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21 अप्रैल 2014

बद्रीनाथ

धरती पर बैकुंठ की यात्रा


श्री बद्रीनाथ धाम : Sri Badrinath Temple

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व भाग है जो पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह स्थल आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित गया था। देश की एकता और अखण्डता तथा हिन्दु धर्म के पुर्नस्थापना करने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल स्थापित किए गए-उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी।

भारत के उत्तर में स्थित यह मन्दिर भगवान विष्णु का दरबार माना जाता है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है।

जिसके दाहिने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है। आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा यहां एक मठ की भी स्थापना की गई थी। शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिएखुला रहता है। यहां पर 130 डिग्री सैल्सियस पर खौलता एक तप्त कुंड और सूर्य कुण्ड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

पंच बद्री या पांच बद्रियां

श्री बद्रीनाथ धाम में सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराध्य देव श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है।

श्री विशाल बद्री

श्री विशाल बद्री (श्री बद्रीनाथ में) विशाल बद्री के नाम से प्रसिद्घ मुख्य बद्रीनाथ मन्दिर, पंच बद्रियों में से एक है। इसकी देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात बद्रीनारायण नारद शिला के नीचे एक मूर्ति के रूप प्राप्त हुए। जिन्हें हम विशाल बद्री के नाम से जानते हैं।

श्री योगध्यान बद्री

श्री योगध्यान बद्री (पाण्डुकेश्वर में) 1500 वर्षो से भी प्राचीन योगध्यान बद्री का मन्दिर जोशीमठ तथा पीपलकोठी पर स्थित है। महाभारत काल के अंत में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के, कलियुग के� प्रभाव से बचने हेतु पाण्डव हिमालय की ओर आए और यही पर उन्होंने स्वर्गारोहण के पूर्व घोर तपस्या की थी।

श्री भविष्य बद्री

श्री भविष्य बद्री (जोशीमठ के पास) जोशीमठ के पूर्व में 17 कि.मी. की दूरी पर और तपोवल के सुबैन के पास भविष्य बद्री का मंदिर स्थित है। आदि ग्रंथों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

श्री वृद्घ बद्री

श्री वृद्घ बद्री (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) यह जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब कलियुग का आगमन हुआ तो भगवान विष्णु मंदिर में चले गये। यह मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। वृद्घ बद्री को आदि शंकराचार्य जी की मुख्य गद्दी माना जाता है।

श्री आदि बद्री

कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि.मी. दूर स्थित है। आदि बद्री को अन्य चार बद्रियों का पिता कहा जाता है। यहां 16 छोटे मंदिरों का समूह है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन मंदिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदि शंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शो के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत थे।

भौगोलिक स्थिति

चारों धामों में सर्वश्रेष्ठ हिन्दुओं का सबसे पावन तीर्थ बद्रीनाथ, नर और नारायण पर्वत श्रंखलाओं से घिरा, अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नीलकंठ पर्वत श्रंखला की पृष्ठभूमि पर स्थित है। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा चारों दिशाओं में से एक उत्तर में बद्रीनाथ धाम तीर्थस्थल की स्थापना की थी। 3,133 मी. की ऊंचाई पर स्थित 15 मी. ऊंचा बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 किमी, कोटद्वार से 327 किमी तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविधाजनक मार्गो से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रम्हकूप, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां के अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

पौराणिक मान्यताएं

बद्रीनाथ श्रद्घेय मंदिर पौराणिक गाथाओं, कथनों और घटनाओं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुर्खों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। गंगा की धारा बारह जल मार्गो में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। एक अन्य मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल बदरियाँ (जंगली बेरों) से भरा रहने के कारण इसको बद्री वन भी कहा जाता था। एक जनश्रुति के अनुसार पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉडर के अन्तिम गांव माण से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

ऐतिहासिक तथ्य

बद्रिनाथ मन्दिर का निर्माण 8 वीं सदी के बुद्घिजीवी संत आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा किया गया था। यह मन्दिर बर्फीले तुफानों के कारण कई बार क्षति ग्रस्त हुआ और पुनर् स्थापित किया गया है। सन् 1939 से पूर्व� श्री बदरीनाथ� मन्दिर के समस्त अधिकार इस मन्दिर के रावल के पास थे। परन्तु सन् 1939 में अंग्रेजी सरकार एवं तत्कालीन महाराजा टिहरी द्वारा श्री बद्रीनाथ मन्दिर समिति का गठन श्री बदरीनाथ एवं इनके अधीनस्थ मन्दिरों के रखरखाव तथा प्रबंधन के उद्देश्य से किया गया। अब इनका प्रबन्धन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति करती है।

कैसे पहुंचे

रेल परिवहन
बद्रीनाथ के सबसे समीपस्थ रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो यहां से मात्र 297 किमी. दूर स्थित है। ऋषिकेश भारत के प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली और लखनऊ आदि से सीधे तौर पर रेलवे से जुड़ा है। दिल्ली से रेल द्वारा बद्रीनाथ पहुंचने के लिए दो रूट का प्रयोग यात्रियों द्वारा किया जा सकता है। दिल्ली से ऋषिकेश-287 किमी., दिल्ली से कोटद्वार-300 किमी.

वायु मार्ग

बद्रीनाथ के लिए सबसे नजदीक स्थित जोली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून है जो वहां मात्र 314 किमी. की दूरी पर स्थित है। देहरादून से भारत के अन्य प्रमुख शहरों के लिए हवाई सेवा उपलब्ध है। बद्रीनाथ से सबसे समीप स्थित अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट इंदिरा गांधी एयरपोर्ट है।

सड़क परिवहन

उत्तरांचल स्टेट ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन दिल्ली-ऋषिकेश के लिए नियमित तौर पर बस सेवा उपलब्ध कराता है। इसके अलावा प्राइवेट ट्रांसपोर्ट भी बद्रीनाथ सहित अन्य समीपस्थ हिल स्टेशनों के लिए बस सेवा मुहैया कराता है। प्राइवेट टैक्सी और अन्य साधनों को किराए पर लेकर ऋषिकेश से बद्रीनाथ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
ऋषिकेश- 297 किमी.
देहरादून- 314 किमी.
कोटद्वार- 327 किमी.
दिल्ली- 395 किमी.

कहां रुके

बद्रीनाथ और जोशीमठ दोनों स्थानों पर तीर्थयात्रियों के रुकने हेतु विभिन्न प्रकार के होटल और धर्मशालाएं सस्ती दर पर उपलब्ध है।

होटल देवलोक, झुनझुनवाला कॉटेज, मोदी भवन, मित्तल कॉटेज, चंद कॉटेज, बद्रीश सदन, काली कमली धर्मशाला, जल निगम रेस्ट हाउस और फॉरेस्ट रेस्ट हाउस आदि यात्रियों के रूकने के लिए पर्याप्त स्थान उपल्ब्ध है।

उत्तरांचल सरकार अपने यात्रियों के लिए पर्यटन सूचना सुविधा भी उपलब्ध कराता है। इनके अलावा यहां विभिन्न रियायती दरों पर प्राइवेट होट्ल्स भी उपलब्ध है।

Rajesh Mishra tour on Badyanath Dham Deoghar

परशुराम जयंती | Parshuram Jayanti

भगवान परशुराम : Lord Parshuram

राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र,परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे. परशुराम भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. वह एक परम ज्ञानी तथा महान योद्धा थे इन्ही के जन्म दिवस को परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में बहुत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है.भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर देश भर में हवन, पूजन, भोग एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है तथा परशुराम जी शोभा यात्रा निकली जाती है. विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूर्व नाम तो राम था, परंतु को भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए.

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार के रूप में अवतरित हुए थे धर्म ग्रंथों के आधार पर परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्लतृतीया को हुआ था जिसे परशुराम जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन व्रत करने और पर्व मनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था. परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी.

भगवान परशुराम जयंती महत्व | Significance of Parshuram Jayanti


वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि त्रेतायुग आरम्भ की तिथि मानी जाती है और इसे अक्षय तृतीया भी कहते है इसी दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था. भागवत अनुसार हैहयवंश राजाओं के निग्रह के लिए अक्षय तृतीया के दिन जन्म परशुराम जी का जन्म हुआ. जमदग्नि व रेणुका की पांचवी सन्तान रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरीत होते हैं इनके चार बड़े भाई रूमण्वन्त, सुषेण, विश्व और विश्वावसु थे अक्षय तृतीया को भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था जिस कारण यह परशुराम जयंती के नाम से विख्यात है.

भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य रहा. परशुराम जी तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष रहे. परशुराम जी अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे उन्होंने दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की हर प्रकार से रक्षा व सहायता की. भगवान परशुराम जी की जयंती की अक्षततिथि तृतीया का भी अपना एक अलग महत्त्व है. इस तारीख को किया गया कोई भी शुभ कार्य फलदायक होता है. अक्षत तृतीया तिथि को शुभ तिथि माना जाता है इस तिथि में बिना योग निकाले भी कार्य होते हैं. भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. प्राचीन ग्रंथों में इनका चरित्र अलौकिक लगता है. महर्षि परशुराम उनका वास्तविक नाम तो राम ही था जिस वजह से यह भी कहा जाता है कि ‘राम से पहले भी राम हुए हैं’.

परशुराम जन्म कथा । Parshuram Katha


भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

पोराणिक काल में महिष्मती नगरी पर हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था. वह बहुत अत्याचारी शासक था. जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता, भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वह धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे इस प्रकार भगवान, परशुराम रूप में जन्म लेते हैं और पृथ्वी पर से पापियों का नाश कर देते हैं.

परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये थे. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका और तब परशुराम जी ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी का दान कर दिया और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगते हैं.

Rajasthan (Jaipur, Ringas, KhatuDham) Jate
samay Train men Shyam Baba ke Manohari
Sringar ke Samaksha Rajesh Mishra 

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