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24 सितंबर 2014

गाय से दूर होते हैं घर के दोष?

घर में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो आप अधिक मेहनत के बाद भी ज्यादा बचत नहीं कर पाएंगे

• बेडरूम में सिर्फ राधा-कृष्ण की फोटो लगाएं, क्योंकि... श्रीकृष्ण की इस फोटो से दूर होंगी समस्याएं?

कैसे और किन वस्तुओं से सजाएं घर?

सभी चाहते हैं कि उनका जीवन सुखी और निरोगी रहे। आज के युग में सुख की प्राप्ति धन के बिना संभव नहीं है। आपकी आय और आपके घर में गहरा संबंध है। यदि घर में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो आप अधिक मेहनत के बाद भी ज्यादा बचत नहीं कर पाएंगे। आपके फिजूल खर्च अधिक होंगे। घर में कोई ना कोई सदस्य
अधिकतर बीमार रहेगा।
• वास्तु शास्त्र की जानकारी के अभाव में हम घर के वास्तुदोषों का निराकरण नहीं कर पाते और परेशानियों का सामना करते रहते हैं। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक परेशानियां चल रही हैं तो ये उपाय पनाएं। निश्चित ही कुछ ही समय में आपको फायदा प्राप्त होने लगेगा।
• घर के सभी वास्तु दोष दूर करने का सबसे अच्छा उपाय है गाय। यदि आप अपने घर के आंगन में गाय रख सकते हैं तो यह सर्वश्रेष्ठ उपाय है सुखी और समृद्धिशाली बनने का। गाय की सेवा से महालक्ष्मी सहित सभी देवी- देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। आंगन में यदि गाय रहती है तो घर के सभी वास्तुदोषों का बुरा प्रभाव खुद की नष्ट हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है गाय के शरीर में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इसी वजह से गाय की सेवा का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। गाय की सेवा से सभी सुखों को देने वाले भगवान शिव अतिप्रसन्न होते हैं।
• यदि कोई व्यक्ति घर में गाय नहीं रख सकता है तो उसे सुबह शाम भगवान के समक्ष गाय के दूध से निर्मित घी का दीपक लगाना चाहिए। इस घी के दीपक से घर के सभी वास्तुदोष दूर होते हैं। घर का वातावरण शुद्ध होता है और सभी सदस्य निरोगी बने रहते हैं।
• गोमूत्र को भी घर से दोष दूर करने में उपयोग किया जाता है। घर में गोमूत्र छिड़कने से घर के सभी वास्तुदोषों निष्क्रीय हो जाते हैं। गोमूत्र के प्रभाव से घर में फैले सभी हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। साथ ही देवी महालक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है।
• अपने घर में श्रीकृष्ण और गोमाता की फोटो लगाकर भी आप कई वास्तु दोष दूर कर सकते हैं l
"सर्वे देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।'*
सनातन धर्म के ग्रंथों में कहा गया है-

'सर्वे देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।'
अर्थात गाय की देह में समस्त देवी-देवताओं का वास होने से यह सर्वदेवमयी है।
* संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं और वेदों में भी गाय की महत्ता और उसके अंग-प्रत्यंग में दिव्य शाक्तियां होने का वर्णन मिलता है।
* पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेदों का निवास हैं। उसके सींगों में भगवान शंकर और विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में इन्द्र, दोनों कानों में अश्विनीकुमार, नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़, जिह्वा में सरस्वती, अपान (गुदा) में सारे तीर्थ, मूत्र-स्थान में गंगा जी, रोमकूपों में ऋषि गण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले भाग में अप्सराएं स्थित हैं।
* गाय के गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी, चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता, रंभाने की आवाज में प्रजापति और थनों में समुद्र प्रतिष्ठित हैं।
* मान्यता है कि जो मनुष्य प्रात: स्नान करके गौ स्पर्श करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।
* भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, महाभारत में भी गौ के अंग-प्रत्यंग में देवी- देवताओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।
* मान्यता है कि गौ के पैरों में लगी हुई मिट्टी का तिलक करने से तीर्थ-स्नान का पुण्य मिलता है। यानी सनातन धर्म में गौ को दूध देने वाला एक निरा पशु न मानकर सदा से ही उसे देवताओं की प्रतिनिधि माना गया है।
卐 卐ॐॐ••कृपया एक बार अवश्य करें।
गौमाता की जय, श्री कृष्ण की जय।।।

15 सितंबर 2014

नवरात्र 2014 घट स्थापना शुभ मुहूर्त : Navratra 2014 : Ghat Sthapna Shubh Muhurt

शारदीय नवरात्र / दुर्गापूजा / दशहरा 2014

सुबह 06:19 से 07:47 तक- शुभ
दोपहर 12:11 से 01:28 तक- लाभ
दोपहर 01:28 से 3:17 तक- अमृत
शाम 04:45 से 06:13 तक- शुभ

शारदीय नवरात्रों का विशेष महत्व रहता है, यह भक्तों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है. देवी दुर्गा जी की पूजा प्राचीन काल से ही चली आ रही है, भगवान श्री राम जी ने भी विजय की प्राप्ति के लिए माँ दुर्गा जी की उपासना कि थी. ऐसे अनेक पौराणिक कथाओं में शक्ति की अराधना का महत्व व्यक्त किया गया है. इसी आधार पर आज भी माँ दुर्गा जी की पूजा संपूर्ण भारत वर्ष में बहुत हर्षोउल्लास के साथ की जाती है.
नौ दिनों तक चलने नवरात्र पर्व में माँ दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है. आश्विन माह में आने वाले इन नवरात्रों को ‘शारदीय नवरात्र’ कहा जाता है. नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों में लोग नियमित रूप से पूजा पाठ और व्रत का पालन करते हैं. दुर्गा पूजा के नौ दिन तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक किर्या कलाप संपन्न किए जाते हैं.

घट स्थापना 

इस वर्ष 2014 को शारदीय नवरात्रों का आरंभ 25 सितंबर, दिन गुरूवार, आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होगा. दुर्गा पूजा का आरंभ घट स्थापना से शुरू हो जाता है अत: यह नवरात्र घट स्थापना प्रतिपदा तिथि को 25 सितंबर, गुरूवार के दिन की जाएगी. इस दिन सूर्योदय से प्रतिपदा तिथि, हस्त नक्षत्र, ब्रह्म योग होगा, सूर्य और चन्द्रमा कन्या राशि में होंगे.

घट स्थापना का समय 25 सितंबर 2014, गुरूवार को अश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रात:काल 06 बजकर 14 मिनट से 07 बजकर 54 मिनट तक रहेगा इसके पश्चात दोपहर 11:49 से 12:36 मिनट तक के मध्य में भी घट स्थापना की जा सकती है.

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है. व्रत का संकल्प लेने के पश्चात ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है. इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है. घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है. तथा "दुर्गा सप्तशती" का पाठ किया जाता है. पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिए.

नवरात्र पूजा विधि, मातारानी  भजन और आरती







नवरात्र तिथि

पहला नवरात्र, प्रथमा तिथि, 25 सितंबर 2014, दिन बृहस्पतिवार
दूसरा नवरात्र, द्वितीया तिथि, 26 सितंबर 2014, दिन शुक्रवार.
तीसरा नवरात्र, तृतीया तिथि, 27 सितंबर 2014, दिन शनिवार.
चौथा नवरात्र, चतुर्थी तिथि, 28 सितंबर 2014, रविवार.
पांचवां नवरात्र , पंचमी तिथि , 29 सितंबर 2014, सोमवार.
छठा नवरात्र, षष्ठी तिथि, 30 सितंबर 2014, मंगलवार.
सातवां नवरात्र, सप्तमी तिथि, 1 अक्तूबर 2014, बुधवार
आठवां नवरात्र, अष्टमी तिथि, 2 अक्तूबर 2014, गुरूवार,
नौवां नवरात्र, नवमी तिथि, 3 अक्तूबर 2014, शुक्रवार
दशहरा, दशमी तिथि, 3 अक्तूबर 2014, शुक्रवार से प्रारंभ होकर शनिवार प्रात:काल तक रहेगी.

12 सितंबर 2014

कल्कि अवतार होना निश्चित है..!

कलयुग कब और कैसे आया

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया और भगवान श्री कृष्ण अपनी लीला का संवरण करके चले गए तो पांडवो ने भी अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के बेटे परीक्षित का राज अभिषेक करके स्वर्गारोहण किया . पाण्डवों के स्वर्ग जाने के पश्चात राजा परीक्षित ऋषि-मुनियों के आदेशानुसार धर्मपूर्वक शासन करने लगे। उनके जन्म के समय ज्योतिषियों ने जिन गुणों का वर्णन किया था, वे समस्त गुण उनमें विद्यमान थे। उनका विवाह राजा उत्तर की कन्या इरावती से हुआ। उससे उन्हें जनमेजय आदि चार पुत्र प्राप्त हुए। इस प्रकार वे समस्त ऐश्वर्य भोग रहे थे। 
एक बार दिग्विजय करते हुए परीक्षित सरस्वती नदी के तट पर पहुंचे। राजा ने छिपकर देखा. तो गौ रो रही थी.भगवान श्रीकृष्ण के जाने के साथ ही पृथ्वी पर कलयुग का आगमन हो गया था। इस युग में प्राणी पापाचार में लिप्त हो जाएंगे। यही सोचकर पृथ्वी अत्यंत दुःखी थी. 
तब बैल ने उससे कहा- तुम क्यों रही हो ? मेरा एक पैर बचा है क्या तुम मेरी इस हालत पर रो रही हो. वास्तव में वृषभ-रूप में धर्म तथा गाय-रूप में पृथ्वी थी. 
तब बैल ने कहा - सतयुग में मेरे (धर्म के) -पवित्रता, तप, दया और सत्य-ये चार चरण थे। किंतु कलयुग में गर्व, मोह और मद के कारण मेरे तीन चरण नष्ट हो गए हैं। अब केवल एक ही चरण बचा है सत्य जिसपर मै स्थित हूँ. तभी वहां उन्होंने देखा कि एक राजवेषधारी शूद्र हाथ में डंडा लिए एक पैर वाले वृषभ (बैल) और अति दुर्बल गाय को निर्दयता से पीटने लगा वह वृषभ भय से कांपता हुआ एक पैर पर खड़ा था और गाय उस शूद्र के पांवों के पास गिर कर उसकी ठोकरें खा रही थी। 
यह वीभत्स दृश्य देखकर परीक्षित क्रोधित होकर बोले-“ठहर जा दुष्ट! तू कौन है, जो इन निर्दोष और दुर्बल प्राणियों पर अत्याचार कर रहा है? यद्यपि तूने राजा का वेष धारण कर रखा है, किंतु तेरा कर्म तेरे शूद्र होने की बात कह रहा है। तूने मेरे राज्य में यह कार्य कर घोर अपराध किया है। इसलिए तेरा वध ही तेरे लिए उचित दण्ड है।”
परीक्षित ने धर्म और पृथ्वी को सांत्वना दी और म्यान से तलवार निकालकर आगे बढ़े। कलयुग ने देखा कि अब परीक्षित उसे मार ही डालेंगे तो उसने अपना राजसी वेश त्याग दिया और भय से व्याकुल होकर उनके चरणों में मस्तक झुका दिया। परीक्षित परम दयालु थे। जब उन्होंने कलयुग को अपनी शरण में देखा तो उनका मन दया से भर आया।


उन्होंने उसके रहने के लिए ये स्थान बता दिए- 

1. जुआ- जहाँ जुआ खेला जाता है. 
2. स्त्री- जहाँ परस्त्री गमन होता है. 
3. मद्य- जहाँ लोग शराब पीते है.
4. हिंसा - जहाँ हिंसा होती है.इस प्रकार जब राजा परीक्षित ने कलयुग को चार स्थान दिए तो वह बोला कोई एक और जगह दीजिये. 

तब राजा ने कहा -तुम स्वर्ण (सोना)में भी वास कर सकते हो.(यहाँ स्वर्ण का अर्थ अनीति से कमाये धन से है.) इनके साथ-साथ मिथ्या, मद, काम, हिंसा और वैर-ये पांच वस्तुएं भी कलि को दे दीं। 

राजा आखेट के लिए निकले थे जैसे ही स्वर्ण में रहने का स्थान दिया तो राजा उस दिन जो मुकुट पहने था वह जरासंध राजा का था जो भीम ने जबरजस्ती उससे छीन लिया था. इसलिए कलि उनके मुकुट में आकर बैठ गया. 

कलयुग राजा परीक्षित के सिर पर सवार था ही। उस दिन उन्हें दिनभर घुमने पर भी शिकार नहीं मिला और उनके सैनिक भी पीछे छुट गए वे भूखे प्यासे एक आश्रम में पहुँचे तब उन्होंने एक ऋषि को देखा.जो समाधि में थे तब उन्होंने जल कि याचना की परन्तु ऋषि तो समाधि में थे इसलिए उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया.

इस पर उनके सिर पर सवार कलि ने उनकी बुद्धि खराब कर दी और कहा - ये ढोग कर रहा है इसे मार डाल .परन्तु अच्छे संस्कार के कारण राजा ने उन्हें मारा तो नहीं क्रोधवश भूखे और प्यासे होने के कारण उनके गले में मरे सर्प को डाल दिया. क्योंकि ऋषि ध्यानमग्न थे, अतः परीक्षित का स्वागत नहीं कर सके थे। और आश्रम से चले गए. मुनि के श्रृंगी नामक पुत्र ने जब यह सुना तो परीक्षित को श्राप दे दिया कि आजा से सातवे दिन तक्षक नाग द्वारा कटने से आपकी मृत्यु हो जायेगी. 

इस प्रकार पृथ्वी पर कलयुग का आगमन हुआ और इसका पहला शिकार इसे शरण देने वाले परीक्षित ही बने। कलयुग की आयु 4,32,000 वर्ष कही गई है। इसका आरंभ 3102 वर्ष ईसा पूर्व से हुआ।

कल्कि अवतार ..

जिस तरह आज पुरे दुनिया में अत्याचार, भ्रस्टाचार, पापाचार और व्याविचार का बोलबाला बढ़ रहा है- लड़कियों और महिलाओं का घर से बाहर निकलना मुश्किल है, जमाखोरों ने महंगाई को एवरेस्ट पर पहुंचा दिया है, दलालों की पूछ बढ़ गयी है, पैकेटमारों की दिन-दूनी वृद्धि हो रही है, छिंताईबाज़ के पौ बारह हैं, नमक हरामो की चांदी काट रही है, स्कूलों में पढाई के नाम पर ऐश हो रहा है, स्कुल-अस्पताल-मंदिर बनाने  के नाम पर पूंजीपतियों का सबसे बड़ा गोरखधंधा चरम पर है....... इससे तो यही लगता है की किसी न किसी रूप में किसी कल्याणकारी का उद्गम जरूर होगा. पर प्रश्नवाचक चिन्ह भी चेहरे पर झलकने लगते है. क्या यह संभव है. धार्मिक पवृति के लोगों ने तो कल्कि अवतार की घोषणा भी कर दी है. सिर्फ यही नहीं समय और स्थान भी निर्धारित कर दिए गए हैं. अब देखना है की भगवान श्री  कल्कि का अवतार होता है या फिर लोगों का यह भ्रम मात्र है- राजेश मिश्रा।
यहाँ पर मैंने जो भी लिखा है अपने दिल से लिखा है.... किसी को आपत्ति हो या किसी के धर्म या उनके ईस्ट को इससे क्षति पहुचता है या उनके खुद को दुःख पहुचता है तो मुझे क्षमा करें। मैंने जो लिखा है वह सत्य है. 

"जय जय श्री राधे"

11 सितंबर 2014

जब हनुमानजी पड़ गए चक्कर में

कोई फर्क नहीं है नारायण और राम में


नारायण और राम दोनों वास्तव में एक ही हैं, मात्र नामों का अंतर है। 'नारायण' संस्कृत का शब्द है। राम का अर्थ क्या है? एक अर्थ है 'रमंते योगिनः यस्मिन रामः।' अर्थात् 'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय है जो योगियों के आध्यात्मिक मानसिक आभोग हैं, मानसाध्यात्मिक भोजन है, मानसाध्यात्मिक आनंद और प्रसन्नता के स्रोत हैं।
एक कहानी है कि किसी ने हनुमान से कहा, 'हनुमान, तुम एक भक्त हो और जानते हो कि मूलतः नारायण और राम में कोई अंतर नहीं है। तब तुम सर्वदा राम का ही नाम लेते हो, कभी नारायण का नाम नहीं लेते हो जबकि दोनों मूलतः एक ही हैं।' 

राम का दूसरा अर्थ है, 'राति महीधरः रामः।' 'रति' का प्रथम अक्षर 'र' है और 'महीधर' का प्रथम अथर 'म', राम। 'रति महीधरः', संपूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ ज्योतित सत्ता है, जिनसे सभी ज्योतित (प्रकाशित) सत्ताएं ज्योति प्राप्त करती हैं। चन्द्रमा पृथ्वी से ज्योति प्राप्त करती है, पृथ्वी सूर्य से ज्योति प्राप्त करती है और सूर्य परम पुरुष से ज्योति प्राप्त करते हैं। वे ही वह सर्वोच्च सत्ता है जो दूसरों को प्रकाशित करते हैं। वह सर्वोच्च प्रकाशमान सत्ता कौन हैं? परम पुरुष ही सर्वोच्च ज्योतित सत्ता हैं। 'राति महीधरः' का तात्पर्य है, मात्र परम पुरुष, कोई अलग सत्ता नहीं, कोई अन्य सत्ता नहीं। 'राम' का तीसरा अर्थ है, 'रावणस्य मरणं रामः'। 'रावण' शब्द का प्रथम अक्षर है 'रा' और 'मरणं' का प्रथम अक्षर है 'म'। राम-राम अर्थात वह सत्ता जिसके चाप से रावण मर जाता है। अस्तु, 'रावणस्य मरणं', रावण की मृत्यु कहां होती है, कब होती है? जब कोई राम की शरण में जाता है तो रावण मर जाता है। अतः 'रावणस्य मरणं राम', जो परम पुरुष, राम, चिति सत्ता की शरण में चला जाता है, वह रावण रूपी राक्षस का नाश कर सकता है। 'रावणस्य मरणं' का तात्पर्य सर्वोच्च चितिसत्ता। अतः 'राम' और 'नारायण' में कोई अंतर नहीं है। तुम्हें अधिकाधिक सचाई के साथ अपनी सम्पूर्ण मानसिक वृत्तियों को समाहृत करते हुए बिंदुभूत रूप में अपने लक्ष्य परम पुरुष की ओर चलना चाहिए। अपितु, सभी मानसिक वृत्तियों को सूई की नोक (सूच्यग्र) के समान एकाग्र करते हुए अपने 'मैं' भाव को मात्र उस एक तत्व की ओर, बिना किसी अन्य रूप, नाम, वर्ण अथवा विषय पर ध्यान दिए तुम्हें परिचालित करना चाहिए। इसीलिए हनुमान कहते हैं, 'श्रीनाथे जानकी नाथे।' 'श्री' शब्द का योगारूढ़ार्थ है, वह सत्ता जो रजोगुणी शक्ति की अधिष्ठान है, जो शक्ति से पूर्ण है। श्रीनाथ, श्री के मालिक 'नारायण' हैं और जानकी अर्थात् सीता के मालिक (पति) हैं राम। सीता में 'सी' का अर्थ है खेतों को जोतना (कल्चर), और उसका 'विशेषण' वाची शब्द है 'सीता' अर्थात् पूर्ण संस्कारित। यह संस्कार आता कहां से है? कौन इस संस्कार (संस्कृति) का मालिक है? इस संस्कार (संस्कृति) का कौन प्रेरणास्रोत अथवा सहायक है? परम पुरुष, श्रीनाथ अथवा जानकीनाथ का तात्पर्य है, उन्हीं परम पुरुष से। इसीलिए श्रीनाथ और जानकीनाथ में कोई अंतर नहीं है। हनुमान कहते हैं, 'मैं' इसे जानता हूं कि आध्यात्मिकता, अध्यात्मवाद और आध्यात्मिक साधना विज्ञान की भी दृष्टि से श्रीनाथ और जानकीनाथ में कोई अंतर नहीं है। 'तथापि मम सर्वस्वः रामः कमललोचनः।' 

अस्तु, मन की सम्पूर्ण वृत्तियों को एक ही तत्त्व की ओर परिचालित करो, एक नाम का उपयोग करो, मात्र अपने इष्ट मंत्र का उपयोग करो और किसी अन्य मंत्र का उपयोग मत करो। हनुमान इसीलिए कहते हैं, 'मैं मात्र राम का नाम जपता हूं । कभी भी नारायण का नाम नहीं जपता। मैं नहीं जानता कि और नारायण हैं कौन? प्रत्येक साधक को जानना चाहिए कि संपूर्ण विश्व में मात्र एक ही मंत्र है और वह है उसका इष्ट मंत्र। वह कोई और मंत्र जानता ही नहीं है।

08 सितंबर 2014

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Navaratri Maa Durge 
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Rajesh Mishra With Prasun Paul (Mata Vaishno Devi Tour)

मेरी ब्लॉग सूची

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  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
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