आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार (Year's 2016festival) नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

13 मार्च 2014

होलिका-दहन मंत्र और पूजन विधि और समय

जानिए होलिका-दहन मंत्र और पूजन विधि


रविवार, 16 मार्च 2014 के दिन होलिका-दहन किया जाएगा। प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भद्रारहित काल में होलिका-दहन किया जाता है। 16 मार्च 2014 को भद्रा काल की समाप्ति पश्चात होलिका-दहन किया जा सकता है इसलिए होलिका-दहन से पूर्व और भद्रा के पश्चात होली का पूजन किया जाना चाहिए।
भद्रा के मुख का त्याग करके निशा मुख में होली का पूजन करना शुभ फलदायक सिद्ध होता है। पर्व-त्योहारों को मुहूर्त शुद्धि में मनाना शुभ एवं कल्याणकारी है।

होलिका में आहुति देने वाली सामग्रियां

होलिका-दहन होने के बाद होलिका में जिन वस्तुओं की आहुति दी जाती है, उसमें नारियल, सप्तधान्य, गोबर के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग है। सप्त धान्य, गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर।

होलिका-दहन मंत्र और पूजन विधि

होलिका-दहन करने से पहले होली की पूजा की जाती है। इस पूजा को करते समय पूजा करने वाले व्यक्ति को होलिका के पास जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। पूजा करने के लिए निम्न सामग्री को प्रयोग करना चाहिए।
एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल आदि का प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त नई फसल के धान्यों, जैसे पके चने की बालियां व गेहूं की बालियां भी सामग्री के रूप में रखी जाती हैं। इसके बाद होलिका के पास गोबर से बने खिलौने रख दिए जाते हैं।
होलिका-दहन मुहूर्त समय में जल, मोली, फूल, गुलाल तथा गुड़ आदि से होलिका का पूजन करना चाहिए। गोबर से बनाए खिलौनों की 4 मालाएं अलग से घर लाकर सुरक्षित रख ली जाती हैं। इसमें से एक माला पितरों के नाम की, दूसरी हनुमानजी के नाम की, तीसरी शीतलामाता के नाम की तथा चौथी अपने घर-परिवार के नाम की होती है।
कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर 3 या 7 परिक्रमा करते हुए लपेटना होता है। फिर लोटे का शुद्ध जल व अन्य पूजन की सभी वस्तुओं को एक-एक करके होलिका को समर्पित किया जाता है। रोली, अक्षत व पुष्प को भी पूजन में प्रयोग किया जाता है। गंध-पुष्प का प्रयोग करते हुए पंचोपचार विधि से होलिका का पूजन किया जाता है। पूजन के बाद जल से अर्घ्य दिया जाता है।
सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में अग्नि प्रज्वलित कर दी जाती है। इसके बाद सार्वजनिक होली से अग्नि लाकर घर में बनाई गई होली में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। अंत में सभी पुरुष रोली का टीका लगाते हैं तथा महिलाएं भजन व गीत गाती हैं तथा बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
होली में सेंककर लाए गए धान्यों को खाने से निरोगी रहने की मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि होली की बची हुई अग्नि और राख को अगले दिन प्रातः घर में लाने से घर को अशुभ शक्तियों से बचाने में सहयोग मिलता है तथा इस राख का शरीर पर लेपन करने की भी प्रथा है।
राख का लेपन करते समय निम्न मंत्र का जाप करना कल्याणकारी रहता है-
'वंदितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च। इतस्त्वं पाहि मां देवी! भूति भूतिप्रदा भव’।
होलिका पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए-
अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्

इस मंत्र का उच्चारण कम से कम 5 माला के रूप में करना चाहिए।

विधि-
होलिका पूजन के लिए उसके समीप, पूर्व या उत्तरमुख वाले स्थान पर जमीन साफ़ कर बैठे. भगवान विष्णु और अग्निदेव के नामों से होलिका में आहूति दें. फ़ूल-माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चे सूत, गुड़ हल्दी की गांठे, मूंग बताशे, नारियल, बड़कुले आदि के द्वारा होलिका पूजन व आरती करें. कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर लपेटते हुए होलिका की तीन या सात बार परिक्रमा करें.
सूर्यास्त के बाद मुहूर्त का विचार करते हुए होलिका जलाई जाती है. इसमें चने की बालियाँ व गेँहू की बालियाँ सेंक कर खायी जाती है. मान्यता है कि इससे शरीर निरोग रहता है. होलिका दहन की बची हुई अग्नि और राख अगले दिन सुबह घर लाई जाती है. इसके लिए मान्यता है कि इससे बुरी शक्तियाँ घर नही आती, फ़िर इसी राख को प्रातः शरीर पर लगाई जाती है.
कथा-
होलिका दहन के लिए पुराणों में कई कथायें मिलती है, परन्तु सबसे प्रचलित कथा के अनुसार - राक्षसराज हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से शत्रुता रखता था. उसे अपनी शक्ति पर बहुत अभिमान था. इसलिए उसने स्वयं को ईश्वर धोषित कर दिया. इसके लिए उसने अपने राज्य में यज्ञ, हवन, आहूति सब बन्द करवा दिया. यदि कोई उसके आदेशों की अवहेलना करता तो उसे कठोर से कठोर दण्ड़ दिया जाने लगा. हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. उसने पिता के आदेशों को नही माना तथा भगवान विष्णु की भक्ति करता रहा. इससे क्रोधित हो असुर राज ने प्रह्लाद को समाप्त करने की कोशिश की परन्तु हर बार भगवान विष्णु की कृपा से वह असफ़ल ही रहा. राक्षसराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को भगवान शिव से एक ऐसी चमत्कारिक चादर वरदान में प्राप्त थी जिसे ओढ़ने से अग्नि उसे जला नही सकती थी. प्रह्लाद को अग्नि में जलाने के उद्देश्य से होलिका प्रह्लाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ गई. इस बार भी भगवान विष्णु ने अपने भक्त पर दया दिखाई और उनकी माया से चादर उड़कर प्रह्लाद पर आ गई. जिससे प्रह्लाद तो बच गया परन्तु होलिका जलकर भस्म हो गई. तभी से होलिका दहन का प्रचलन शुरु हुआ.

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    4 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook