञान देते हैं. सात फेरों के दौरान वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे को जीवन भर खुश रखने का वचन देते हैं.

क्यों लेते हैं सात फेरे?


कहा जाता है कि हमारे शरीर में भी सात केंद्र पाए जाते हैं. यदि हम योग की दृष्टि से देखें तो मानव शरीर में ऊर्जा व शक्ति के सात केंद्र होते हैं जिन्हें चक्र कहा जाता है. विवाह के दौरान यज्ञ और संस्कार के वातावरण में इन सात फेरों में सातवें पद या परिक्रमा में वर-वधू एक-दूसरे से कहते हैं हम दोनों अब परस्पर सखा बन गए हैं.

विवाह में सात फेरे ही क्यों?

विवाह के दौरान लिए जाने वाले सात फेरों की हिंदू धर्म में बहुत मान्यता है. लेकिन यहां गौर करने का विषय यह है कि विवाह में वर-वधू सात फेरे ही क्यों लेते हैं? क्या इसकी संख्या इससे ज्यादा या कम भी हो सकती है?
यह तो आपने ही होगा कि जब तक सात फेरे पूरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूरा हुआ नहीं माना जाता. भारतीय संस्कृति के अनुसार यह सात अंक बहुए महत्वपूर्ण है. सालों से ही सात अंक की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है.

लोक-परलोक तक है सात अंक की महत्ता


भारतीय संस्कार में विवाह से लेकर लोक-परलोक तक फैला है सात अंक का महत्व. यदि हम नजर घुमा कर देखें तो सूर्य प्रकाश में रंगों की संख्या भी सात होती है. यदि संगीत की बात करें तो इसमें भी स्वरों की संख्या सात है: सा, रे, गा, मा, प , ध, नि. पृथ्वी के समान ही लोकों की संख्या भी सात है: भू, भु:, स्व: मह:, जन, तप और सत्य.

सिर्फ पृथ्वी ही क्यों लोक-परलोक में भी गाया जाता हैं सात अंक की महत्ता का गुणगान. दुनिया में सात तरह के पाताल: अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं. द्वीपों तथा समुद्रों की संख्या भी मिलकर सात हो जाती है.
प्रमुख पदार्थ भी सात ही हैं: गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि जो कि शुद्ध माने जाते हैं. मानव से संबंधित प्रमुख क्रियाएं भी सात ही हैं जैसे कि शौच, मुखशुद्धि, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन तथा निद्रा.

पूज्यनीय जनों की संख्या भी सात ही है: ईश्वर, गुरु, माता, पिता, सूर्य, अग्रि तथा अतिथि. इंसानी बुराइयों की संख्या भी सात है: ईर्ष्या, क्रोध, मोह, द्वेष, लोभ, घृणा तथा कुविचार. वेदों के अनुसार सात तरह के स्नान भी होते हैं: मंत्र स्नान, भौम स्नान, अग्रि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, करुण स्नान, और मानसिक स्नान.

दुनिया के हर एक कोने व हर एक विषय में बसे हुए इस सात अंक के महत्व को देखते हुए ही ऋषि-मुनियों ने विवाह की रस्म को सात फेरों में बांधा है.

हिन्दू विवाह की स्थिरता के मुख्य स्तंभ होते हैं सात फेरे


सात अंक के महत्व ने भारतीय विवाह में सात फेरों का चलन किया है. यह तो मान्य है कि हिन्दू धर्म में सात फेरों के बाद ही शादी को पूर्ण माना जाता है. यदि एक भी फेरा कम हो तो वह शादी अपूर्ण है.

विवाह के दौरान सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. यह सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं. विवाह के अंतर्गत वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसकी परिक्रमा करते हैं व एक-दूसरे को सुख से जीवन बिताने के लिए वचन देते हैं. विवाह में निभाई जाने वाली इस प्रक्रिया को सप्तपदी भी कहा जाता है.

वर-वधू द्वारा निभाए गए इन सातों फेरों में सात वचन भी होते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है और हर एक वचन का अपना अर्थ व मान्यता है. इन वचनों में पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं. यह सात फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं.

क्या है इन वचनों का वैज्ञानिक अर्थ


हिन्दू विवाह रीति में विख्यात इन सात फेरों में लिए गए वचनों का क्या कोई वैज्ञानिक अर्थ भी है? आइए जानते हैं सात फेरों में कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचनों का वैज्ञानिक अर्थ…

पहला वचन:


सात फेरों के पहले फेरे में कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यह पहला वचन पति व पत्नी के साथ होने का संदर्भ बताता है. वैज्ञानिक रूप से भी वर-वधू का एक दूसरे के साथ होना आवश्यक है. यह वैवाहिक जिंदगी को सुखमय व खुशहाल बनाने के लिए लाभदायक माना जाता है.

दूसरा वचन:


दूसरे वचन में कन्या वर से वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं. यदि इस वचन के वैज्ञानिक अर्थ की बाते करें तो यह वचन सबको एक बंधन में बांधता है. आज के समय में लोगों में छोटी-छोटी बातों को लेकर मन-मुटाव काफी तीव्रता से उत्पन्न होता है जिस कारण रिश्ते बिगड़ते हैं. यह वचन पति-पत्नी को मानसिक रूप से रिश्तों को संजोने में मदद करता है.

तीसरा वचन:


तीसरे वचन में कन्या वर से यह मांगती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, पल-पल मेरा साथ निभाएंगे. विवाह के इस वचन से पति-पत्नी सभी अवस्थाओं में एक-दूसरे के लिए प्रेरणा का स्रोत बनते हैं. इससे दोनों के मन व मस्तिष्क में वैवाहिक जीवन को लेकर जिम्मेदारियों का एहसास उत्पन्न होता है.

चौथा वचन:


विवाह के चौथे वचन में कन्या यह माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है. विवाह का यह चौथा वचन वर व वधू के विकास का प्रतीक है. वे दोनों शारीरिक व मानसिक दोनों रूप से जीवन में आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनते हैं. इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है.

पांचवा वचन:


शादी के पांचवें वचन में कन्या वर से कहती है कि वो अपने जिंदगी के सभी कार्यों में अपनी पत्नी को भी स्थान दे. वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं. इस वचन में वर-वधू अपने वैवाहिक जीवन में अपने व्यक्तिगत अधिकारों को रेखांकित करते हैं. यहां पत्नी पति को अपनी अहमियत बताना चाहती है और यह समझाती है कि अब से उसके जीवन से जुड़ी हर एक बात में वो बराबर की हिस्सेदार है.

छठा वचन:


इस वचन में कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूं तब आप वहां सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं. विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा-जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डांट-डपट देते हैं. ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा. यहां पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुर्व्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले.

सातवां वचन:


विवाह के अन्तिम व सातवें वचन में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे. विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाहरी स्त्री की ओर आकर्षित हो जाए तो दोनों के वैवाहिक जीवन पर आंच आ सकती है. इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है.

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