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07 अगस्त 2014

Radha or Gopiyon ke sang Krishna ki Maharaslila

राधा व गोपियों के संग महारासलीला
Rasleela : Maharasleela- Krishna_Radha_Gopiyan

एक दिन श्री वृषभानु भवन में श्रीराधा, मैया के पास उदास बैठी हैं, कारण एक ही है, श्री कृष्ण के प्रेम संबंधों की घर-घर में चर्चा, जिससे दुखी होकर मैया, राधा बेटी को समझाते हुए कहती हैं, तू वृषभानुजी की पुत्री है, राज राजेश्वरी है और कृष्ण ग्वाला ही तो है। मित्रता और नाते रिश्ते बराबर के कुल में ही उचित रहते हैं। इसलिए आज से उस कान्हा के साथ खेलना छोड़ अपनी सखियों के संग रहा करो। श्रीराधा ने मैया को अनेक तर्क देकर श्रीकृष्ण प्रेम संबंध के विषय में संतुष्ट कर दिया। फिर भी आज श्रीराधा रानी अपनी सखियों के संग जल विहार की इच्छा से यमुना पर जाती हैं। जल विहार प्रारंभ हुआ। सखियों के संग श्रीराधा ने जल में प्रवेश किया। ग्रीवा तक जल में खड़ी होकर एक-दूसरे पर जल उछाल-उछालकर क्रीड़ा करने लगीं।

इसी आनंद लीला में निमग्न सखियां यमुना के दूसरे तट पर पहुंच गर्इं। कृष्ण चर्चा में लीन इन सखियों को आभास ही नहीं हुआ कि सूर्यास्त कब हो गया। उनकी चिंता उस समय अपनी चरम सीमा पर पहुंची जब चंद्र देव अपनी पूर्ण आभा के साथ आकाश में उदित हो गए। अंधियारे को चीरकर चारों ओर शीतल चांदनी फैल गई। सबको अपने घर की याद आने लगी, मैया बाबा के गुस्से का सामना करना पड़ेगा, ऐसा विचार आते ही सब सखियां भय से थर-थर कांपने लगीं।’

ललिता, विसाखा, चंपकलता, चित्रा, रंगदेवी, सुदेवी, तुड्गविद्या, इंदुलेखा और श्रीराधारानी इस संकट से मुक्ति पाने का उपाय सोचने लगीं। उसी समय यमुना के दूसरे छोर से वंशी की ध्वनि सुनाई देने लगी, सखियां सतर्क हो गर्इं। उसी समय यमुना किनारे भगवान श्रीकृष्ण दिखाई पड़े। सिर पर मोर मुकुट, कानों में मकराकृत कुंडल और कटि में पीतांबर धारण किए अति शोभायमान लग रहे थे। इनके दर्शन से ब्रजबालाएं प्रेम मग्न हो गर्इं। इन सबने अपने नंदलाल से इस समय सहायता की याचना की। श्रीकृष्ण ने गोपियों को उस पार से लाने के लिए नाव की व्यवस्था की और उनकी ओर चल पड़े- ललिता सखी से कहने लगी, हे राधा रानी देखो कृष्ण नाव ले आए। श्रीराधा कृष्ण गोद में बैठ गर्इं। श्रीराधा को अपने प्रियतम की गोद में देख वंशी के स्वर मुखरित हो उठे। श्री राधा श्याम सुंदर से कहनी लगी, हे प्रियतम!
Radhe_Krishna

मेरी इक बात सुनो, श्रीकृष्ण मुस्कराकर पूछने लगे, हे प्रिये तुम क्या कहना चाहती हो, नि:संकोच होकर कहो, तुम ही मेरे प्राण और जीवन धन हो और देखो ऊपर आकाश में तुम्हारा भाई चंद्रमा भी तुम्हारे साथ है। हे राधे! लज्जा को त्यागकर अपने मन की बात कहो।

हे नाथ, आज मुझे महारासलीला का स्मरण हो आया। देखो, वही पूर्ण चंद्र, वही पूर्णमासी की रात्रि, वही यमुना का किनारा, वही सखियां, वही तुम और वही तुम्हारी राधा। हम सब आज पुन: उस सुख को भोगना चाहती हैं। श्रीराधा की ऐसी इच्छा जानकर श्रीकृष्ण हर्षित हो उठे! ललिता सखी अन्य सखियों को संबोधित करते हुए कहने लगी, हे सखियों, श्रीराधा और श्रीकृष्ण का प्रेम, सौंदर्य, गुण और स्वभाव सभी स्वाभाविक हैं। दोनों के शरीर भिन्न-भिन्न हैं, परंतु प्राण एक ही हैं। इसी बीच कान्हा की वंशी के स्वर मुखरित हो उठे। नाव, बीच धारा में हिचकोले लेने लगी, उसी समय देव वधुओं ने अपने-अपने वाद्य यंत्र सखियों को समर्पित कर दिए। मुरली के स्वर में स्वर मिलाकर सभी वाद्य यंत्र एक साथ बजने लगे। देवता अपनी पत्नियों सहित भगवान की इस दिव्य लीला के दर्शन हेतु आकाश में स्थिर हो गए।

थर-थर कांपती हुई घर आर्इं। पुत्री को पाकर माता हर्षित हो गई, उसे सांत्वना देते हुए अपने हृदय से लगा लिया। दोनों की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। माता की आंखों में प्रेमाश्रु थे और पुत्री के आंसू की लीला वह स्वयं ही जाने! माता अथवा पिता उसके बाहर रहने का कारण पूछें, राधा ने विचार किया, उनसे पहिले वह अपनी व्यथा कथा सुना दे।

चतुर शिरोमणि राधा मगरमच्छी आंसू बहाती हुई कहने लगीं, मैया कल प्रात:काल मैं अपनी सखियों के संग यमुना किनारे खेलने गई थी। मैया तुमने ही तो कहा था कि अपनी सखियों के संग रहा करो, इसलिए उनके साथ ही हास्य विनोद में व्यस्त हो गई। इसी व्यस्तता में रात्रि हो गई। अंधेरे के कारण हम अपने घर का मार्ग भूलकर सारी रात मधुवन में भटकते रहे। चारों ओर अनेक पगडंडियां थीं, हम एक से दूसरी पर चलते रहे, लेकिन अपने गांव का मार्ग नहीं मिला। मैया उस बन में हिंसक जीव दिखाई देने लगे, डरावनी आवाजें आनी प्रारंभ हो गई। हम डर के मारे एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गर्इं।

सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ हमें श्रीकृष्ण की वंशी के स्वर सुनाई देने लगे। पेड़ से उतरकर हम उसी दिशा में चल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद एक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण वंशी बजा रहे थे। हमने उन्हें अपनी व्यथा से अवगत कराया। उन्हें हमारे ऊपर दया आ गई। अभी-अभी हमें गांव के बाहर छोड़कर कहीं चले गए। पुत्री की इस व्यथा को सुनकर माता ने हृदय से लगाया और महल में ले जाकर पलंग पर सुला दिया। श्रीराधा को रात्रि जागरण की थकान तो थी ही, वह गहरी नींद में सो गर्इं।

दोपहर का समय हुआ। राधा जाग उठी, मैया ने अपने हाथों भोजन कराया। राधा भोजन करके बैठी ही थीं कि रात वाली सखियां भी आ गर्इं। राधा ने मैया को कैसे संतुष्ट किया, यह सुनकर सखियां कहने लगीं- राधा, अपनी चतुराई से तुमने हमको भी बचा लिया। हे राधारानी! तुम सचमुच में धन्य हो, तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया है, वह भी धन्य हैं। वह दिन, वह रात्रि, वह पल भी धन्य है, जब तुमने जन्म लिया था।

प्रात: काल होते ही ब्रज के हर घर में चर्चा होने लगती है कि कान्हा बड़े ही चंचल हैं, गोपियों के घरों में घुसकर माखन चुराकर खाते हैं। कई दिनों से श्रीकृष्ण का नाम सुनते ही राधा रानी विचित्र प्रेम का अनुभव करने लगी थीं। जहां भी श्रीकृष्ण की चर्चा होती, वह वहीं चली जातीं, वह मन ही मन विचार करने लगतीं कि श्रीकृष्ण कितना सुंदर, कितना मधुर, कितना सुखदायक नाम है। यमुना तट की ओर से आती वंशी ध्वनि सुनकर युवती गोपिकाएं कहतीं, ‘देखो राधा, ये श्रीकृष्ण की वंशी के ही स्वर हैं।’ जैसे-जैसे उनका अनुराग बढ़ता गया।
एक दिन की बात है, श्रीराधा यमुना तट पर जल भरने आई थीं। गोरी-गोरी छोटी-सी बालिका नीले रंग की साड़ी पहने अति आकर्षक लग रही थी। संयोग से कान्हा भी वहां आ गए। एक-दूसरे को देखकर दोनों ही अपनी सुध-बुध खो बैठे। कुछ देर बाद श्री श्याम सुंदर ने उन्हें अकेली देख पूछ ही लिया, ‘लली तुम कहां रहती हो?’ ‘हम बरसाना रहते हैं जी’ श्री राधा ने मधुर वाणी में उत्तर दिया।

‘तुम्हें आज से पहले कभी नहीं देखा, तुम किसकी पुत्री हो, अपना पूरा परिचय दो सुमुखी।’ श्रीकृष्ण के मुख मंडल की ओर निहारती हुई श्रीराधा कहने लगीं, मैंने अपने गांव का नाम तो बता ही दिया है, पिता का नाम श्री वृषभानुजी और माता का नाम है श्रीमती कीर्ती कुमारी।

श्रीकृष्ण ने तुरंत ही कहा, ‘और तुम्हारा नाम राधा है।’ वंशीवारे के मुख से अपना नाम सुनकर राधा के हृदय की धड़कन बढ़ गई, उन्होंने कंपन युक्त स्वर में पूछा, तुम कौन हो जी और मेरा नाम कैसे जानते हो? मंद-मंद मुस्कान भरे मुख की खनखनाती वाणी में श्याम कहने लगे-
तुम्हारे रूप और ऐश्वर्य की ख्याति सारे ब्रजमंडल में फैली हुई,
ऐसा कोई अभागा ही होगा, जो तुम्हारे नाम से परिचित न हो।


मैं श्री नंदरायजी का पुत्र कृष्ण हूं। कृष्ण का नाम सुनकर राधा कह उठीं, मैंने भी सुना था कि ब्रज में श्यामसुंदर नाम के एक बड़े चोर हैं। क्या तुम वही हो, जिसके नाम की चर्चा घर-घर में हो रही है। श्यामसुंदर ने हंसकर कहा, तुम भी मुझे चोर कहती हो, मैंने तुम्हारा क्या चुराया है? चोर तो ये हैं ही, इन्होंने प्रथम दृष्टि में मेरा मन चुरा लिया, परंतु सत्य को कैसे कहें यमुना किनारे दो चोर मिले हैं और जब एक ही जाति के दो जब मिलते हैं प्रीत होनी स्वाभाविक है। राधा बोलीं, हे श्यामसुंदर। अब मैं जाती हूं, राधा के मुख से ये वचन सुनकर कन्हैया विचलित हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से कहा, अभी क्यों जाती हो राधा! आओ थोड़ी देर यमुना किनारे मिलकर खेलें। राधा ने सोचा, इसकी वाणी में कितना आकर्षण है, कितनी मोहकता है।

राधा ने विनम्रतापूर्वक कहा, मुझे अब जाने दो मोहन, मेरी मां प्रतीक्षा कर रही होगी। मैं फिर कभी आऊंगी, इतना कहकर राधा जैसे ही घूमी, श्याम ने उसकी नीली चुनरी पकड़कर रोक लिया। राधा ने चुनरी छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया, शंकित दृष्टि से इधर-उधर देखकर कहा, अब मुझे छोड़ दो, मैं कल फिर आऊंगी, परंतु एक बात है कोई बहाना बनाकर माताजी की आज्ञा लेनी होगी। यह तो बहुत सरल बात है। श्याम ने कहा सुनो राधा, तुम्हारा खिरक हमारे खिरक के पास में ही है, गौओं को दुहाने के बहाने आ जाना, राधा ने कहा मैं सब जानती हूं, आ जाऊंगी, अब मुझे जाने दो कान्हा। राधा ने अपना हाथ छुड़ाना चाहा तो कान्हा ने उसकी चुनरी खींच ली। राधा ने कहा, देखो नंदलाला तुम ऐसे छेड़छाड़ करोगे तो मैं फिर कभी नहीं आऊंगी। राधा की प्यार भरी धमकी से कृष्ण डर गए। उन्होंने भूल से चुनरी की जगह अपना पीताम्बर उन्हें उढ़ा दिया। आज दोनों ही एक-दूसरे से बातें करते हुए अपने तन-मन की सुधि भूल गए। राधा को पता ही न लगा कि उन्होंने अपनी चुनरी की जगह श्रीकृष्ण का पीताम्बर ओढ़ रखा है और कृष्ण भी नहीं जान पाए कि उन्होंने राधा की चुनरी ओढ़ रखी है। राधा रानी अपने घर की ओर भाग गर्इं और कन्हैया माता यशोदा के पास आ गए। मैया ने कान्हा को चुनरी ओढ़े देखा पूछा, तू किसकी ओढ़नी ओढ़ आया रे, मैं तो समझी कोई छोरी मेरे घर में आ गई। चोरी पकड़ी देख कन्हैया सिटपिटा गए और कहने लगे, मैया अपनी जो सांवली गैया है न, वह आज बिदक कर जैसे ही भागने लगी, एक गोरी-सी छोरी की चूनरी उसके सींगों में उलझ गई, उसे रोता देख मैंने अपना पीताम्बर उढ़ा दिया और गाय को रोककर चुनरी मैंने ले ली। मैया मैं उस छोरी को जानता हूं, कल दे आऊंगा। मैया ने कहा, बहुत अच्छा किया बेटा, अपने घर में पीताम्बर बहुत हैं, नया निकाल ले। कन्हैया ने नया पीताम्बर धारण कर लिया और चुनरी को छिपा कर रख दिया।

उधर जैसे ही राधा ने घर में प्रवेश किया, मैया ने डांटना फटकारना प्रारंभ कर दिया। और जब बेटी के सिर पर पीताम्बर देखा तो मैया के क्रोध की सीमा नहीं रही, बहुत देर तक ताने मारने के बाद मैया जब शांत हुई तो राधा ने कहा, ‘मैया अब जरा मेरी भी सुन लो।’ मैया ने कहा ठीक है तू अपनी भी सुना। राधा ने कहा, ‘मैया मैं ललिता के साथ जब खिरक की ओर गई तो देखा चारों ओर गैयान के नीचे गोबर फैला पड़ा है, मैंने वह गोबर उठाकर वहां सफाई कर दी और फिर अपने हाथ-पैर धोने यमुना किनारे चली गई। मैया मैं जैसे ही जल में घुसने लगी, मैंने देखा एक काला सर्प मेरी ओर देख रहा है, मैं डरकर भागने लगी तो मेरी चुनरी जमुना में जा पड़ी और बह गई। मैं बाल-बाल बच गई मैया, नहीं तो वह काला सर्प आज मुझे डस ही लेता।’ मैया ने राधा को अपनी ओर खींचकर अपनी छाती से चिपटा लिया, राधा मैया की छाती में लिपटी हुई पुन: कहने लगी, मैया और सुन, ‘जब मैं डरकर भागने लगी तो सामने से एक सांवला-सा छोरा आ गया, मुझे नंगे सिर देख कहने लगा, अरे तू तो नंदबाबा की छोरी है। ले मेरे पीताम्बर से अपना सिर ढक ले। मैंने परिचित जान उसका पीताम्बर लेकर ओढ़ लिया और सुन मैया, मुझे डरी हुई देखकर अपनी खिरक के पास तक छोड़ने भी आया था, कह रहा था कि उनकी खिरक भी पास में ही है।’

अपनी बेटी को सकुशल देख मैया बार-बार मुख चूमने लगीं। स्थिति अनुकूल जान राधा ने मैया से पूछा, मैया तुम जानती हो, वह कारो-सो छोरा कौन है, मुझसे बार-बार कह रहा था, हमारे घर खेलने आना, मैंने तो कोई जवाब नहीं दिया, चुपचाप अपने घर आ गई।

मैया ने कहा बेटी, वह नंदबाबा का बेटा है, उसकी मैया यशोदा रानी मेरी सहेली है और उसका नाम है कृष्ण। बड़ा ही नटखट है, सारा ब्रज जानता है उसे। उनके यहां जाने में कोई बात नहीं है, अपना ही घर है। कल वहां खेलने चली जाना और एक नया पीताम्बर उसे दे आना। माता के मुख से अनुकूल वाणी सुन राधा प्रसन्न हो गर्इं। 

यही वह शुभ समय है, शुभ घड़ी है, जब श्रीराधा और श्रीकृष्ण की प्रेमलीला प्रारंभ हुई। माता के अनुकूल संकेत पर राधा जब भी इच्छा हो, जब भी अवसर मिलता, श्रीकृष्ण से मिलने जाने लगीं, उधर श्रीकृष्ण भी अनेक रूप धारण उनके अंत:पुर में चले जाते। इस प्रकार दोनों में स्नेह बढ़ने लगा, प्रेम में परस्पर कभी खेलने लगते, कभी-कभी झगड़ा भी कर बैठते थे। मान मनुहार होता और फिर यह मनुहार प्रणय रूप में परिणित हो गया। दोनों भिन्न होते हुए भी एक रूप हो गए। इनका प्रेम देखकर मैया बाबा ही नहीं, सारा ब्रजमंडल हर्षित हो गया।
ब्रज में जब से श्रीराधा और श्रीश्याम सुंदर का मिलन हुआ है, श्रीराधारानी अपने तन मन की सुधि ही भूल बैठी हैं। भूख और प्यास भी प्रेम की अनंत जल राशि में जैसे विलीन ही हो गई है। रात-दिन श्याम का स्मरण उनके हृदय को तड़पाता रहता है। जिन नैनन में श्याम बसे हों, उन नैनन में नींद कहां? श्री राधा की रात्रि श्रीकृष्ण विरह में तारे गिनते-गिनते व्यतीत हो जाती है। एक दिन की बात है, प्रात:काल की मधुर बेला में राधारानी अपनी गगरिया ले अकेली ही यमुना पर जल भरने चल पड़ीं। मार्ग में देखा, एक कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठे श्रीकृष्ण वंशी बजा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे वंशी के स्वरों में मुझे ही पुकार रहे हों।

मुझे अपने समीप देख उनकी वंशी के स्वर और मुखरित हो उठे, मानो मेरा स्वागत कर रहे हों। राधारानी ने आगे बढ़कर मोहन का हाथ पकड़ लिया और कहने लगीं -
प्रियतम मीठी नित याद तुम्हारी आती,
मैं पल पर तुमको कभी बिसान न पाती।
जगने में सपने में तुम मेरे प्यारे,
होते कभी न मुझसे पल भर न्यारे।।
दे दर्शन मुझको सदा परम सुख देते,
कर मीठी रस की बातें, दुख हर लेते।
देते रहते दिन-रात, स्पर्श सुख भारी,
निज हृदय खोल, कह देते मन की सारी।।
यों मिलने पर भी मिलने की अभिलाषा,
बढ़ती रहती ही है, नित्य मिलन की आशा।
नित मिलन पर भी स्मृति दूर न होती,
वह सदा तुम्हीं में प्यारे, जगती भी है और सोती।।
-‘पद रत्नाकर’

श्री राधा के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर श्रीकृष्ण अधीर हो उठे। वे अपने स्थान से उठे और श्रीराधा को अपने हृदय से लगाकर अपनी भावना से अवगत कराते हुए कहने लगे प्राणाधिके!... प्रियतमे...

तेरे प्रेम-सुधा निधि में नित डूबा रहता मन मेरा।
मधुमय वाणी सुनने को नित चित्त लुभाता है मेरा।।
प्रेम छलकती आंखें तेरी नित मेरे सम्मुख रहती।
सदा समीप खड़ी तू मन भर, मन की सब बातें करती।।

हे राधे कभी तुम- आलिंगन करती, सुख देती, गलबइयां देकर मिलती। इधर श्रीराधा और माधव अपने-अपने मन की बातें करने में लीन थे, उधर भोर की लालिमा नभ में फैलते ही ललिता, बिसाखा, तुंगविद्या और चम्पकलता आदि सब सखियां यमुना से जल भरने के लिए श्रीराधा को उनके भवन से बुलाने गर्इं। ये सखियां जैसे ही भवन के मुख्य द्वार पर पहुंची, वहां खड़ी मैया कीर्तिजी को देख प्रणामकर राधा को बुलाने की विनती की। मैया तो इनको देखकर सहम गई और उन्हें संकेत कर कहने लगी, ललिता, राधा तो आज तारों की छांव में ही जल लेने चली गई। क्या आज वह तुम्हें छोड़ अकेली ही गई है, सखियों से तुरंत यमुना तट जाकर राधा को ढूंढ़ कर ले आओ, ऐसा न हो कि वह मार्ग में ही कहीं भटक जाए। ललिता ने मैया से कहा, हम शीघ्र ही उन्हें ढूंढ़कर ले आती हैं। मार्ग में चलते-चलते ये सखियां चर्चा करते हुए कहने लगीं, मैया को क्या मालूम कि उनकी लाडली बिटिया तो कब की भटक चुकी, आज भी यमुना पर नहीं, वंशीवट पर मिलेगी। कुछ ही पलों में ये सखियां जैसे ही वंशीवट पहुंची, वह राधा को श्री कृष्ण के कांधे पर अपना सिर रखे प्रेम में लीन देख आश्चर्यचकित हो गर्इं। श्रीकृष्ण ने जैसे ही सखियों को देखा, वह तुरंत ही अपने गैया बछड़ों को लेकर वन में प्रवेश कर गए। श्रीराधा लाज के मारे अपनी आंखे नीची कर वहीं बैठ गर्इं, सखियों ने कहा राधे, हमसे कैसा संकोच और कैसी लाज? तुम्हारे श्रीकृष्ण प्रेम मार्ग में हम बाधक नहीं, सहायक हैं। 

हे राधे, तुम इतनी भाग्यशाली होते हुए भी श्रीकृष्ण से इस समय मिलने का क्या औचित्य है। श्रीराधा ने कहा, हे सखियों मेरे मन की पीड़ा को समझने का प्रयास करो। घर पर मेरा मन नहीं लग रहा था। रात काटनी दूभर हो गई थी। प्रिय की याद में मन व्याकुल हो रहा था। जैसे सुबह होने को हुई, मैंने उसी समय गगरी उठाई और चल पड़ी वंशीवट की ओर। यहां आकर देखा कान्हा सचमुच ही विकल हो मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं जैसे ही उनके समीप आई, वह,
वह करने लगे दुलार सहज मनुहार अपरिमित।
नहलाने बस लगे, प्रेम धारा में अविरत।।

उस समय मैं अपनी अंखियां मूंदे उनके प्रेम रस में डूबी अपरिमित सुख का अनुभव कर रही थी। श्रीकृष्ण को जैसे ही तुम्हारे आगमन का अनुमान हुआ, वह अपनी गैया बछड़े लेकर वन में प्रवेश कर गए और मैं यहां अकेली बैठी रह गई। सखियों ने श्रीराधा की कथा आदरभाव से सुनी और उनके भाग्य की सराहना करते हुए कहने लगीं, राधा तुम अतिशय सुख का भोग कर रही हो, उधर मैया चिंता के महासागर में डूबी भवन के बाहर बैठी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं। आओ, अपनी-अपनी गगरिया में जल भर के भवन की ओर चलें। जलयुक्त गगरियां कोई अपने सिर पर और कोई अपनी-अपनी बगल में दबाए, ये सखियां श्रीराधा के संग अपने गांव की ओर चली जा रही हैं, मार्ग में राधारानी ने मैया की संतुष्टि के लिए उचित बहाने का ताना-बाना बुनकर सखियों को अवगत करा सहयोग का आश्वासन ले लिया। कुछ समय के पश्चात भवन के समीप पहुंच श्रीराधा ने देखा, मैया चिंतित अवस्था में बैठी है, वह दौड़कर उनके समीप गई, गगरी नीचे उतारी और दौड़कर मैया लिपटकर रोने लगी। राधा की आंखों में मैया आंसू कैसे देखती, उन्होंने पुत्री को अपने वक्षस्थल से लिपटाकर प्यार किया, दुलार किया और उसके बालों को सहलाते हुए पूछने लगीं, क्या बात है बेटी, तू क्यों रो रही है? श्रीराधा ने सुबकी भरते हुए कहा, मैया मैं जानती हूं आपको बिना बताए यमुना पर जाकर मैंने गलती की है, लेकिन यह आवश्यक भी था। मैया कल संध्या समय मैं यमुना किनारे खेलने गई थी, खेल-खेल में मेरे गले का मोतियों का हार कहीं गिर गया। मुझे पता उस समय लगा जब रात्रि में मैं सोने लगी। भय के मारे मैया मैं सारी रात सो न सकी। प्रात: होते ही सखियां जल लेने यमुना पर आने लगती हैं। मैंने सोचा, कहीं यह हार उनमें से किसी को दिखाई दे गया तो वह उठाकर ले जाएंगी। मैं आज अंधेरे में ही यमुना तट पहुंच गई और जिस स्थान पर यह हार गिरा था, वहां ढूंढ़ने लगी। जब ये सखियां वहां पहुंची, तब इनकी सहायता से वह हार मिल गया, देख मैया वह हार अब मेरे गले में पड़ा है। सखियों ने श्रीराधा की बातों का समर्थन किया। मैया संतुष्ट हुई, अपनी लाडली को महल में ले जाकर खिलाया-पिलाया और एक सुंदर बिछौना बिछाकर कहने लगीं, रात्रि भर सोई नहीं और हार ढूंढ़ने में थक गई होगी। अब आराम से सो जा, इतना कहकर मैया अपने काम में लग गई। उधर ‘जिन नैनन में श्याम बसे हों, उन नैनन में नींद कहां’ राधारानी ने मैया को दिखाने के लिए अपना मुंह ढक लिया और नयनों में बसे श्याम सुंदर के संग प्रेम लीला में लीन हो गई।

आज अपनी प्रियतमा को रिझाने के लिए, कान्हा ने विचित्र रास की रचना की। सूरदासजी इस दिव्य लीला का वर्णन करते हुए लिखते हैं, जिस समय श्रीकृष्ण की वंशी के स्वर त्रैलोक्य में सुनाई पड़े, देवता विमोहित हो गए, जड़ पदार्थ कंपायमान हो उठे, जो गतिमान थे, वे स्थिर हो गए, ऋषि मुनियों का ध्यान विचलित हो गया, चंचल वायु स्थिर हो गई, यमुना का जल विपरीत दिशा में बहने लगा, चंद्र देव आकाश के मध्य में ठहर गए। सारी रात वंशी की ध्वनि में अपना नाम सुनकर राधा अपने कन्हैया की गोदी में अपूर्व सुख का अनुभव कर रही थीं, सखियां रस विलास में निमग्न थीं! प्रात:काल का समय हुआ। सूर्य की स्वर्णिम किरणें भू मंडल पर फैलने लगीं। प्रकृति अपने मूल रूप में जीवंत हो उठी। कन्हैया ने नाव किनारे लगाई। कान्हा चले नंद भवन की ओर और सखियां चलीं अपने गांव। उधर, श्रीराधा की मैया चिंतातुर हो सोच ही हैं, पता नहीं मेरी नन्ही-सी बच्ची कहां गई है। प्रात: होते ही गई थी, पूरा दिन बीत गया और अब तो रात्रि भी बीत गई, न जाने उस पर क्या बीत रही होगी। यह समाचार जब गांव में फैला तो वृषभानु भवन के बाहर ब्रजवासी एकत्रित हो गए। राधा का कल से कोई अता-पता नहीं, सबकी चर्चा का यही विषय था। कुछ ही देर के बाद राधा डर-डराती घर आई। 

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