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23 मई 2014

BABA VISHWANATH : Sabse Uncha Shiv Mandir (Varanashi Hindu Vishwavidyalay)

सबसे ऊँचा शिव मंदिर 
(बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर)



भारत का सबसे ऊँचा (करीब 252 फुट) शिव मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मध्य में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर है। मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के तंजावुर स्थित वृहदेश्वर मंदिर की ऊँचाई से ज्यादा है। इसमें मुख्य शिखर के अलावा दो अन्य शिखर भी हैं। मंदिर की अंदर की दीवारों पर श्रीमद्भगवतगीता के श्लोक अंकित हैं।

इसके अलावा दीवारों पर संतों के अनमोल वचन भी संगमरमर पर उकेरे गए हैं। मंदिर के दोनों तरफ खूबसूरत मूर्तियाँ बनी हैं। मंदिर तथा आस-पास का परिसर इतना सुंदर है कि फिल्म बनाने वाले भी यहाँ आकर्षित होते हैं। हरे-भरे आमों के पेड़ मंदिर की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। कई फिल्मों की यहाँ पर शूटिंग भी हो चुकी है। मंदिर की साफ-सफाई इतनी अच्छी है कि कहीं पर एक तिनका नजर नहीं आता। इस मंदिर को अगर हिंदू विश्वविद्यालय का आध्यात्मिक केंद्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

यहाँ बाबा भोलेनाथ की आरती में इलेक्ट्रॉनिक घंटा-घड़ियाल लयबद्ध ताल में गूँजते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की कल्पना की परिणति है यह भव्य और अलौकिक सौंदर्य से भरा मंदिर। मंदिर के चढ़ावे से विश्वविद्यालय के 22 छात्रों को 'अन्न सुख' भी मिलता है।

मदनमोहन मालवीय की मंशा के अनुरूप इसे आकार देने का श्रेय उद्योगपति युगल किशोर बिरला को जाता है। मंदिर का शिलान्यास 11 मार्च 1931 को हुआ और 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि पर मंदिर के गर्भगृह में भगवान विश्वनाथ प्रतिष्ठित हुए। जीवन के अंतिम समय में बिस्तर पर पड़े मदनमोहन मालवीय की आँखें नम देख जाने-माने उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने मंदिर के बारे में पूछा तो वे मौन रहे।


मदनमोहन मालवीय को मौन देख बिरला बोले, आप मंदिर के बारे में चिंता न करें, मैं वचन देता हूँ कि पूरी तत्परता के साथ मंदिर के निर्माण कार्य में लगूँगा। तब मदनमोहन मालवीय निश्चिंत हुए और कुछ दिन बाद ही उनका देहाँत हो गया। मंदिर की अन्नदान योजना के तहत अभी 22 छात्रों और कुलपति के विवेकाधीन कोष से 16 छात्रों को भोजन कराया जाता है। मंदिर के कोष से इसका रख-रखाव होता है। विश्वविद्यालय की ओर से यहाँ छह पुजारी, तीन चौकीदार, दो गायक, एक तबला वादक, एक अधिकारी समेत अन्य कर्मचारी मंदिर की देखरेख एवं सेवा में तैनात हैं।
वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहाँ अपने को कृतार्थ करते हैं वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की 'पीकों' की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं।
पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ भक्तिभाव से जुटते हैं। मंदिर के मानद व्यवस्थापक ज्योतिषाचार्य पंडित चंद्रमौलि उपाध्याय के अनुसार इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहाँ का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनिया भर के आस्थावान श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जहाँ उनके जीवन में सात्विक मूल्यों का बीजारोपण होता है।

Basukinath Dham (Dumka)

बासुकीनाथ धाम (दुमका)




बासुकीनाथ दुमका-देवघर राजमार्ग पर दुमका जिला से उत्तर पश्चिम में लगभग 25 कि0मी0 की दूरी पर अवस्थित है। यह हिन्दुओं का बड़ा ही पवित्र तीर्थस्थल है जो बासुकीनाथ प्रखंड में पड़ता है। प्रतिवर्ष श्रावण मास में देश के विभिन्न प्रदेशों से लाखों श्रद्धालु आकर भगवान शिव को जल अर्पित कर पूजा करते हैं। यह तीर्थस्थल जसीडीह जंक्शन एवं जामताड़ा स्टेशन से रेल मार्ग से जुड़ा है। वायुमार्ग द्वारा राँची या कोलकाता हवाईअड्डा से भी यहाँ पहुँचा जा सकता है।

आकर्षण का केन्द्र मसानजोर

मयुराक्षी नदी पर निर्मित मसानजोर डैम और यहां आस पास का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। झारखंड, बिहार और प.बंगाल सहित कई राज्यों से सैलानी यहां भ्रमण करने एवं पिकनिक के उद्देश्य से आते हैं। दुमका जिला मुख्यालय से 30 कि.मी. की दूरी पर मसानजोर, दुमका-कोलकता सड़क मार्ग पर पड़ता हैं। क्षेत्र में पनबिजली एवं सिंचाई के उद्देश्य से 1951 में कनाडा सरकार द्वारा निर्मित इस डैम का शिलान्यास भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों किया गया था। डैम बनने के बाद इस क्षेत्र के लोगों को बिजली एवं सिंचाई की सुविधा मिलती हैं।

बासुकीनाथ


हरे भरे जंगलों, अनगिनत छोटी-बड़ी पहाड़ियों से भरे झारखंड प्रांत के उप राजधानी दुमका से सटे जरमुंडी प्रखंड अंतर्गत बासुकीनाथ धाम भक्तों के बीच फौजदारी दरबार के रुप में प्रसिद्ध हैं। आम तौर पर सालों भर इस अदालत में विभिन्न प्रकार के कष्टों के निवारण एवं मंगल कामना के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता हैं। लेकिन प्रत्येक वर्ष सावन माह में यह नगरी केसरीया चोलाधारी लाखों काँवरियों से केसरीया मय रहती हैं। यहां भारत के विभिन्न प्रांतों के अलावे पड़ोसी हिन्दू धर्मावलंबी देशों नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मारीशस के अलावे पश्चिम देशों से अप्रवासी भारतीय एवं अन्य धर्मों के भी लोग पहुंचते हैं। सावन मास में तो वसुधैव कुटुम्बकम, राष्ट्रीय एकता, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग, सदभाव की चरम स्थिति यहां दिखती हैं।

सुम्मेश्वरनाथ मंदिर में हैं दुर्लभ शिवलिंग

दुमका जिले के सरैयाहाट प्रखंड मुख्यालय से 11 किमी दूर धौनी गांव स्थित बाबा सुम्मेश्वर नाथ मंदिर हैं। ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्वों को संजोये इस मंदिर में शिवलिंग की पूजा होती हैं। इस मंदिर की पौराणिक कहानी महाभारत काल से संबंधित है। यह स्थल अपने प्राकृतिक खूबसूरती में बसे होने के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। घने जंगल में बसे इस मंदिर से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हैं। अति प्राचीन काल में यहां घनघोर जंगल में शुम्भ व निशुम्भ दो राक्षस भाईयों का वर्चस्व कायम था। दोनों ही शिवभक्त थे। दोनों भाईयों द्वारा ही यहां अलग- अलग शिवलिंग की स्थापना की गयी है। यह शिवलिंग आज भी जुड़वा शिवलिंग से जाना जाता है। यह पूरे देश में दुर्लभ शिवलिंग के नाम से प्रसिद्ध है।

शिव पहाड़ का नाग मंदिर

दुमका के शिव मंदिरों में शिवपहाड़ का एक विशेष ही महत्व हैं। शिवपहाड़ यहां के मनोरम स्थलों में भी एक विशेष स्थान रखता हैं। शहर के बीचो बीच स्थित पहाड़ के उपरी हिस्से में भगवान शिव का यह मंदिर लगभग सौ साल पुराना बताया जाता हैं। यहां सालों भर शिवभक्तों को बड़ी श्रद्धा के साश भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते देखा जाता है। भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए सावन महीने में खासकर सोमवार के दिन तो यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती हैं।

दुमका जिले के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल

सिरसानाथ
सिरसानाथ दुमका से महज 15 किमी की दूरी पर बारापलासी के निकट मयूराक्षी नदी के किनीरे बसा है। यहां शिव-पार्वदी जी का मंदिर है। इस मंदिर का शिवलिंग जमीन के भीतर से सर्प के रुप में बनकर बाहर निकला हैं। यहां दुमका एवं आसपास क्षेत्रों से सैकड़ो श्रद्धालु पहुंचते है।
पंचवाहिनी
यह स्थान शिकारीपाड़ा प्रखंड़ मुख्यालय के निकट ब्राह्मणी नदी से सटे जंगल में स्थित है। यहां की विशेषता यह है कि यहां एक अति प्राचीन शिव मंदिर का अवशेष मिला है, जो देखने लायक है। मंदिर अर्धनिर्मित है। पुरातत्व के दृष्टिकोण से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है।

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